आज का पंचांग Daily Panchang
— 🌄 सूर्योदय एवं चन्द्रोदय 🌄 — सूर्योदय – 05:31 चन्द्रोदय – 19:20 सूर्यास्त – 19:22 चन्द्रास्त – चन्द्रास्त नहीं — पञ्चाङ्ग — तिथि – पूर्णिमा – 02:06, जुलाई 11 तक योग – इन्द्र – 21:38 तक वार – गुरुवार पक्ष – शुक्ल पक्ष नक्षत्र – पूर्वाषाढा – पूर्ण रात्रि तक करण – विष्टि – 13:55 तक — 🌙 चन्द्र मास एवं सम्वत 🌙 — शक सम्वत – 1947 विश्वावसु विक्रम सम्वत – 2082 कालयुक्त गुजराती सम्वत – 2081 नल चन्द्रमास – आषाढ़ – पूर्णिमान्त — राशि तथा नक्षत्र — चन्द्र राशि – धनु सूर्य राशि – मिथुन सूर्य नक्षत्र – पुनर्वसु सूर्य नक्षत्र पद – पुनर्वसु नक्षत्र पद – पूर्वाषाढा – 11:09 तक — ऋतु और अयन — द्रिक ऋतु – वर्षा वैदिक ऋतु – ग्रीष्मद्रिक अयन – दक्षिणायण वैदिक अयन – उत्तरायण दिनमान – 13 घण्टे 51 मिनट्स 26 सेकण्ड्स रात्रिमान – 10 घण्टे 09 मिनट्स 02 सेकण्ड्स मध्याह्न – 12:26 — अन्य कैलेंडर — कलियुग – 5126 वर्ष कलि अहर्गण – 1872401 दिन जूलियन दिनाङ्क – जून 27, 2025 सीई राष्ट्रीय नागरिक दिनाङ्क – आषाढ़ 19, 1947 शक राष्ट्रीय निरयण दिनाङ्क – आषाढ़ 26, 1947 शक लाहिरी अयनांश – 24.220338 राटा डाई – 739442 जूलियन दिन – जून 27, 2025 सीई संशोधित जूलियन दिन – 60866 दिन — शुभ समय — ब्रह्म मुहूर्त – 04:10 से 04:50प्रातः सन्ध्या – 04:30 से 05:31 अभिजित मुहूर्त – 11:59 से 12:54 विजय मुहूर्त – 14:45 से 15:40 गोधूलि मुहूर्त – 19:21 से 19:41 सायाह्न सन्ध्या – 19:22 से 20:23 अमृत काल – 00:55, जुलाई 11 से 02:35, जुलाई 11 निशिता मुहूर्त – 00:06, जुलाई 11 से 00:47, जुलाई 11 — अशुभ समय — राहुकाल – 14:10 से 15:54 यमगण्ड – 05:31 से 07:15 आडल योग – पूरे दिन दुर्मुहूर्त – 10:08 से 11:03 गुलिक काल – 08:59 से 10:43 वर्ज्य – 14:52 से 16:33 भद्रा – 05:31 से 13:55 बाण – चोर – 10:38 से पूर्ण रात्रि तक — पंचक रहित — शुभ मुहूर्त – 05:31 से 06:03रोग पञ्चक – 06:03 से 08:23 शुभ मुहूर्त – 08:23 से 10:40 मृत्यु पञ्चक – 10:40 से 12:57 अग्नि पञ्चक – 12:57 से 15:16 शुभ मुहूर्त – 15:16 से 17:35 रज पञ्चक – 17:35 से 19:39 शुभ मुहूर्त – 19:39 से 21:21 चोर पञ्चक – 21:21 से 22:49 शुभ मुहूर्त – 22:49 से 00:13, जुलाई 11 शुभ मुहूर्त – 00:13, जुलाई 11 से 01:49, जुलाई 11 चोर पञ्चक – 01:49, जुलाई 11 से 02:06, जुलाई 11 शुभ मुहूर्त – 02:06, जुलाई 11 से 03:44, जुलाई 11रोग पञ्चक – 03:44, जुलाई 11 से 05:31, जुलाई 11 — उदय लग्न — मिथुन – 03:48 से 06:03 कर्क – 06:03 से 08:23 सिंह – 08:23 से 10:40 कन्या – 10:40 से 12:57 तुला – 12:57 से 15:16 वृश्चिक – 15:16 से 17:35 धनु – 17:35 से 19:39 मकर – 19:39 से 21:21 कुम्भ – 21:21 से 22:49 मीन – 22:49 से 00:13, जुलाई 11 मेष – 00:13, जुलाई 11 से 01:49, जुलाई 11 वृषभ – 01:49, जुलाई 11 से 03:44, जुलाई 11
आज का पंचांग Panchang
— 🌄 सूर्योदय एवं चन्द्रोदय 🌄 — सूर्योदय – 05:30 चन्द्रोदय – 18:28 सूर्यास्त – 19:22 चन्द्रास्त – 04:34, जुलाई 10 — पञ्चाङ्ग — तिथि – चतुर्दशी – 01:36, जुलाई 10 तक योग – ब्रह्म – 22:09 तक वार – बुधवार पक्ष – शुक्ल पक्ष नक्षत्र – मूल – 04:50, जुलाई 10 तक करण – गर – 13:11 तक — 🌙 चन्द्र मास एवं सम्वत 🌙 — शक सम्वत – 1947 विश्वावसु विक्रम सम्वत – 2082 कालयुक्त गुजराती सम्वत – 2081 नल चन्द्रमास – आषाढ़ – पूर्णिमान्त — राशि तथा नक्षत्र — चन्द्र राशि – धनु सूर्य राशि – मिथुन सूर्य नक्षत्र – पुनर्वसु सूर्य नक्षत्र पद – पुनर्वसु – 17:51 तक नक्षत्र पद – मूल – 09:41 तक — ऋतु और अयन — द्रिक ऋतु – वर्षा वैदिक ऋतु – ग्रीष्म द्रिक अयन – दक्षिणायण वैदिक अयन – उत्तरायण दिनमान – 13 घण्टे 52 मिनट्स 06 सेकण्ड्स रात्रिमान – 10 घण्टे 08 मिनट्स 21 सेकण्ड्स मध्याह्न – 12:26 — अन्य कैलेंडर — कलियुग – 5126 वर्ष कलि अहर्गण – 1872400 दिन जूलियन दिनाङ्क – जून 26, 2025 सीई राष्ट्रीय नागरिक दिनाङ्क – आषाढ़ 18, 1947 शक राष्ट्रीय निरयण दिनाङ्क – आषाढ़ 25, 1947 शक लाहिरी अयनांश – 24.220300 राटा डाई – 739441 जूलियन दिन – जून 26, 2025 सीई संशोधित जूलियन दिन – 60865 दिन — शुभ समय — ब्रह्म मुहूर्त – 04:09 से 04:50प्रातः सन्ध्या – 04:29 से 05:30 अभिजित मुहूर्त – कोई नहीं विजय मुहूर्त – 14:45 से 15:40 गोधूलि मुहूर्त – 19:21 से 19:41 सायाह्न सन्ध्या – 19:22 से 20:23 अमृत काल – 22:00 से 23:43 निशिता मुहूर्त – 00:06, जुलाई 10 से 00:47, जुलाई 10 रवि योग – 05:30 से 04:50, जुलाई 10 — अशुभ समय — राहुकाल – 12:26 से 14:10 यमगण्ड – 07:14 से 08:58 आडल योग – 04:50, जुलाई 10 से 05:31, जुलाई 10 विडाल योग – 05:30 से 04:50, जुलाई 10 गुलिक काल – 10:42 से 12:26 दुर्मुहूर्त – 11:59 से 12:54 वर्ज्य – 11:46 से 13:29 भद्रा – 01:36, जुलाई 10 से 05:31, जुलाई 10 गण्ड मूल – 05:30 से 04:50, जुलाई 10 बाण – रज – 09:28 तक — पंचक रहित — रज पञ्चक – 05:30 से 06:07 शुभ मुहूर्त – 06:07 से 08:27 चोर पञ्चक – 08:27 से 10:44 शुभ मुहूर्त – 10:44 से 13:01 रोग पञ्चक – 13:01 से 15:20 शुभ मुहूर्त – 15:20 से 17:39 मृत्यु पञ्चक – 17:39 से 19:43 अग्नि पञ्चक – 19:43 से 21:25 शुभ मुहूर्त – 21:25 से 22:52 रज पञ्चक – 22:52 से 00:17, जुलाई 10 अग्नि पञ्चक – 00:17, जुलाई 10 से 01:36, जुलाई 10 शुभ मुहूर्त – 01:36, जुलाई 10 से 01:53, जुलाई 10 रज पञ्चक – 01:53, जुलाई 10 से 03:48, जुलाई 10 शुभ मुहूर्त – 03:48, जुलाई 10 से 04:50, जुलाई 10 चोर पञ्चक – 04:50, जुलाई 10 से 05:31, जुलाई 10 — उदय लग्न — मिथुन – 03:52 से 06:07 कर्क – 06:07 से 08:27 सिंह – 08:27 से 10:44 कन्या – 10:44 से 13:01 तुला – 13:01 से 15:20 वृश्चिक – 15:20 से 17:39 धनु – 17:39 से 19:43 मकर – 19:43 से 21:25 कुम्भ – 21:25 से 22:52 मीन – 22:52 से 00:17, जुलाई 10 मेष – 00:17, जुलाई 10 से 01:53, जुलाई 10 वृषभ – 01:53, जुलाई 10 से 03:48, जुलाई 10
चातुर्मास Chaturmas
चातुर्मास – साधना, संयम और शुद्धि का काल देवशयनी एकादशी से प्रारंभ होकर कार्तिक मास तक चलने वाला चातुर्मास सनातन संस्कृति में तप, व्रत, उपवास और आत्मशुद्धि का विशेष काल माना गया है.यह काल वर्षा ऋतु का होता है, जब संत-महात्मा एक स्थान पर रुककर साधना करते हैं और जनसामान्य को धर्मोपदेश देते हैं. चातुर्मास में आहार, आचरण और विचारों में संयम की परंपरा है, जो शरीर एवं मन दोनों की शुद्धि में सहायक होती है.वैज्ञानिक दृष्टि से यह काल पाचन तंत्र की शिथिलता का होता है, अतः व्रत-उपवास और सात्विकता स्वास्थ्य की रक्षा करते हैं. सनातन संस्कृति की यह परंपरा ऋतु, प्रकृति और अध्यात्म के संतुलन की गूढ़ समझ को दर्शाती है. चातुर्मास्य व्रत की महिमा 06 जुलाई 2025 रविवार से चातुर्मास प्रारंभ। 6/7/2025 Chaturmas आषाढ़ के शुक्ल पक्ष में एकादशी के दिन उपवास करके मनुष्य भक्तिपूर्वक चातुर्मास्य व्रत प्रारंभ करे। एक हजार अश्वमेघ यज्ञ करके मनुष्य जिस फल को पाता है, वही चातुर्मास्य व्रत के अनुष्ठान से प्राप्त कर लेता है।इन चार महीनों में ब्रह्मचर्य का पालन, त्याग, पत्तल पर भोजन, उपवास, मौन, जप, ध्यान, स्नान, दान, पुण्य आदि विशेष लाभप्रद होते हैं। व्रतों में सबसे उत्तम व्रत है – ब्रह्मचर्य का पालन। ब्रह्मचर्य तपस्या का सार है और महान फल देने वाला है। ब्रह्मचर्य से बढ़कर धर्म का उत्तम साधन दूसरा नहीं है। विशेषतः चतुर्मास में यह व्रत संसार में अधिक गुणकारक है।मनुष्य सदा प्रिय वस्तु की इच्छा करता है। जो चतुर्मास में अपने प्रिय भोगों का श्रद्धा एवं प्रयत्नपूर्वक त्याग करता है, उसकी त्यागी हुई वे वस्तुएँ उसे अक्षय रूप में प्राप्त होती हैं। चतुर्मास में गुड़ का त्याग करने से मनुष्य को मधुरता की प्राप्ति होती है। ताम्बूल का त्याग करने से मनुष्य भोग-सामग्री से सम्पन्न होता है और उसका कंठ सुरीला होता है। दही छोड़ने वाले मनुष्य को गोलोक मिलता है। नमक छोड़ने वाले के सभी पूर्तकर्म (परोपकार एवं धर्म सम्बन्धी कार्य) सफल होते हैं। जो मौनव्रत धारण करता है उसकी आज्ञा का कोई उल्लंघन नहीं करता। चतुर्मास में काले एवं नीले रंग के वस्त्र त्याग देने चाहिए। नीले वस्त्र को देखने से जो दोष लगता है उसकी शुद्धि भगवान सूर्यनारायण के दर्शन से होती है। कुसुम्भ (लाल) रंग व केसर का भी त्याग कर देना चाहिए। आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को श्रीहरि के योगनिद्रा में प्रवृत्त हो जाने पर मनुष्य चार मास अर्थात् कार्तिक की पूर्णिमा तक भूमि पर शयन करें । ऐसा करने वाला मनुष्य बहुत से धन से युक्त होता और विमान प्राप्त करता है, बिना माँगे स्वतः प्राप्त हुए अन्न का भोजन करने से बावड़ी और कुआँ बनवाने का फल प्राप्त होता है। जो भगवान जनार्दन के शयन करने पर शहद का सेवन करता है, उसे महान पाप लगता है। चतुर्मास में अनार, नींबू, नारियल तथा मिर्च, उड़द और चने का भी त्याग करें । जो प्राणियों की हिंसा त्याग कर द्रोह छोड़ देता है, वह भी पूर्वोक्त पुण्य का भागी होता है। चातुर्मास्य में परनिंदा का विशेष रूप से त्याग करें । परनिंदा को सुनने वाला भी पापी होता है। परनिंदा महापापं परनिंदा महाभयं। परनिंदा महद् दुःखं न तस्याः पातकं परम्।। ‘परनिंदा महान पाप है, परनिंदा महान भय है, परनिंदा महान दुःख है और पर निंदा से बढ़कर दूसरा कोई पातक नहीं है।’ चातुर्मास्य व्रत की महिमा चातुर्मास में ताँबे के पात्र में भोजन विशेष रूप से त्याज्य है। काँसे के बर्तनों का त्याग करके मनुष्य अन्य धातुओं के पात्रों का उपयोग करे। अगर कोई धातुपात्रों का भी त्याग करके पलाशपत्र, मदारपत्र या वटपत्र की पत्तल में भोजन करे तो इसका अनुपम फल बताया गया है। अन्य किसी प्रकार का पात्र न मिलने पर मिट्टी का पात्र ही उत्तम है अथवा स्वयं ही पलाश के पत्ते लाकर उनकी पत्तल बनाये और उससे भोजन-पात्र का कार्य ले। पलाश के पत्तों से बनी पत्तल में किया गया भोजन चन्द्रायण व्रत एवं एकादशी व्रत के समान पुण्य प्रदान करने वाला माना गया है।प्रतिदिन एक समय भोजन करने वाला पुरुष अग्निष्टोम यज्ञ के फल का भागी होता है। पंचगव्य सेवन करने वाले मनुष्य को चन्द्रायण व्रत का फल मिलता है। यदि धीर पुरुष चतुर्मास में नित्य परिमित अन्न का भोजन करता है तो उसके सब पातकों का नाश हो जाता है और वह वैकुण्ठ धाम को पाता है। चतुर्मास में केवल एक ही अन्न का भोजन करने वाला मनुष्य रोगी नहीं होता।जो मनुष्य चतुर्मास में केवल दूध पीकर अथवा फल खाकर रहता है, उसके सहस्रों पाप तत्काल विलीन हो जाते हैं।पंद्रह दिन में एक दिन संपूर्ण उपवास करने से शरीर के दोष जल जाते हैं और चौदह दिनों में तैयार हुए भोजन का रस ओज में बदल जाता है। इसलिए एकादशी के उपवास की महिमा है। वैसे तो गृहस्थ को महीने में केवल शुक्लपक्ष की एकादशी रखनी चाहिए, किंतु चतुर्मास की तो दोनों पक्षों की एकादशियाँ रखनी चाहिए।जो बात करते हुए भोजन करता है, उसके वार्तालाप से अन्न अशुद्ध हो जाता है। वह केवल पाप का भोजन करता है। जो मौन होकर भोजन करता है, वह कभी दुःख में नहीं पड़ता। मौन होकर भोजन करने वाले राक्षस भी स्वर्गलोक में चले गये हैं। यदि पके हुए अन्न में कीड़े-मकोड़े पड़ जायें तो वह अशुद्ध हो जाता है। यदि मानव उस अपवित्र अन्न को खा ले तो वह दोष का भागी होता है। जो नरश्रेष्ठ प्रतिदिन ‘ॐ प्राणाय स्वाहा, ॐ अपानाय स्वाहा, ॐ व्यानाय स्वाहा, ॐ उदानाय स्वाहा, ॐ समानाय स्वाहा’ – इस प्रकार प्राणवायु को पाँच आहुतियाँ देकर मौन हो भोजन करता है, उसके पाँच पातक निश्चय ही नष्ट हो जाते हैं।चतुर्मास में जैसे भगवान विष्णु आराधनीय हैं, वैसे ही ब्राह्मण भी। भाद्रपद मास आने पर उनकी महापूजा होती है। जो चतुर्मास में भगवान विष्णु के आगे खड़ा होकर ‘पुरुष सूक्त’ का पाठ करता है, उसकी बुद्धि बढ़ती है।चतुर्मास सब गुणों से युक्त समय है। इसमें धर्मयुक्त श्रद्धा से शुभ कर्मों का अनुष्ठान करना चाहिए। सत्संगे द्विजभक्तिश्च गुरुदेवाग्नितर्पणम्। गोप्रदानं वेदपाठः सत्क्रिया सत्यभाषणम्।। गोभक्तिर्दानभक्तिश्च सदा धर्मस्य साधनम्। सत्संग, भक्ति, गुरु, देवता और अग्नि का तर्पण, गोदान, वेदपाठ, सत्कर्म, सत्यभाषण, गोभक्ति और दान में प्रीति – ये सब सदा धर्म के साधन हैं। ’देवशयनी एकादशी से देवउठी एकादशी तक उक्त धर्मों का साधन एवं नियम महान फल देने वाला है। चतुर्मास
गुरु पूर्णिमा के दिन कौन से पाठ को श्रद्धा पूर्वक पढ़ने से होती है अभीष्ट लक्ष्य की प्राप्ति !
गुरु पूर्णिमा हर साल आषाढ़ मास की पूर्णिमा को मनाई जाती है गुरु पूर्णिमा। 10 जुलै 2025, गुरुवार, Thursday, 10/7/2025 Guru Purnima गुरु पूर्णिमा अपने गुरु की पूजा करने का दिन है, चाहे वे आध्यात्मिक हों या शैक्षणिक गुरु। भक्त और छात्र इस दिन अपने गुरुओं को श्रध्दा पुर्वक पूजते हैं। गुरु जिसका अर्थ है जो अंधकार या अज्ञान को दूर करता है। गुरु एक ऐसा शब्द है जिसका उपयोग केवल सांसारिक ज्ञान के शिक्षक को संदर्भित करने के लिए नहीं किया जाता है, बल्कि वह व्यक्ति जो आत्म-परिवर्तन और अंततः आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जा सकता है। गुरु शब्द का प्रयोग श्रद्धा और सम्मान के साथ किया जाता है और इसे हमेशा पवित्रता और सर्वोच्च ज्ञान के साथ जोड़ा जाता है। इसे अक्सर गुरुदेव के रूप में प्रयोग किया जाता है, जो एक प्रबुद्ध गुरु को संदर्भित करता है। गुरु मानवता का मार्गदर्शन करते हैं और प्राचीन ज्ञान और शिक्षाओं के माध्यम से समकालीन दुनिया में जीवन को समझने में मानव जाति की मदद करते हैं। सदाशिव समारंभं शंकराचार्य मध्यमाम् । अस्मदाचार्य पर्यंतां वंदे गुरु परंपराम् ॥ भगवान सदाशिव से शुरू होने वाली, मध्य में आदि शंकराचार्य से लेकर मेरे तात्कालिक गुरु तक जारी रहने वाली परंपरा को नमन। ||श्री गुरु अष्टकम् || शरीरं सुरूपं तथा वा कलत्रंयशश्चारु चित्रं धनं मेरु तुल्यम् । मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मेततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ॥ 1 ॥ कलत्रं धनं पुत्र पौत्रादिसर्वंगृहो बांधवाः सर्वमेतद्धि जातम् । मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मेततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ॥ 2 ॥ षड्क्षंगादिवेदो मुखे शास्त्रविद्याकवित्वादि गद्यं सुपद्यं करोति । मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मेततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ॥ 3 ॥ विदेशेषु मान्यः स्वदेशेषु धन्यःसदाचारवृत्तेषु मत्तो न चान्यः । मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मेततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ॥ 4 ॥ क्षमामंडले भूपभूपलबृब्दैःसदा सेवितं यस्य पादारविंदम् । मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मेततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ॥ 5 ॥ यशो मे गतं दिक्षु दानप्रतापात्जगद्वस्तु सर्वं करे यत्प्रसादात् । मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मेततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ॥ 6 ॥ न भोगे न योगे न वा वाजिराजौन कंतामुखे नैव वित्तेषु चित्तम् । मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मेततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ॥ 7 ॥ अरण्ये न वा स्वस्य गेहे न कार्येन देहे मनो वर्तते मे त्वनर्ध्ये । मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मेततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ॥ 8 ॥ गुरोरष्टकं यः पठेत्पुरायदेहीयतिर्भूपतिर्ब्रह्मचारी च गेही । लमेद्वाच्छिताथं पदं ब्रह्मसंज्ञंगुरोरुक्तवाक्ये मनो यस्य लग्नम् ॥ 9 ॥ श्री गुर्वष्टकम् (गुरु अष्टकम्) हिन्दी अनुवाद 1.) यदि आपके पास शरीर सुन्दर हो, पत्नी सुन्दर हो, यश उत्तम और विविध हो, तथा धन मेरु पर्वत के समान हो; किन्तु यदि आपका मन गुरु के चरण कमलों में आसक्त न हो, तो फिर क्या अर्थ है, फिर क्या अर्थ है, फिर क्या अर्थ है, फिर क्या अर्थ है? 2.) आपके पास पत्नी, धन, पुत्र, पौत्र आदि ये सब; घर, सम्बन्धी – ये सब हो सकते हैं; किन्तु यदि मन गुरु के चरण कमलों में आसक्त न हो, तो फिर क्या अर्थ अर्थ, फिर क्या अर्थ है, फिर क्या अर्थ अर्थ, फिर क्या अर्थ है? 3.) वेद तथा उनके छह सहायक शास्त्रों का ज्ञान भी उसके होठों पर हो; काव्य-कौशल में निपुण हो; तथा वह अच्छा गद्य और काव्य रच सकता हो; किन्तु यदि उसका मन गुरु के चरण कमलों में आसक्त न हो, तो फिर क्या अर्थ है, फिर क्या अर्थ है, फिर क्या अर्थ है, फिर क्या अर्थ है? 4.) ‘अन्य देशों में मेरा सम्मान है; अपने देश में मैं सौभाग्यशाली हूँ; ‘सदाचरण में मुझसे बढ़कर कोई नहीं है’ – ऐसा कोई सोच सकता है, लेकिन यदि किसी का मन गुरु के चरणकमलों में आसक्त नहीं है, तो फिर क्या अर्थ है, फिर क्या अर्थ है, फिर क्या अर्थ है, फिर क्या अर्थ है? 5.) संसार के सम्राटों और राजाओं द्वारा निरंतर किसी के चरणों की पूजा की जा सकती है; लेकिन यदि किसी का मन गुरु के चरणकमलों में आसक्त नहीं है, तो फिर क्या अर्थ अर्थ, फिर क्या अर्थ है, फिर क्या अर्थ है, फिर क्या अर्थ है? 6.) दान और पराक्रम के कारण मेरी कीर्ति सब ओर फैल गई है; इन गुणों के पुरस्कार स्वरूप संसार की सभी वस्तुएँ मेरे हाथ में हैं; लेकिन यदि मेरा मन गुरु के चरणकमलों में आसक्त नहीं है, तो फिर क्या अर्थ है, फिर क्या अर्थ है, फिर क्या अर्थ है, फिर क्या अर्थ है? 7) न भोग में, न एकाग्रता में, न घोड़ों की भीड़ में; न प्रियतम के मुख में, न धन में मन टिकता है; परन्तु यदि वह मन गुरु के चरणकमलों में आसक्त न हो, तो फिर क्या अर्थ है, फिर क्या अर्थ अर्थ, फिर क्या अर्थ है, फिर क्या अर्थ है? 8.) न तो वन में, न अपने घर में, न ही जो कुछ प्राप्त होना है, न शरीर में, न ही जो अमूल्य है, उसमें मेरा मन लगता है; परन्तु यदि मेरा मन गुरु के चरणकमलों में आसक्त न हो, तो फिर क्या अर्थ है, फिर क्या अर्थ है, फिर क्या अर्थ है, फिर क्या अर्थ है? 9.) जो पुण्यात्मा व्यक्ति गुरु पूर्णिमा के पावनपर्व पर इस अष्टक का पाठ करता है, तथा जिसका मन गुरु के वचनों पर स्थिर रहता है – चाहे वह तपस्वी हो, राजा हो, विद्यार्थी हो, या गृहस्थ हो, वह अभीष्ट लक्ष्य को प्राप्त करता है, जिसे ब्रह्म कहा जाता है। श्री गुरुवष्टकम् (गुरु अष्टकम्)
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