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ॠण कितने प्रकार के होते है, आपकी जन्म कुंडली में कौन सा ॠण है विद्यमान, ऋण मुक्ति के क्या है उपाय

।। घर के पितर रुष्ट होने के लक्षण और उपाय ।। बहुत जिज्ञासा होती है आखिर ये पितृदोष है क्या? पितृ-दोष शांति के सरल उपाय पितृ या पितृ गण कौन हैं ? आपकी जिज्ञासा को शांत करती विस्तृत प्रस्तुति। पितृ गण हमारे पूर्वज हैं जिनका ऋण हमारे ऊपर है, क्योंकि उन्होंने कोई ना कोई उपकार हमारे जीवन के लिए किया है मनुष्य लोक से ऊपर पितृ लोक है,पितृ लोक के ऊपर सूर्य लोक है एवं इस से भी ऊपर स्वर्ग लोक है।आत्मा जब अपने शरीर को त्याग कर सबसे पहले ऊपर उठती है तो वह पितृ लोक में जाती है, वहाँ हमारे पूर्वज मिलते हैं अगर उस आत्मा के अच्छे पुण्य हैं तो ये हमारे पूर्वज भी उसको प्रणाम कर अपने को धन्य मानते हैं की इस अमुक आत्मा ने हमारे कुल में जन्म लेकर हमें धन्य किया इसके आगे आत्मा अपने पुण्य के आधार पर सूर्य लोक की तरफ बढती है।वहाँ से आगे, यदि और अधिक पुण्य हैं, तो आत्मा सूर्य लोक को भेज कर स्वर्ग लोक की तरफ चली जाती है, लेकिन करोड़ों में एक आध आत्मा ही ऐसी होती है, जो परमात्मा में समाहित होती है जिसे दोबारा जन्म नहीं लेना पड़ता मनुष्य लोक एवं पितृ लोक में बहुत सारी आत्माएं पुनः अपनी इच्छा वश, मोह वश अपने कुल में जन्म लेती हैं। पितृ दोष- हमारे ये ही पूर्वज सूक्ष्म व्यापक शरीर से अपने परिवार को जब देखते हैं, और महसूस करते हैं कि हमारे परिवार के लोग ना तो हमारे प्रति श्रद्धा रखते हैं और न ही इन्हें कोई प्यार या स्नेह है और ना ही किसी भी अवसर पर ये हमको याद करते हैं,ना ही अपने ऋण चुकाने का प्रयास ही करते हैं तो ये आत्माएं दुखी होकर अपने वंशजों को श्राप दे देती हैं,जिसे “पितृ- दोष” कहा जाता है।पितृ दोष एक अदृश्य बाधा है। ये बाधा पितरों द्वारा रुष्ट होने के कारण होती है पितरों के रुष्ट होने के बहुत से कारण हो सकते हैं, आपके आचरण से, किसी परिजन द्वारा की गयी गलती से, श्राद्ध आदि कर्म ना करने से, अंत्येष्टि कर्म आदि में हुई किसी त्रुटि के कारण भी हो सकता है।इसके अलावा मानसिक अवसाद,व्यापार में नुक्सान, परिश्रम के अनुसार फल न मिलना, विवाह या वैवाहिक जीवन में समस्याएं, कैरिअर में समस्याएं या संक्षिप्त में कहें तो जीवन के हर क्षेत्र में व्यक्ति और उसके परिवार को बाधाओं का सामना करना पड़ता है। पितृ दोष होने पर अनुकूल ग्रहों की स्थिति, गोचर, दशाएं होने पर भी शुभ फल नहीं मिल पाते, कितना भी पूजा पाठ, देवी देवताओं की अर्चना की जाए उसका शुभ फल नहीं मिल पाता। पितृ दोष दो प्रकार से प्रभावित करता है- १.अधोगति वाले पितरों के कारण, २.उर्ध्वगति वाले पितरों के कारण। अधोगति वाले पितरों के दोषों का मुख्य कारण परिजनों द्वारा किया गया गलत आचरण, अतृप्त इच्छाएं, जायदाद के प्रति मोह और उसका गलत लोगों द्वारा उपभोग होने पर, विवाहादि में परिजनों द्वारा गलत निर्णय। परिवार के किसी प्रियजन को अकारण कष्ट देने पर पितर क्रुद्ध हो जाते हैं, परिवार जनों को श्राप दे देते हैं और अपनी शक्ति से नकारात्मक फल प्रदान करते हैं। उर्ध्व गति वाले पितर सामान्यतः पितृदोष उत्पन्न नहीं करते, परन्तु उनका किसी भी रूप में अपमान होने पर अथवा परिवार के पारंपरिक रीति-रिवाजों का निर्वहन नहीं करने पर वह पितृदोष उत्पन्न करते हैं।इनके द्वारा उत्पन्न पितृदोष से व्यक्ति की भौतिक एवं आध्यात्मिक उन्नति बिलकुल बाधित हो जाती है, फिर चाहे कितने भी प्रयास क्यों ना किये जाएँ, कितने भी पूजा पाठ क्यों ना किये जाएँ, उनका कोई भी कार्य ये पितृदोष सफल नहीं होने देता। पितृ दोष निवारण के लिए सबसे पहले ये जानना ज़रूरी होता है कि किस गृह के कारण और किस प्रकार का पितृ दोष उत्पन्न हो रहा है ?जन्म पत्रिका और पितृ दोष जन्म पत्रिका में लग्न, पंचम, अष्टम और द्वादश भाव से पितृदोष का विचार किया जाता है। पितृ दोष में ग्रहों में मुख्य रूप से सूर्य, चन्द्रमा, गुरु, शनि और राहू-केतु की स्थितियों से पितृ दोष का विचार किया जाता है।इनमें से भी गुरु, शनि और राहु की भूमिका प्रत्येक पितृ दोष में महत्वपूर्ण होती है इनमें सूर्य से पिता या पितामह, चन्द्रमा से माता या मातामह, मंगल से भ्राता या भगिनी और शुक्र से पत्नी का विचार किया जाता है।अधिकाँश लोगों की जन्म पत्रिका में मुख्य रूप से क्योंकि गुरु, शनि और राहु से पीड़ित होने पर ही पितृ दोष उत्पन्न होता है, इसलिए विभिन्न उपायों को करने के साथ साथ व्यक्ति यदि पंचमुखी, सातमुखी और आठ मुखी रुद्राक्ष भी धारण कर ले , तो पितृ दोष का निवारण शीघ्र हो जाता है। पितृ दोष निवारण के लिए इन रुद्राक्षों को धारण करने के अतिरिक्त इन ग्रहों के अन्य उपाय जैसे मंत्र जप और स्तोत्रों का पाठ करना भी श्रेष्ठ होता है। विभिन्न ऋण और पितृ दोष- हमारे ऊपर मुख्य रूप से ०५ ऋण होते हैं जिनका कर्म न करने (ऋण न चुकाने पर) हमें निश्चित रूप से श्राप मिलता है, ये ऋण हैं- मातृ ऋण, पितृ ऋण, मनुष्य ऋण, देव ऋण और ऋषि ऋण। मातृ ऋण- माता एवं माता पक्ष के सभी लोग जिनमें मा, मामी, नाना, नानी, मौसा, मौसी और इनके तीन पीढ़ी के पूर्वज होते हैं, क्योंकि माँ का स्थान परमात्मा से भी ऊंचा माना गया है अतः यदि माता के प्रति कोई गलत शब्द बोलता है, अथवा माता के पक्ष को कोई कष्ट देता रहता है, तो इसके फलस्वरूप उसको नाना प्रकार के कष्ट भोगने पड़ते हैं। इतना ही नहीं, इसके बाद भी कलह और कष्टों का दौर भी परिवार में पीढ़ी दर पीढ़ी चलता ही रहता है। पितृ ऋण- पिता पक्ष के लोगों जैसे बाबा, ताऊ, चाचा, दादा-दादी और इसके पूर्व की तीन पीढ़ी का श्राप हमारे जीवन को प्रभावित करता है पिता हमें आकाश की तरह छत्रछाया देता है, हमारा जिंदगी भर पालन -पोषण करता है, और अंतिम समय तक हमारे सारे दुखों को खुद झेलता रहता है।पर आज के के इस भौतिक युग में पिता का सम्मान क्या नयी पीढ़ी कर रही है ? पितृ-भक्ति करना मनुष्य का धर्म है, इस धर्म का पालन न करने पर उनका श्राप नयी पीढ़ी को झेलना ही पड़ता है, इसमें घर

पितृ दोष के लक्षण एवं पितृदोष शांति के उपाय

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पितृदोष की शांति के उपाय || पितृ-सूक्तम्|| ||श्राद्ध महिमा ||

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पितृदोष की शांति के उपाय सर्वपितृ अमावस्या पर अवश्य प्रयोग करें पितृदोष एक अदृश्य बाधा है। यह बाधा पितरों द्वारा रुष्ट होने के कारण होती है। पितरों के रुष्ट होने के बहुत से कारण हो सकते हैं, जैसे आपके आचरण से, किसी परिजन द्वारा की गई गलती से, श्राद्ध आदि कर्म न करने से, अंत्येष्टि कर्म आदि में हुई किसी त्रुटि के कारण भी हो सकता है। 1. सामान्य उपायों में षोडश पिंडदान, सर्पपूजा, ब्राह्मण को गौदान, कन्यादान, कुआं, बावड़ी, तालाब आदि बनवाना, मंदिर प्रांगण में पीपल, बड़ (बरगद) आदि देववृक्ष लगवाना एवं विष्णु मंत्रों का जाप, प्रेत श्राप को दूर करने के लिए श्रीमद्द्भागवत का पाठ करना चाहिए। 2. वेदों और पुराणों में पितरों की संतुष्टि के लिए मंत्र, स्तोत्र एवं सूक्तों का वर्णन है जिसके नित्य पठन से किसी भी प्रकार की पितृ बाधा क्यों न हो, वह शांत हो जाती है। अगर नित्य पठन संभव न हो तो कम से कम प्रत्येक माह की अमावस्या और आश्विन कृष्ण पक्ष अमावस्या अर्थात पितृपक्ष में अवश्य करना चाहिए। वैसे तो कुंडली में किस प्रकार का पितृदोष है, उस पितृदोष के प्रकार के हिसाब से पितृदोष शांति करवाना अच्छा होता है। 3. भगवान भोलेनाथ की तस्वीर या प्रतिमा के समक्ष बैठकर या घर में ही भगवान भोलेनाथ का ध्यान कर निम्न मंत्र की 1 माला नित्य जाप करने से समस्त प्रकार के पितृदोष संकट बाधा आदि शांत होकर शुभत्व की प्राप्ति होती है। मंत्र जाप प्रात: या सायंकाल कभी भी कर सकते हैं। मंत्र : ‘ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय च धीमहि तन्नो रुद्र: प्रचोदयात।’ 4. अमावस्या को पितरों के निमित्त पवित्रतापूर्वक बनाया गया भोजन तथा चावल बूरा, घी एवं 1 रोटी गाय को खिलाने से पितृदोष शांत होता है। 5. अपने माता-पिता व बुजुर्गों का सम्मान, सभी स्त्री कुल का आदर-सम्मान करने और उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति करते रहने से पितर हमेशा प्रसन्न रहते हैं। 6. पितृदोषजनित संतान कष्ट को दूर करने के लिए ‘हरिवंश पुराण’ का श्रवण करें या स्वयं नियमित रूप से पाठ करें। 7. प्रतिदिन दुर्गा सप्तशती या सुन्दरकाण्ड का पाठ करने से भी इस दोष में कमी आती है। 8. सूर्य पिता है अत: ताम्बे के लोटे में जल भरकर उसमें लाल फूल, लाल चंदन का चूरा, रोली आदि डालकर सूर्यदेव को अर्घ्य देकर 11 बार ‘ॐ घृणि सूर्याय नम:’ मंत्र का जाप करने से पितरों की प्रसन्नता एवं उनकी ऊर्ध्व गति होती है। 9. अमावस्या वाले दिन अवश्य अपने पूर्वजों के नाम दुग्ध, चीनी, सफेद कपड़ा, दक्षिणा आदि किसी मंदिर में अथवा किसी योग्य ब्राह्मण को दान करना चाहिए। 10. पितृ पक्ष में पीपल की परिक्रमा अवश्य करें। अगर 108 परिक्रमा लगाई जाए तो पितृदोष अवश्य दूर होगा। 11.किसी मंदिर के परिसर में पीपल अथवा बड़ का वृक्ष लगाएं और रोज उसमें जल डालें, उसकी देखभाल करें। जैसे-जैसे वृक्ष फलता-फूलता जाएगा, पितृदोष दूर होता जाएगा, क्योंकि इन वृक्षों पर ही सारे देवी-देवता, इतर योनियां व पितर आदि निवास करते हैं। 12. यदि आपने किसी का हक छीना है या किसी मजबूर व्यक्ति की धन-संपत्ति का हरण किया है तो उसका हक या संपत्ति उसको अवश्य लौटा दें। 13. पितृदोष से पीड़ित व्यक्ति को किसी भी एक अमावस्या से लेकर दूसरी अमावस्या तक अर्थात 1 माह तक किसी पीपल के वृक्ष के नीचे सूर्योदय काल में शुद्ध घी का 1 दीपक लगाना चाहिए और ये क्रम टूटना नहीं चाहिए। 14.एक माह बीतने पर जो अमावस्या आए, उस दिन एक प्रयोग और करें। इसके लिए किसी देसी गाय या दूध देने वाली गाय का थोड़ा-सा गौमूत्र प्राप्त करें और उसे थोड़े जल में मिलाकर इस जल को पीपल वृक्ष की जड़ों में डाल दें। इसके बाद पीपल वृक्ष के नीचे 5 अगरबत्ती, 1 नारियल और शुद्ध घी का दीपक लगाकर अपने पूर्वजों से श्रद्धापूर्वक अपने कल्याण की कामना करें और घर आकर उसी दिन दोपहर में कुछ गरीबों को भोजन करा दें। ऐसा करने पर पितृदोष शांत हो जाएगा। 15. घर में कुआं हो या पीने का पानी रखने की जगह हो, उस जगह की शुद्धता का विशेष ध्यान रखें, क्योंकि ये पितृ स्थान माना जाता है। इसके अलावा पशुओं के लिए पीने का पानी भरवाने तथा प्याऊ लगवाने अथवा आवारा कुत्तों को जलेबी खिलाने से भी पितृदोष शांत होता है। 16. अगर पितृदोष के कारण अत्यधिक परेशानी हो, संतान हानि हो या संतान को कष्ट हो तो किसी शुभ समय में अपने पितरों को प्रणाम कर उनसे प्रसन्न होने की प्रार्थना करें और अपने द्वारा जाने-अनजाने में किए गए अपराध व उपेक्षा के लिए क्षमा-याचना करें। फिर घर अथवा शिवालय में पितृगायत्री मंत्र का सवा लाख विधि से जाप कराएं। जाप के उपरांत दशांश हवन के बाद संकल्प लें कि इसका पूर्ण फल पितरों को प्राप्त हो, ऐसा करने से पितर अत्यंत प्रसन्न होते हैं, क्योंकि उनकी मुक्ति का मार्ग आपने प्रशस्त किया होता है। विशेष उपाय :पितृदोष की शांति हेतु यह उपाय बहुत ही अनुभूत और अचूक फल देने वाला देखा गया है। वह यह कि किसी गरीब की कन्या के विवाह में गुप्त रूप से अथवा प्रत्यक्ष रूप से आर्थिक सहयोग करना। (लेकिन यह सहयोग पूरे दिल से होना चाहिए, केवल दिखावे या अपनी बढ़ाई कराने के लिए नहीं)। इससे पितर अत्यंत प्रसन्न होते हैं, क्योंकि इसके परिणामस्वरूप मिलने वाले पुण्य फल से पितरों को बल और तेज मिलता है जिससे वे ऊर्ध्व लोकों की ओर गति करते हुए पुण्य लोकों को प्राप्त होते हैं। अगर किसी विशेष कामना को लेकर किसी परिजन की आत्मा पितृदोष उत्पन्न करती है तो ऐसी स्थिति में मोह को त्यागकर उसकी सद्गति के लिए ‘गजेन्द्र मोक्ष स्तोत्र’ का पाठ करना चाहिए। पितृदोष दूर करने का अत्यंत सरल उपाय घर के वायव्य कोण (North-West)में सरसों के तेल में बराबर मात्रा में अगर का तेल मिलाकर दीपक पूरे पितृपक्ष में लगाना चाहिए। दीया पीतल का हो तो ज्यादा अच्छा है। दीपक कम से कम 10 मिनट जलना आवश्यक है। 17…पितृपक्ष में अपने पितरों के नाम से संकल्प कर मृत्युंजय मंत्र/ गायत्री मंत्र विष्णु सहस्रनाम/ गीता पाठ आदि में जो भी संभव हो करें उसका फल अपने पितरों को अर्पित कर दें।उनकी कृपा, प्रसन्नता और शांति हेतु। 1..सीताराम 2..श्रीकृष्णम् शरणम् गच्छामि। 3..ॐ श्रींं श्रीनिवासाय नमः। ४..ॐ नमः शिवाय शिवजी सदा

श्राध्दपक्ष/ पितृपक्ष में क्या करने से मिलेगी पितृ ऋण से मुक्ति !

पितृपक्ष 2025 : महत्व, तिथि एवं विधि (07 सितंबर 2025, रविवार से 21 सितंबर 2025, रविवार तक) ॐ पितृदेवानां नमो नमः । ॐ ब्रह्मयोनये पितृलोकनाथाय नमः । ॐ सोमाय पितृराजाय स्वधा नमः । ॐ वसु-रुद्रादित्य-पितृभ्यः स्वधा नमः । ॐ सप्तर्षिभ्यः पितृभ्यश्च नमः स्वधा स्वाहा । ॐ त्रैलोक्यपालक पितृभ्यः सर्वेभ्यो नमो नमः ।। ॐ नमोऽस्तु पितृभ्यः पितामहेभ्यः प्रपितामहेभ्यश्च । नमो नमः सर्वेभ्यो ये के च न स्मर्यन्ते ॥ “उन पितरों को मेरा बार-बार नमस्कार है — पिता, पितामह, प्रपितामह और वे भी जिनका नाम स्मरण में नहीं आता।”:ॐ पितृभ्यः स्वधा नमः । 01.. पितृपक्ष 2025 : तिथि तालिकाप्रारंभ : 7 सितंबर 2025, रविवार (पूर्णिमा श्राद्ध)समापन : 21 सितंबर 2025, रविवार (सर्वपितृ अमावस्या) दिन, वार, श्राद्ध तिथियाँ 7 सितम्बर – रविवार,पूर्णिमा श्राद्ध 8 सितम्बर –सोमवार प्रतिपदा श्राद्ध 9 सितम्बर –मंगलवार, द्वितीया श्राद्ध 10 सितम्बर –बुधवार, तृतीया, चतुर्थी श्राद्ध 11 सितम्बर – गुरुवार, चतुर्थी, महाभरणी श्राद्ध 12 सितम्बर – शुक्रवार, पंचमी—षष्ठी श्राद्ध 13 सितम्बर – शनिवार, सप्तमी श्राद्ध 14 सितम्बर –रविवार , अष्टमी श्राद्ध 15 सितम्बर – सोमवार,नवमी श्राद्ध 16 सितम्बर – मंगलवार,दशमी श्राद्ध 17 सितम्बर –बुधवार, एकादशी श्राद्ध 18 सितम्बर – गुरुवार,द्वादशी श्राद्ध 19 सितम्बर – शुक्रवार,त्रयोदशी, मघा श्राद्ध 20 सितम्बर – शनिवार,चतुर्दशी श्राद्ध 21 सितम्बर – रविवार,सर्वपितृ अमावस्या (मुख्य श्राद्ध) 2… पितरों का परिचय पितर शब्द संस्कृत के “पिता” या पूर्वज से बना है।वे हमारे पूर्वज हैं जिनकी आत्मा परलोक में स्थित है।उनका आशीर्वाद मिलने पर परिवार में सुख-समृद्धि और शांति आती है, और उपेक्षा करने पर जीवन में बाधाएँ उत्पन्न हो सकती हैं। हिन्दू धर्म में पितृपक्ष का बहुत महत्व है। प्रत्येक वर्ष आश्विन माह की कृष्ण पक्ष तिथि को पितृपक्ष कहा जाता है। इसे श्राद्ध पक्ष भी कहते हैं। पितरों की आत्मा की शांति के लिए इस पक्ष में श्रद्धापूर्वक तर्पण, पिंडदान, हवन और ब्राह्मण भोजन कराया जाता है। श्राद्ध और तर्पण करने का कारण है पितरों को प्रसन्न करना। यह विश्वास है कि पितर प्रसन्न होकर अपने वंशजों को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं। धर्मशास्त्रों के अनुसार श्राद्ध-पक्ष में पितरों का पृथ्वी पर आगमन होता है। पितरों की आत्मा की शांति और तृप्ति के लिए श्राद्ध कर्म, तर्पण और ब्राह्मण भोजन कराया जाता है। श्राद्ध शब्द श्रद्धा से बना है। श्रद्धा का अर्थ है ।आस्था और विश्वास। आस्था और विश्वास से किया गया कर्म ही श्राद्ध कहलाता है। शास्त्रों के अनुसार श्राद्ध कर्म से पितर तृप्त होते हैं और आशीर्वाद देते हैं। श्राद्ध पक्ष में किया गया पिंडदान, तर्पण, ब्राह्मण भोजन, दान-पुण्य आदि पितरों को तृप्त कर उन्हें मोक्ष की ओर अग्रसर करता है। श्राद्ध कर्म करने से पितरों की आत्मा की शांति होती है। पितर प्रसन्न होकर परिवार की रक्षा करते हैं और घर-परिवार को खुशियों से भर देते हैं। शास्त्रों में लिखा है कि जो मनुष्य अपने पितरों का श्राद्ध करता है, उसके जीवन में कभी भी दुख, कष्ट और दरिद्रता नहीं आती। पितर वंशजों को दीर्घायु, संतान सुख धन-धान्य और समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं। पितृपक्ष में प्रतिदिन सूर्य उदय के बाद तर्पण करने का विधान है। तर्पण में पवित्र नदी तालाब या कुएँ के जल का प्रयोग किया जाता है। तर्पण के समय काला तिल , कुश और जल का उपयोग कर ‘ॐ पितृभ्यः नमः’ कहते हुए पितरों का आह्वान करना चाहिए। श्राद्ध पक्ष में पिंडदान करने का भी महत्व है। आटे के गोले जिसमें तिल, चावल, जौ, घी और शहद मिलाकर बनाए जाते हैं, उन्हें पिंड कहते हैं। इन पिंडों को पितरों को समर्पित कर ब्राह्मणों को दान किया जाता है। यह पिंडदान पितरों की आत्मा को तृप्त कर उन्हें मोक्ष की ओर ले जाता है। श्राद्ध कर्म में ब्राह्मणों को भोजन कराना अत्यंत आवश्यक है। मान्यता है कि ब्राह्मण भोजन से पितर प्रसन्न होते हैं। साथ ही श्राद्ध में दक्षिणा, अन्न, वस्त्र आदि का दान करना भी पुण्यकारी माना जाता है। पितृपक्ष के समय विवाह , गृह प्रवेश , मुंडन संस्कार आदि शुभ कार्य करने का निषेध है। इस दौरान केवल पितरों को तृप्त करने वाले कार्य करने चाहिए। श्राद्ध पक्ष का समापन सर्वपितृ अमावस्या को होता है। इस दिन उन पितरों का श्राद्ध किया जाता है जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं होती। 3.. पितृस्थान (पितृलोक) पितरों का निवास पितृलोक में माना गया है।यह सूर्यलोक और मर्त्यलोक के ऊपर बताया गया है।वे हमारे कर्म, दान और श्राद्ध से संतुष्ट होकर आशीर्वाद देते हैं। 4..पितृकर्म (अनुष्ठान) मुख्य कर्म:1. श्राद्ध – भोजन और दान द्वारा पितरों को तृप्त करना। 2. तर्पण (जलदान) – तिल और जल से अर्घ्य अर्पण। 3. पिंडदान – आटे/चावल के गोल पिंड बनाकर समर्पण। 4. दान और ब्राह्मण भोजन – गरीब, गौ, पक्षी, ब्राह्मण को भोजन-वस्त्र दान। 5.. पितरों का प्रभावअनुग्रह होने पर : परिवार में सुख, स्वास्थ्य, संतान, उन्नति और धन-धान्य। असंतोष होने पर : कलह, रोग, आर्थिक कठिनाई, मानसिक अशांति। 6.. वैदिक व पुराणिक दृष्टिऋग्वेद (10/12 सूक्त) में पितरों का उल्लेख।महाभारत और भागवत पुराण में श्राद्ध की महिमा।पितरों को देवताओं के समान अन्न-जल से तृप्त करना आवश्यक बताया गया है। 7.. पितृ दोष और निवारण यदि किसी पूर्वज की इच्छाएँ अधूरी रह गई हों, तो जन्मकुंडली में पितृदोष बनता है। निवारण के उपाय:श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान।गायत्री मंत्र जप, रुद्राभिषेक।दान और सेवा। 8..साधारण पितृ मंत्र ॐ पितृभ्यः नमःॐ तर्पयामि पितरंॐ स्वधा नमः 9. विशेष प्रसंगमहाभारत प्रसंग : दानवीर कर्ण को मृत्यु के बाद भोजन के स्थान पर स्वर्ण मिला क्योंकि उन्होंने जीवन में भोजन दान नहीं किया था। बाद में पितृपक्ष में आकर उन्होंने पितरों को अर्पण कर ऋणमुक्ति पाई। 10. भरणी श्राद्धभरणी नक्षत्र में होने वाला विशेष श्राद्ध।इसे महाभरणी श्राद्ध कहा जाता है और गया श्राद्ध के समान फलदायी है।इस दिन कौवे, कुत्ते और गौ को भोजन अवश्य कराना चाहिए। 11.– श्राद्ध के नियम और विशेष बातें १ गाय का घी, दूध, दही प्रयोग करें। २.चांदी के बर्तन पितरों को तृप्त करते हैं। ३. श्राद्ध में मौन ब्राह्मण भोजन आवश्यक है। ४. श्राद्ध का समय – कुतप मुहूर्त (प्रातः 11:30 से 1:00 के बीच) श्रेष्ठ है। ५.. पितरों को प्रिय खाद्य – खीर, दूध, दही, शहद, घी। ६. कौए, गाय, कुत्ते, चींटी आदि को भोजन अर्पण करना चाहिए। ७. श्राद्ध में तुलसी, कुशा, तिल और गंगाजल का उपयोग अनिवार्य है। 12. श्राद्ध स्थलों का महत्व गया (बिहार)काशी (वाराणसी)प्रयागराज (त्रिवेणी संगम)रामेश्वरमबद्रीनाथ–केदारनाथ 13. पितृपक्ष का महत्व पितृऋण से मुक्ति

श्राद्ध से बढ़कर महान् यज्ञ तीनों लोकों में दूसरा कोई नहीं है।पितृ पक्ष की होने वाली है शुरुआत, इन मंत्रों के जप से मिलेगा पितरों का आशीर्वाद !

श्राद्धसे बढ़कर महान् यज्ञ तीनों लोकोंमें दूसरा कोई नहीं है। इसमें जो कुछ दान दिया जाता है, वह सब अक्षय होता है। दूसरोंको जो दान दिया जाता है; उसका फल दस हजारगुना होता है। अपनी जातिवालोंको देनेसे लाख-गुना फल होता है क्योंकि मनुष्य का कर्तव्य अपने समुदाय या अपनी जाति का संरक्षण और देखभाल करना मुख्य है। पर पिण्डदान व श्राद्ध आदि में लगाया हुआ धन करोड़गुना होकर पुनः आपको ही प्राप्त हो जाता है क्योंकि जिन पूर्वजों तथा जिन जिन पितरों की कृपा से आपका जन्म हो सका उनके लिए कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए ही आश्विन मास का श्राद्ध काल निर्धारित किया गया है वेसे हर अमावस्या तथा अष्टकाओं में भी श्राद्ध कर्म अनिवार्य होता है।जो गृहस्थ हर अमावस्या को भी मासिक श्राद्ध करता है अथवा पितरों के निमित्त तिल मिश्रित जल से तीर्थ स्थल पर जाकर तर्पण वह गृहस्थ अति शीघ्र ही अद्वितीय धनधान्य और संतति से भरा हुआ होकर देवताओं और नवग्रहों की कृपा भी प्राप्त कर धन्य हो जाता है। देवी स्वधा के पति जो पितर नाम से संबोधित किये गए हैं वे सभी देवताओं द्वारा भी पूजनीय हैं और वे आधुनिक मन्वंतर के देवताओं के भी पूर्वज हैं। अतः श्राद्ध कर्म से देवता भी प्रसन्न होते हैं। आप लोग वर्ष के 11 माह देवी देवताओं के लिए व्रत उपवास हवन आदि करते हो यह उत्तम कार्य है पर आश्विन मास का श्राद्ध काल उन सभी प्रकार के कर्मकांडो या सब कर्मो या हवन विधि विधान आदि को महाफल देने वाला ही समझा जाए। पिण्डदान और श्राद्ध कर्म के दौरान उस बुलाये गए जितेन्द्रिय ब्राह्मण को दान देने पर वह अनन्त गुना फल देनेवाला बताया गया है। पितरों के निमित्त तीर्थ में अन्नदान-जो गंगाजीके जलमें और गया, प्रयाग, पुष्कर, काशी, सिद्धकुण्ड तथा गंगा-सागर-संगम तीर्थमें पितरोंके लिये अन्नदान करता है, उसकी मुक्ति निश्चित है तथा उसके पितर अक्षय स्वर्ग प्राप्त करते हैं। उनका जन्म सफल हो जाता है। जो विशेषतः गंगाजीमें तिलमिश्रित जलके द्वारा तर्पण करता है, उसे भी मोक्षका मार्ग मिल जाता है। फिर जो पिण्डदान करता है, उसके लिये तो कहना ही क्या है। अमावास्या और युगादि तिथियोंको ( इनका वर्णन हमने कालखण्ड पुस्तक में किया है ) तथा चन्द्रमा और सूर्य ग्रहणके दिन जो पार्वण श्राद्ध करता है, वह अक्षय लोकका भागी होता है। उसके पितर उसे प्रिय आशीर्वाद और अनन्त भोग प्रदान करके दस हजार वर्षांतक तृप्त रहते हैं। ऐसा पद्मपुराण के सृष्टिखण्ड अध्याय ४७ का कथन है। इसलिये प्रत्येक पर्वपर पुत्रोंको प्रसन्नतापूर्वक पार्वण श्राद्ध करना चाहिये। माता-पिताके इस श्राद्ध-यज्ञका अनुष्ठान करके मनुष्य सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त हो जाता है।जो श्राद्ध प्रतिदिन किया जाता है, उसे नित्य श्राद्ध माना गया है। जो पुरुष श्रद्धापूर्वक नित्य श्राद्ध करता है, वह अक्षय लोकका उपभोग करता है। इसी प्रकार कृष्णपक्षमें विधिपूर्वक काम्य श्राद्धका अनुष्ठान करके मनुष्य मनोवांछित फल प्राप्त करता है। महालय या पितृपक्ष में पितरोंका श्राद्ध सभी को करना चाहिये। उस समय सूर्य कन्याराशिपर गये हैं या नहीं-इसका विचार नहीं करना चाहिये। जब सूर्य कन्याराशिपर स्थित होते हैं, उस समयसे लेकर सोलह दिन उत्तम दक्षिणाओं से सम्पन्न यज्ञों के समान महत्त्व रखते हैं। उन दिनोंमें इस परम पवित्र काम्य श्राद्धका अनुष्ठान करना उचित है। इससे श्राद्धकर्ताका मंगल होता है। यदि उस समय श्राद्ध न हो सके तो जब सूर्य तुला राशि पर स्थित हों, उसी समय कृष्णपक्ष आदिमें उक्त श्राद्ध करना उचित है। चंद्र ग्रहण के समय – चन्द्रग्रहण ( आने ही वाला है चंद्र ग्रहण ..) के समय सभी दान भूमिदानके समान होते हैं, सभी संध्यापूत ब्राह्मण व्यासके समान माने जाते हैं , सभी जितेन्द्रिय संत सनत्कुमार के समान पावन माने गए हैं ।और समस्त जल गंगाजलके तुल्य हो जाता है। चन्द्रग्रहणमें दिया हुआ दान और समयकी अपेक्षा लाखगुना तथा सूर्यग्रहणका दस लाखगुना अधिक फल देनेवाला बताया गया है। और संयोग से चंद्र ग्रहण के समय आपको यदि गंगाजीका जल प्राप्त हो जाय, तब तो चन्द्रग्रहणका दान करोड़गुना और सूर्यग्रहणमें दिया हुआ दान दस करोड़गुना अधिक फल देनेवाला होता है। विधिपूर्वक एक लाख ( 1,00000) गोदान करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वह चन्द्रग्रहणके समय गंगाजीमें स्नान करनेसे मिल जाता है। जो चन्द्रमा और सूर्यके ग्रहणमें गंगाजीके जलमें डुबकी लगाता है, उसे सम्पूर्ण तीर्थोंमें स्नान करनेका फल प्राप्त होता है। यदि रविवारको सूर्यग्रहण और सोमवारको चन्द्रग्रहण हो तो वह चूड़ामणि नामक योग कहलाता है; उसमें स्नान और दानका अनन्त फल माना गया है। उस समय पुण्य तीर्थमें पहले उपवास करके जो पुरुष पिण्डदान, तर्पण तथा धन-दान करता है, वह सत्यलोकमें प्रतिष्ठित होता है। अथवा कोई मनुष्य किसी घोर मजबूरी के कारण चंद्र ग्रहण के समय अथवा सूर्य ग्रहण के पावन समय यदि तीर्थ स्थल पर न जा पाए तो वह पवित्र स्थल पर बैठकर कुशा या स्वर्ण अथवा चांदी धारण करके देवी स्वधा के स्तोत्र का पाठ करे या श्राद्ध के दिन संध्यापूत ब्राह्मण से करवाये तो भी उस पर पितरों की कृपा निश्चित ही होती है पितृ पक्ष की होने वाली है शुरुआत, इन मंत्रों के जप से मिलेगा पितरों का आशीर्वाद ● पितृ पक्ष की शुरुआत भाद्रपद पूर्णिमा से होगी और समापन आश्विन मास की अमावस्या को होगा, सोलह दिनों तक चलने वाले इस कालखंड में श्रद्धालु अपने पितरों को जल अर्पित करते हैं और उनकी मृत्यु तिथि पर श्राद्ध व तर्पण की विशेष परंपरा निभाते हैं, पंचांग के अनुसार, 2025 में पितृ पक्ष 7 सितंबर से प्रारंभ होकर 21 सितंबर को महालया अमावस्या के दिन संपन्न होगा। ● पितृ पक्ष के दौरान उपाय – पितृ पक्ष के दौरान पितृ दोष को दूर करने के भी कई उपाय किए जाते हैं, पितृ दोष ज्योतिष शास्त्र के अनुसार एक प्रमुख दोष माना जाता है, यह दोष उस कर्म ऋण का प्रतीक है, जो हमारे पूर्वजों के अधूरे या नकारात्मक कर्मों के कारण बनता है, यदि इसका निवारण न किया जाए तो व्यक्ति और उसका परिवार पितरों की नाराजगी के साथ-साथ जीवन में अनेक बाधाओं और अनहोनी घटनाओं का सामना कर सकता है, हालांकि शास्त्रों और रावण संहिता में इसके समाधान और विशेष मंत्र बताए गए हैं। ● पितृ दोष निवारण मंत्र – ऊँ श्री पितराय नमः तथा ऊँ श्री पितृदेवाय नमः – इन मंत्रों का 21 बार जाप करने से पूर्वज प्रसन्न होते हैं। ● ऊँ श्री पितृभ्यः नमः – 51

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