पोळे के दिन चौसठ योगिनियों की पूजा क्यों की जाती है?
पिठोरी अमावस्या की भूली-बिसरी कथा
पोळे का दिन आते ही गांव-घर का माहौल ही बदल जाता था। बैलों के गले में घुंघरुओं की माला सजती, उनके सींग रंगे जाते और बच्चे उन्हें देखने के लिए उत्साह से इधर-उधर दौड़ते। घरों में पुरणपोली की खुशबू फैलने लगती और आंगन में बैलों की पूजा के लिए थाली सजाई जाती।
लेकिन कुछ घरों में इस दिन एक और महत्वपूर्ण परंपरा निभाई जाती थी—पिठोरी अमावस्या का व्रत और चौसठ योगिनियों की पूजा।
देवघर के सामने आटे से छोटी-छोटी देवियों की आकृतियां बनाई जातीं। उनके साथ हाथी, घोड़े, झूले और पालने भी रखे जाते। शाम को घर की महिला दीप जलाकर इन देवियों की पूजा करती। बाहर बैलों का पूजन होता और घर के भीतर मां अपने बच्चों के अच्छे स्वास्थ्य, सुख और लंबी उम्र के लिए प्रार्थना करती।
महाराष्ट्र में श्रावण अमावस्या का यह रूप लंबे समय से दो परंपराओं को साथ लेकर चलता आया है। पोळा खेतों में सालभर मेहनत करने वाले बैलों के प्रति कृतज्ञता का पर्व है, जबकि पिठोरी व्रत संतान के सुख और कल्याण के लिए किया जाता है।
इसी पिठोरी व्रत में चौसठ योगिनियों की पूजा का विशेष महत्व माना जाता है।
एक मां के दुःख की कहानी
पिठोरी अमावस्या से जुड़ी एक प्रचलित कथा श्रीधर नाम के एक संपन्न ब्राह्मण की बताई जाती है। श्रीधर के आठ बेटे थे। उनका बड़ा बेटा शंकर था और उसकी पत्नी का नाम विदेहा था।
विदेहा के जीवन में किसी चीज की कमी नहीं थी। घर भरा-पूरा था, परिवार था और सुख-सुविधाएं भी थीं। लेकिन उसके मन में एक ऐसा दुःख था, जिसे कोई सुख दूर नहीं कर सकता था।
उसकी गोद बार-बार भरती थी, लेकिन उसका बच्चा जीवित नहीं रहता था।
एक-दो नहीं, उसके लगातार सात बच्चे जन्म के बाद चल बसे थे।
हर बार वह अपने बच्चे के आने की उम्मीद में सपने सजाती। उसके लिए कपड़े और छोटी-छोटी चीजों की कल्पना करती। सोचती कि बच्चा उसकी गोद में खेलेगा, उसकी आवाज सुनाई देगी और वह उसे अपने हाथों से बड़ा करेगी।
लेकिन प्रसव के बाद वही उम्मीद फिर टूट जाती।
सात बच्चों को खोने के बाद जब वह आठवीं बार गर्भवती हुई, तो उसके मन में खुशी के साथ डर भी था। उसे उम्मीद थी कि शायद इस बार उसका बच्चा जीवित रहेगा।
लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था।
आठवां बच्चा भी नहीं बचा
एक दिन घर में श्रीधर के पिता का श्राद्ध था। पूरे घर में धार्मिक विधि की तैयारियां चल रही थीं। उसी समय विदेहा को प्रसव पीड़ा शुरू हुई।
उसने एक बच्चे को जन्म दिया, लेकिन आठवां बच्चा भी मृत था।
विदेहा पर जैसे दुःख का पहाड़ टूट पड़ा।
जिस मां ने नौ महीने अपने बच्चे को अपने भीतर रखा था, वह उसे जन्म के बाद अपनी गोद में भी नहीं रख सकी।
दुःख के उस समय उसे सहारे की जरूरत थी, लेकिन कथा के अनुसार घर में किसी बात को लेकर उसे सुमित्रा के कटु शब्द भी सुनने पड़े।
अपने बच्चे को खोने का दुःख और अपनों के कठोर शब्द—दोनों को सहना उसके लिए असहनीय हो गया।
वह अपने मृत बच्चे को गोद में लेकर घर से निकल पड़ी।
उसे नहीं पता था कि उसे कहां जाना है। बस वह चलती रही।
जंगल में मिला एक अनजान सहारा
चलते-चलते वह जंगल में पहुंच गई। उसके पीछे उसका घर छूट चुका था और आगे का रास्ता अनजान था।
कुछ दूर उसे नदी के किनारे एक मठ दिखाई दिया। उसे लगा कि शायद यहां उसे थोड़ी देर के लिए आश्रय मिल जाए।
लेकिन वहां उसे बताया गया कि उस स्थान पर भयानक यक्षों का वास है और उसे वहां नहीं रुकना चाहिए।
विदेहा ने अपनी पूरी कहानी सुनाई—अपने सात बच्चों की मृत्यु, आठवें बच्चे को खोने का दुःख और घर से निकलने की मजबूरी।
उसकी कहानी सुनकर वहां मौजूद एक प्रमुख महिला का हृदय पिघल गया।
उसने विदेहा को सांत्वना दी और कहा कि उसी रात उस मठ में चौसठ योगिनियां आने वाली हैं। यदि वह श्रद्धा और विश्वास के साथ उनकी शरण ले, तो शायद उसका दुःख दूर हो सकता है।
लेकिन तब तक उसे बेलपत्रों के पीछे छिपकर रहना होगा। जब योगिनियां किसी अतिथि के बारे में पूछें, तभी उसे सामने आना होगा।
विदेहा वहीं रुक गई।
कई दिनों के बाद शायद पहली बार किसी ने उसके दुःख को समझने की कोशिश की थी।
आधी रात को आईं चौसठ योगिनियां
वह श्रावण अमावस्या की रात थी।
आधी रात के समय चौसठ योगिनियां मठ में आईं। उन्होंने वहां देवी की पूजा की।
पूजा समाप्त होने के बाद उन्होंने पूछा—
“क्या यहां कोई अतिथि है?”
जिस सवाल का विदेहा इंतजार कर रही थी, वह आखिर उसके कानों तक पहुंचा।
वह बेलपत्रों के पीछे से बाहर आई और अपने मृत बच्चे को गोद में लेकर उनके सामने खड़ी हो गई।
उसने अपनी पूरी कहानी उन्हें सुनाई।
उसने कहा कि उसके सात बच्चे पहले ही उससे छिन चुके हैं और अब आठवां बच्चा भी उसके पास नहीं रहा।
उसकी मांग बहुत बड़ी नहीं थी।
वह केवल इतना चाहती थी—
“मेरे बच्चों को जीवन मिल जाए और मुझे फिर कभी ऐसा दुःख न सहना पड़े।”
उसकी करुण पुकार सुनकर योगिनियां प्रसन्न हुईं। उन्होंने उसे प्रसाद दिया और आशीर्वाद दिया कि उसके आठों पुत्र जीवित होकर उसके पास लौट आएंगे।
कथा के अनुसार योगिनियों के आशीर्वाद से उसके आठों बच्चे जीवित हो गए।
जिस मां ने मृत बच्चे को गोद में लेकर अपना घर छोड़ा था, वही मां अब अपने बच्चों के साथ घर वापस लौटी।
घरवालों ने उसे देखा तो सभी की खुशी का ठिकाना नहीं रहा।
इसके बाद विदेहा ने श्रद्धापूर्वक चौसठ योगिनियों की पूजा की और पिठोरी व्रत को अपनी परंपरा बना लिया।
यहीं से इस व्रत में चौसठ योगिनियों और संतान के कल्याण का संबंध और भी गहरा माना जाने लगा।
अलग-अलग जगहों पर कहानी के रूप भी अलग हैं
महाराष्ट्र में सुनाई जाने वाली पिठोरी की कथा के अलग-अलग संस्करण मिलते हैं।
कहीं सात बच्चों की कथा सुनाई जाती है। कहीं जंगल में विदेहा को झोटिंग की पत्नी रास्ता दिखाती है। कहीं शिवलिंग के पास नागकन्याएं, देवकन्याएं और साती पूजा के लिए आती हैं।
कहानी के पात्र और घटनाएं अलग हो सकती हैं, लेकिन मूल भावना एक ही है—
एक दुःखी मां को दैवी स्त्रीशक्ति का सहारा मिलता है और वह अपने बच्चों के सुख और जीवन के लिए आशीर्वाद प्राप्त करती है।
इसीलिए पीढ़ियों से मांएं पिठोरी की कथा सुनते हुए अपने बच्चों के स्वास्थ्य, सुख और लंबी उम्र की प्रार्थना करती आई हैं।
चौसठ योगिनियों के साथ सप्तमातृकाओं की पूजा
पिठोरी की पूजा में केवल चौसठ योगिनियां ही नहीं, बल्कि सप्तमातृकाओं का भी आवाहन किया जाता है।
इनमें—
- ब्राह्मी
- माहेश्वरी
- कौमारी
- वैष्णवी
- वाराही
- इंद्राणी
- चामुंडा
का उल्लेख मिलता है।
चौसठ योगिनियों के लिए अलग-अलग स्थान बनाए जाते हैं। कुछ परंपराओं में चावल की छोटी-छोटी ढेरियां बनाई जाती हैं।
आठ पंक्तियों में आठ-आठ ढेरियां—इस तरह कुल 64 स्थान बनाए जाते हैं।
कुछ परिवारों में चावल के ऊपर सुपारी रखी जाती है, तो कहीं आटे से योगिनियों की छोटी आकृतियां बनाई जाती हैं। कहीं चित्रों की पूजा की जाती है।
अर्थात पूजा की विधि परिवार और क्षेत्र के अनुसार बदल सकती है, लेकिन भावना वही रहती है—मातृशक्ति का आवाहन और संतान के कल्याण की प्रार्थना।
आखिर इसे ‘पिठोरी’ क्यों कहा जाता है?
‘पिठोरी’ नाम का संबंध भी आटे यानी पीठ से जोड़ा जाता है।
पुराने संदर्भों में ‘पिठोरी’ के लिए ‘पिष्टगौरी’ या ‘पीठगौरी’ जैसे रूप भी मिलते हैं।
घर में रोज जिस आटे से रोटी बनती है, उसी आटे से इस दिन देवी की छोटी-छोटी आकृतियां बनाई जाती हैं।
उन पर हल्दी-कुंकू लगाया जाता है, फूल चढ़ाए जाते हैं और घर में बने पकवानों का नैवेद्य अर्पित किया जाता है।
यानी रोजमर्रा की रसोई में इस्तेमाल होने वाला साधारण आटा उस दिन देवी के रूप में पूजनीय हो जाता है।
आटे के पालने और झूले का क्या अर्थ है?
पिठोरी की पूजा में देवी के साथ छोटे-छोटे पालने, झूले, हाथी, घोड़े और सिंहासन भी बनाए जाते हैं।
पहली नजर में ये केवल सजावट जैसी चीजें लग सकती हैं, लेकिन इनके पीछे एक गहरी भावना है।
एक मां अपने बच्चे को पालने में झुलाना चाहती है। उसे बड़ा होते देखना चाहती है। उसका घर बच्चों की हंसी से भरा रहे—यही तो उसकी सबसे बड़ी इच्छा होती है।
इसलिए पिठोरी की पूजा में बनाया गया छोटा-सा पालना भी एक मां की बड़ी प्रार्थना बन जाता है।
पिठोरी में पूरा संसार क्यों बनाया जाता था?
पिठोरी की एक अन्य परंपरा में घर की दीवार पर चित्र बनाए जाने का उल्लेख मिलता है।
बीच में शिव-पार्वती या शिवलिंग का चित्र बनाया जाता और उसके आसपास पूरे संसार की तस्वीर उकेरी जाती।
उसमें—
घर, रसोई, बच्चे, बुजुर्ग, गाय-बैल, घोड़े, झूले, बर्तन, अनाज और खेती से जुड़ी चीजें बनाई जातीं।
यहां तक कि चूल्हा, सूप, उखल-मूसल, दीपक, लेखनी और किताबों जैसी चीजों को भी चित्र में स्थान दिया जाता।
सोचिए, एक पूजा के चित्र में पूरा घर और पूरा जीवन समा गया था।
इसका अर्थ भी बहुत सुंदर है—
घर में अन्न रहे, पशुधन सुरक्षित रहे, बच्चे स्वस्थ रहें, परिवार खुश रहे और जीवन में किसी आवश्यक चीज की कमी न हो।
इसीलिए पिठोरी के हाथी-घोड़े या झूले केवल सजावटी वस्तुएं नहीं थे। वे उस समय के परिवार के सुखी जीवन की कल्पना का हिस्सा थे।
‘पिठोरीपट’ में दिखाई देती है एक सुंदर परंपरा
पिठोरी की परंपरा केवल घर की पूजा तक सीमित नहीं रही।
‘पिठोरीपट’ नाम से बनाए गए चित्रों का भी उल्लेख मिलता है। मराठी विश्वकोश में पुणे के भारत इतिहास संशोधक मंडल के संग्रह में मौजूद एक पिठोरीपट का उल्लेख मिलता है।
इसमें कृष्णलीला के प्रसंग चित्रित किए गए हैं।
पिठोरी की कथा और कृष्ण जन्म की कथा में संतान से जुड़े दुःख और उसके बाद मिलने वाले सुख की समानता दिखाई देती है। शायद इसी कारण कलाकार ने कृष्ण जन्म से जुड़े प्रसंगों को पिठोरीपट में स्थान दिया।
इन चित्रों में महाराष्ट्र की पारंपरिक चित्रकला, उस समय की वेशभूषा और आभूषणों की झलक भी दिखाई देती है।
इस तरह एक ही परंपरा में व्रतकथा, मातृभाव, कृष्णकथा और महाराष्ट्र की लोकचित्र परंपरा एक साथ दिखाई देती है।
पूजा के बाद बच्चों को दिया जाता है ‘वाण’
पिठोरी की पूजा में बच्चों को वाण देने की परंपरा भी बेहद भावुक है।
पूजा करने वाली मां बच्चों को अपने पीछे खड़ा करती है।
कहीं खीर की कटोरी को पूरी से ढककर सिर पर रखा जाता है, तो कहीं पुरणपोली या कोई दूसरा पकवान लेकर मां बच्चों की ओर पीठ कर लेती है।
फिर वह पूछती है—
“अतीत कौन?”
पीछे खड़ा बच्चा जवाब देता है—
“मैं हूं।”
वह अपना नाम बताता है और मां के हाथ से प्रसाद लेता है।
आज ‘अतीत’ शब्द सुनकर कई लोगों को इसका अर्थ समझ में नहीं आता। लेकिन पुराने मराठी शब्दकोशों में ‘अतीत’ का अर्थ पाहुणा या अतिथि दिया गया है।
इससे पिठोरी की कथा से इसका संबंध समझ में आता है।
कथा में योगिनियां पूछती हैं—
“कोई अतिथि है?”
और विदेहा सामने आकर कहती है—
“मैं हूं।”
घर की पूजा में मां पूछती है और उसका बच्चा जवाब देता है—
“मैं हूं।”
मानो सदियों पुरानी कथा और आज का परिवार उस एक छोटे-से संवाद में एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं।
मां के लिए यह सिर्फ एक रस्म नहीं
बच्चे के लिए उस समय यह सब एक मजेदार परंपरा होती है।
मां के पीछे खड़े होना, अपना नाम बताना और उसके हाथ से खीर या पुरणपोली लेना—बस इतना ही।
लेकिन मां के लिए उस पल का अर्थ कहीं ज्यादा गहरा होता है।
वह पूरे दिन अपने बच्चे के अच्छे स्वास्थ्य और लंबी उम्र के लिए प्रार्थना कर चुकी होती है।
विदेहा की कहानी सुन चुकी होती है।
और जब उसके पीछे से उसके बच्चे की आवाज आती है—
“मैं हूं…”
तो शायद उस आवाज में उसे अपनी सबसे बड़ी प्रार्थना का उत्तर सुनाई देता है।
इसलिए पिठोरी को ‘मातृदिन’ भी कहा जाता है
कुछ स्थानों पर पिठोरी को ‘मातृदिन’ भी कहा जाता है।
क्योंकि यह मूल रूप से मां के उस प्रेम और चिंता से जुड़ा व्रत है, जिसमें वह अपने बच्चों के स्वास्थ्य, सुख और लंबी उम्र की कामना करती है।
पुरानी कथा में पुत्रों का उल्लेख अधिक मिलता है, लेकिन आज के समय में इस भावना को बेटा और बेटी—दोनों के लिए समान रूप से समझा जा सकता है।
आखिर हर मां की प्रार्थना एक ही होती है—
“मेरा बच्चा स्वस्थ रहे, खुश रहे, सुरक्षित रहे और जीवन में आगे बढ़े।”
पोळा और पिठोरी—दोनों एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं
अब जरा पोळे के उस दिन को फिर से याद कीजिए।
आंगन में सजे हुए बैल हैं।
उनके पैरों पर पानी डाला जा रहा है। उनका औक्षण किया जा रहा है। उन्हें पुरणपोली का निवाला खिलाया जा रहा है।
और उसी घर में पिठोरी की पूजा के लिए आटे की देवियां बनाई जा रही हैं।
एक तरफ खेत में सालभर मेहनत करने वाले बैल के प्रति कृतज्ञता है।
दूसरी तरफ घर के बच्चों के लिए मां की प्रार्थना।
लेकिन दोनों को जोड़ने वाली चीज एक ही है—अन्न।
बैल खेत में मेहनत करते हैं।
खेत से अनाज आता है।
उसी अनाज से घर का आटा बनता है।
उसी आटे से पिठोरी की देवी बनती है।
और उसी अन्न से बना प्रसाद बच्चे के हाथ में पहुंचता है।
यानी पोळा और पिठोरी केवल दो अलग-अलग परंपराएं नहीं हैं। इनके पीछे खेती, पशुधन, अन्न, परिवार और मातृभाव से जुड़ा पूरा ग्रामीण जीवन दिखाई देता है।
एक परंपरा, जो धीरे-धीरे यादों में सिमट रही है
आज पोळे की शोभायात्राएं दिखाई देती हैं। सजाए हुए बैल दिखाई देते हैं। लेकिन पिठोरी की पूरी परंपरा अब हर घर में देखने को नहीं मिलती।
कहीं आज भी आटे की छोटी-छोटी देवियां बनाई जाती हैं।
कहीं पुराना पिठोरीपट संभालकर रखा है।
कहीं दादी या नानी से सुनी हुई कथा ही इस परंपरा की आखिरी कड़ी है।
और कहीं बच्चों को आज भी मां के पीछे खड़ा करके वाण दिया जाता है।
शायद इस परंपरा को बचाने का सबसे अच्छा तरीका यही है कि इसे केवल एक पूजा की विधि के रूप में न देखें, बल्कि इसके पीछे छिपी कहानी और भावना को अगली पीढ़ी तक पहुंचाएं।
जब बच्चों को बताया जाएगा कि पिठोरी की कथा एक ऐसी मां की कहानी है, जिसने अपने बच्चों को बचाने के लिए चौसठ योगिनियों की शरण ली थी, तब यह परंपरा उनके लिए भी अर्थपूर्ण बन जाएगी।
और जब मां अपने बच्चे से पूछेगी—
“अतीत कौन?”
और पीछे से मासूम आवाज आएगी—
“मैं हूं…”
तो शायद उस छोटे-से जवाब में सिर्फ एक बच्चे की आवाज नहीं होगी।
उसमें सदियों पुरानी एक मां की प्रार्थना, उसकी उम्मीद और अपने बच्चे के लिए उसका अटूट प्रेम भी सुनाई देगा।
यही पिठोरी अमावस्या की सबसे सुंदर भावना है—
मां की प्रार्थना, संतान का सुख और मातृशक्ति पर अटूट विश्वास।