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गुरुपूर्णिमा Gurupurnima

सभी देशवासियों को गुरुपूर्णिमा महर्षि वेदव्यास जयंती की असीम एवं हार्दिक शुभकामनाएं………..! हिंदू धर्म में गुरु पूर्णिमा का खास महत्व है। ज्योतिष पंचांग के अनुसार हर साल गुरु पूर्णिमा का पर्व आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि के दिन मनाये जाने का विधान है। इस तिथि को आषाढ़ पूर्णिमा, व्यास पूर्णिमा और वेद व्यास जयंती के नाम से भी जाना जाता है। साथ ही इस दिन महान गुरु महर्षि वेदव्यास जिन्होंने ब्रह्मसूत्र, महाभारत, श्रीमद्भागवत और अट्ठारह पुराण जैसे अद्भुत साहित्यों की रचना की उनका जन्म हुआ था। साथ ही इस दिन गुरु पूजन करने का खास महत्व है। साथ ही इस शुभ अवसर पर पवित्र नदी में स्नान और दान करने का विशेष महत्व है।जहां इस दिन को वेद व्यास जी की जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। वहीं लोग गुरु पूजन करते हैं। साथ ही गुरु को उपहार में फल, वस्त्र और मिष्ठान देते हैं। वहीं इस दिन सत्यनारायण भगवान की कथा घर पर कराना शुभ रहता है। गुरु पूर्णिमा की तिथि, शुभ मुहूर्त और धार्मिक महत्व- गुरु पूर्णिमा २०२५ तिथि-ज्योतिष पंचांग के मुताबिक आषाढ़ माह की पूर्णिमा तिथि की शुरुआत १० जुलाई को रात ०१ बजकर ३७ मिनट पर होगी और अगले दिन यानी ११ जुलाई रात को ०२ बजकर ०७ मिनट पर तिथि खत्म होगी। इस प्रकार से १० जुलाई को गुरु पूर्णिमा का पर्व मनाया जाएगा। गुरु पूर्णिमा २०२५ शुभ मुहूर्त -ब्रह्म मुहूर्त- सुबह ४:१०-४:५० बजे तक। अभिजीत मुहूर्त- सुबह ११:५९- १२:५४ बजे तक। विजय मुहूर्त- दोपहर १२:४५- ०३:४० बजे तक। गोधूलि मुहूर्त- शाम ०७:२१- ०७:४१ बजे तक। गुरु पूर्णिमा का महत्व-गुरु पूर्णिमा के दिन सभी गुरुओं को नमन किया जाता है। गुरु पूर्णिमा के अगले दिन से सावन मास प्रारंभ हो जाता है, जिसका उत्तर भारत में बहुत महत्व है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, आषाढ़ माह की पूर्णिमा तिथि पर भगवान वेद व्यास का जन्म हुआ था। इसलिए इस तिथि पर गुरु पूर्णिमा के पर्व को मनाया जाता है। महर्षि वेद व्यास ने कई वेदों और पुराणों की रचना की । इस खास अवसर पर भगवान विष्णु, मां लक्ष्मी और वेद व्यास जी की पूजा-अर्चना करने का खास महत्व है। वहीं गुरु की हमारे जीवन में महत्व को समझाने के लिए गुरु पूर्णिमा का पर्व मनाया जाता है। गुरु पूर्णिमा पर लोग अपने गुरुओं को उपहार देते हैं और उनका आर्शीवाद लेते हैं। ।। श्री गुरुवे नमः ।।

गुरु पूर्णिमा के दिन कौन से पाठ को श्रद्धा पूर्वक पढ़ने से होती है अभीष्ट लक्ष्य की प्राप्ति !

गुरु पूर्णिमा हर साल आषाढ़ मास की पूर्णिमा को मनाई जाती है गुरु पूर्णिमा। 10 जुलै 2025, गुरुवार, Thursday, 10/7/2025 Guru Purnima गुरु पूर्णिमा अपने गुरु की पूजा करने का दिन है, चाहे वे आध्यात्मिक हों या शैक्षणिक गुरु। भक्त और छात्र इस दिन अपने गुरुओं को श्रध्दा पुर्वक पूजते हैं। गुरु जिसका अर्थ है जो अंधकार या अज्ञान को दूर करता है। गुरु एक ऐसा शब्द है जिसका उपयोग केवल सांसारिक ज्ञान के शिक्षक को संदर्भित करने के लिए नहीं किया जाता है, बल्कि वह व्यक्ति जो आत्म-परिवर्तन और अंततः आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जा सकता है। गुरु शब्द का प्रयोग श्रद्धा और सम्मान के साथ किया जाता है और इसे हमेशा पवित्रता और सर्वोच्च ज्ञान के साथ जोड़ा जाता है। इसे अक्सर गुरुदेव के रूप में प्रयोग किया जाता है, जो एक प्रबुद्ध गुरु को संदर्भित करता है। गुरु मानवता का मार्गदर्शन करते हैं और प्राचीन ज्ञान और शिक्षाओं के माध्यम से समकालीन दुनिया में जीवन को समझने में मानव जाति की मदद करते हैं। सदाशिव समारंभं शंकराचार्य मध्यमाम् । अस्मदाचार्य पर्यंतां वंदे गुरु परंपराम् ॥ भगवान सदाशिव से शुरू होने वाली, मध्य में आदि शंकराचार्य से लेकर मेरे तात्कालिक गुरु तक जारी रहने वाली परंपरा को नमन। ||श्री गुरु अष्टकम् || शरीरं सुरूपं तथा वा कलत्रंयशश्चारु चित्रं धनं मेरु तुल्यम् । मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मेततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ॥ 1 ॥ कलत्रं धनं पुत्र पौत्रादिसर्वंगृहो बांधवाः सर्वमेतद्धि जातम् । मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मेततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ॥ 2 ॥ षड्क्षंगादिवेदो मुखे शास्त्रविद्याकवित्वादि गद्यं सुपद्यं करोति । मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मेततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ॥ 3 ॥ विदेशेषु मान्यः स्वदेशेषु धन्यःसदाचारवृत्तेषु मत्तो न चान्यः । मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मेततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ॥ 4 ॥ क्षमामंडले भूपभूपलबृब्दैःसदा सेवितं यस्य पादारविंदम् । मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मेततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ॥ 5 ॥ यशो मे गतं दिक्षु दानप्रतापात्जगद्वस्तु सर्वं करे यत्प्रसादात् । मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मेततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ॥ 6 ॥ न भोगे न योगे न वा वाजिराजौन कंतामुखे नैव वित्तेषु चित्तम् । मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मेततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ॥ 7 ॥ अरण्ये न वा स्वस्य गेहे न कार्येन देहे मनो वर्तते मे त्वनर्ध्ये । मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मेततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ॥ 8 ॥ गुरोरष्टकं यः पठेत्पुरायदेहीयतिर्भूपतिर्ब्रह्मचारी च गेही । लमेद्वाच्छिताथं पदं ब्रह्मसंज्ञंगुरोरुक्तवाक्ये मनो यस्य लग्नम् ॥ 9 ॥ श्री गुर्वष्टकम् (गुरु अष्टकम्) हिन्दी अनुवाद 1.) यदि आपके पास शरीर सुन्दर हो, पत्नी सुन्दर हो, यश उत्तम और विविध हो, तथा धन मेरु पर्वत के समान हो; किन्तु यदि आपका मन गुरु के चरण कमलों में आसक्त न हो, तो फिर क्या अर्थ है, फिर क्या अर्थ है, फिर क्या अर्थ है, फिर क्या अर्थ है? 2.) आपके पास पत्नी, धन, पुत्र, पौत्र आदि ये सब; घर, सम्बन्धी – ये सब हो सकते हैं; किन्तु यदि मन गुरु के चरण कमलों में आसक्त न हो, तो फिर क्या अर्थ अर्थ, फिर क्या अर्थ है, फिर क्या अर्थ अर्थ, फिर क्या अर्थ है? 3.) वेद तथा उनके छह सहायक शास्त्रों का ज्ञान भी उसके होठों पर हो; काव्य-कौशल में निपुण हो; तथा वह अच्छा गद्य और काव्य रच सकता हो; किन्तु यदि उसका मन गुरु के चरण कमलों में आसक्त न हो, तो फिर क्या अर्थ है, फिर क्या अर्थ है, फिर क्या अर्थ है, फिर क्या अर्थ है? 4.) ‘अन्य देशों में मेरा सम्मान है; अपने देश में मैं सौभाग्यशाली हूँ; ‘सदाचरण में मुझसे बढ़कर कोई नहीं है’ – ऐसा कोई सोच सकता है, लेकिन यदि किसी का मन गुरु के चरणकमलों में आसक्त नहीं है, तो फिर क्या अर्थ है, फिर क्या अर्थ है, फिर क्या अर्थ है, फिर क्या अर्थ है? 5.) संसार के सम्राटों और राजाओं द्वारा निरंतर किसी के चरणों की पूजा की जा सकती है; लेकिन यदि किसी का मन गुरु के चरणकमलों में आसक्त नहीं है, तो फिर क्या अर्थ अर्थ, फिर क्या अर्थ है, फिर क्या अर्थ है, फिर क्या अर्थ है? 6.) दान और पराक्रम के कारण मेरी कीर्ति सब ओर फैल गई है; इन गुणों के पुरस्कार स्वरूप संसार की सभी वस्तुएँ मेरे हाथ में हैं; लेकिन यदि मेरा मन गुरु के चरणकमलों में आसक्त नहीं है, तो फिर क्या अर्थ है, फिर क्या अर्थ है, फिर क्या अर्थ है, फिर क्या अर्थ है? 7) न भोग में, न एकाग्रता में, न घोड़ों की भीड़ में; न प्रियतम के मुख में, न धन में मन टिकता है; परन्तु यदि वह मन गुरु के चरणकमलों में आसक्त न हो, तो फिर क्या अर्थ है, फिर क्या अर्थ अर्थ, फिर क्या अर्थ है, फिर क्या अर्थ है? 8.) न तो वन में, न अपने घर में, न ही जो कुछ प्राप्त होना है, न शरीर में, न ही जो अमूल्य है, उसमें मेरा मन लगता है; परन्तु यदि मेरा मन गुरु के चरणकमलों में आसक्त न हो, तो फिर क्या अर्थ है, फिर क्या अर्थ है, फिर क्या अर्थ है, फिर क्या अर्थ है? 9.) जो पुण्यात्मा व्यक्ति गुरु पूर्णिमा के पावनपर्व पर इस अष्टक का पाठ करता है, तथा जिसका मन गुरु के वचनों पर स्थिर रहता है – चाहे वह तपस्वी हो, राजा हो, विद्यार्थी हो, या गृहस्थ हो, वह अभीष्ट लक्ष्य को प्राप्त करता है, जिसे ब्रह्म कहा जाता है। श्री गुरुवष्टकम् (गुरु अष्टकम्)

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