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स्कंधमाता की पूजाविधि – शक्ति की आराधना | भारतीय धर्म

माँ स्कंदमाता: नवदुर्गा का पंचम स्वरूपनवरात्रि के पावन पर्व पर, जब प्रकृति नवजीवन का संचार करती है और आध्यात्मिक ऊर्जा अपने चरम पर होती है, तब माँ दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की आराधना का विशेष महत्व होता है। इन नौ दिव्य रात्रियों में से पाँचवी रात्रि को जिस देवी की पूजा-अर्चना की जाती है, वे हैं माँ स्कंदमाता। यह स्वरूप ममता, वात्सल्य और परम शक्ति का अद्भुत संगम है। माँ स्कंदमाता, नवदुर्गा के पंचम स्वरूप के रूप में पूजी जाती हैं और उनकी आराधना से भक्तों को अलौकिक सुख, शांति और संतान सुख की प्राप्ति होती है। नाम का अर्थ और महत्व (नामकरण एवं व्युत्पत्ति) ‘स्कंदमाता’ नाम स्वयं उनके स्वरूप और महत्व को प्रकट करता है। यह दो शब्दों से मिलकर बना है: ‘स्कंद’ और ‘माता’। ‘स्कंद’ भगवान कार्तिकेय का एक नाम है, जिन्हें देवसेनापति और भगवान शिव-पार्वती के ज्येष्ठ पुत्र के रूप में जाना जाता है। ‘माता’ का अर्थ है जननी या माँ। इस प्रकार, स्कंदमाता का अर्थ हुआ ‘स्कंद की माता’ या ‘भगवान कार्तिकेय की जननी’। यह नाम ही उनकी सबसे बड़ी पहचान और महिमा का प्रतीक है।भगवान स्कंद, जिन्हें दक्षिण भारत में मुरुगन या सुब्रह्मण्यम के नाम से पूजा जाता है, देवों के सेनापति हैं जिन्होंने तारकासुर जैसे शक्तिशाली असुर का वध किया था। उनकी जननी होने के कारण, माँ स्कंदमाता को शक्ति और पराक्रम के साथ-साथ परम वात्सल्य और ममता का प्रतीक माना जाता है। वे अपने पुत्र स्कंद को अपनी गोद में लिए हुए हैं, जो उनकी ममतामयी छवि को दर्शाता है। इस स्वरूप में, वे न केवल एक देवी हैं, बल्कि एक आदर्श माँ भी हैं जो अपने पुत्र की रक्षा और पोषण करती हैं। दिव्य स्वरूप का वर्णन (दिव्य स्वरूप एवं iconography) माँ स्कंदमाता का स्वरूप अत्यंत भव्य, मनमोहक और शांत है, जो भक्तों के मन को शांति और सकारात्मकता से भर देता है। उनकी चार भुजाएँ हैं। वे अपने दो हाथों में कमल पुष्प धारण करती हैं, जो पवित्रता, सौंदर्य और आध्यात्मिक जागृति का प्रतीक है। कमल कीचड़ में खिलता है, फिर भी अपनी शुद्धता और सुंदरता बनाए रखता है, ठीक वैसे ही जैसे माँ अपने भक्तों को सांसारिक मोहमाया के बीच भी निर्मल और पवित्र रहने की प्रेरणा देती हैं।उनकी दाहिनी भुजा में, जो ऊपर की ओर उठी हुई है, वे अपने प्रिय पुत्र भगवान स्कंद (कार्तिकेय) को गोद में लिए हुए हैं। यह मुद्रा उनकी ममता और वात्सल्य को स्पष्ट रूप से दर्शाती है। भगवान स्कंद बाल रूप में माँ की गोद में विराजमान हैं, जो इस बात का प्रतीक है कि माँ अपने भक्तों को भी संतानवत प्रेम और सुरक्षा प्रदान करती हैं। उनका चौथा हाथ, जो नीचे की ओर झुका हुआ है, भक्तों को आशीर्वाद देने की मुद्रा (अभय मुद्रा) में होता है। यह मुद्रा भक्तों को भयमुक्त होने और सभी बाधाओं से मुक्ति पाने का आश्वासन देती है।माँ स्कंदमाता का वर्ण शुभ्र है, अर्थात वे श्वेत वर्ण की हैं, जो शांति, पवित्रता और ज्ञान का प्रतीक है। वे कमल के आसन पर विराजमान हैं, इसलिए उन्हें ‘पद्मासना’ देवी भी कहा जाता है। कमल पर आसीन होना यह दर्शाता है कि वे दिव्य लोकों में सर्वोच्च स्थान पर हैं और सांसारिक बंधनों से मुक्त हैं।उनका वाहन सिंह है, जो शक्ति, शौर्य और पराक्रम का प्रतीक है। एक ओर जहाँ वे अपने पुत्र को गोद में लेकर ममतामयी दिखती हैं, वहीं दूसरी ओर सिंह पर सवार होना उनकी अदम्य शक्ति और दुष्टों का नाश करने की क्षमता को दर्शाता है। यह स्वरूप बताता है कि माँ स्कंदमाता कोमल हृदय की होते हुए भी आवश्यकता पड़ने पर प्रचंड रूप धारण कर सकती हैं ताकि धर्म और न्याय की रक्षा की जा सके। यह duality उनके स्वरूप की अद्वितीय विशेषता है – वे एक ही समय में कोमल और शक्तिशाली हैं, शांत और प्रचंड हैं। पौराणिक कथा (पौराणिक पृष्ठभूमि एवं कथा) माँ स्कंदमाता के स्वरूप का गहरा संबंध भगवान कार्तिकेय की उत्पत्ति और तारकासुर वध की कथा से है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, तारकासुर नामक एक अत्यंत शक्तिशाली असुर था, जिसने अपनी कठोर तपस्या से ब्रह्मा जी से यह वरदान प्राप्त कर लिया था कि उसका वध केवल भगवान शिव के पुत्र ही कर सकते हैं। इस वरदान के कारण वह अत्यंत अहंकारी हो गया था और तीनों लोकों में हाहाकार मचा दिया था। देवतागण उसके अत्याचारों से त्रस्त थे और किसी भी तरह उससे मुक्ति पाना चाहते थे।समस्या यह थी कि भगवान शिव उस समय गहन तपस्या में लीन थे और माता सती के आत्मदाह के बाद उन्होंने विवाह न करने का प्रण ले लिया था। देवताओं ने कामदेव को भगवान शिव की तपस्या भंग करने के लिए भेजा, ताकि वे पार्वती से विवाह करें और उनके पुत्र तारकासुर का वध कर सकें। कामदेव ने अपने बाण चलाए, जिससे शिव की तपस्या भंग हुई, परंतु क्रोधित होकर शिव ने उन्हें भस्म कर दिया।बाद में, देवी पार्वती ने कठोर तपस्या की, जिससे प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उनसे विवाह किया। भगवान शिव और पार्वती के मिलन से ही भगवान स्कंद (कार्तिकेय) का जन्म हुआ। स्कंद को जन्म देने और उनका पोषण करने के कारण ही पार्वती का यह स्वरूप ‘स्कंदमाता’ कहलाया।भगवान स्कंद का जन्म एक विशेष उद्देश्य के लिए हुआ था – तारकासुर का वध। वे अत्यंत वीर, पराक्रमी और ज्ञानी थे। देवताओं ने उन्हें अपना सेनापति नियुक्त किया और उन्होंने अपनी अद्भुत शक्ति से तारकासुर का वध कर तीनों लोकों को उसके आतंक से मुक्ति दिलाई। इस प्रकार, माँ स्कंदमाता न केवल भगवान स्कंद की जननी हैं, बल्कि वे उस शक्ति का भी प्रतिनिधित्व करती हैं जो धर्म की रक्षा और दुष्टों के संहार के लिए एक दिव्य संतान को जन्म देती है और उसका पोषण करती है। उनकी गोद में विराजमान स्कंद यह दर्शाते हैं कि माँ अपने भक्तों को भी ज्ञान, शक्ति और विजय प्रदान करती हैं। पूजा का महत्व और शुभ फल (पूजा का महत्व एवं फल) नवरात्रि के पाँचवे दिन माँ स्कंदमाता की पूजा का विशेष महत्व है। उनकी आराधना से कई प्रकार के भौतिक और आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होते हैं: 1.संतान सुख की प्राप्ति: माँ स्कंदमाता को विशेष रूप से संतान प्राप्ति के लिए पूजा जाता है। जो दंपत्ति निःसंतान हैं या उत्तम संतान

माॕंं चंद्रघंटा की पूजा करने का सही तरीका – पूजा विधि और शुभ फल | भारतीय संस्कृति

इस बार पंचांग के अनुसार ऐसा अद्भुत संयोग बन रहा है जब माँ चंद्रघंटा की पूजा लगातार दो दिनों तक की जाएगी। आमतौर पर नवरात्रि का तीसरा दिन माँ चंद्रघंटा को समर्पित होता है, लेकिन इस बार तिथि और नक्षत्रों के विशेष संयोग के कारण भक्तों को 24 और 25 सितंबर दोनों दिन माँ चंद्रघंंटा की आराधना का अवसर मिलेगा। संयोग का कारण2025 में नवरात्रि का तीसरा दिन तृतीया तिथि और चतुर्थी तिथि के संयोग में आ रहा है। तिथि परिवर्तन की स्थिति के कारण श्रद्धालु 24 सितंबर को भी और 25 सितंबर को भी माँ चंद्रघंटा की पूजा कर सकेंगे।यह संयोग अत्यंत दुर्लभ माना गया है और इसे शुभ फलदायी भी बताया गया है। माँ चंद्रघंटा नवरात्रि के पावन पर्व का तीसरा दिन माँ दुर्गा के तृतीय स्वरूप, माँ चंद्रघंटा को समर्पित है। यह दिन भक्तों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि इस दिन माँ चंद्रघंटा की आराधना से असीम शांति, शक्ति और निर्भयता प्राप्त होती है। माँ चंद्रघंटा का नाम उनके मस्तक पर सुशोभित अर्धचंद्र से पड़ा है, जो घंटे के आकार का प्रतीत होता है। यह अर्धचंद्र उनकी सुंदरता और दिव्यता का प्रतीक है, साथ ही यह दर्शाता है कि वे अपने भक्तों के जीवन में शीतलता और शांति लाती हैं। स्वरूप और महिमा माँ चंद्रघंटा का स्वरूप अत्यंत भव्य और दिव्य है। उनका वर्ण स्वर्ण के समान चमकीला है, जो उनकी तेजोमय उपस्थिति को दर्शाता है। वे दस भुजाओं से सुशोभित हैं, जिनमें वे विभिन्न प्रकार के अस्त्र-शस्त्र धारण करती हैं। उनके एक हाथ में त्रिशूल, दूसरे में गदा, तीसरे में तलवार, चौथे में धनुष-बाण, पाँचवें में कमल का पुष्प, छठे में शंख, सातवें में अमृत कलश, आठवें में जप माला और नौवें में अभय मुद्रा तथा दसवें में वरद मुद्रा होती है। उनकी सवारी सिंह है, जो शक्ति और पराक्रम का प्रतीक है। सिंह पर सवार माँ चंद्रघंटा का यह स्वरूप भक्तों को यह संदेश देता है कि वे किसी भी चुनौती का सामना करने के लिए सदैव तत्पर रहती हैं।उनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र उनकी पहचान है। इस घंटे की ध्वनि इतनी तीव्र और भयंकर मानी जाती है कि यह समस्त नकारात्मक शक्तियों, दानवों और असुरों को भयभीत कर देती है। उनकी आँखों में करुणा और तेज का अद्भुत संगम है। उनका यह स्वरूप जितना उग्र और युद्ध के लिए तत्पर प्रतीत होता है, उतना ही शांत और सौम्य भी है। यह विरोधाभासी गुण उनके दिव्य स्वभाव को उजागर करते हैं, जहाँ वे दुष्टों का संहार करने वाली और भक्तों को शांति प्रदान करने वाली दोनों हैं। माँ चंद्रघंटा का यह स्वरूप भक्तों को भयमुक्त जीवन जीने की प्रेरणा देता है। वे अपने भक्तों को हर प्रकार के भय, बाधा और संकट से मुक्ति दिलाती हैं। उनकी उपासना से आत्मविश्वास में वृद्धि होती है और व्यक्ति किसी भी परिस्थिति में विचलित नहीं होता। पौराणिक कथाएँ और उत्पत्ति माँ चंद्रघंटा के प्राकट्य से जुड़ी कई पौराणिक कथाएँ प्रचलित हैं। एक कथा के अनुसार, जब पृथ्वी पर महिषासुर जैसे शक्तिशाली असुरों का अत्याचार बढ़ गया था और देवताओं को भी असुरो ने पराजित कर दिया था, तब ब्रह्मा, विष्णु और महेश सहित सभी देवताओं ने अपनी-अपनी शक्तियों का अंश प्रदान कर माँ दुर्गा को उत्पन्न किया। महिषासुर के आतंक को समाप्त करने के लिए माँ दुर्गा ने विभिन्न स्वरूप धारण किए, और उन्हीं में से एक स्वरूप माँ चंद्रघंटा का है।यह माना जाता है कि जब देवी ने चंद्रघंटा का रूप धारण किया, तब उनके घंटे की ध्वनि से तीनों लोक गूँज उठे। इस प्रचंड ध्वनि ने असुरों के हृदय में भय उत्पन्न कर दिया और उनकी सेना में भगदड़ मच गई। माँ चंद्रघंटा ने अपने दस हाथों में धारण किए गए अस्त्रों से उन दुष्टों का संहार किया और पृथ्वी पर शांति स्थापित की। उनका यह स्वरूप युद्ध के लिए पूरी तरह से तैयार, अत्यंत शक्तिशाली और क्रोधित प्रतीत होता है, लेकिन उनके भक्तों के लिए वे सदैव सौम्य और कल्याणकारी रहती हैं। एक अन्य कथा के अनुसार, भगवान शिव से विवाह करने के बाद, देवी पार्वती ने अपने मस्तक पर अर्धचंद्र धारण किया, जिसके कारण उन्हें चंद्रघंटा के नाम से जाना जाने लगा। यह स्वरूप उनके वैवाहिक जीवन की स्थिरता और शांति का प्रतीक भी माना जाता है। इस प्रकार, माँ चंद्रघंटा न केवल युद्ध की देवी हैं, बल्कि वे प्रेम, शांति और सद्भाव की प्रतीक भी हैं। प्रतीकात्मक महत्व और आध्यात्मिक अर्थ माँ चंद्रघंटा का प्रत्येक अंग और उनका समग्र स्वरूप गहन आध्यात्मिक महत्व रखता है: 1. स्वर्ण वर्ण: यह समृद्धि, शुद्धता और दिव्य प्रकाश का प्रतीक है। यह दर्शाता है कि माँ अपने भक्तों के जीवन को ज्ञान और धन से प्रकाशित करती हैं। 2. दस भुजाएँ: ये दसों दिशाओं पर देवी के नियंत्रण और उनकी सर्वव्यापकता को दर्शाती हैं। यह भी प्रतीक है कि वे अपने भक्तों को हर दिशा से आने वाले संकटों से बचाती हैं। 3. अस्त्र-शस्त्र: ये बुराई पर अच्छाई की विजय, आत्मरक्षा और धर्म की स्थापना के प्रतीक हैं। माँ अपने भक्तों को आंतरिक और बाहरी शत्रुओं से लड़ने की शक्ति प्रदान करती हैं। 4. सिंह की सवारी: सिंह साहस, शक्ति, दृढ़ संकल्प और निडरता का प्रतीक है। माँ सिंह पर सवार होकर यह संदेश देती हैं कि व्यक्ति को अपने जीवन के संघर्षों का सामना साहस और आत्मविश्वास के साथ करना चाहिए। 5. मस्तक पर अर्धचंद्र (घंटा): यह चंद्र शीतलता, शांति और संतुलन का प्रतीक है। घंटे की ध्वनि नकारात्मक ऊर्जा को दूर भगाती है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है। यह मन की चंचलता को शांत कर एकाग्रता प्रदान करने में भी सहायक है। 6. अभय और वरद मुद्राएँ: अभय मुद्रा भक्तों को भयमुक्त होने का आश्वासन देती है, जबकि वरद मुद्रा उन्हें आशीर्वाद और मनोवांछित फल प्रदान करने का प्रतीक है। 7. सौम्य और उग्र स्वरूप का संगम: यह दर्शाता है कि जीवन में संतुलन कितना महत्वपूर्ण है। माँ हमें सिखाती हैं कि आवश्यकता पड़ने पर हमें दृढ़ और शक्तिशाली होना चाहिए, लेकिन साथ ही हमें शांति और करुणा भी बनाए रखनी चाहिए। आध्यात्मिक रूप से, माँ चंद्रघंटा की उपासना से व्यक्ति के भीतर की नकारात्मकता, जैसे क्रोध, अहंकार, लोभ और मोह का नाश होता है। वे अपने

Shardiya Navratri 2025:शारदीय नवरात्री घटस्थापना (कलश स्थापना) का शुभ मुहूर्त

नवरात्रि, जिसका शाब्दिक अर्थ ‘नौ रातें’ है, हिंदू धर्म के सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है। यह शक्ति की देवी, दुर्गा, को समर्पित है, जो ब्रह्मांड की सृजन, पालन और संहारक शक्ति का प्रतिनिधित्व करती हैं। यह पर्व मुख्य रूप से वर्ष में दो बार मनाया जाता है: चैत्र नवरात्रि, जो वसंत ऋतु में आती है, और शारदीय नवरात्रि, जो शरद ऋतु के आगमन का प्रतीक है। शारदीय नवरात्रि का विशेष महत्व है क्योंकि यह माँ दुर्गा की महिषासुर पर विजय की कथा से जुड़ा है, और इसका समापन दसवें दिन विजयादशमी के रूप में होता है, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। यह नौ दिन साधकों के लिए गहन आध्यात्मिक अभ्यास, व्रत और देवी के नौ रूपों की पूजा का समय होता है। ​शारदीय नवरात्रि शुभ मुहूर्त ​वर्ष 2025 में शारदीय नवरात्रि का पावन पर्व सोमवार, 22 सितंबर से शुरू हो रहा है । इस वर्ष यह पर्व नौ की बजाय दस दिनों का होगा । यह एक अत्यंत शुभ लक्षण है, क्योंकि एक तिथि का बढ़ना अत्यधिक फलदायी माना जाता है। इस बार चतुर्थी तिथि 25 और 26 सितंबर दोनों दिन रहेगी, जिससे पर्व की अवधि में वृद्धि होगी । पंचांग के अनुसार, घटस्थापना (कलश स्थापना) का मुहूर्त शारदीय नवरात्र की तिथि (Shardiya Navratri 2025 Tithi) प्रतिपदा तिथि 22 सितंबर को देर रात 1:26 बजे से शुरू होकर 23 सितंबर को रात 2:57 बजे तक रहेगी । उदयातिथि के अनुसार, शारदीय नवरात्रि इस बार 22 सितंबर को ही मनाई जाएगी. कलश स्थापना के लिए दो अत्यंत शुभ मुहूर्त हैं: प्रातः काल का मुहूर्त: सुबह 6:15 बजे से सुबह 7:46 बजे तक । ​अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 11:55 बजे से 12:43 बजे तक । ​ सूर्योदय – सुबह 06 बजकर 09 मिनट पर सूर्यास्त – शाम 06 बजकर 18 मिनट पर चन्द्रोदय- सुबह 06 बजकर 25 मिनट पर चंद्रास्त- शाम 06 बजकर 30 मिनट पर ब्रह्म मुहूर्त – सुबह 04 बजकर 35 मिनट से 05 बजकर 22 मिनट तक विजय मुहूर्त – दोपहर 02 बजकर 15 मिनट से 03 बजकर 03 मिनट तक गोधूलि मुहूर्त – शाम 06 बजकर 18 मिनट से 06 बजकर 41 मिनट तक निशिता मुहूर्त – रात्रि 11 बजकर 50 मिनट से 12 बजकर 38 मिनट तक पर्व का समापन 2 अक्टूबर को विजयादशमी के साथ होगा, जिस दिन रावण दहन की परंपरा होती है । ​देवी के वाहन का महत्व देवी का आगमन और प्रस्थान सप्ताह के उस दिन के अनुसार होता है, जिस दिन नवरात्रि का प्रारंभ होता है । चूँकि इस साल शारदीय नवरात्रि का प्रारंभ सोमवार, 22 सितंबर को हो रहा है, माँ दुर्गा का आगमन गज (हाथी) पर होगा । हाथी पर सवार होकर आना एक अत्यंत शुभ लक्षण माना जाता है । यह पूरे वर्ष सुख-समृद्धि और सौभाग्य का संचार करने का प्रतीक है । इसके विपरीत, प्रस्थान का वाहन मनुष्य है, जो एक अलग प्रतीकात्मक अर्थ रखता है । नवरात्रि की उत्पत्ति (Shardiya Navratri 2025 Significance) नवरात्रि का पौराणिक आधार महाशक्ति दुर्गा की महासुर महिषासुर पर विजय की कहानी से जुड़ा है । पौराणिक कथा के अनुसार, महिषासुर नामक एक अत्यंत शक्तिशाली दानव था, जिसका जन्म एक ऋषिवर और एक भैंस के मिलन से हुआ था । अपनी कठोर तपस्या से उसने ब्रह्मा से यह वरदान प्राप्त कर लिया था कि उसे कोई भी देवता या पुरुष नहीं मार पाएगा; उसकी मृत्यु केवल एक स्त्री के हाथों से ही संभव थी । इस वरदान के अहंकार में चूर होकर, महिषासुर ने तीनों लोकों पर अत्याचार करना शुरू कर दिया। उसने स्वर्ग पर आक्रमण कर देवताओं को पराजित कर दिया, जिसमें भगवान विष्णु और शिव भी शामिल थे । ​अपनी हार से हताश होकर, सभी देवता ब्रह्मा, विष्णु और महेश के पास सहायता के लिए पहुँचे। अपनी सामूहिक ऊर्जाओं को एक साथ मिलाकर, इन देवताओं ने एक नई, सर्वोच्च नारी शक्ति का निर्माण किया, जिसे दुर्गा कहा गया । इस प्रक्रिया में, प्रत्येक देवता ने अपने विशिष्ट हथियार देवी को प्रदान किए। शिव ने अपना त्रिशूल दिया, विष्णु ने अपना चक्र दिया, वरुण ने शंख दिया, और अन्य देवताओं ने भी अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र दिए । हिमवान ने उन्हें सिंह का वाहन भेंट किया । यह प्रतीकात्मक रूप से दर्शाता है कि देवी दुर्गा कोई अलग शक्ति नहीं हैं, बल्कि वे सभी दिव्य शक्तियों का एक एकीकृत और अंतिम रूप हैं । ​इसके बाद, देवी दुर्गा ने अपनी भयंकर गर्जना से महिषासुर के असुरों को युद्ध के लिए चुनौती दी । नौ दिनों तक चले इस भयंकर युद्ध में, महिषासुर ने विभिन्न मायावी रूप धारण कर देवी को छलने का प्रयास किया। कभी वह एक क्रूर शेर बनता, तो कभी एक विशाल हाथी । अंत में, नौवें दिन, देवी ने अपने चक्र से महिषासुर का सिर काट दिया, जिससे धर्म की विजय हुई और ब्रह्मांडीय व्यवस्था पुनः स्थापित हुई । नवरात्रि में जिन नौ देवियों की पूजा होती है, वे कोई अलग-अलग देवता नहीं हैं, बल्कि वे एक ही महाशक्ति के नौ अलग-अलग स्वरूप हैं । ये नौ स्वरूप मानव चेतना के विभिन्न आध्यात्मिक चरणों और गुणों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो हमें अज्ञानता से मुक्ति की ओर ले जाते हैं। ● शैलपुत्री (पहला दिन): हिमालय की पुत्री, ये देवी किसी भी अनुभव के शिखर पर स्थित दिव्यता का प्रतीक हैं। वे जीवन में स्थिरता और समृद्धि लाती हैं । ●​ब्रह्मचारिणी (दूसरा दिन): यह स्वरूप गहन तपस्या और शुद्ध, अछूती ऊर्जा का प्रतीक है। उनकी पूजा से साधक को स्वतः ही सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं । ●​चंद्रघंटा (तीसरा दिन): यह रूप मन को मोहित करने वाली सुंदरता का प्रतीक है। ये सभी प्राणियों में मौजूद सौंदर्य का स्रोत हैं । ●​कूष्माण्डा (चौथा दिन): इन्हें प्राण ऊर्जा का पुंज माना जाता है, जो सूक्ष्मतम जगत से लेकर विशालतम ब्रह्मांड तक फैली हुई है। ये निराकार होकर भी सभी रूपों को जन्म देती हैं । ●​स्कंदमाता (पांचवां दिन): ये संपूर्ण ब्रह्मांड की संरक्षिका और सभी ज्ञान प्रणालियों की जननी हैं । ●​कात्यायनी (छठा दिन): चेतना के द्रष्टा पहलू से निकलने वाली ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करती हैं, जो सहज ज्ञान की शक्ति लाती हैं। इन्हें मन की शक्ति भी कहा गया है, और रुक्मिणी ने भगवान कृष्ण को पति

माँ शैलपुत्री Maa shailputri

नवरात्र पहला दिन माँ शैलपुत्री Navratri maa shailputri नवरात्र पहला दिन माँ शैलपुत्री  ब्रह्म पुराण में माँ शैलपुत्री के बारे में विस्तृत वर्णन मिलता है. माँ शैलपुत्री पर्वतराज हिमालय की बेटी है उन्हें माता पार्वती और हेमवती के नाम से भी जाना जाता है. इनका वाहन वृषभ है. नवरात्र के प्रथम दिन देवी शैलुपुत्री की पूजा करने का विधान है. मान्यता है की देवी पार्वती शिव के साथ विवाह के पश्चात प्रत्येक साल नौ दिनों के लिए अपने मायके आती थीं और पर्वतराज हिमालय नवरात्र के पहले दिन अपनी पुत्री का स्वागत उनकी पूजा कर किया करते थे तभी से नवरात्रो में पहले दिन माँ के शैलपुत्री रुप की पूजा की जाती है. माँ के दाहिने हाथ में त्रिशूल एवं बाएं हाथ में कमल का पुष्प शुशोभित है. करूणा और ममता का स्वरूप मानकर माँ के इस रूप की पूजा की  जाती है. माना जाता है कि माँ शैलपुत्री की आराधना करने मात्र से मूलाधार चक्र जागृत होता है नवरात्रो के पहले दिन माँ शैलपुत्री की पूजा करने से व्यक्ति को सुख, सुविधा, घर, संपत्ति,यश, वैभव प्राप्त होता है. नवरात्र पहला दिन माँ शैलपुत्री पूजा विधि Navratri puja vidhi नवरात्र पहला दिनपूजा विधिमाँ शैलपुत्रनवरात्रि के प्रथम दिन माँ शैलपुत्री की पूजा आराधना करने के लिए सबसे पहले पूजा स्थान को अच्छी तरह से साफ करके गंगाजल छिड़ककर शुद्ध कर ले. इसके बाद माँ दुर्गा की प्रतिमा को पूजा स्थल पर स्थापित करें। इसके बाद शुभ मुहूर्त में घटस्थापना यानि की कलश की स्थापना करे. कलश पर स्वस्तिक का चिन्ह बनाकर उसमें मौली बांध ले. अब कलश में गंगाजल मिलाकर शुद्ध जल से कलश को भर दे. कलश में सुपारी, या सिक्का डालकर कलश में आम के पत्ते रख दे. कलश के ऊपर नारियल रखकर मंदिर में स्थापित कर दे. इसके बाद माता को लाल चुनरी ओढ़ाकर तिलक कर पूजा करनी चाहिए. नवरात्र पहला दिन मंत्र/स्तुति Navratri Mantra Stuti नवरात्र पहला दिन माँ शैलपुत्री मंत्र ‘ॐ ऐं ह्रीं क्लीं शैलपुत्र्यै नम:।’ स्तुति :– शिखर वासिनी, त्रिशूल धारिणी वृषभ वाहिनी, शिव अर्धांगिनी सर्व प्रथम पूजा प्रतिस्ठायीनी शैलपुत्री यशस्विनम नमो नम:!! ध्यान वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्। वृषारुढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥ पूणेन्दु निभां गौरी मूलाधार स्थितां प्रथम दुर्गा त्रिनेत्राम्   पटाम्बर परिधानां रत्नाकिरीटा नामालंकार भूषिता॥ प्रफुल्ल वंदना पल्लवाधरां कातंकपोलां तुग कुचाम्। कमनीयां लावण्यां स्नेमुखी क्षीणमध्यां नितम्बनीम्॥ नवरात्र पहला दिन पहला भोग नवरात्र पहला दिन भोग विधि Navratri maa shailputri bhog मां शैलपुत्री को सफ़ेद चीजें अत्यधिक प्रिय है. इसीलिए नवरात्री के प्रथम दिन माँ शैलपुत्री को सफेद चीजों का भोग जैसे- गाय के घी में बना प्रसाद, घी का भोग बताया जाता है ऐसा करने से माँ अत्यधिक प्रसन्न होती है और व्यक्ति को आरोग्य का आशीर्वाद देती है. माँ शैलपुत्री आरती माँ शैलपुत्री आरती Aarti शैलपुत्री मां बैल असवार करें देवता जय जयकार ।।   शिव शंकर की प्रिय भवानी तेरी महिमा किसी ने ना जानी ।।   पार्वती तू उमा कहलावे जो तुझे सिमरे सो सुख पावे ।।   ऋद्धि-सिद्धि परवान करे तू दया करे धनवान करे तू ।।   सोमवार को शिव संग प्यारी आरती तेरी जिसने उतारी ।।   उसकी सगरी आस पुजा दो सगरे दुख तकलीफ मिला दो ।।   घी का सुंदर दीप जला के गोला गरी का भोग लगा के ।।   श्रद्धा भाव से मंत्र गाएं प्रेम सहित फिर शीश झुकाएं ।।   जय गिरिराज किशोरी अंबे शिव मुख चंद्र चकोरी अंबे ।।   मनोकामना पूर्ण कर दो भक्त सदा सुख संपत्ति भर दो ।। 

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