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।। उत्पातनाशन श्रीगणेश स्तोत्र ।।

।। उत्पातनाशन श्रीगणेश स्तोत्र ।। (हिन्दी अर्थ सहित) भगवान् गणेश समस्त विघ्नों का नाश करने वाले हैं तथा शुभ फल को साधकों को प्रदान करने वाले हैं। इनकी महिमा का वर्णन हमें अनेकों ग्रन्थों और पुराणों में प्राप्त होता है, उन्हीं में से एक समस्त उत्पातों के नाश के लिए श्रीगणेशपुराण में वर्णित उत्पातनाशनगणेशस्तोत्र है। इस स्तोत्र पाठ से समस्त उत्पातों का विनाश होता है। इस स्तोत्र के पाठ से उपासक को त्रिविध तापों से राहत प्राप्त होती है तथा भगवान् गणेश स्वयं इस स्तोत्र का पाठ करने वाले साधक की रक्षा करते हैं। नाथस्त्वमसि देवानां मनुष्योरगरक्षसाम्।।१।। यक्षगन्धर्वविप्राणां गजाश्वरथपक्षिणाम्। भूतभव्यभविष्यस्य बुद्धीन्द्रियगणस्यच।।२।। हर्षस्य शोकदुःखस्य सुखस्य ज्ञानमोहयोः। अर्थस्य कार्यजातस्य लाभहान्योस्तथैव च।।३।। स्वर्गपाताललोकानां पृथिव्या जलधेरपि। नक्षत्राणां ग्रहाणां च पिशाचानां च वीरुधाम्।।४।। वृक्षाणां सरितां पुंसां स्त्रीणां बालजनस्य च। उत्पत्तिस्थितिसंहारकारिणे ते नमो नमः।।५।। हे प्रभो ! आप देवता, मनुष्य, नाग, राक्षस, यक्ष, गन्धर्व, विप्र, गज, अश्व, रथ, पक्षी, भूत, वर्तमान, भविष्य, बुद्धि, इन्द्रियसमूह, हर्ष, शोक, दुःख, सुख, ज्ञान, मोह, अर्थ, समस्त कार्य, लाभ, हानि, स्वर्ग तथा पाताल आदि लोक, पृथ्वी, समुद्र, नक्षत्र, ग्रह, पिशाच, वनस्पति, वृक्ष, नदी, पुरुष, स्त्री एवं बालक-इन सभी के स्वामी हैं। सृष्टि, पालन तथा संहार करने वाले प्रभु आप [गणेश] को मेरा बारम्बार नमस्कार है। पशूनां पतये तुभ्यं तत्त्वज्ञानप्रदायिने। नमो विष्णुस्वरूपाय नमस्ते रुद्ररूपिणे।।६।। जीवरूपी पशुओं के पति तथा तत्त्वज्ञान प्रदान करनेवाले आपको नमस्कार है। विष्णुस्वरूप तथा रुद्रस्वरूप प्रभु आपको मेरा नमस्कार है। नमस्ते ब्रह्मरूपाय नमोऽनन्तस्वरूपिणे। मोक्षहेतो नमस्तुभ्यं नमो विघ्नहराय ते।।७।। ब्रह्मस्वरूप आपको नमस्कार है। अनन्तस्वरूप आपको नमस्कार है। हे मोक्षहेतो ! (मोक्ष को प्रदान करने वाले) आपको नमस्कार है। विघ्नों का नाश करने वाले आपको नमस्कार है। नमोऽभक्तविनाशाय नमो भक्तप्रियाय च। अधिदैवाधिभूतात्मंस्तापत्रयहराय ते।।८।। अभक्तों का नाश करने वाले आपको नमस्कार है तथा भक्तों के लिये प्रिय आपको नमस्कार है। सर्वोत्पातविघाताय नमो लीलास्वरूपिणे। सर्वान्तर्यामिणे तुभ्यं सर्वाध्यक्षाय ते नमः।।९।। हे प्रभु ! आप‌ आधिदैविक, आधिभौतिक तथा आध्यात्मिक- इन तीनों प्रकार के तापों का हरण करने वाले आपको नमस्कार है। समस्त उपद्रवों का नाश करने वाले तथा लीलास्वरूप आपको नमस्कार है। आप सर्वान्तर्यामी को नमस्कार है। आप सर्वाध्यक्ष को नमस्कार है। अदित्या जठरोत्पन्न विनायक नमोऽस्तु ते। परब्रह्मस्वरूपाय नमः कश्यपसूनवे।।१०।। देवी अदिति के गर्भ से उत्पन्न हे विनायक ! आपको नमस्कार है। आप परब्रह्मस्वरूप कश्यपपुत्र को नमस्कार है। अमेयमायान्वितविक्रमाय मायाविने मायिकमोहनाय। अमेयमायाहरणाय माया- महाश्रयायास्तु नमो नमस्ते।।११।। अपरिमित माया से सम्पन्न पराक्रम वाले, मायास्वरूप, मायावियों को भी मोहित कर देने वाले, अपरिमेय माया का हरण कर लेने वाले तथा महामाया के आश्रयस्वरूप आपको बार-बार नमस्कार है। य इदं पठते स्तोत्रं त्रिसंध्योत्पातनाशनम्। न भवन्ति महोत्पाता विघ्ना भूतभयानि च।।१२।। जो मनुष्य तीनों सन्ध्याकालों में उपद्रवों का नाश करने वाले इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसे महान् उत्पात, विघ्न तथा भूत-प्रेत जनित भय नहीं होता। त्रिसंध्यं यः पठेत् स्तोत्रं सर्वान् कामानवाप्नुयात्। विनायकः सदा तस्य रक्षणं कुरुतेऽनघ।।१३।। जो तीनों सन्ध्याओं में इस स्तोत्र को पढ़ता है, वह समस्त वांछित फल प्राप्त करता है और हे अनघ ! विनायक गणेश सदा उसकी रक्षा करते हैं। ।। इति श्रीगणेशपुराणे उत्पातनाशनगणेशस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।।

श्री गणेशमहिम्न: स्तोत्र (श्रीपुष्पदन्तविरचितं)

भगवान श्री गणेश का अद्भुत स्तोत्र जिसके पठन के प्रभाव से होती है आपकी यात्रा सफल और होता है यात्रा का उद्देश्य सफल ! श्री गणेशमहिम्न: स्तोत्र (श्रीपुष्पदन्तविरचितं) भगवान् शिव एवं गणपति के अनन्य भक्त श्रीपुष्पदन्तजी द्वारा विरचित इस स्तोत्र में भगवान् गणेश की महिमा का विस्तृत वर्णन इकत्तीस (31) श्लोकों में किया गया है । स्तोत्र पाठ के लाभ :आत्मानन्द की प्राप्ति । यात्रा की निर्विघ्न पूर्ति तथा उद्देश्य की प्राप्ति । मोक्ष प्राप्ति । विद्या-ऐश्वर्य तथा धन की प्राप्ति । सुलक्षणा पत्नी एवं सुपुत्र की प्राप्ति । श्रीगणेशमहिम्न: स्तोत्र हिन्दी अर्थ सहित।। अनिर्वाच्यं रूपं स्तवननिकरो यत्र गणित स्तथा वक्ष्ये स्तोत्रं प्रथमपुरुषस्यात्र महतः। यतो जातं विश्वं स्थितमपि सदा यत्र विलयः स कीदृग्गीर्वाणः सुनिगमनुतः श्रीगणपतिः ॥१॥ श्रीगणेशजी का रूप अनिर्वचनीय है और जिनकी अनेक स्तुतियाँ की गयी हैं तथापि उन महत्तम परम पुरुष का स्तवन् करने को मैं उद्यत हूँ। जिनसे संसार की उत्पत्ति, स्थिति तथा संहारादि कार्य सदा होते रहते हैं, उन वेदवन्दित भगवान् श्रीगणपति की स्तुति वाणी से कैसे सम्भव है ? गणेशं गाणेशाः शिवमिति च शैवाश्च विबुधा, रविं सौरा विष्णुं प्रथमपुरुषं विष्णुभजकाः। वदन्त्येके शाक्ता जगदुदयमूलां परशिवां, न जाने किं तस्मै नम इति परं ब्रह्म सकलम् ॥२॥ जिन्हें भगवान् गणेश के भक्त गणेश कहते हैं, शिव के विद्वान् भक्त शिव कहते हैं, सूर्य के भक्त सूर्य कहते हैं, विष्णु के भक्त प्रथम पुरुष विष्णु कहते हैं, शक्ति की उपासना करने वाले जगत् की उत्पत्ति का मूल पराशक्ति शिवा कहते हैं, मुझे ज्ञात नहीं वे वस्तुतः क्या हैं ? उन सम्पूर्ण कलायुक्त परब्रह्म को मेरा नमस्कार है । तथेशं योगज्ञा गणपतिमिमं कर्म निखिलं, समीमांसा वेदान्तिन इति परं ब्रह्म सकलम् । अजां साङ्ख्यो ब्रूते सकलगुणरूपां च सततं प्रकर्तारं न्यायस्त्वथ जगति बौद्धा धियमिति ॥३॥ इन श्री गणपति को ही योग के तत्त्व को जानने वाले ईश्वर कहते हैं, पूर्वमीमांसक सम्पूर्ण कर्म कहते हैं, (उत्तर मीमांसक) वेदान्ती लोग पूर्ण परब्रह्म कहते हैं, सांख्यवादी सर्वगुणमयी अनादि प्रकृति कहते हैं, नैयायिक लोग संसार का कर्ता मानते हैं और बौद्ध लोग बुद्धि कहते हैं । कथं ज्ञेयो बुद्धेः परतर इयं बाह्यसरणिर्यथा धीर्यस्य स्यात्स च तदनुरूपो गणपतिः । महत्कृत्यं तस्य स्वयमपि महान् सूक्ष्ममणुवद् धृतिर्ज्योतिर्बिन्दुर्गगनसदृशः किञ्च सदसत् ॥४॥ उस परतर परमात्मा के वास्तविक रूप का ज्ञान बुद्धिगम्य नहीं है, क्योंकि यह बुद्धि के बाहर की बात है। जिसकी जैसी धारणा होती है, उसे गणपति उसी रूप में प्राप्त होते हैं। उनके कृत्य महान् हैं, वे स्वयं भी महत्तम तथा अणु से भी सूक्ष्मतम हैं। धृति, ज्योति, बिन्दु, आकाश आदि सब उन्हीं के रूप हैं। वे ही सत् तथा असत् रूप से सर्वत्र विद्यमान हैं । अनेकास्योऽपाराक्षिकरचरणोऽनन्तहृदय-स्तथा नानारूपो विविधवदनः श्रीगणपतिः । अनन्ताह्व: शक्त्या विविधगुणकर्मैकसमये त्वसङ्ख्यातानन्ताभिमतफलदोऽनेकविषये ॥५॥ श्री गणपति अनेक मुखों से युक्त हैं, अपार नेत्र, हाथ तथा चरणों वाले हैं, वे अनन्त हृदय वाले हैं, विविध रूपों वाले हैं, विविध प्रकार के मुखों वाले हैं, उनके न नामों का अन्त है और न शक्ति का अन्त है, क्योंकि नाना प्रकार के गुण एवं कर्मों का सम्पादन वे एक काल में करते हैं । अपने भक्तों को अनेक प्रकार के असंख्य, अनन्त मनोवांछित फल वे एक साथ प्रदान करते रहते हैं । न यस्यान्तो मध्यो न च भवति चादिः सुमहता- मलिप्तः कृत्वेत्थं सकलमपि खंवत् स च पृथक् । स्मृतः संस्मतॄणां सकलहृदयस्थः प्रियकरो नमस्तस्मै देवाय सकलसुरवन्द्याय महते ॥६॥ परमात्मास्वरूप श्रीगणेशजी का न आदि है, न अन्त है और न मध्य है। वे सब कुछ करते हुए भी आकाश की तरह अलिप्त रहते हैं । वे स्मरण करने वाले भक्तों द्वारा सदा वन्दित होकर उनके हृदयों में अन्तर्यामी रूप से विराजमान रहते हैं तथा उनका कल्याण करते रहते हैं। सभी देवताओं के वन्दनीय उन महान् देव को मेरा नमस्कार है । गणेशाद्यं बीजं दहनवनितापल्लवयुतं मनुश्चैकार्णोऽयं प्रणवसहितोऽभीष्टफलदः । सबिन्दुश्चाङ्गाद्यां गणकऋषिछन्दोऽस्य च निचृत्, स देवः प्राग्बीजं विपदपि च शक्तिर्जपकृताम् ॥७॥ हे गणेश ! आपका मूल बीजमन्त्र (गं) एकाक्षर है, जो बिन्दु, अंगादि और प्रणव के सहित अभीष्ट फल को प्रदान करता है। इस मन्त्र के ऋषि गणक, छन्द निचृत् एवं देवता गणपति हैं। विपत्तिकाल में बीजाक्षर सहित इस मन्त्र (ॐ गं गणपतये नमः) का जप करने से भक्तों को शक्ति प्राप्त होती है । गकारो हेरम्बः सगुण इति पुन्निर्गुणमयो, द्विधाऽप्येको जातः प्रकृतिपुरुषो ब्रह्म हि गणः । स चेशश्चोत्पत्तिस्थितिलयकरोऽयं प्रथमको, यतो भूतं भव्यं भवति पतिरीशो गणपतिः ॥८॥ गकार हेरम्ब (माता अम्बा के पुत्र) सगुण प्रकृति तत्त्व हैं और निर्गुण पुरुषतत्त्व भी हैं। एक होते हुए भी प्रकृति और पुरुष रूप में दो प्रकार से विभक्त हुआ वह ब्रह्म ही गण है। वे ही परमात्मा उत्पत्ति, स्थिति तथा प्रलय करने वाले हैं, वे गणपति ही आदिदेव हैं, जिनसे भूत, भविष्य तथा वर्तमान होते हैं, ये गणपति सबके पति तथा ईश हैं । गकारः कण्ठोर्ध्वं गजमुखसमो मर्त्यसदृशो णकारः कण्ठाधो जठरसदृशाकार इति च । अधोभागः कट्यां चरण इति हीशोऽस्य च तनु- र्विभातीत्थं नाम त्रिभुवनसमं भूर्भुवः सुवः ॥९॥ गजमुखाकार ‘ग’ कण्ठ के ऊर्ध्वभाग में स्थित मृत्युलोक सदृश है, ‘णकार’ जठराकार होकर कण्ठ के अधोभाग में स्थित है और शकार कटि के अधोभाग में चरण बनकर स्थित है। इस प्रकार श्रीगणपति का गणेश नाम भूर्भुवः तथा सुवरूप त्रिभुवन के समान सुशोभित हो रहा है । गणेशेति त्र्यर्णात्मकमपि वरं नाम सुखदं, सकृत्प्रोच्चैरुच्चारितमिति नृभिः पावनकरम् । गणेशस्यैकस्य प्रतिजपकरस्यास्य सुकृतं, न विज्ञातो नाम्नः सकलमहिमा कीदृशविधः ॥१०॥ तीन वर्णों का जो यह ‘गणेश’ ऐसा सुखद एवं सुन्दर नाम है, वह मनुष्यों के द्वारा एक बार भी उच्च स्वर से उच्चारण किये जाने पर उन्हें पवित्र कर देता है। एक बार भी ‘गणेश’ नाम का जप करने वाले का पुण्य फल नहीं जाना जा सकता है, तो उनके नाम की सम्पूर्ण महिमा कितनी है, इसे कौन जान सकता है । गणेशेत्याह्वां यः प्रवदति मुहुस्तस्य पुरतः, प्रपश्यंस्तद्वक्त्रं स्वयमपि गणस्तिष्ठति तदा । स्वरूपस्य ज्ञानं त्वमुक इति नाम्नास्य भवति, प्रबोधः सुप्तस्य त्वखिलमिह सामर्थ्यममुना ॥११॥ जिस भक्त की जिह्वा में ‘गणेश’ ऐसा नाम उच्चरित होता है, सम्पूर्ण गणरूपा सृष्टि उसके सामने उसके मुख की ओर बार-बार निहारती रहती है। इस नाम जप में स्वरूप ज्ञान कराने का ऐसा सामर्थ्य है – जैसे किसी सोये हुए व्यक्ति को उसका नाम लेकर पुकारने पर हो जाता है । गणेशो विश्वेऽस्मिन्स्थित इह च विश्वं गणपतौ गणेशो यत्रास्ते धृतिमतिरमैश्वर्यमखिलम् । समुक्तं नामैकं गणपतिपदं मङ्गलमयं तदेकास्यं दृष्टेः सकलविबुधास्येक्षणसमम् ॥१२॥ ब्रह्मरूप श्रीगणपति सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त हैं एवं सम्पूर्ण विश्व उन गणपति में व्याप्त है। जहाँ मूर्तिमान् श्रीगणेशजी अधिष्ठित होते हैं, वहाँ नैसर्गिक

इस साल गणेश चतुर्थी पर बन रहा है दुर्लभ संयोग इस शुभ मुहूर्त में करे पूजा Ganesh Chaturthi

श्रीगणेश प्राकट्योत्सव (श्रीगणेश चतुर्थी) दिनांक- २७ अगस्त २०२५ को भगवान श्री गणेश अपने सभी भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करें-वैसे तो रोजाना ही भगवान गणेश की पूजा-अर्चना की जाती है, लेकिन भादों माह प्रभु की उपासना के लिए अत्यंत शुभ है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि पर गणेश चतुर्थी मनाई जाती है। इस दिन भगवान गणेश का जन्म हुआ था, जिसकी खुशी में देशभर में गणेश चतुर्थी मनाई जाती है। इस दौरान भक्तजन घरों, दफ्तरों, दुकानों और मंदिरों में गणपति जी की मूर्ति को स्थापित करते हैं और १० दिनों तक उनकी विधिनुसार उपासना करते हैं। इसके अलावा प्रभु की विशेष कृपा प्राप्ति के लिए मोदक, मोतीचूर लड्डू, खीर और मालपुआ जैस भोग लगाए जाते हैं, जिसे बेहद शुभ माना जाता है। इस वर्ष २७ अगस्त को गणेश चतुर्थी मनाई जा रही है। अतः प्रस्तुत है इस दिन गणपति जी की मूर्ति की स्थापना का शुभ मुहूर्त-इस बार भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि का प्रारंभ २६ अगस्त को दोपहर ०१ बजकर ५४ मिनट पर होगा। इसका समापन २७ अगस्त की दोपहर ०३ बजकर ४४ मिनट पर हो रहा है। उदया तिथि के अनुसार गणेश चतुर्थी का पर्व २७ अगस्त को मनाया जाएगा। स्थापना मुहूर्त- गणेश चतुर्थी पर भगवान गणेश की पार्थिव प्रतिमा पूजन एवं मूर्ति स्थापना के लिए २७ अगस्त को सुबह ११ बजकर ०५ मिनट से लेकर दोपहर ०१ बजकर ४० मिनट तक का शुभ मुहूर्त रहेगा। आप इस अवधि में गणपति जी की मूर्ति की स्थापना कर सकते हैं। गणेश चतुर्थी दुर्लभ संयोग-इस बार गणेश चतुर्थी पर प्रीति, सर्वार्थ सिद्धि, रवि के साथ इंद्र-ब्रह्म योग का संयोग बना रहेगा। वहीं कर्क में बुध और शुक्र के होने से लक्ष्मी नारायण योग का निर्माण होगा। इसके अलावा गणेश चतुर्थी पर बुधवार का महासंयोग तिथि की महत्ता को गई गुना बढ़ा रहा है। ।। जय गौरीनन्दन भगवान श्री गणेश ।।

किस देवता या देवी को कौन सा प्रसाद चढ़ाना चाहिये ?? आप जिन देवता की भक्ति करते हो उन्हें चढ़ाए इस व्यंजन से बना हुआ प्रसाद भगवान होंगे प्रसन्न ! देंगे मनचाहा वरदान !

किस देवता या देवी को कौन सा प्रसाद चढ़ाना चाहिये ??? ‘पत्रं, पुष्पं, फलं, तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मन:।’ अर्थ:– जो कोई भक्त मेरे लिए प्रेम से पत्र, पुष्प, फल, जल आदि अर्पण करता है, उस शुद्ध बुद्धि निष्काम प्रेमी का प्रेमपूर्वक अर्पण किया हुआ वह पत्र-पुष्पादि मैं सगुण रूप में प्रकट होकर प्रीति सहित खाता हूं। -श्रीकृष्ण पूजा-पाठ या आरती के बाद तुलसीकृत जलामृत व पंचामृत के बाद बांटे जाने वाले पदार्थ को ‘प्रसाद’ कहते हैं। पूजा के समय जब कोई खाद्य सामग्री देवी-देवताओं के समक्ष प्रस्तुत की जाती है तो वह सामग्री प्रसाद के रूप में वितरण होती है। इसे ‘नैवेद्य’ भी कहते हैं। मनमाने प्रसाद हिन्दू धर्म में मंदिर में या किसी देवी या देवता की मूर्ति के समक्ष प्रसाद चढ़ाने की प्राचीनकाल से ही परंपरा रही है। यह बहुत महत्वपूर्ण सवाल है कि किस देवता को चढ़ता है कौन-सा प्रसाद। आजकल लोग कुछ भी लेकर आ जाते हैं और भगवान को चढ़ा देते हैं, जबकि यह अनुचित है। यह तर्क देना कि ‘देवी या देवता तो भाव के भूखे होते हैं, प्रसाद के नहीं’, ‍उचित नहीं है। आजकल मनमानी पूजा और मनमाने त्योहार भी बहुत प्रचलन में आ गए हैं। प्राचीन उत्सवों को फिल्मी लुक दे दिया गया है। गरबों में डिस्को डांडिया होने लगा है, जो कि धर्म-विरुद्ध कर्म है। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि किस देवता को चढ़ता है किस चीज का प्रसाद जिससे कि वे प्रसन्न होंगे। प्रसाद चढ़ाने का प्रचलन कब शुरू हुआ? यज्ञ की आहुति भी देवता का प्रसाद है : प्रसाद चढ़ावे को नैवेद्य, आहुति और हव्य से जोड़कर देखा जाता रहा है, लेकिन प्रसाद को प्राचीनकाल से ही ‘नैवेद्य’ कहते हैं, जो कि शुद्ध और सात्विक अर्पण होता है। इसका संबंध किसी बलि आदि से नहीं होता। हवन की अग्नि को अर्पित किए गए भोजन को ‘हव्य’ कहते हैं। यज्ञ को अर्पित किए गए भोजन को ‘आहुति’ कहा जाता है। दोनों का अर्थ एक ही होता है। हवन किसी देवी-देवता के लिए और यज्ञ किसी खास मकसद के लिए। प्राचीनकाल से ही प्रत्येक हिन्दू भोजन करते वक्त उसका कुछ हिस्सा देवी-देवताओं को समर्पित करते आया है। यज्ञ के अलावा वह घर-परिवार में भोजन का एक हिस्सा अग्नि को समर्पित करता था। अग्नि उस हिस्से को देवताओं तक पहुंचा देती थी। चढा़ए जाने के उपरांत नैवेद्य द्रव्य ‘निर्माल्य’ कहलाता है। यज्ञ, हवन, पूजा और अन्न ग्रहण करने से पहले भगवान को नैवेद्य एवं भोग अर्पण की शुरुआत वैदिक काल से ही रही है। ‘शतपत ब्राह्मण’ ग्रंथ में यज्ञ को साक्षात भगवान का स्वरूप कहा गया है। यज्ञ में यजमान सर्वश्रेष्ठ वस्तुएं हविरूप से अर्पण कर देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त करना चाहता है। शास्त्रों में विधान है कि यज्ञ भोजन पहले दूसरों को खिलाकर यजमान ग्रहण करेंगे। वेदों के अनुसार यज्ञ में हृविष्यान्न और नैवेद्य समर्पित करने से व्यक्ति देवऋण से मुक्त होता है। प्राचीन समय में यह नैवेद्य (भोग) अग्नि में आहुति रूप में ही दिया जाता था, लेकिन अब इसका स्वरूप थोड़ा-सा बदल गया है। गुड़-चने के प्रसाद का प्रचलन ऐसे हुआ शुरू देवर्षि नारद भगवान विष्णु से आत्मा का ज्ञान प्राप्त करना चाहते थे लेकिन जब भी वे विष्णुजी के पास जाते तो विष्‍णुजी कहते कि पहले उन्हें इस ज्ञान के योग्य बनना होगा। तब नारदजी ने कठोर तप किया लेकिन फिर भी बात नहीं बनी तब वे चल पड़े धरती की ओर। धरती पर उन्होंने एक मंदिर में साक्षात विष्णु को बैठे हुए देखा कि एक बूढ़ी महिला उन्हें अपने हाथों से कुछ खिला रही है। नारदजी ने विष्णुजी के जाने के बाद उस बूढ़ी महिला से पूछा कि उन्होंने नारायण को क्या खिलाया? तब उन्हें पता चला कि गुड़-चने का प्रसाद उन्होंने ग्रहण किया था। कहते हैं कि नारद तब वहां रुककर तप और व्रत करने लगे और गुड़-चने का प्रसाद सभी को बांटने लगे। एक दिन नारायण स्वयं प्रकट हुए और उन्होंने नारद से कहा कि सच्ची भक्ति वाला ही ज्ञान का अधिकारी होता है। भगवान विष्णु ने उस बूढ़ी महिला को वैकुंठ धाम जाने का आशीर्वाद दिया और कहा कि जब भी कोई भक्त गुड़ और चना अर्पित करेगा उसकी मनोकामना निश्चित ही पूरी होगी। माना जाता है कि तभी से सभी ऋषि, मुनि और भक्त अपने इष्ट को गुड़ और चने का प्रसाद चढ़ाकर प्रसन्न करते आ रहे हैं। प्रचलित प्रसाद:– गुड़-चना, चना-मिश्री, नारियल-मिठाई, लड्डू, फल, दूध और सूखे मेवे। विष्णु भोग विष्णुजी को खीर या सूजी के हलवे का नैवेद्य बहुत पसंद है। खीर कई प्रकार से बनाई जाती है। खीर में किशमिश, बारीक कतरे हुए बादाम, बहुत थोड़ी-सी नारियल की कतरन, काजू, पिस्ता, चारौजी, थोड़े से पिसे हुए मखाने, सुगंध के लिए एक इलायची, कुछ केसर और अंत में तुलसी जरूर डालें। उसे उत्तम प्रकार से बनाएं और फिर विष्णुजी को भोग लगाने के बाद वितरित करें। भारतीय समाज में हलवे का बहुत महत्व है। कई तरह के हलवे बनते हैं लेकिन सूजी का हलवा विष्णुजी को बहुत प्रिय है। सूजी के हलवे में भी लगभग सभी तरह के सूखे मेवे मिलाकर उसे भी उत्तम प्रकार से बनाएं और भगवान को भोग लगाएं। प्रति रविवार और गुरुवार को विष्णु-लक्ष्मी मंदिर में जाकर विष्णुजी को उक्त उत्तम प्रकार का भोग लगाने से दोनों प्रसन्न होते हैं और उसके घर में किसी भी प्रकार से धन और समृद्धि की कमी नहीं होती है। शिव भोग शिव को भांग और पंचामृत का नैवेद्य पसंद है। भोले को दूध, दही, शहद, शकर, घी, जलधारा से स्नान कराकर भांग-धतूरा, गंध, चंदन, फूल, रोली, वस्त्र अर्पित किए जाते हैं। शिवजी को रेवड़ी, चिरौंजी और मिश्री भी अर्पित की जाती है। श्रावण मास में शिवजी का उपवास रखकर उनको गुड़, चना और चिरौंजी के अलावा दूध अर्पित करने से सभी तरह की मनोकामना पूर्ण होती है। श्री हनुमान भोग हनुमानजी को हलुआ, पंच मेवा, गुड़ से बने लड्डू या रोठ, डंठल वाला पान और केसर- भात बहुत पसंद हैं। इसके अलावा हनुमानजी को कुछ लोग इमरती भी अर्पित करते हैं।कोई व्यक्ति 5 मंगलवार कर हनुमानजी को चोला चढ़ाकर यह नैवेद्य लगाता है, तो उसके हर तरह के संकटों का अविलंब समाधान होता है। माँ लक्ष्मी भोग लक्ष्मीजी को धन की देवी माना

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