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श्राद्ध से बढ़कर महान् यज्ञ तीनों लोकों में दूसरा कोई नहीं है।पितृ पक्ष की होने वाली है शुरुआत, इन मंत्रों के जप से मिलेगा पितरों का आशीर्वाद !

श्राद्धसे बढ़कर महान् यज्ञ तीनों लोकोंमें दूसरा कोई नहीं है।

इसमें जो कुछ दान दिया जाता है, वह सब अक्षय होता है। दूसरोंको जो दान दिया जाता है; उसका फल दस हजारगुना होता है। अपनी जातिवालोंको देनेसे लाख-गुना फल होता है क्योंकि मनुष्य का कर्तव्य अपने समुदाय या अपनी जाति का संरक्षण और देखभाल करना मुख्य है। पर पिण्डदान व श्राद्ध आदि में लगाया हुआ धन करोड़गुना होकर पुनः आपको ही प्राप्त हो जाता है क्योंकि जिन पूर्वजों तथा जिन जिन पितरों की कृपा से आपका जन्म हो सका उनके लिए कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए ही आश्विन मास का श्राद्ध काल निर्धारित किया गया है वेसे हर अमावस्या तथा अष्टकाओं में भी श्राद्ध कर्म अनिवार्य होता है।जो गृहस्थ हर अमावस्या को भी मासिक श्राद्ध करता है अथवा पितरों के निमित्त तिल मिश्रित जल से तीर्थ स्थल पर जाकर तर्पण वह गृहस्थ अति शीघ्र ही अद्वितीय धनधान्य और संतति से भरा हुआ होकर देवताओं और नवग्रहों की कृपा भी प्राप्त कर धन्य हो जाता है।

देवी स्वधा के पति जो पितर नाम से संबोधित किये गए हैं वे सभी देवताओं द्वारा भी पूजनीय हैं और वे आधुनिक मन्वंतर के देवताओं के भी पूर्वज हैं। अतः श्राद्ध कर्म से देवता भी प्रसन्न होते हैं। आप लोग वर्ष के 11 माह देवी देवताओं के लिए व्रत उपवास हवन आदि करते हो यह उत्तम कार्य है पर आश्विन मास का श्राद्ध काल उन सभी प्रकार के कर्मकांडो या सब कर्मो या हवन विधि विधान आदि को महाफल देने वाला ही समझा जाए।

पिण्डदान और श्राद्ध कर्म के दौरान उस बुलाये गए जितेन्द्रिय ब्राह्मण को दान देने पर वह अनन्त गुना फल देनेवाला बताया गया है।

पितरों के निमित्त तीर्थ में अन्नदान-जो गंगाजीके जलमें और गया, प्रयाग, पुष्कर, काशी, सिद्धकुण्ड तथा गंगा-सागर-संगम तीर्थमें पितरोंके लिये अन्नदान करता है, उसकी मुक्ति निश्चित है तथा उसके पितर अक्षय स्वर्ग प्राप्त करते हैं। उनका जन्म सफल हो जाता है। जो विशेषतः गंगाजीमें तिलमिश्रित जलके द्वारा तर्पण करता है, उसे भी मोक्षका मार्ग मिल जाता है। फिर जो पिण्डदान करता है, उसके लिये तो कहना ही क्या है। अमावास्या और युगादि तिथियोंको ( इनका वर्णन हमने कालखण्ड पुस्तक में किया है ) तथा चन्द्रमा और सूर्य ग्रहणके दिन जो पार्वण श्राद्ध करता है, वह अक्षय लोकका भागी होता है। उसके पितर उसे प्रिय आशीर्वाद और अनन्त भोग प्रदान करके दस हजार वर्षांतक तृप्त रहते हैं। ऐसा पद्मपुराण के सृष्टिखण्ड अध्याय ४७ का कथन है। इसलिये प्रत्येक पर्वपर पुत्रोंको प्रसन्नतापूर्वक पार्वण श्राद्ध करना चाहिये। माता-पिताके इस श्राद्ध-यज्ञका अनुष्ठान करके मनुष्य सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है।जो श्राद्ध प्रतिदिन किया जाता है, उसे नित्य श्राद्ध माना गया है। जो पुरुष श्रद्धापूर्वक नित्य श्राद्ध करता है, वह अक्षय लोकका उपभोग करता है। इसी प्रकार कृष्णपक्षमें विधिपूर्वक काम्य श्राद्धका अनुष्ठान करके मनुष्य मनोवांछित फल प्राप्त करता है। महालय या पितृपक्ष में पितरोंका श्राद्ध सभी को करना चाहिये। उस समय सूर्य कन्याराशिपर गये हैं या नहीं-इसका विचार नहीं करना चाहिये। जब सूर्य कन्याराशिपर स्थित होते हैं, उस समयसे लेकर सोलह दिन उत्तम दक्षिणाओं से सम्पन्न यज्ञों के समान महत्त्व रखते हैं। उन दिनोंमें इस परम पवित्र काम्य श्राद्धका अनुष्ठान करना उचित है। इससे श्राद्धकर्ताका मंगल होता है। यदि उस समय श्राद्ध न हो सके तो जब सूर्य तुला राशि पर स्थित हों, उसी समय कृष्णपक्ष आदिमें उक्त श्राद्ध करना उचित है।

चंद्र ग्रहण के समय – चन्द्रग्रहण ( आने ही वाला है चंद्र ग्रहण ..) के समय सभी दान भूमिदानके समान होते हैं, सभी संध्यापूत ब्राह्मण व्यासके समान माने जाते हैं , सभी जितेन्द्रिय संत सनत्कुमार के समान पावन माने गए हैं ।और समस्त जल गंगाजलके तुल्य हो जाता है। चन्द्रग्रहणमें दिया हुआ दान और समयकी अपेक्षा लाखगुना तथा सूर्यग्रहणका दस लाखगुना अधिक फल देनेवाला बताया गया है। और संयोग से चंद्र ग्रहण के समय आपको यदि गंगाजीका जल प्राप्त हो जाय, तब तो चन्द्रग्रहणका दान करोड़गुना और सूर्यग्रहणमें दिया हुआ दान दस करोड़गुना अधिक फल देनेवाला होता है। विधिपूर्वक एक लाख ( 1,00000) गोदान करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वह चन्द्रग्रहणके समय गंगाजीमें स्नान करनेसे मिल जाता है। जो चन्द्रमा और सूर्यके ग्रहणमें गंगाजीके जलमें डुबकी लगाता है, उसे सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान करनेका फल प्राप्त होता है। यदि रविवारको सूर्यग्रहण और सोमवारको चन्द्रग्रहण हो तो वह चूड़ामणि नामक योग कहलाता है; उसमें स्नान और दानका अनन्त फल माना गया है। उस समय पुण्य तीर्थमें पहले उपवास करके जो पुरुष पिण्डदान, तर्पण तथा धन-दान करता है, वह सत्यलोकमें प्रतिष्ठित होता है। अथवा कोई मनुष्य किसी घोर मजबूरी के कारण चंद्र ग्रहण के समय अथवा सूर्य ग्रहण के पावन समय यदि तीर्थ स्थल पर न जा पाए तो वह पवित्र स्थल पर बैठकर कुशा या स्वर्ण अथवा चांदी धारण करके देवी स्वधा के स्तोत्र का पाठ करे या श्राद्ध के दिन संध्यापूत ब्राह्मण से करवाये तो भी उस पर पितरों की कृपा निश्चित ही होती है

पितृ पक्ष की होने वाली है शुरुआत, इन मंत्रों के जप से मिलेगा पितरों का आशीर्वाद

● पितृ पक्ष की शुरुआत भाद्रपद पूर्णिमा से होगी और समापन आश्विन मास की अमावस्या को होगा, सोलह दिनों तक चलने वाले इस कालखंड में श्रद्धालु अपने पितरों को जल अर्पित करते हैं और उनकी मृत्यु तिथि पर श्राद्ध व तर्पण की विशेष परंपरा निभाते हैं, पंचांग के अनुसार, 2025 में पितृ पक्ष 7 सितंबर से प्रारंभ होकर 21 सितंबर को महालया अमावस्या के दिन संपन्न होगा।

● पितृ पक्ष के दौरान उपाय – पितृ पक्ष के दौरान पितृ दोष को दूर करने के भी कई उपाय किए जाते हैं, पितृ दोष ज्योतिष शास्त्र के अनुसार एक प्रमुख दोष माना जाता है, यह दोष उस कर्म ऋण का प्रतीक है, जो हमारे पूर्वजों के अधूरे या नकारात्मक कर्मों के कारण बनता है, यदि इसका निवारण न किया जाए तो व्यक्ति और उसका परिवार पितरों की नाराजगी के साथ-साथ जीवन में अनेक बाधाओं और अनहोनी घटनाओं का सामना कर सकता है, हालांकि शास्त्रों और रावण संहिता में इसके समाधान और विशेष मंत्र बताए गए हैं।

● पितृ दोष निवारण मंत्र – ऊँ श्री पितराय नमः तथा ऊँ श्री पितृदेवाय नमः – इन मंत्रों का 21 बार जाप करने से पूर्वज प्रसन्न होते हैं।

● ऊँ श्री पितृभ्यः नमः – 51 बार जाप करने से पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है।

● ऊँ श्री सर्व पितृ देवताभ्यो नमो नमः – 108 बार जाप करने से पितरों की कृपा और संतोष मिलता है।

● ऊँ पितृभ्यः स्वधायिभ्यः पितृगणाय च नमः – नियमित जप से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है।

● ऊँ श्राद्धाय स्वधा नमः – श्राद्ध कर्म के दौरान इस मंत्र का जाप विशेष लाभकारी है।

● ऊँ नमः शिवाय – शिवलिंग पर जल अर्पित करते हुए इस मंत्र का जाप करने से पितरों की आत्मा को शांति और पितृ दोष से मुक्ति मिलती है।

● पितृ गायत्री मंत्र – ऊँ पितृगणाय विद्महे, जगत धारिणी धीमहि। तन्नो पितृ प्रचोदयात्॥,

यह मंत्र पितरों की आत्मा को शांति और मुक्ति प्रदान करता है।

● पितृ नमन मंत्र –

ऊँ देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च।

नमः स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव नमो नमः॥

ब्रह्म पुराण के अनुसार, इस पितृ मंत्र का प्रतिदिन कम से कम एक माला जाप करने से पितृ दोष का प्रभाव काफी हद तक कम होता है और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा आती है।

Also Read:- श्राध्दपक्ष/ पितृपक्ष में क्या करने से मिलेगी पितृ ऋण से मुक्ति !

दिवम् एस्ट्रो वर्ल्ड आचार्या सौ भावनाजी बिसावा

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