अनन्त चतुर्दशी व्रत कथा एवं पूजा-विधि,अनन्त चतुर्दशी माहात्म्य एवं रहस्य, अनन्त नारायण स्तोत्रम् (हिंदी अर्थ सहित)
01. अनन्त चतुर्दशी व्रत कथा एवं पूजा-विधि 02. अनन्त चतुर्दशी माहात्म्य एवं रहस्य 03.अनन्त नारायण स्तोत्रम् (हिंदी अर्थ सहित) अनन्त चतुर्दशी व्रत भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी 06 सितंबर शनिवार 2025 १.ॐ श्रीं अनंताय नमः २ॐ ह्रीं नमो नारायणाय अनन्ताय श्रीं ॐ ३.ॐ अनन्तदेवाय च विदमहे विश्वरूपाय धीमहि तन्नो विष्णु प्रचोदयात् ४..अनन्तं ध्यायामहे विश्वरूपं प्रपद्यामहे।अनादिनित्यं विष्णुं तन्नो मोक्षाय प्रचोदयात् ॥ ५..ॐ नमो भगवते अनन्ताय विश्वरूपाय सर्वेश्वरायप्रलयकालानलसंहारकाय महापुरुषाय परब्रह्मणे नमः । ॐ अनन्तोऽसि अनन्तबाहो अनन्तशक्ते अनन्तगतेमाम् अमृतत्वाय पावय पावय नमः ॥ अनन्त चतुर्दशी व्रत कथा एवं पूजा-विधि अनन्त चतुर्दशी का महत्वअनन्त चतुर्दशी का पर्व भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी को मनाया जाता है। यह दिन भगवान विष्णु के “अनन्त” स्वरूप की उपासना के लिए अत्यंत पवित्र माना गया है।शास्त्रों में कहा गया है – इस दिन भगवान नारायण ने विराट विश्वरूप धारण कर समस्त ब्रह्माण्ड को अपने सूक्ष्म शरीर में धारण किया। अनंत चतुर्दशी व्रत रखने से या इस दिन भगवान अनंत के मंत्रों के जाप से बर्ष भर अनजाने में किए भक्ष्य अभक्ष्य के दोष से मुक्ति मिलती है। अनंत चतुर्दशी के व्रत से मनोकामना पूरी होने का योग बनता है। अनन्त चतुर्दशी पर व्रत रखने से धन, सुख, संतान, दीर्घायु तथा जीवन में स्थिरता प्राप्त होती है। इस दिन गणेश प्रतिमा विसर्जन भी होता है, अतः यह पर्व दोहरी महिमा से युक्त है।–2025 का शुभ समयभाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी 06 सितंबर शनिवार 2025तिथि आरंभ: 6 सितम्बर, प्रातः 03:12 बजेतिथि समाप्ति: 7 सितम्बर, प्रातः 01:41 बजेपूजा का श्रेष्ठ समय: 6 सितम्बर प्रातः 05:21 बजे से लेकर रात्रि 01:41 बजे तक व्रत पूर्व तैयारी 1. प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ पीले या सफेद वस्त्र धारण करें। 2. घर के पवित्र स्थान को गंगाजल से शुद्ध करें। 3. लकड़ी की चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर उस पर भगवान विष्णु और गणेश जी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। 4. एक कलश स्थापित करें – उसमें पवित्र जल, आम की पत्तियाँ रखें और ऊपर नारियल रखें। 5. अनन्त सूत्र तैयार करें – यह पीले या लाल धागे का होता है जिसमें 14 गांठें होती हैं। अनन्त चतुर्दशी व्रत-विधि 1. दीपक व धूप जलाकर भगवान की स्तुति करें। 2. भगवान गणेश का पूजन करें और फिर विष्णुजी का ध्यान करें –“शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं, विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्ण शुभाङ्गम्।लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं, वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥” 3. चौकी पर 14 तिलक करें और हर तिलक पर 1 पूड़ी और 1 पुआ (या मिठाई) अर्पित करें। यह 14 लोकों का प्रतीक है। 4. पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, गुड़) से भगवान का अभिषेक करें और पूजा में प्रयोग करें। भगवान विष्णु कीकिसी भी पूजा में तुलसी दल अवश्य चढ़ाएं और उनके प्रसाद में तुलसी दल अवश्य मिलाकर अर्पित करें। 5. अनन्त सूत्र को पंचामृत में डुबोकर भगवान विष्णु के चरणों में अर्पित करें। 6. पूजा के बाद सूत्र को पुरुष दाहिनी बांह में और स्त्रियाँ बायीं बांह में बाँधती हैं।इस समय मंत्र जपें –“ॐ अनन्ताय नमः” 7. फल, पुष्प, तुलसीदल, नारियल और नैवेद्य अर्पित करें। 8. इसके बाद अनन्त चतुर्दशी की व्रत-कथा सुनें। और आरती करें।(श्रद्धालु चाहे तो इस दिन विष्णु सहस्रनाम एवं पुरुष सूक्त कापाठ भी कर सकते हैं।)इस प्रकार श्रद्धापूर्वक अनन्त चतुर्दशी व्रत-पूजन करने से भगवान विष्णु अपने भक्तों को अनन्त आशीर्वाद प्रदान करते हैं। व्रत का नियम इस दिन उपवास रखें और केवल फलाहार करें।पूजा के बाद प्रसाद ग्रहण करें।अनन्त सूत्र 14 दिन तक धारण करना चाहिए।व्रत का संकल्प 14 वर्षों तक करने की परंपरा है। चौदह बर्ष करने के बाद उद्यापन कर व्रत छोड़ सकते हैं | व्रत का फलपाप नाश होता है।रोग, शोक और क्लेश दूर होते हैं।धन-धान्य और सुख-समृद्धि प्राप्त होती है।संतान-सुख और वैवाहिक जीवन में स्थिरता आती है।अंततः मोक्ष की प्राप्ति होती है। अनंत चतुर्दशी व्रत कथा एक बार महाराज युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ किया। उस समय यज्ञ मंडप का निर्माण सुंदर तो था ही, अद्भुत भी था वह यज्ञ मंडप इतना मनोरम था कि जल व थल की भिन्नता प्रतीत ही नहीं होती थी। जल में स्थल तथा स्थल में जल की भांति प्रतीत होती थी। बहुत सावधानी करने पर भी बहुत से व्यक्ति उस अद्भुत मंडप में धोखा खा चुके थे।एक बार कहीं से टहलते-टहलते दुर्योधन भी उस यज्ञ-मंडप में आ गया और एक तालाब को स्थल समझ उसमें गिर गया। द्रौपदी ने यह देखकर ‘अंधों की संतान अंधी’ कह कर उनका उपहास किया। इससे दुर्योधन चिढ़ गया। यह बात उसके हृदय में बाण समान लगी। उसके मन में द्वेष उत्पन्न हो गया और उसने पांडवों से बदला लेने की ठान ली। उसके मस्तिष्क में उस अपमान का बदला लेने के लिए विचार उपजने लगे। उसने बदला लेने के लिए पांडवों को द्यूत-क्रीड़ा में हरा कर उस अपमान का बदला लेने की सोची। उसने पांडवों को जुए में पराजित कर दिया। पराजित होने पर प्रतिज्ञानुसार पांडवों को बारह वर्ष के लिए वनवास भोगना पड़ा। वन में रहते हुए पांडव अनेक कष्ट सहते रहे। एक दिन भगवान कृष्ण जब मिलने आए, तब युधिष्ठिर ने उनसे अपना दुख कहा और दुख दूर करने का उपाय पूछा। तब श्रीकृष्ण ने कहा- ‘हे युधिष्ठिर! तुम विधिपूर्वक अनंत भगवान का व्रत करो, इससे तुम्हारा सारा संकट दूर हो जाएगा और तुम्हारा खोया राज्य पुन: प्राप्त हो जाएगा।’ इस संदर्भ में श्रीकृष्ण ने उन्हें एक कथा सुनाई – प्राचीन काल में सुमंत नाम का एक नेक तपस्वी ब्राह्मण था। उसकी पत्नी का नाम दीक्षा था। उसकी एक परम सुंदरी धर्मपरायण तथा ज्योतिर्मयी कन्या थी। जिसका नाम सुशीला था। सुशीला जब बड़ी हुई तो उसकी माता दीक्षा की मृत्यु हो गई। पत्नी के मरने के बाद सुमंत ने कर्कशा नामक स्त्री से दूसरा विवाह कर लिया। सुशीला का विवाह ब्राह्मण सुमंत ने कौंडिन्य ऋषि के साथ कर दिया। विदाई में कुछ देने की बात पर कर्कशा ने दामाद को कुछ ईंटें और पत्थरों के टुकड़े बांध कर दे दिए। कौंडिन्य ऋषि दुखी हो अपनी पत्नी को लेकर अपने आश्रम की ओर चल दिए। परंतु रास्ते में ही रात हो गई। वे नदी तट पर संध्या करने लगे।सुशीला ने देखा- वहां पर बहुत-सी स्त्रियां सुंदर वस्त्र धारण कर किसी देवता की पूजा पर रही थीं। सुशीला के पूछने पर उन्होंने विधिपूर्वक अनंत व्रत की महत्ता बताई। सुशीला ने वहीं उस व्रत का अनुष्ठान किया और चौदह गांठों वाला डोरा हाथ में