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शनि साढ़ेसाती: प्रभाव और उपाय

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शनि साढ़ेसाती: प्रभाव और उपाय वैदिक ज्योतिष में शनि ग्रह का एक विशेष स्थान है। इसे कर्मफल दाता, न्यायाधीश और मंद गति से चलने वाला ग्रह माना जाता है। शनि की चाल धीमी होने के कारण यह एक राशि में लगभग ढाई वर्ष तक रहता है, और इसी धीमी गति के कारण इसके प्रभाव भी दीर्घकालिक और गहरे होते हैं। शनि से जुड़ी एक ऐसी ही महत्वपूर्ण अवधि है – शनि साढ़ेसाती। यह वह समय होता है जब व्यक्ति के जीवन में बड़े बदलाव, चुनौतियाँ और कई बार कठिनाइयाँ आती हैं। लेकिन यह केवल नकारात्मकता का काल नहीं है, बल्कि यह आत्म-मंथन, आत्म-सुधार और आध्यात्मिक उन्नति का भी एक महत्वपूर्ण अवसर होता है। इस विस्तृत लेख में हम शनि साढ़ेसाती क्या है, इसकी गणना कैसे की जाती है, इसके विभिन्न चरण और उनके प्रभाव, तथा इस अवधि में आने वाली चुनौतियों से निपटने के लिए ज्योतिषीय और व्यावहारिक उपायों पर गहराई से चर्चा करेंगे। शनि साढ़ेसाती क्या है? शनि साढ़ेसाती एक साढ़े सात वर्ष की अवधि होती है, जो किसी व्यक्ति की चंद्र राशि पर आधारित होती है। जब शनि गोचरवश किसी व्यक्ति की जन्म चंद्र राशि से बारहवीं राशि में प्रवेश करता है, तो साढ़ेसाती का पहला चरण शुरू होता है। इसके बाद जब शनि चंद्र राशि में आता है, तो दूसरा चरण होता है, और जब शनि चंद्र राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करता है, तो तीसरा और अंतिम चरण होता है। इस प्रकार, शनि एक राशि में लगभग ढाई वर्ष रहता है, और तीन राशियों में गोचर करते हुए कुल साढ़े सात वर्ष का समय लेता है। यही अवधि ‘शनि साढ़ेसाती’ कहलाती है। उदाहरण के लिए, यदि किसी व्यक्ति की चंद्र राशि मकर है, तो शनि साढ़ेसाती तब शुरू होगी जब शनि धनु राशि (मकर से बारहवीं) में प्रवेश करेगा। फिर जब शनि मकर राशि में आएगा तो दूसरा चरण होगा, और जब कुंभ राशि (मकर से दूसरी) में आएगा तो तीसरा चरण होगा। शनि साढ़ेसाती के तीन चरण और उनके प्रभाव शनि साढ़ेसाती को मुख्य रूप से तीन चरणों में विभाजित किया जाता है, और प्रत्येक चरण के अपने विशिष्ट प्रभाव होते हैं: प्रभाव: इस चरण में व्यक्ति को अनावश्यक खर्चों का सामना करना पड़ सकता है, जिससे आर्थिक तंगी आ सकती है। स्वास्थ्य संबंधी परेशानियाँ, विशेषकर आँखों और पैरों से संबंधित, हो सकती हैं। मानसिक तनाव और बेचैनी बढ़ सकती है। नींद की समस्याएँ और अज्ञात भय घेर सकते हैं। कुछ लोगों को इस दौरान विदेश यात्रा का अवसर मिल सकता है या उन्हें अपने जन्म स्थान से दूर रहना पड़ सकता है। अनावश्यक वाद-विवाद और कानूनी उलझनें भी इस चरण में सामने आ सकती हैं। यह चरण व्यक्ति को एकांत की ओर धकेलता है और उसे अपने भीतर झाँकने का अवसर देता है। प्रभाव: इस चरण में व्यक्ति को सीधे तौर पर शनि के प्रभावों का सामना करना पड़ता है। मानसिक तनाव अपने चरम पर हो सकता है, जिससे निर्णय लेने में कठिनाई, चिड़चिड़ापन और अवसाद जैसी स्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं। शारीरिक स्वास्थ्य पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है, विशेषकर हड्डियों, जोड़ों और पेट से संबंधित समस्याएँ। करियर और व्यवसाय में बड़ी चुनौतियाँ, नौकरी छूटना, पदोन्नति में बाधा या व्यवसाय में घाटा हो सकता है। पारिवारिक संबंधों में तनाव, गलतफहमी और अलगाव की स्थिति बन सकती है। यह चरण व्यक्ति के धैर्य, सहनशीलता और दृढ़ संकल्प की कड़ी परीक्षा लेता है। हालांकि, यह चरण व्यक्ति को अपनी कमजोरियों और शक्तियों को पहचानने का भी अवसर देता है। प्रभाव: यह चरण धीरे-धीरे साढ़ेसाती के प्रभावों को कम करना शुरू कर देता है। हालाँकि, इस चरण में भी आर्थिक मोर्चे पर चुनौतियाँ बनी रह सकती हैं, जैसे धन संचय में कठिनाई या अनपेक्षित खर्च। पारिवारिक संबंधों में सुधार शुरू होता है, लेकिन वाणी पर नियंत्रण रखना आवश्यक होता है, क्योंकि कठोर वाणी संबंधों को बिगाड़ सकती है। स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ कम होने लगती हैं, लेकिन पूरी तरह से समाप्त नहीं होतीं। इस चरण में व्यक्ति को पिछले साढ़े सात वर्षों के अनुभवों से सीखने और भविष्य के लिए योजना बनाने का अवसर मिलता है। कई बार इस चरण के अंत तक व्यक्ति को अपनी मेहनत और संघर्ष का फल मिलना शुरू हो जाता है, जिससे आर्थिक स्थिति में सुधार और स्थिरता आती है। शनि साढ़ेसाती के सामान्य प्रभाव शनि साढ़ेसाती के दौरान व्यक्ति के जीवन के विभिन्न पहलुओं पर प्रभाव पड़ता है। ये प्रभाव व्यक्ति की कुंडली में शनि की स्थिति, अन्य ग्रहों के प्रभाव और उसके कर्मों पर भी निर्भर करते हैं। मानसिक और भावनात्मक प्रभाव: व्यक्ति को अत्यधिक मानसिक तनाव, चिंता, बेचैनी, अवसाद और अज्ञात भय का सामना करना पड़ सकता है। नींद की समस्याएँ, एकाग्रता में कमी और निर्णय लेने में कठिनाई आम होती है। शारीरिक स्वास्थ्य पर प्रभाव: शनि हड्डियों, जोड़ों, दांतों, त्वचा और पाचन तंत्र को प्रभावित कर सकता है। गठिया, जोड़ों का दर्द, चोट लगना, पेट की समस्याएँ और पुरानी बीमारियाँ इस दौरान उभर सकती हैं। आर्थिक प्रभाव: अनावश्यक खर्च, धन हानि, निवेश में नुकसान, कर्ज बढ़ना और आय में कमी आना इस अवधि के सामान्य आर्थिक प्रभाव हैं। व्यवसाय में मंदी या नौकरी में अस्थिरता भी देखी जा सकती है। संबंधों पर प्रभाव: परिवार, मित्र और सहकर्मियों के साथ संबंधों में तनाव, गलतफहमी और दूरियाँ बढ़ सकती हैं। विवाह संबंधों में भी चुनौतियाँ आ सकती हैं। करियर और व्यवसाय पर प्रभाव: नौकरी में बदलाव, पदोन्नति में बाधा, नौकरी छूटना या व्यवसाय में भारी नुकसान का सामना करना पड़ सकता है। कड़ी मेहनत के बावजूद अपेक्षित परिणाम न मिलना निराशाजनक हो सकता है। कानूनी और विवाद संबंधी प्रभाव: अनावश्यक कानूनी उलझनें, मुकदमेबाजी या सरकारी विभागों से संबंधित समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं। सकारात्मक प्रभाव: शनि न्याय का ग्रह है और यह व्यक्ति को उसके कर्मों का फल देता है। यह अवधि आत्म-मंथन, आत्म-सुधार और आध्यात्मिक विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। यह व्यक्ति को धैर्य, अनुशासन, कड़ी मेहनत और यथार्थवादी दृष्टिकोण सिखाती है। साढ़ेसाती के अंत तक व्यक्ति पहले से अधिक मजबूत, समझदार और अनुभवी बन जाता है। राशियों पर साढ़ेसाती का प्रभाव (संक्षेप में) प्रत्येक राशि के लिए साढ़ेसाती का प्रभाव थोड़ा भिन्न हो सकता है, क्योंकि शनि का गोचर विभिन्न भावों में अलग-अलग

श्राध्दपक्ष/ पितृपक्ष में क्या करने से मिलेगी पितृ ऋण से मुक्ति !

पितृपक्ष 2025 : महत्व, तिथि एवं विधि (07 सितंबर 2025, रविवार से 21 सितंबर 2025, रविवार तक) ॐ पितृदेवानां नमो नमः । ॐ ब्रह्मयोनये पितृलोकनाथाय नमः । ॐ सोमाय पितृराजाय स्वधा नमः । ॐ वसु-रुद्रादित्य-पितृभ्यः स्वधा नमः । ॐ सप्तर्षिभ्यः पितृभ्यश्च नमः स्वधा स्वाहा । ॐ त्रैलोक्यपालक पितृभ्यः सर्वेभ्यो नमो नमः ।। ॐ नमोऽस्तु पितृभ्यः पितामहेभ्यः प्रपितामहेभ्यश्च । नमो नमः सर्वेभ्यो ये के च न स्मर्यन्ते ॥ “उन पितरों को मेरा बार-बार नमस्कार है — पिता, पितामह, प्रपितामह और वे भी जिनका नाम स्मरण में नहीं आता।”:ॐ पितृभ्यः स्वधा नमः । 01.. पितृपक्ष 2025 : तिथि तालिकाप्रारंभ : 7 सितंबर 2025, रविवार (पूर्णिमा श्राद्ध)समापन : 21 सितंबर 2025, रविवार (सर्वपितृ अमावस्या) दिन, वार, श्राद्ध तिथियाँ 7 सितम्बर – रविवार,पूर्णिमा श्राद्ध 8 सितम्बर –सोमवार प्रतिपदा श्राद्ध 9 सितम्बर –मंगलवार, द्वितीया श्राद्ध 10 सितम्बर –बुधवार, तृतीया, चतुर्थी श्राद्ध 11 सितम्बर – गुरुवार, चतुर्थी, महाभरणी श्राद्ध 12 सितम्बर – शुक्रवार, पंचमी—षष्ठी श्राद्ध 13 सितम्बर – शनिवार, सप्तमी श्राद्ध 14 सितम्बर –रविवार , अष्टमी श्राद्ध 15 सितम्बर – सोमवार,नवमी श्राद्ध 16 सितम्बर – मंगलवार,दशमी श्राद्ध 17 सितम्बर –बुधवार, एकादशी श्राद्ध 18 सितम्बर – गुरुवार,द्वादशी श्राद्ध 19 सितम्बर – शुक्रवार,त्रयोदशी, मघा श्राद्ध 20 सितम्बर – शनिवार,चतुर्दशी श्राद्ध 21 सितम्बर – रविवार,सर्वपितृ अमावस्या (मुख्य श्राद्ध) 2… पितरों का परिचय पितर शब्द संस्कृत के “पिता” या पूर्वज से बना है।वे हमारे पूर्वज हैं जिनकी आत्मा परलोक में स्थित है।उनका आशीर्वाद मिलने पर परिवार में सुख-समृद्धि और शांति आती है, और उपेक्षा करने पर जीवन में बाधाएँ उत्पन्न हो सकती हैं। हिन्दू धर्म में पितृपक्ष का बहुत महत्व है। प्रत्येक वर्ष आश्विन माह की कृष्ण पक्ष तिथि को पितृपक्ष कहा जाता है। इसे श्राद्ध पक्ष भी कहते हैं। पितरों की आत्मा की शांति के लिए इस पक्ष में श्रद्धापूर्वक तर्पण, पिंडदान, हवन और ब्राह्मण भोजन कराया जाता है। श्राद्ध और तर्पण करने का कारण है पितरों को प्रसन्न करना। यह विश्वास है कि पितर प्रसन्न होकर अपने वंशजों को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं। धर्मशास्त्रों के अनुसार श्राद्ध-पक्ष में पितरों का पृथ्वी पर आगमन होता है। पितरों की आत्मा की शांति और तृप्ति के लिए श्राद्ध कर्म, तर्पण और ब्राह्मण भोजन कराया जाता है। श्राद्ध शब्द श्रद्धा से बना है। श्रद्धा का अर्थ है ।आस्था और विश्वास। आस्था और विश्वास से किया गया कर्म ही श्राद्ध कहलाता है। शास्त्रों के अनुसार श्राद्ध कर्म से पितर तृप्त होते हैं और आशीर्वाद देते हैं। श्राद्ध पक्ष में किया गया पिंडदान, तर्पण, ब्राह्मण भोजन, दान-पुण्य आदि पितरों को तृप्त कर उन्हें मोक्ष की ओर अग्रसर करता है। श्राद्ध कर्म करने से पितरों की आत्मा की शांति होती है। पितर प्रसन्न होकर परिवार की रक्षा करते हैं और घर-परिवार को खुशियों से भर देते हैं। शास्त्रों में लिखा है कि जो मनुष्य अपने पितरों का श्राद्ध करता है, उसके जीवन में कभी भी दुख, कष्ट और दरिद्रता नहीं आती। पितर वंशजों को दीर्घायु, संतान सुख धन-धान्य और समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं। पितृपक्ष में प्रतिदिन सूर्य उदय के बाद तर्पण करने का विधान है। तर्पण में पवित्र नदी तालाब या कुएँ के जल का प्रयोग किया जाता है। तर्पण के समय काला तिल , कुश और जल का उपयोग कर ‘ॐ पितृभ्यः नमः’ कहते हुए पितरों का आह्वान करना चाहिए। श्राद्ध पक्ष में पिंडदान करने का भी महत्व है। आटे के गोले जिसमें तिल, चावल, जौ, घी और शहद मिलाकर बनाए जाते हैं, उन्हें पिंड कहते हैं। इन पिंडों को पितरों को समर्पित कर ब्राह्मणों को दान किया जाता है। यह पिंडदान पितरों की आत्मा को तृप्त कर उन्हें मोक्ष की ओर ले जाता है। श्राद्ध कर्म में ब्राह्मणों को भोजन कराना अत्यंत आवश्यक है। मान्यता है कि ब्राह्मण भोजन से पितर प्रसन्न होते हैं। साथ ही श्राद्ध में दक्षिणा, अन्न, वस्त्र आदि का दान करना भी पुण्यकारी माना जाता है। पितृपक्ष के समय विवाह , गृह प्रवेश , मुंडन संस्कार आदि शुभ कार्य करने का निषेध है। इस दौरान केवल पितरों को तृप्त करने वाले कार्य करने चाहिए। श्राद्ध पक्ष का समापन सर्वपितृ अमावस्या को होता है। इस दिन उन पितरों का श्राद्ध किया जाता है जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं होती। 3.. पितृस्थान (पितृलोक) पितरों का निवास पितृलोक में माना गया है।यह सूर्यलोक और मर्त्यलोक के ऊपर बताया गया है।वे हमारे कर्म, दान और श्राद्ध से संतुष्ट होकर आशीर्वाद देते हैं। 4..पितृकर्म (अनुष्ठान) मुख्य कर्म:1. श्राद्ध – भोजन और दान द्वारा पितरों को तृप्त करना। 2. तर्पण (जलदान) – तिल और जल से अर्घ्य अर्पण। 3. पिंडदान – आटे/चावल के गोल पिंड बनाकर समर्पण। 4. दान और ब्राह्मण भोजन – गरीब, गौ, पक्षी, ब्राह्मण को भोजन-वस्त्र दान। 5.. पितरों का प्रभावअनुग्रह होने पर : परिवार में सुख, स्वास्थ्य, संतान, उन्नति और धन-धान्य। असंतोष होने पर : कलह, रोग, आर्थिक कठिनाई, मानसिक अशांति। 6.. वैदिक व पुराणिक दृष्टिऋग्वेद (10/12 सूक्त) में पितरों का उल्लेख।महाभारत और भागवत पुराण में श्राद्ध की महिमा।पितरों को देवताओं के समान अन्न-जल से तृप्त करना आवश्यक बताया गया है। 7.. पितृ दोष और निवारण यदि किसी पूर्वज की इच्छाएँ अधूरी रह गई हों, तो जन्मकुंडली में पितृदोष बनता है। निवारण के उपाय:श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान।गायत्री मंत्र जप, रुद्राभिषेक।दान और सेवा। 8..साधारण पितृ मंत्र ॐ पितृभ्यः नमःॐ तर्पयामि पितरंॐ स्वधा नमः 9. विशेष प्रसंगमहाभारत प्रसंग : दानवीर कर्ण को मृत्यु के बाद भोजन के स्थान पर स्वर्ण मिला क्योंकि उन्होंने जीवन में भोजन दान नहीं किया था। बाद में पितृपक्ष में आकर उन्होंने पितरों को अर्पण कर ऋणमुक्ति पाई। 10. भरणी श्राद्धभरणी नक्षत्र में होने वाला विशेष श्राद्ध।इसे महाभरणी श्राद्ध कहा जाता है और गया श्राद्ध के समान फलदायी है।इस दिन कौवे, कुत्ते और गौ को भोजन अवश्य कराना चाहिए। 11.– श्राद्ध के नियम और विशेष बातें १ गाय का घी, दूध, दही प्रयोग करें। २.चांदी के बर्तन पितरों को तृप्त करते हैं। ३. श्राद्ध में मौन ब्राह्मण भोजन आवश्यक है। ४. श्राद्ध का समय – कुतप मुहूर्त (प्रातः 11:30 से 1:00 के बीच) श्रेष्ठ है। ५.. पितरों को प्रिय खाद्य – खीर, दूध, दही, शहद, घी। ६. कौए, गाय, कुत्ते, चींटी आदि को भोजन अर्पण करना चाहिए। ७. श्राद्ध में तुलसी, कुशा, तिल और गंगाजल का उपयोग अनिवार्य है। 12. श्राद्ध स्थलों का महत्व गया (बिहार)काशी (वाराणसी)प्रयागराज (त्रिवेणी संगम)रामेश्वरमबद्रीनाथ–केदारनाथ 13. पितृपक्ष का महत्व पितृऋण से मुक्ति

शनि,राहू के कारण करना पडता है दरिद्रता का सामना !

शनि और राहू यह दो ग्रह ऐसे हैं जो अपनी अशुभता पर आ जाए तो व्यक्ति को दुसरो पर निर्भर यानी मंगता बना देते हैं। क्युकी जब कोई भी ऐसा बोलता है कि उसको कोई नौकरी नहीं मिल रही, समाज में सम्मान नहीं मिल रहा और पैसे से खाली होने की वजह से परिवार के साथ भी झगड़े की स्थिति बनी रहती है। उस व्यक्ति पर कही ना कही शनि राहू दशा का प्रभाव या शनि साडेसाती या ढैय्या का प्रभाव होता है। इसी लिए आज आपको नौकरी कारोबार की समस्या और पारिवारिक कलह दूर करने के लिए शनि राहू अशुभता दूर करने के लिए उपाय बताये जा रहे हैं। ख़ास कर अगर जन्म कुंडली में सूर्य शनि युति, मंगल राहू युति या शनि राहू की स्थिति मेष, सिंह या वृश्चिक राशि में है और आपकी समस्या आर्थिक या पारिवारिक सुख से संबंधित है तो आपको शनि राहू के लिए उपाय जरुर करने चाहिए। १) शनि की अशुभता दूर करने के लिए घर की पश्चिम दिशा में सूर्य अस्त के बाद नीले आसन पर बैठें अपने सामने सरसों के तेल का दीपक 4 लॉन्ग डाल कर जलाएं। और शनि मंत्र “ऊँ शं शनैश्चराय नम:” 108 बार जप करें। सिर्फ इतना सा उपाय 4 शनिवार करने से ही आपको सकरात्मक प्रभाव देखने में मिलेगे। २) यदि आप राहू की अशुभता से परेशान हैं तो जूठे बर्तन राहू के कारक हैं और मंगल मिटटी है। इस लिए जूठे बर्तन धोने के लिए साबुन के साथ कुछ राख, मिटटी या रेत का इस्तेमाल करें। इस छोटे से उपाय से ही राहू की अशुभता दूर होगी और परिवार में शांति का माहोल बनेगा। यहाँ एक बात का और ध्यान रखें कि जूठे बर्तन सुबह धोने के लिए बिलकुल ना छोड़ें बल्कि रात को ही बर्तन धोकर सोना चाहिए।

आज का पंचांग

वैदिक पंचांग दिनांक – 25 अप्रैल 2025 दिन – शुक्रवार विक्रम संवत – 2082 (गुजरात-महाराष्ट्र अनुसार 2081) शक संवत -1947 अयन – उत्तरायण ऋतु – ग्रीष्म ॠतु मास – वैशाख (गुजरात-महाराष्ट्र अनुसार चैत्र) पक्ष – कृष्ण तिथि – द्वादशी सुबह 11:44 तक तत्पश्चात त्रयोदशी नक्षत्र – पूर्वभाद्रपद सुबह 08:53 तक तत्पश्चात उत्तरभाद्रपद योग – इन्द्र दोपहर 12:31 तक तत्पश्चात वैधृति राहुकाल – सुबह 11:01 से दोपहर 12:37 तक सूर्योदय – 06:13 सूर्यास्त – 07:00 दिशाशूल – पश्चिम दिशा मे व्रत पर्व विवरण- प्रदोष व्रत,पंचक विशेष- द्वादशी को पूतिका(पोई) अथवा त्रयोदशी को बैंगन खाने से पुत्र का नाश होता है। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-34) प्रदोष व्रत हिंदू पंचांग के अनुसार, प्रत्येक महिने की दोनों पक्षों की त्रयोदशी तिथि पर प्रदोष व्रत किया जाता है। ये व्रत भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए किया जाता है। इस बार 25 अप्रैल, शुक्रवार को प्रदोष व्रत है। इस दिन भगवान शिव की विशेष पूजा की जाती है। प्रदोष पर व्रत व पूजा कैसे करें और इस दिन क्या उपाय करने से आपका भाग्योदय हो सकता है, जानिए… ऐसे करें व्रत व पूजा प्रदोष व्रत के दिन सुबह स्नान करने के बाद भगवान शंकर, पार्वती और नंदी को पंचामृत व गंगाजल से स्नान कराएं। इसके बाद बेल पत्र, गंध, चावल, फूल, धूप, दीप, नैवेद्य (भोग), फल, पान, सुपारी, लौंग, इलायची भगवान को चढ़ाएं। पूरे दिन निराहार (संभव न हो तो एक समय फलाहार) कर सकते हैं) रहें और शाम को दुबारा इसी तरह से शिव परिवार की पूजा करें। भगवान शिवजी को घी और शक्कर मिले जौ के सत्तू का भोग लगाएं। आठ दीपक आठ दिशाओं में जलाएं। भगवान शिवजी की आरती करें। भगवान को प्रसाद चढ़ाएं और उसीसे अपना व्रत भी तोड़ें।उस दिन ब्रह्मचर्य का पालन करें। ये उपाय करें सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करने के बाद तांबे के लोटे से सूर्यदेव को अर्ध्य देें। पानी में आकड़े के फूल जरूर मिलाएं। आंकड़े के फूल भगवान शिवजी को विशेष प्रिय हैं । ये उपाय करने से सूर्यदेव सहित भगवान शिवजी की कृपा भी बनी रहती है और भाग्योदय भी हो सकता है। कर्ज-मुक्ति के लिए मासिक शिवरात्रि 26 अप्रैल 2025 शनिवार को मासिक शिवरात्रि है। हर मासिक शिवरात्रि को सूर्यास्‍त के समय घर में बैठकर अपने गुरुदेव का स्मरण करके शिवजी का स्मरण करते- करते ये 17 मंत्र बोलें, जिनके सिर पर कर्जा ज्यादा हो, वो शिवजी के मंदिर में जाकर दिया जलाकर ये 17 मंत्र बोले।इससे कर्जा से मुक्ति मिलेगी 1).ॐ शिवाय नम: 2).ॐ सर्वात्मने नम 3).ॐ त्रिनेत्राय नम: 4).ॐ हराय नम: 5).ॐ इन्द्र्मुखाय नम: 6).ॐ श्रीकंठाय नम: 7).ॐ सद्योजाताय नम: 8).ॐ वामदेवाय नम 9).ॐ अघोरह्र्द्याय नम 10).ॐ तत्पुरुषाय नम: 11).ॐ ईशानाय नम: 12).ॐ अनंतधर्माय नम: 13).ॐ ज्ञानभूताय नम: 14). ॐ अनंतवैराग्यसिंघाय नम: 15).ॐ प्रधानाय नम 16).ॐ व्योमात्मने नम 17).ॐ युक्तकेशात्मरूपाय नम आर्थिक परेशानी से बचने हेतु हर महीने में शिवरात्रि (मासिक शिवरात्रि – कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी) को आती है | तो उस दिन जिसके घर में आर्थिक कष्ट रहते हैं वो शाम के समय या संध्या के समय जप-प्रार्थना करें एवं शिवमंदिर में दीप-दान करें । और रात को जब 12 बज जायें तो थोड़ी देर जाग कर जप और एक श्री हनुमान चालीसा का पाठ करें।तो आर्थिक परेशानी दूर हो जायेगी।प्रति वर्ष में एक महाशिवरात्रि आती है और हर महीने में एक मासिक शिवरात्रि आती है। उस दिन शाम को बराबर सूर्यास्त हो रहा हो उस समय एक दिया पर पाँच लंबी बत्तियाँ अलग-अलग उस एक में हो शिवलिंग के आगे जला के रखना |बैठ कर भगवान शिवजी के नाम का जप करना प्रार्थना करना, | इससे व्यक्ति के सिर पे कर्जा हो तो जल्दी उतरता है, आर्थिक परेशानियाँ दूर होती है ।

आज का पंचांग Daily panchang

7 March 2025, by Divam astro world दिनांक – 7 मार्च 2025 दिन – शुक्रवार विक्रम संवत् – 2081 अयन – उत्तरायण ऋतु – बसन्त मास – फाल्गुन पक्ष – शुक्ल तिथि – अष्टमी सुबह 09:18 तक तत्पश्चात नवमी नक्षत्र – मृगशिरा रात्रि 11:32 तक  तक तत्पश्चात आर्द्रा योग – प्रीति शाम 06:15 तक तत्पश्चात आयुष्मान् राहु काल – सुबह 11:22 से दोपहर 12:51 तक सूर्योदय – 06:59 सूर्यास्त – 06:41 दिशा शूल – पश्चिम दिशा में ब्राह्ममुहूर्त – प्रातः 05:18 से 06:07 तक अभिजीत मुहूर्त – दोपहर 12:27 से दोपहर 01:14 तक निशिता मुहूर्त – रात्रि 12:26 मार्च 08 से रात्रि 01:15 मार्च 08 तक व्रत पर्व विवरण – मासिक दुर्गाष्टमी विशेष – अष्टमी को नारियल का फल खाने से बुद्धि का नाश होता है व नवमी को लौकी खाना गौमाँस के समान त्याज्य है। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-34)

आज का पंचांग Panchang today

4 March,2025, Tuesday by Divam astro world दिनांक – 4 मार्च 2025 दिन – मंगलवार विक्रम संवत् – 2081 अयन – उत्तरायण ऋतु – बसन्त मास – फाल्गुन पक्ष – शुक्ल तिथि – पञ्चमी  दोपहर 3:16 तक तत्पश्चात षष्ठी नक्षत्र – भरणी रात्रि 02:37 मार्च 05 तक तत्पश्चात कृत्तिका योग- इंद्र रात्रि 02:07 मार्च 05 तक तत्पश्चात वैधृति राहु काल – दोपहर 03:48 से शाम 05:16 तक सूर्योदय – 07:02 सूर्यास्त – 06:40 दिशा शूल – उत्तर दिशा में ब्राह्ममुहूर्त – प्रातः 05:21 से 06:10 तक अभिजीत मुहूर्त – दोपहर 12:28 से दोपहर 01:15 तक निशिता मुहूर्त – रात्रि 12:27  मार्च 05 से रात्रि 01:15 मार्च 05 तक व्रत पर्व विवरण – स्कन्द षष्ठी, सर्वार्थसिद्धि योग (रात्रि 02:37 मार्च 05 से प्रातः 06:58 मार्च 05 तक) विशेष – पञ्चमी को बेल खाने से कलंक लगता है। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-34) देशी गोघृत सेवन के लाभ : (१) हृदय स्वस्थ व बलवान होता है। रक्तदाब नियंत्रित रहता है । हृदय की रक्तवाहिनियों की धमनी प्रतिचय (atherosclerosis) से रक्षा करता है। अतः हृदयरोग से रक्षा हेतु तथा हृदय रोगियों के लिए यह घी अत्यंत लाभदायी है । (२) इससे ओज की वृद्धि व दीर्घायुष्य की प्राप्ति होती है। (३) मस्तिष्क की कोशिकाएँ (neurons) पुष्ट हो जाती हैं, जिससे बुद्धि व इन्द्रियों की कार्यक्षमता विकसित होती है। बुद्धि, धारणाशक्ति एवं स्मृति की वृद्धि होती है। (४) मन का सत्व गुण विकसित होकर चिंता, तनाव, चिड़चिड़ापन, क्रोध आदि दूर होने में मदद मिलती है । मन की एकाग्रता बढ़ती है । साधना में उन्नति होती है । (५) नेत्रज्योति बढ़ती है । चश्मा, मोतियाबिंद (cataract), काँचबिंदु (glaucoma) व आँखों की अन्य समस्याओं से रक्षा होती है । (६) हड्डियाँ व स्नायु सशक्त होते हैं। संधिस्थान (joints) लचीले व मजबूत बनते हैं । (७) कैंसर से लड़ने व उसकी रोकथाम की आश्चर्यजनक क्षमता प्राप्त होती है । (८) रोगप्रतिरोधक शक्ति (immunity power) बढ़कर घातक विषाणुजन्य संक्रमणों (viral infections) से प्रतिकार करने की शक्ति मिलती है । (९) जठराग्नि तीव्र व पाचन-संस्थान सशक्त होता है। मोटापा नहीं आता, वजन नियंत्रित रहता है । वीर्य पुष्ट होता है। यौवन दीर्घकाल तक बना रहता है । (१०) चेहरे की सौम्यता, तेज एवं सुंदरता बढ़ती है। स्वर उत्तम होता है एवं रंग निखरता है। बाल घने, मुलायम व लम्बे होते हैं । (११) गर्भवती माँ द्वारा सेवन करने पर गर्भस्थ शिशु बलवान, पुष्ट और बुद्धिमान बनता है ।

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