Enable Notifications OK No thanks

पितृ दोष के लक्षण एवं पितृदोष शांति के उपाय

Also Read:-पितृदोष की शांति के उपाय || पितृ-सूक्तम्|| ||श्राद्ध महिमा || Also Read:- श्राद्ध से बढ़कर महान् यज्ञ तीनों लोकों में दूसरा कोई नहीं है।पितृ पक्ष की होने वाली है शुरुआत, इन मंत्रों के जप से मिलेगा पितरों का आशीर्वाद ! Also Read:-श्राध्दपक्ष/ पितृपक्ष में क्या करने से मिलेगी पितृ ऋण से मुक्ति !

श्राध्दपक्ष/ पितृपक्ष में क्या करने से मिलेगी पितृ ऋण से मुक्ति !

पितृपक्ष 2025 : महत्व, तिथि एवं विधि (07 सितंबर 2025, रविवार से 21 सितंबर 2025, रविवार तक) ॐ पितृदेवानां नमो नमः । ॐ ब्रह्मयोनये पितृलोकनाथाय नमः । ॐ सोमाय पितृराजाय स्वधा नमः । ॐ वसु-रुद्रादित्य-पितृभ्यः स्वधा नमः । ॐ सप्तर्षिभ्यः पितृभ्यश्च नमः स्वधा स्वाहा । ॐ त्रैलोक्यपालक पितृभ्यः सर्वेभ्यो नमो नमः ।। ॐ नमोऽस्तु पितृभ्यः पितामहेभ्यः प्रपितामहेभ्यश्च । नमो नमः सर्वेभ्यो ये के च न स्मर्यन्ते ॥ “उन पितरों को मेरा बार-बार नमस्कार है — पिता, पितामह, प्रपितामह और वे भी जिनका नाम स्मरण में नहीं आता।”:ॐ पितृभ्यः स्वधा नमः । 01.. पितृपक्ष 2025 : तिथि तालिकाप्रारंभ : 7 सितंबर 2025, रविवार (पूर्णिमा श्राद्ध)समापन : 21 सितंबर 2025, रविवार (सर्वपितृ अमावस्या) दिन, वार, श्राद्ध तिथियाँ 7 सितम्बर – रविवार,पूर्णिमा श्राद्ध 8 सितम्बर –सोमवार प्रतिपदा श्राद्ध 9 सितम्बर –मंगलवार, द्वितीया श्राद्ध 10 सितम्बर –बुधवार, तृतीया, चतुर्थी श्राद्ध 11 सितम्बर – गुरुवार, चतुर्थी, महाभरणी श्राद्ध 12 सितम्बर – शुक्रवार, पंचमी—षष्ठी श्राद्ध 13 सितम्बर – शनिवार, सप्तमी श्राद्ध 14 सितम्बर –रविवार , अष्टमी श्राद्ध 15 सितम्बर – सोमवार,नवमी श्राद्ध 16 सितम्बर – मंगलवार,दशमी श्राद्ध 17 सितम्बर –बुधवार, एकादशी श्राद्ध 18 सितम्बर – गुरुवार,द्वादशी श्राद्ध 19 सितम्बर – शुक्रवार,त्रयोदशी, मघा श्राद्ध 20 सितम्बर – शनिवार,चतुर्दशी श्राद्ध 21 सितम्बर – रविवार,सर्वपितृ अमावस्या (मुख्य श्राद्ध) 2… पितरों का परिचय पितर शब्द संस्कृत के “पिता” या पूर्वज से बना है।वे हमारे पूर्वज हैं जिनकी आत्मा परलोक में स्थित है।उनका आशीर्वाद मिलने पर परिवार में सुख-समृद्धि और शांति आती है, और उपेक्षा करने पर जीवन में बाधाएँ उत्पन्न हो सकती हैं। हिन्दू धर्म में पितृपक्ष का बहुत महत्व है। प्रत्येक वर्ष आश्विन माह की कृष्ण पक्ष तिथि को पितृपक्ष कहा जाता है। इसे श्राद्ध पक्ष भी कहते हैं। पितरों की आत्मा की शांति के लिए इस पक्ष में श्रद्धापूर्वक तर्पण, पिंडदान, हवन और ब्राह्मण भोजन कराया जाता है। श्राद्ध और तर्पण करने का कारण है पितरों को प्रसन्न करना। यह विश्वास है कि पितर प्रसन्न होकर अपने वंशजों को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं। धर्मशास्त्रों के अनुसार श्राद्ध-पक्ष में पितरों का पृथ्वी पर आगमन होता है। पितरों की आत्मा की शांति और तृप्ति के लिए श्राद्ध कर्म, तर्पण और ब्राह्मण भोजन कराया जाता है। श्राद्ध शब्द श्रद्धा से बना है। श्रद्धा का अर्थ है ।आस्था और विश्वास। आस्था और विश्वास से किया गया कर्म ही श्राद्ध कहलाता है। शास्त्रों के अनुसार श्राद्ध कर्म से पितर तृप्त होते हैं और आशीर्वाद देते हैं। श्राद्ध पक्ष में किया गया पिंडदान, तर्पण, ब्राह्मण भोजन, दान-पुण्य आदि पितरों को तृप्त कर उन्हें मोक्ष की ओर अग्रसर करता है। श्राद्ध कर्म करने से पितरों की आत्मा की शांति होती है। पितर प्रसन्न होकर परिवार की रक्षा करते हैं और घर-परिवार को खुशियों से भर देते हैं। शास्त्रों में लिखा है कि जो मनुष्य अपने पितरों का श्राद्ध करता है, उसके जीवन में कभी भी दुख, कष्ट और दरिद्रता नहीं आती। पितर वंशजों को दीर्घायु, संतान सुख धन-धान्य और समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं। पितृपक्ष में प्रतिदिन सूर्य उदय के बाद तर्पण करने का विधान है। तर्पण में पवित्र नदी तालाब या कुएँ के जल का प्रयोग किया जाता है। तर्पण के समय काला तिल , कुश और जल का उपयोग कर ‘ॐ पितृभ्यः नमः’ कहते हुए पितरों का आह्वान करना चाहिए। श्राद्ध पक्ष में पिंडदान करने का भी महत्व है। आटे के गोले जिसमें तिल, चावल, जौ, घी और शहद मिलाकर बनाए जाते हैं, उन्हें पिंड कहते हैं। इन पिंडों को पितरों को समर्पित कर ब्राह्मणों को दान किया जाता है। यह पिंडदान पितरों की आत्मा को तृप्त कर उन्हें मोक्ष की ओर ले जाता है। श्राद्ध कर्म में ब्राह्मणों को भोजन कराना अत्यंत आवश्यक है। मान्यता है कि ब्राह्मण भोजन से पितर प्रसन्न होते हैं। साथ ही श्राद्ध में दक्षिणा, अन्न, वस्त्र आदि का दान करना भी पुण्यकारी माना जाता है। पितृपक्ष के समय विवाह , गृह प्रवेश , मुंडन संस्कार आदि शुभ कार्य करने का निषेध है। इस दौरान केवल पितरों को तृप्त करने वाले कार्य करने चाहिए। श्राद्ध पक्ष का समापन सर्वपितृ अमावस्या को होता है। इस दिन उन पितरों का श्राद्ध किया जाता है जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं होती। 3.. पितृस्थान (पितृलोक) पितरों का निवास पितृलोक में माना गया है।यह सूर्यलोक और मर्त्यलोक के ऊपर बताया गया है।वे हमारे कर्म, दान और श्राद्ध से संतुष्ट होकर आशीर्वाद देते हैं। 4..पितृकर्म (अनुष्ठान) मुख्य कर्म:1. श्राद्ध – भोजन और दान द्वारा पितरों को तृप्त करना। 2. तर्पण (जलदान) – तिल और जल से अर्घ्य अर्पण। 3. पिंडदान – आटे/चावल के गोल पिंड बनाकर समर्पण। 4. दान और ब्राह्मण भोजन – गरीब, गौ, पक्षी, ब्राह्मण को भोजन-वस्त्र दान। 5.. पितरों का प्रभावअनुग्रह होने पर : परिवार में सुख, स्वास्थ्य, संतान, उन्नति और धन-धान्य। असंतोष होने पर : कलह, रोग, आर्थिक कठिनाई, मानसिक अशांति। 6.. वैदिक व पुराणिक दृष्टिऋग्वेद (10/12 सूक्त) में पितरों का उल्लेख।महाभारत और भागवत पुराण में श्राद्ध की महिमा।पितरों को देवताओं के समान अन्न-जल से तृप्त करना आवश्यक बताया गया है। 7.. पितृ दोष और निवारण यदि किसी पूर्वज की इच्छाएँ अधूरी रह गई हों, तो जन्मकुंडली में पितृदोष बनता है। निवारण के उपाय:श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान।गायत्री मंत्र जप, रुद्राभिषेक।दान और सेवा। 8..साधारण पितृ मंत्र ॐ पितृभ्यः नमःॐ तर्पयामि पितरंॐ स्वधा नमः 9. विशेष प्रसंगमहाभारत प्रसंग : दानवीर कर्ण को मृत्यु के बाद भोजन के स्थान पर स्वर्ण मिला क्योंकि उन्होंने जीवन में भोजन दान नहीं किया था। बाद में पितृपक्ष में आकर उन्होंने पितरों को अर्पण कर ऋणमुक्ति पाई। 10. भरणी श्राद्धभरणी नक्षत्र में होने वाला विशेष श्राद्ध।इसे महाभरणी श्राद्ध कहा जाता है और गया श्राद्ध के समान फलदायी है।इस दिन कौवे, कुत्ते और गौ को भोजन अवश्य कराना चाहिए। 11.– श्राद्ध के नियम और विशेष बातें १ गाय का घी, दूध, दही प्रयोग करें। २.चांदी के बर्तन पितरों को तृप्त करते हैं। ३. श्राद्ध में मौन ब्राह्मण भोजन आवश्यक है। ४. श्राद्ध का समय – कुतप मुहूर्त (प्रातः 11:30 से 1:00 के बीच) श्रेष्ठ है। ५.. पितरों को प्रिय खाद्य – खीर, दूध, दही, शहद, घी। ६. कौए, गाय, कुत्ते, चींटी आदि को भोजन अर्पण करना चाहिए। ७. श्राद्ध में तुलसी, कुशा, तिल और गंगाजल का उपयोग अनिवार्य है। 12. श्राद्ध स्थलों का महत्व गया (बिहार)काशी (वाराणसी)प्रयागराज (त्रिवेणी संगम)रामेश्वरमबद्रीनाथ–केदारनाथ 13. पितृपक्ष का महत्व पितृऋण से मुक्ति

श्राद्ध से बढ़कर महान् यज्ञ तीनों लोकों में दूसरा कोई नहीं है।पितृ पक्ष की होने वाली है शुरुआत, इन मंत्रों के जप से मिलेगा पितरों का आशीर्वाद !

श्राद्धसे बढ़कर महान् यज्ञ तीनों लोकोंमें दूसरा कोई नहीं है। इसमें जो कुछ दान दिया जाता है, वह सब अक्षय होता है। दूसरोंको जो दान दिया जाता है; उसका फल दस हजारगुना होता है। अपनी जातिवालोंको देनेसे लाख-गुना फल होता है क्योंकि मनुष्य का कर्तव्य अपने समुदाय या अपनी जाति का संरक्षण और देखभाल करना मुख्य है। पर पिण्डदान व श्राद्ध आदि में लगाया हुआ धन करोड़गुना होकर पुनः आपको ही प्राप्त हो जाता है क्योंकि जिन पूर्वजों तथा जिन जिन पितरों की कृपा से आपका जन्म हो सका उनके लिए कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए ही आश्विन मास का श्राद्ध काल निर्धारित किया गया है वेसे हर अमावस्या तथा अष्टकाओं में भी श्राद्ध कर्म अनिवार्य होता है।जो गृहस्थ हर अमावस्या को भी मासिक श्राद्ध करता है अथवा पितरों के निमित्त तिल मिश्रित जल से तीर्थ स्थल पर जाकर तर्पण वह गृहस्थ अति शीघ्र ही अद्वितीय धनधान्य और संतति से भरा हुआ होकर देवताओं और नवग्रहों की कृपा भी प्राप्त कर धन्य हो जाता है। देवी स्वधा के पति जो पितर नाम से संबोधित किये गए हैं वे सभी देवताओं द्वारा भी पूजनीय हैं और वे आधुनिक मन्वंतर के देवताओं के भी पूर्वज हैं। अतः श्राद्ध कर्म से देवता भी प्रसन्न होते हैं। आप लोग वर्ष के 11 माह देवी देवताओं के लिए व्रत उपवास हवन आदि करते हो यह उत्तम कार्य है पर आश्विन मास का श्राद्ध काल उन सभी प्रकार के कर्मकांडो या सब कर्मो या हवन विधि विधान आदि को महाफल देने वाला ही समझा जाए। पिण्डदान और श्राद्ध कर्म के दौरान उस बुलाये गए जितेन्द्रिय ब्राह्मण को दान देने पर वह अनन्त गुना फल देनेवाला बताया गया है। पितरों के निमित्त तीर्थ में अन्नदान-जो गंगाजीके जलमें और गया, प्रयाग, पुष्कर, काशी, सिद्धकुण्ड तथा गंगा-सागर-संगम तीर्थमें पितरोंके लिये अन्नदान करता है, उसकी मुक्ति निश्चित है तथा उसके पितर अक्षय स्वर्ग प्राप्त करते हैं। उनका जन्म सफल हो जाता है। जो विशेषतः गंगाजीमें तिलमिश्रित जलके द्वारा तर्पण करता है, उसे भी मोक्षका मार्ग मिल जाता है। फिर जो पिण्डदान करता है, उसके लिये तो कहना ही क्या है। अमावास्या और युगादि तिथियोंको ( इनका वर्णन हमने कालखण्ड पुस्तक में किया है ) तथा चन्द्रमा और सूर्य ग्रहणके दिन जो पार्वण श्राद्ध करता है, वह अक्षय लोकका भागी होता है। उसके पितर उसे प्रिय आशीर्वाद और अनन्त भोग प्रदान करके दस हजार वर्षांतक तृप्त रहते हैं। ऐसा पद्मपुराण के सृष्टिखण्ड अध्याय ४७ का कथन है। इसलिये प्रत्येक पर्वपर पुत्रोंको प्रसन्नतापूर्वक पार्वण श्राद्ध करना चाहिये। माता-पिताके इस श्राद्ध-यज्ञका अनुष्ठान करके मनुष्य सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है।जो श्राद्ध प्रतिदिन किया जाता है, उसे नित्य श्राद्ध माना गया है। जो पुरुष श्रद्धापूर्वक नित्य श्राद्ध करता है, वह अक्षय लोकका उपभोग करता है। इसी प्रकार कृष्णपक्षमें विधिपूर्वक काम्य श्राद्धका अनुष्ठान करके मनुष्य मनोवांछित फल प्राप्त करता है। महालय या पितृपक्ष में पितरोंका श्राद्ध सभी को करना चाहिये। उस समय सूर्य कन्याराशिपर गये हैं या नहीं-इसका विचार नहीं करना चाहिये। जब सूर्य कन्याराशिपर स्थित होते हैं, उस समयसे लेकर सोलह दिन उत्तम दक्षिणाओं से सम्पन्न यज्ञों के समान महत्त्व रखते हैं। उन दिनोंमें इस परम पवित्र काम्य श्राद्धका अनुष्ठान करना उचित है। इससे श्राद्धकर्ताका मंगल होता है। यदि उस समय श्राद्ध न हो सके तो जब सूर्य तुला राशि पर स्थित हों, उसी समय कृष्णपक्ष आदिमें उक्त श्राद्ध करना उचित है। चंद्र ग्रहण के समय – चन्द्रग्रहण ( आने ही वाला है चंद्र ग्रहण ..) के समय सभी दान भूमिदानके समान होते हैं, सभी संध्यापूत ब्राह्मण व्यासके समान माने जाते हैं , सभी जितेन्द्रिय संत सनत्कुमार के समान पावन माने गए हैं ।और समस्त जल गंगाजलके तुल्य हो जाता है। चन्द्रग्रहणमें दिया हुआ दान और समयकी अपेक्षा लाखगुना तथा सूर्यग्रहणका दस लाखगुना अधिक फल देनेवाला बताया गया है। और संयोग से चंद्र ग्रहण के समय आपको यदि गंगाजीका जल प्राप्त हो जाय, तब तो चन्द्रग्रहणका दान करोड़गुना और सूर्यग्रहणमें दिया हुआ दान दस करोड़गुना अधिक फल देनेवाला होता है। विधिपूर्वक एक लाख ( 1,00000) गोदान करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वह चन्द्रग्रहणके समय गंगाजीमें स्नान करनेसे मिल जाता है। जो चन्द्रमा और सूर्यके ग्रहणमें गंगाजीके जलमें डुबकी लगाता है, उसे सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान करनेका फल प्राप्त होता है। यदि रविवारको सूर्यग्रहण और सोमवारको चन्द्रग्रहण हो तो वह चूड़ामणि नामक योग कहलाता है; उसमें स्नान और दानका अनन्त फल माना गया है। उस समय पुण्य तीर्थमें पहले उपवास करके जो पुरुष पिण्डदान, तर्पण तथा धन-दान करता है, वह सत्यलोकमें प्रतिष्ठित होता है। अथवा कोई मनुष्य किसी घोर मजबूरी के कारण चंद्र ग्रहण के समय अथवा सूर्य ग्रहण के पावन समय यदि तीर्थ स्थल पर न जा पाए तो वह पवित्र स्थल पर बैठकर कुशा या स्वर्ण अथवा चांदी धारण करके देवी स्वधा के स्तोत्र का पाठ करे या श्राद्ध के दिन संध्यापूत ब्राह्मण से करवाये तो भी उस पर पितरों की कृपा निश्चित ही होती है पितृ पक्ष की होने वाली है शुरुआत, इन मंत्रों के जप से मिलेगा पितरों का आशीर्वाद ● पितृ पक्ष की शुरुआत भाद्रपद पूर्णिमा से होगी और समापन आश्विन मास की अमावस्या को होगा, सोलह दिनों तक चलने वाले इस कालखंड में श्रद्धालु अपने पितरों को जल अर्पित करते हैं और उनकी मृत्यु तिथि पर श्राद्ध व तर्पण की विशेष परंपरा निभाते हैं, पंचांग के अनुसार, 2025 में पितृ पक्ष 7 सितंबर से प्रारंभ होकर 21 सितंबर को महालया अमावस्या के दिन संपन्न होगा। ● पितृ पक्ष के दौरान उपाय – पितृ पक्ष के दौरान पितृ दोष को दूर करने के भी कई उपाय किए जाते हैं, पितृ दोष ज्योतिष शास्त्र के अनुसार एक प्रमुख दोष माना जाता है, यह दोष उस कर्म ऋण का प्रतीक है, जो हमारे पूर्वजों के अधूरे या नकारात्मक कर्मों के कारण बनता है, यदि इसका निवारण न किया जाए तो व्यक्ति और उसका परिवार पितरों की नाराजगी के साथ-साथ जीवन में अनेक बाधाओं और अनहोनी घटनाओं का सामना कर सकता है, हालांकि शास्त्रों और रावण संहिता में इसके समाधान और विशेष मंत्र बताए गए हैं। ● पितृ दोष निवारण मंत्र – ऊँ श्री पितराय नमः तथा ऊँ श्री पितृदेवाय नमः – इन मंत्रों का 21 बार जाप करने से पूर्वज प्रसन्न होते हैं। ● ऊँ श्री पितृभ्यः नमः – 51

मंत्र जाप की शक्तियां

🔹ॐ कार मंत्र में शक्तियाँ हैं (Mantra Chanting) 🔸रक्षण शक्ति : ॐ सहित मंत्र का जप करते हैं तो वह हमारे जप तथा पुण्य की रक्षा करता है । किसी नामदान के लिए हुए साधक पर यदि कोई आपदा आनेवाली है, कोई दुर्घटना घटने वाली है तो मंत्र भगवान उस आपदा को शूली में से काँटा कर देते हैं । साधक का बचाव कर देते हैं। ऐसा बचाव तो एक नहीं, हजारों साधकों के जीवन में चमत्कारिक ढंग से महसूस होता है । 🔸गति शक्ति : जिस योग में, ज्ञान में, ध्यान में आप फिसल गये थे, उदासीन हो गये थे, किंकर्तव्यविमूढ़ हो गये थे उसमें मंत्रदीक्षा लेने के बाद गति आने लगती है । मंत्रदीक्षा के बाद आपके अंदर गति शक्ति कार्य में आपको मदद करने लगती है । 🔸कांति शक्ति : मंत्रजाप से जापक के कुकर्मों के संस्कार नष्ट होने लगते हैं और उसका चित्त उज्जवल होने लगता है । उसकी आभा उज्जवल होने लगती है, उसकी मति-गति उज्जवल होने लगती है और उसके व्यवहार में उज्जवलता आने लगती है । इसका मतलब ऐसा नहीं है कि आज मंत्र लिया और कल सब छूमंतर हो जायेगा… धीरे-धीरे होगा। एक दिन में कोई स्नातक नहीं होता,  एक दिन में कोई एम.ए. नहीं पढ़ लेता, ऐसे ही एक दिन में सब छूमंतर नहीं हो जाता। मंत्र लेकर ज्यों-ज्यों आप श्रद्धा से, एकाग्रता से और पवित्रता से जप करते जायेंगे त्यों-त्यों विशेष लाभ होता जायेगा । 🔸प्रीति शक्ति : ज्यों-ज्यों आप मंत्र जपते जायेंगे त्यों-त्यों मंत्र के देवता के प्रति, मंत्र के ऋषि, मंत्र के सामर्थ्य के प्रति आपकी प्रीति बढ़ती जायेगी । 🔸तृप्ति शक्ति : ज्यों-ज्यों आप मंत्र जपते जायेंगे त्यों-त्यों आपकी अंतरात्मा में तृप्ति बढ़ती जायेगी, संतोष बढ़ता जायेगा ।**जिनको गुरुमंत्र सिद्ध हो गया है उनकी वाणी में सामर्थ्य आ जाता है । नेता भाषण करता है त लोग इतने तृप्त नहीं होते, किंतु जिनका गुरुमंत्र सिद्ध हो गया है ऐसे महापुरुष बोलते हैं तो लोग बड़े तृप्त हो जाते हैं और महापुरुष के शिष्य बन जाते हैं । 🔸अवगम शक्ति : मंत्रजाप से दूसरों के मनोभावों को जानने की शक्ति विकसित हो जाती है । दूसरे के मनोभावों को आप अंतर्यामी बनकर जान सकते हो । 🔸प्रवेश अवति शक्ति : अर्थात् सबके अंतरतम की चेतना के साथ एकाकार होने की शक्ति । अंतःकरण के सर्व भावों को तथा पूर्वजीवन के भावों को और भविष्य की यात्रा के भावों को जानने की शक्ति कई योगियों में होती है । वे कभी-कभार मौज में आ जायें तो बता सकते हैं कि आपकी यह गति थी, आप यहाँ थे, फलाने जन्म में ऐसे थे, अभी ऐसे हैं । जैसे दीर्घतपा के पुत्र पावन को माता-पिता की मृत्यु पर उनके लिए शोक करते देखकर उसके बड़े भाई पुण्यक ने उसे उसके पूर्वजन्मों के बारे में बताया था । यह कथा योगवाशिष्ठ महारामायण में आती है । 🔸श्रवण शक्ति : मंत्रजाप के प्रभाव से जापक सूक्ष्मतम, गुप्ततम शब्दों का श्रोता बन जाता है । जैसे, शुकदेवजी महाराज ने जब परीक्षित के लिए सत्संग शुरु किया तो देवता आये । शुकदेवजी ने उन देवताओं से बात की । माँ आनंदमयी का भी देवलोक के साथ सीधा सम्बन्ध था । और भी कई संतो का होता है । दूर देश से भक्त पुकारता है कि गुरुजी ! मेरी रक्षा करो… तो गुरुदेव तक उसकी पुकार पहुँच जाती है !

Translate »