दीपावली से पहले रमा एकादशी क्यों है खास? पूजा विधि, शुभ मुहूर्त और व्रत कथा
**रमा एकादशी: सौभाग्य, समृद्धि और मोक्ष का पावन पर्व** प्रत्येक वर्ष कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को रमा एकादशी का व्रत रखा जाता है। यह एकादशी दीपावली से ठीक चार दिन पहले आती है और इसे अत्यंत शुभ तथा फलदायी माना जाता है। भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी को समर्पित यह व्रत धन, धान्य, सुख-समृद्धि और आरोग्य प्रदान करने वाला है। ‘रमा’ देवी लक्ष्मी का ही एक नाम है, इसलिए इस एकादशी को रमा एकादशी कहा जाता है। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से व्रत रखने और पूजा करने से व्यक्ति के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। **रमा एकादशी का महत्व** हिंदू धर्म में एकादशी का व्रत भगवान विष्णु को समर्पित है और इसे सभी व्रतों में श्रेष्ठ माना जाता है। रमा एकादशी का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि यह देवी लक्ष्मी के नाम से जुड़ी है और दीपावली के आगमन का संकेत देती है। इस व्रत को करने से साधक को न केवल विष्णु जी का आशीर्वाद प्राप्त होता है, बल्कि देवी लक्ष्मी की कृपा से उसके घर में धन-धान्य की वृद्धि होती है। यह एकादशी व्यक्ति के जीवन में सकारात्मकता, शांति और समृद्धि लाती है।पद्म पुराण में रमा एकादशी के महत्व का विस्तृत वर्णन मिलता है। इस व्रत को करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं, दरिद्रता का नाश होता है और व्यक्ति को बैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है। यह व्रत शारीरिक और मानसिक शुद्धता के साथ-साथ आध्यात्मिक उन्नति का भी मार्ग प्रशस्त करता है। जो व्यक्ति निष्ठा और श्रद्धा के साथ इस व्रत का पालन करता है, उसे अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य प्राप्त होता है। **तिथि और शुभ मुहूर्त** रमा एकादशी कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को आती है। इसकी सटीक तिथि पंचांग के अनुसार बदल सकती है, लेकिन यह प्रायः अक्टूबर या नवंबर के महीने में पड़ती है। एकादशी तिथि का प्रारंभ और समापन समय महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि व्रत का संकल्प एकादशी तिथि के प्रारंभ में लिया जाता है और पारण द्वादशी तिथि में किया जाता है। व्रत के पारण का समय भी अत्यंत महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि द्वादशी तिथि के समाप्त होने से पहले और हरि वासर के बाद ही पारण करना चाहिए। **रमा एकादशी की व्रत कथा** रमा एकादशी की पावन कथा पद्म पुराण में वर्णित है, जो इस व्रत के महत्व को और भी बढ़ा देती है। प्राचीन काल में मुचुकुंद नाम के एक प्रतापी राजा थे, जो चंद्रभागा नगरी में राज्य करते थे। वे भगवान विष्णु के परम भक्त थे और न्यायप्रिय तथा धर्मात्मा शासक के रूप में विख्यात थे। राजा मुचुकुंद की एक अत्यंत सुंदर और गुणवान पुत्री थी, जिसका नाम चंद्रभागा था।राजा मुचुकुंद ने अपनी पुत्री चंद्रभागा का विवाह शोभन नामक एक राजकुमार से किया। शोभन एक धर्मात्मा और नेक हृदय का व्यक्ति था, लेकिन उसका स्वास्थ्य बहुत कमजोर था। वह शारीरिक रूप से दुर्बल था और बीमारियों से ग्रस्त रहता था। राजा मुचुकुंद के राज्य में सभी लोग, यहाँ तक कि उनके दामाद भी, एकादशी का व्रत नियमपूर्वक रखते थे।जब कार्तिक कृष्ण पक्ष की रमा एकादशी आई, तो चंद्रभागा और शोभन भी अपने पिता के घर पर थे। नगर में सभी लोग एकादशी व्रत की तैयारी कर रहे थे। चंद्रभागा ने अपने पति शोभन से कहा, “स्वामी! मेरे पिता के राज्य में एकादशी का व्रत बहुत कठोरता से रखा जाता है। इस दिन अन्न-जल ग्रहण नहीं किया जाता। यदि आप व्रत नहीं रखेंगे, तो आपको बहुत कष्ट होगा।”शोभन ने उत्तर दिया, “प्रिये! मैं तो अत्यंत दुर्बल हूँ। मुझसे निराहार व्रत कैसे हो पाएगा? यदि मैं जल भी नहीं पीऊँगा, तो संभव है कि मेरे प्राण ही निकल जाएँ।”चंद्रभागा बहुत चिंतित हुई। उसने सोचा कि यदि उसके पति ने व्रत नहीं रखा, तो उन्हें पाप लगेगा और यदि व्रत रखा, तो उनके प्राणों का संकट आ सकता है। वह अपने पिता राजा मुचुकुंद के पास गई और अपनी दुविधा बताई।राजा मुचुकुंद ने कहा, “बेटी, भगवान विष्णु की कृपा से सब संभव है। तुम अपने पति को हिम्मत दो। यदि वह शारीरिक रूप से अक्षम हैं, तो फलाहार या एक समय भोजन करके भी व्रत का पालन कर सकते हैं। किंतु व्रत का संकल्प और श्रद्धा महत्वपूर्ण है।” शोभन ने अपनी पत्नी चंद्रभागा की प्रेरणा और राजा मुचुकुंद के वचन सुनकर एकादशी का व्रत रखने का निश्चय किया। उसने संकल्प लिया कि वह यथाशक्ति व्रत का पालन करेगा। हालांकि, उसकी दुर्बलता के कारण वह व्रत के नियमों का पूरी तरह पालन नहीं कर पाया और व्रत के प्रभाव से उसकी मृत्यु हो गई।चंद्रभागा ने अपने पति की मृत्यु पर शोक व्यक्त किया, किंतु उसने अपने धर्म का पालन करते हुए स्वयं को सती नहीं किया, बल्कि अपने पिता के घर ही रहने का निर्णय लिया।रमा एकादशी के व्रत के प्रभाव से शोभन को अगले जन्म में मंदराचल पर्वत पर एक अत्यंत सुंदर और दिव्य नगरी प्राप्त हुई। यह नगरी धन-धान्य से परिपूर्ण थी और रत्नों से सुसज्जित थी। शोभन ने उस नगरी का राजा बनकर सुख-भोग किया। एक दिन, राजा मुचुकुंद के राज्य का एक ब्राह्मण, जो तीर्थ यात्रा पर निकला था, घूमते-घूमते मंदराचल पर्वत पर पहुँचा। उसने शोभन की दिव्य नगरी और उसके वैभव को देखा।उस ब्राह्मण ने शोभन को पहचान लिया और आश्चर्यचकित होकर पूछा, “राजकुमार शोभन! आप तो मृत हो चुके थे। यह सब कैसे संभव हुआ? इस अलौकिक नगरी का रहस्य क्या है?”शोभन ने ब्राह्मण को बताया, “यह सब मेरी पत्नी चंद्रभागा के पुण्य और रमा एकादशी के व्रत के प्रभाव से हुआ है। मैंने उस एकादशी का व्रत अत्यंत कठिनाई से रखा था, और उसी के पुण्य से मुझे यह दिव्य नगरी प्राप्त हुई है। किंतु, यह नगरी अस्थायी है, क्योंकि मैंने व्रत पूर्ण श्रद्धा से नहीं किया था। यदि चंद्रभागा यहाँ आकर मेरे साथ रहे, तो यह नगरी स्थायी हो सकती है।”ब्राह्मण ने वापस आकर चंद्रभागा को यह सारी बात बताई। चंद्रभागा अपने पति के जीवित होने और उनकी दिव्य नगरी के बारे में सुनकर अत्यंत प्रसन्न हुई। वह तुरंत उस ब्राह्मण के साथ मंदराचल पर्वत की ओर चल पड़ी। रास्ते में उन्हें देवगुरु बृहस्पति मिले, जिन्होंने चंद्रभागा को आशीर्वाद दिया और बताया कि उसके पति को
रमा एकादशी पर राशि अनुसार उपाय के लाभ !
रमा एकादशी 2025 : राशि अनुसार उपाय और उनका महत्व सनातन धर्म में एकादशी का व्रत भगवान विष्णु को समर्पित होता है, और आप जानते हैं क्या? सभी एकादशियों में रमा एकादशी का अपना एक खास महत्व है। ये कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को आती है – बिल्कुल दीपावली से पहले! इस दिन हम भगवान विष्णु के साथ-साथ देवी लक्ष्मी की भी पूजा करते हैं। और हाँ, ये व्रत सुख-समृद्धि और वैभव पाने के लिए बहुत ही फलदायी माना जाता है। शास्त्रों में लिखा है कि जो भी श्रद्धा से इस व्रत को करता है, उसके जीवन में धन, धान्य और अच्छी सेहत आती है। क्या आप जानते हैं रमा एकादशी का नाम कैसे पड़ा? दरअसल, देवी लक्ष्मी के एक स्वरूप को ‘रमा’ कहते हैं, और उन्हीं के नाम पर इसका नाम रखा गया है। लोगों का मानना है कि अगर आप इस दिन व्रत रखें और सही तरीके से पूजा करें, तो भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी दोनों का आशीर्वाद मिलता है। फिर क्या – घर में सुख-शांति और समृद्धि का माहौल बन जाता है! और हाँ, इस दिन जो भी दान-पुण्य या धार्मिक काम करते हैं, उसका फल कई गुना बढ़कर वापस मिलता है। इस दिन किए गए दान-पुण्य और धार्मिक अनुष्ठानों का फल कई गुना होकर वापस मिलता है। रमा एकादशी व्रत का महत्व: रमा एकादशी को ‘रंभा एकादशी’ भी कहा जाता है। यह व्रत चतुर्मास के अंतिम एकादशियों में से एक है, जब भगवान विष्णु क्षीरसागर में शयन कर रहे होते हैं। इस समय किए गए उपाय और पूजा-पाठ का विशेष फल मिलता है। इस दिन व्रत रखने से व्यक्ति के समस्त पापों का नाश होता है, उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है और जीवन में आने वाली सभी बाधाएं दूर होती हैं। यह व्रत विशेष रूप से धन-धान्य की वृद्धि, परिवार में सुख-शांति और दीर्घायु के लिए किया जाता है। सामान्य पूजा विधि: रमा एकादशी के दिन प्रातःकाल उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। व्रत का संकल्प लें और फिर धूप, दीप, चंदन, रोली, अक्षत, तुलसी दल, फल और मिष्ठान से भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी की पूजा करें। विष्णु सहस्त्रनाम या लक्ष्मी स्तोत्र का पाठ करना विशेष फलदायी होता है। दिन भर निराहार रहकर व्रत का पालन करें और शाम को भगवान की आरती करने के बाद फलाहार कर सकते हैं। अगले दिन द्वादशी को व्रत का पारण करें। राशि अनुसार उपाय का महत्व: ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, प्रत्येक व्यक्ति की अपनी एक विशेष राशि होती है, जिसका उसके जीवन, स्वभाव और भाग्य पर गहरा प्रभाव पड़ता है। ग्रहों की स्थिति और उनकी चाल के अनुसार हमारे जीवन में शुभ-अशुभ घटनाएं घटित होती हैं। जब हम अपनी राशि के अनुसार कोई विशेष उपाय या पूजा करते हैं, तो वह हमारी कुंडली में ग्रहों की स्थिति को अनुकूल बनाने में मदद करता है। रमा एकादशी के दिन राशि अनुसार उपाय करने से न केवल भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है, बल्कि संबंधित ग्रह भी मजबूत होते हैं, जिससे जीवन में अधिक सकारात्मकता और समृद्धि आती है। ये उपाय व्यक्ति की विशिष्ट समस्याओं को लक्षित करते हैं और उन्हें व्यक्तिगत रूप से अधिक लाभ पहुंचाते हैं।आइए जानते हैं रमा एकादशी पर अपनी राशि के अनुसार कौन से विशेष उपाय करने चाहिए:— मेष राशि (Aries): मेष राशि के जातकों के स्वामी मंगल देव हैं, जो ऊर्जा और पराक्रम के प्रतीक हैं। रमा एकादशी पर इन जातकों को भगवान विष्णु के नरसिंह स्वरूप और देवी लक्ष्मी के मंगलमयी स्वरूप की पूजा करनी चाहिए। उपाय: प्रातःकाल स्नान के बाद लाल वस्त्र धारण करें। भगवान विष्णु और लक्ष्मी जी को लाल चंदन, लाल फूल (जैसे गुड़हल) और लाल फल (जैसे अनार) अर्पित करें। विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें या “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का 108 बार जाप करें। दान:किसी गरीब व्यक्ति को लाल मसूर दाल या गुड़ का दान करें। लाभ:यह उपाय आपके क्रोध को शांत करेगा, शत्रु बाधा दूर करेगा और आत्मविश्वास में वृद्धि करेगा। धन संबंधी मामलों में भी लाभ होगा। वृषभ राशि (Taurus): वृषभ राशि के स्वामी शुक्र ग्रह हैं, जो धन, सौंदर्य और भौतिक सुखों के कारक हैं। इस राशि के जातकों को रमा एकादशी पर भगवान विष्णु के मोहिनी स्वरूप और देवी लक्ष्मी के धन लक्ष्मी स्वरूप की पूजा करनी चाहिए। उपाय: सफेद या गुलाबी वस्त्र धारण करें। भगवान विष्णु और लक्ष्मी जी को सफेद फूल (जैसे कमल या गुलाब), सफेद मिठाई और इत्र अर्पित करें। लक्ष्मी चालीसा या कनकधारा स्तोत्र का पाठ करें। दान: किसी सुहागिन स्त्री को सफेद वस्त्र, चावल या चीनी का दान करें। लाभ: यह उपाय आपके जीवन में सुख-समृद्धि लाएगा, आर्थिक स्थिति मजबूत करेगा और प्रेम संबंधों में मधुरता बढ़ाएगा। मिथुन राशि (Gemini): मिथुन राशि के स्वामी बुध ग्रह हैं, जो बुद्धि, वाणी और व्यापार के कारक हैं। इन जातकों को रमा एकादशी पर भगवान विष्णु के बुद्ध अवतार और देवी लक्ष्मी के विद्या लक्ष्मी स्वरूप की पूजा करनी चाहिए। उपाय: हरे वस्त्र धारण करें। भगवान को हरे रंग के फल (जैसे अमरूद), हरी इलायची और तुलसी दल अर्पित करें। “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” या “ॐ बुं बुधाय नमः” मंत्र का जाप करें। विष्णु पुराण का पाठ करना भी शुभ रहेगा। दान: किसी विद्यार्थी को पुस्तकें, कलम या हरी मूंग दाल का दान करें। लाभ: यह उपाय आपकी बुद्धि को तेज करेगा, वाणी में मधुरता लाएगा और व्यापार व करियर में सफलता दिलाएगा। कर्क राशि (Cancer): कर्क राशि के स्वामी चंद्रमा हैं, जो मन, माता और भावनाओं के कारक हैं। इन जातकों को रमा एकादशी पर भगवान विष्णु के कृष्ण स्वरूप और देवी लक्ष्मी के अन्नपूर्णा स्वरूप की पूजा करनी चाहिए। उपाय: सफेद वस्त्र धारण करें। भगवान को खीर, सफेद फूल (जैसे चमेली) और दूध से बनी मिठाई अर्पित करें। “ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चंद्रमसे नमः” मंत्र का जाप करें या चंद्र चालीसा का पाठ करें। दान: किसी जरूरतमंद को चावल, दूध या चांदी का दान करें। लाभ: यह उपाय आपके मन को शांत करेगा, मानसिक तनाव दूर करेगा और पारिवारिक सुख में वृद्धि करेगा। सिंह राशि (Leo): सिंह राशि के स्वामी सूर्य
परिवर्तिनी एकादशी
श्री पद्मा एकादशी महत्व विधि एवं कथा परिवर्तिनी (पद्मा) एकादशी का व्रत कल 03 सितंबर को रखा जाएगा। यह व्रत भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को रखा जाता है। इस दिन व्रत करने से आपके सभी कष्ट दूर होते हैं। परिवर्तिनी एकादशी भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को कहा जाता है। परिवर्तिनी एकादशी का व्रत कल 03 सितंबर बुधवार को रखा जाएगा। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु की विधि विधान से पूजा करने और व्रत करने से आपको सभी पापों से मुक्ति मिलने के साथ ही मोक्ष की भी प्राप्ति होती है। परिवर्तिनी एकादशी का महत्व इसलिए भी खास माना जाता है, क्योंकि मान्यता के अनुसार इस तिथि पर भगवान विष्णु पाताललोक में चातुर्मास की योग निद्रा के दौरान करवट बदलते हैं। इसलिए इसे परिवर्तिनी एकादशी कहते हैं। परिवर्तिनी एकादशी को जलझूलनी एकादशी और पद्मा एकादशी भी कहा जाता है। आइए आपको बताते हैं परिवर्तिनी एकादशी की तिथि कब से कब तक हैं और किस दिन व्रत रखना शास्त्र सम्मत होगा। परिवर्तिनी एकादशी की तिथि कब से कब तक परिवर्तिनी एकादशी तिथि का आरंभ 03 सितंबर बुधवार को देर रात 03 बजकर 53 मिनट से होगा और और यह 04 सितंबर गुरुवार को प्रातः 04 बजकर 21 मिनट पर समाप्त होगी। इसलिए उदया तिथि की मान्यता के अनुसार परिवर्तिनी एकादशी का व्रत 03 सितंबर को रखा जाएगा। पारण 04 सितंबर को सुर्योदय के उपरांत किया जाएगा। पद्मा एकादशी का महत्व पुराणों में मनीषी पुरुषों ने जल को ‘नारा’ कहा है। वह नारा ही भगवान का अयन-निवास स्थल है इसलिए वे नारायण कहलाते हैं। नारायण स्वरूप भगवान विष्णु सर्वत्र व्यापक रूप में विराजमान हैं। वे ही मेघ स्वरूप होकर वर्षा करते हैं। वर्षा से अन्न पैदा होता है और अन्न से प्रजा जीवन धारण करती है। श्रीविष्णु देवशयनी एकादशी से योग निद्रा में चले जाते हैं और भाद्रपद शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन वे अपनी करवट बदलते हैं। इस एकादशी को पद्मा, परिवर्तिनी, वामन एकादशी या डोल ग्यारस के नाम से जाना जाता है। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु करवट बदलने के समय प्रसन्न मुद्रा में रहते हैं, इस अवधि में भक्तिभाव और विनयपूर्वक उनसे जो कुछ भी मांगा जाता है वे अवश्य प्रदान करते हैं। यह भी माना जाता है कि इस दिन माता यशोदा ने जलाशय पर जाकर श्रीकृष्ण के वस्त्र धोए थे,इसी कारण इसे जलझूलनी एकादशी भी कहा जाता है। मंदिरों में इस दिन भगवान श्रीविष्णु की प्रतिमा या शालिग्राम को पालकी में बिठाकर पूजा-अर्चना के बाद ढोल-नगाड़ों के साथ शोभा यात्रा निकाली जाती है। एकादशी पूजा विधि शास्त्रों के अनुसार पद्मा एकादशी के दिन प्रातः स्नान आदि से निवृत होकर भगवान विष्णु के वामन अवतार को ध्यान करते हुए उन्हें पचांमृत से स्नान करवाएं। इसके पश्चात गंगाजल से स्नान करवाकर कुमकुम-अक्षत, पीले पुष्प, चन्दन, तुलसी पत्र आदि से श्री हरि की पूजा करें। वामन भगवान की कथा का श्रवण या वाचन करने के बाद दीपक से आरती उतारें एवं प्रसाद सभी में वितरित करें। पुण्य फलों की प्राप्ति के लिए भगवान विष्णु के मंत्र ‘‘ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय’’का यथा संभव तुलसी की माला से जाप करें। शाम के समय भगवान विष्णु के मंदिर अथवा उनकी मूर्ति के समक्ष भजन-कीर्तन करना शुभ माना गया है। पद्मा एकादशी का महत्व इस एकादशी पर भगवान विष्णु सहित देवी लक्ष्मी की पूजा करने से जीवन में धन और सुख-समृद्धि की प्राप्ति तो होती ही है। परलोक में भी इस एकादशी के पुण्य से उत्तम स्थान मिलता है। पद्मा एकादशी के विषय में शास्त्र कहता है कि इस दिन छाता,जूते, चावल, दही,जल से भरा कलश एवं चांदी का दान करना उत्तम फलदायी होता है। जो लोग किसी कारणवश पद्मा एकादशी का व्रत नहीं कर पाते हैं उन्हें पद्मा एकादशी के दिन भगवान विष्णु के विभिन्न अवतारों की कथा का पाठ करना चाहिए। विष्णु सहस्रनाम एवं रामायण का पाठ करना भी इस दिन उत्तम फलदायी माना गया है। ये मिलता है फल धर्मग्रंथों के अनुसार, पद्मा एकादशी का व्रत करने से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है। जो मनुष्य इस एकादशी को भगवान विष्णु के वामन रूप की पूजा करता है उसके समस्त पापों का नाश होता है और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसके साथ ही, भगवान विष्णु की कृपा से जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आती है। इस व्रत को करने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। व्रत कथा.. पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार युधिष्ठिर ने भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी की का नाम, देवता और पूजाविधि के बारे में पूछा। तब कृष्ण जी ने युधिष्ठिर को एक कथा सुनाई, जिसे ब्रह्माजी ने महात्मा नारद को कहा था। नारद ने ब्रह्माजी से पूछा – विष्णुजी की आराधना के लिए मैं आपसे जानना चाहता हूं कि भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी कौन-सी होती है? ब्रह्माजी ने कहा- आपने मुझे उत्तम प्रश्न किया है। भादो माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पद्मा के नाम से जाना जाता है। उस दिन भगवान ह्रषीकेश की पूजा की जाती है। सूर्यवंश में मान्धाता नामक एक चक्रवर्ती, सत्यप्रतिज्ञ और प्रतापी राजर्षि (जो राजा और ऋषि दोनों हों) हो गए हैं। उनके राज्य में अकाल नहीं पड़ता था। प्रजा को मानसिक चिंताएं नहीं सताती थीं और व्याधियों का प्रकोप भी नहीं होता था। उनकी प्रजा निर्भय और आर्थिक रूप से धन-समृद्ध थी। महाराज के कोष में केवल ईमानदारी से अर्जित धन का ही संग्रह था। उनके राज्य में समस्त वर्णों और आश्रमों के लोग अपने-अपने धर्म में लगे रहते थे। मान्धाता के राज्य की भूमि कामधेनु के समान फल देने वाली थी। उनके राज्यकाल में प्रजा का जीवन काफी सुखमय था।एक बार किसी कर्म के फलभोग के कारण राजा के राज्य में तीन वर्षों तक बारिश नहीं हुई। जिससे भूख से पीड़ित प्रजा नष्ट होने लगी। प्रजा महाराज के पास आकर कहने लगी कि आपको प्रजा की बात सुननी चाहिए। जल भगवान का निवास स्थान है। इसलिए वे नारायण कहलाते हैं। नारायणस्वरूप भगलावन विष्णु सर्वव्यापी है। वे ही मेघस्वरूप होकर वर्षा करते हैं और वर्षा से अन्न पैदा होता है और अन्न से प्रजा जीवित रहती है। महाराज, इस समय