श्री गणेश लक्ष्मी स्तोत्र
लक्ष्मी गणेश स्तोत्र | अपार धन देने वाला गणेश लक्ष्मी स्तोत्र | Lakshmi Ganesha Stotra | अपार धन देने वाला गणेश-लक्ष्मी स्तोत्र ये गणेश जी का लक्ष्मी स्तोत्र है जो बेहद सरल और असरदार है। सच में चमत्कारी है! कई बड़े-बड़े लोगों ने इसका अनुभव किया है। और जानते हैं? बहुत से लोगों की जिंदगी में इससे अद्भुत बदलाव आया है। लक्ष्मी गणेश स्तोत्र | अपार धन देने वाला गणेश लक्ष्मी स्तोत्र | Lakshmi Ganesha Stotra | गणेश-लक्ष्मी स्तोत्रस्तोत्र प्रयोगदिवाली की रात को बस 108 बार इसका पाठ कर लीजिए। ये सिद्ध हो जाएगा! या फिर भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी से चतुर्दशी तक रोज़ 108 बार पाठ करें। विश्वास करिए, जो परिणाम मिलेगा वो आपकी कल्पना से परे होगा! श्री गणेश-लक्ष्मी स्तोत्र ॐ नमो विघ्नराजाय सर्वसौख्यप्रदायिने | दुष्टारिष्टविनाशाय पराय परमात्मने || लम्बोदरं महावीर्यं नागयज्ञोप शोभितं | अर्धचन्द्रधरं देवं विघ्नव्यूह विनाशनं || ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं ह्रः हेरम्बाय नमो नमः | सर्वसिद्धिप्रदोसि त्वं सिद्धिबुद्धिप्रदोभव || चिन्तितार्थप्रदस्त्वं हि सततं मोदकप्रियः | सिन्दूरारुणवस्त्रेश्च पूजितो वरदायकः || इदं गणपतिस्तोत्रं यः पठेद भक्तिमान नरः | तस्य देहं च गेहं च स्वयं लक्ष्मीर्न मुञ्चति || स्तोत्र का अर्थ विघ्नराज गणेश जी को नमस्कार! वे हमें पूर्ण सुख देते हैं। वे सच्चिदानंद स्वरूप हैं। वे सभी बुरी शक्तियों और अरिष्ट ग्रहों को नष्ट करते हैं। वे परमात्मा हैं – उन्हें प्रणाम!गणपति जी महान शक्तिशाली हैं। लंबोदर हैं, सर्प की माला पहनते हैं, अर्धचंद्र धारण करते हैं। वे सभी विघ्नों को दूर करते हैं। मैं उनकी वंदना करता हूं। ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं ह्रः – हेरंब गणेश को नमस्कार!हे प्रभु! आप ही सभी सिद्धियों के दाता हैं। हमें सिद्धि और बुद्धि दीजिए।आपको मोदक बहुत प्रिय हैं। जो भी हम मन में सोचते हैं, आप वो पूरा करते हैं। सिंदूर और लाल वस्त्र से जब आपकी पूजा होती है, आप वरदान देते हैं। जो भी भक्ति से इस स्तोत्र का पाठ करता है, लक्ष्मी जी खुद उसके घर और शरीर को कभी नहीं छोड़तीं! || गणेश-लक्ष्मी स्तोत्र संपूर्ण ||
उपासक जो भी मनोकामना अपने मन में चिंतन करता है उसे यह दिव्य स्तोत्र के नित्य पाठ से निश्चित रूप से प्राप्त करता है |
पञ्चदेवैःकृत: श्री महागणपति स्तुति 1. इस स्तोत्र के पाठ से ही पंचदेव यानी कि ब्रह्मा विष्णु महेश्वर भगवान सूर्य और भगवान गणेश साधक पर प्रसन्न हो जाते हैं। साधक को मनोवांछित फल प्राप्त होता है। 2. यह दिव्य स्तोत्र अपनी उर्जा से व्यक्ति की मन, विवेक, आत्मा, तथा अंतरात्मा का परमआह्लाद वर्धन करने वाला है। 3. यह दिव्य स्तोत्र श्री भगवान गणेश को ध्यान करते हुए या स्मरण करते हुए पाठ किया जाए तो भगवान गणेश अत्यंत प्रसन्न हो जाते हैं । यह महान दिव्य स्तोत्र “सर्वद” है मतलब सब कुछ देने वाला है । 4.जो मन में भक्ति भाव रखते हुए इस महान दिव्य स्तोत्र का पाठ करता है। उसको सरलता से ही धर्म अर्थ काम मोक्ष की प्राप्त हो जाती है। धर्म यानी आध्यात्मिक उन्नति तथा सभी प्रकार के पापों का नाश, अर्थ का मतलब धन संपदा ऐश्वर्या, रिद्धि सिद्धि तथा सौभाग्य प्राप्ति, काम का मतलब व्यक्ति अपने जीवन में जो भी कामना करता है वह पूर्ण हो जाती है, और उत्तम प्राण संगिनी की प्राप्ति होती हैऔर पति पत्नी में अतुलनीय प्रेम की वृद्धि होती है। और अंत में मोक्ष यानी साधक परमेश्वर में विलीन हो जाता है। 5. इस महान स्तोत्र के नित्य पाठ से कुल वृद्धि होती है।साधक के पुत्र पौत्रादि में वर्धन होता है। और लक्ष्मी उसे कभी छोड़कर नहीं जाती है.संसार में ” श्रीमान ” होकर जीवन यापन करता है। व्यक्ति का हर दिन आनंदमय होता है। 6. यदि कोई उपासक स्तोत्र का नित्य 7बार पाठ 21 दिन तक करें तो वह यदि उसका कोई संबन्धी कारागार में यानी कि जेल में पड़ा है तो मुक्त हो जाता है। और यदि किसी भी प्रकार का बंधन में पडा हो जैसे कि ग्रह बंधन, व्यवसाय बंधन, भाग्य बंधन यानी दुर्भाग्य, इसी तरह जितना भी बंधन है हो सभी बंधन अपने आप नष्ट हो जाते हैं । याद रहे प्रतिदिन 7 बार 21 दिन तक। चमत्कार आपके सामने होगा। 7. हमारे एक दिवस में तीन काल होते है। सुबह का समय को प्रातः काल कहते हैं मध्यान्न का समय को मध्यान्न काल कहते हैं और संध्या का समय को संध्याकाल कहते हैं। यह तीन काल को त्रिकाल कहते हैं।यदि कोई उपासक इस महान दिव्य स्तोत्र का एक काल द्विकाल या त्रिकाल में पाठ करता है वह स्वयं देवताओं का वंदनीय हो जाता है। 8. यदि किसी के ऊपर मारण उच्चाटन विद्वेषण या कोई बड़े तांत्रिक प्रयोग किया गया है तो इस स्तोत्र का नित्य 21 दिन तक प्रतिदिन 21 बार पाठ करना चाहिए। यह दिव्य स्तोत्र सभी प्रकार के मारण विद्वेषण उच्चाटन तथा तांत्रिक क्रिया का सर्वनाश कर देगा यानी कि सभी को नष्ट कर देगा। इस स्तोत्र का पाठ करने वाले साधक को किसी प्रकार का कोई भी भय नहीं लगता है.वह निर्भय हो जाता है सुरक्षित हो जाता है। 9. धनधान्य समृद्धि, संपत्ति मैं वृद्धि, आरोग्यता यानी कि सभी प्रकार के रोगों से आरोग्य, यान वाहन में वृद्धि, तथा सभी प्रकार की संपन्नता प्राप्ति होती है..। “यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम्” यानी कि उपासक जो भी मनोकामना अपने मन में चिंतन करता है उसे यह दिव्य स्तोत्र के नित्य पाठ से निश्चित रूप से मिल जाता है। विधान-: पंचदेव सहित भगवान गणेश का पूजन करते हुए प्रतिदिन स्तोत्र का 21 बार पाठ करें । 21 दिन तक करने के पश्चात 5 बालकों को भोजन करायें। पञ्चदेवैःकृत: श्री महागणपति स्तुति श्रीगणेशाय नमः। ॐ नमो भगवते श्रीवल्लभ महागणपतए। ॐ नमो भगवते वासुदेव गणपतए। ॐ नमो भगवते संकर्षण गणपतए। ॐ नमो प्रद्युम्न गणपतए। ॐ नमो भगवते अनिरुद्ध गणपतए। || पञ्चदेवा ऊचुः॥ नमस्ते विघ्नराजाय भक्तानां विघ्नहारिणे । विघ्नकर्त्रे ह्यभक्तानां गणेशाय नमो नमः ॥१॥ हेरंबाय नमस्तुभ्यं ढुण्ढिराजाय ते नमः । विनायकाय देवाय ब्रह्मणां नायकाय च ॥२॥ लम्बोदराय सिद्धेश गजाननधराय च । शूर्पकर्णाय गूढाय चतुर्हस्त नमोऽस्तुते॥ ३॥ लम्बोष्ठायैकदन्ताय सर्वेशाय गणाधिप । अनन्तमहिमाधार धरणीधर ते नमः॥४॥ नमो मायामयायैव मायाहीनाय ते नमः । मोहदाय नमस्तुभ्यं मोहहन्त्रे नमो नमः ॥ ५॥ पञ्चभूतमयायैव पञ्चभूतधराय च । इन्द्रियाणां चाधिपायेन्द्रियज्ञानप्रकारिणे ॥६॥ अध्यात्मनेऽधिभूतायाधिदैवाय च ते नमः। अन्नायान्नपते तुभ्यमन्नान्नाय नमो नमः ॥ ७॥ प्राणाय प्राणनाथाय प्राणानां प्राणरूपिणे । चित्ताय चित्तहीनाय चित्तेभ्यश्चित्तदायिने ॥८॥ विज्ञानाय च विज्ञानपतये द्वन्द्वधारिणे । विज्ञानेभ्यः स्वविज्ञानदायिने ते नमो नमः ॥९॥ आनन्दाय नमस्तुभ्यमानन्दपतये नमः । आनन्दानन्ददात्रे च कारणाय नमो नमः ॥१०॥ चैतन्याय च यत्नाय चेतनाधारिणे नमः । चैतन्येभ्यः स्वचैतन्यदायिने नादरूपिणे ॥११॥ बिन्दुमात्राय बिन्दूनां पतये प्राकृताय च। भेदाभेदमयायैव ज्योतीरूपाय ते नमः ॥ १२॥ सोऽहंमात्राय शून्याय शुन्याधाराय देहिने। शून्यानां शून्यरूपाय पुरुषाय नमो नमः ॥१३॥ ज्ञानाय बोधनाथाय बोधानां बोधकारिणे। मनोवाणीविहीनाय सर्वात्मक नमो नमः ॥१४॥ विदेहाय नमस्तुभ्यं विदेहाधारकाय च । विदेहानां विदेहाय साङ्ख्यरूपाय ते नमः ॥१५॥ नानाभेदधरायैव चैकानेकादिमूर्तये । असत्स्वानन्दरूपाय शक्तिरूपाय ते नमः ॥१६॥ अमृताय सदाखण्डभेदाभेदविवर्जित । सदात्मरूपिणे सूर्यरूपाधाराय ते नमः ॥ १७॥ सत्यासत्यविहीनाय समस्वानन्दमूर्तये । आनन्दानन्दकन्दाय विष्णवे ते नमो नमः ॥१८॥ अव्यक्ताय परेशाय नेतिनेतिमयाय च । शिवाय शाश्वतायैव मोहहीनाय ते नमः ॥१९॥ संयोगेन च सर्वत्र समाधौ रूपधारिणे । स्वानन्दाय नमस्तुभ्यं मौनभावप्रदायिने ॥२०॥ अयोगाय नमस्तुभ्यं निरालम्ब स्वरूपिणे। मायाहीनाय देवाय नमस्ते ह्यसमाधये॥ २१॥ शान्तिदाय नमस्तुभ्यं पूर्णशान्तिप्रदाय ते। योगानां पतये चैव योगरूपाय ते नमः॥ २२॥ गणेशाय परेशाय ह्यपारगुणकीर्तये । योगशान्तिप्रदात्रे च महायोगाय ते नमः ॥२३॥ गुणान्तं न ययुर्यस्य वेदाद्या वेदकारकाः। स कस्य स्तवनीयः स्याद्यथामति तथा स्तुतः ॥२४॥ तेन वै भगवान् साक्षाच्चिन्तामणि गजाननः। प्रसन्नो भवतु त्राताऽस्माकं त्वं परमा गतिः॥२५॥ इत्येवमुक्त्वा देवेशास्तूष्णीं भूतास्तथा शिवे । गणेशोऽपि प्रसन्नात्मा हृष्टः सन् प्रत्युवाच तान्॥२६॥ !!फलश्रुति!! श्रीगणेश उवाच। पञ्चदेवा महाभागाः प्रसन्नो भवतां स्तवैः । तपसा च तथा भक्त्या वाञ्छितं ब्रूत वै वरम् ॥२७॥ भवत्कृतमिदं स्तोत्रं परमाह्लादवर्धनम् । मम प्रीतिकरं भक्त्या सर्वदं प्रभविष्यति ॥२८॥ यः पठेद्भावपूर्वं स धर्म कामार्थ मोक्ष भाक्। पुत्रपौत्रयुतः श्रीमानन्ते स्वानन्दमाप्नुयात् ॥२९॥ सप्तवारं पठेन्नित्यमेकविंशतिवासरम् । कारागृहगतो वाऽपि मुच्यते बन्धनात् स्वयम् ॥३०॥ एककालं द्विकालं वा त्रिकालमपि यः पठेत् । स वै देवादिकैर्वन्द्यो भविष्यति न संशयः ॥३१॥ मारणोच्चाटनादिभ्य एकविंशतिवारतः । तावद्दिनानि पाठेन तस्य नैव भयं भवेत् ॥३२॥ धनधान्यादिकं सर्वमारोग्यं पशुवर्धनम् । यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम्॥३३॥ इति पञ्चदेवैः कृता गणेशस्तुतिः ।। हिन्दी अर्थ सहित हे विघ्नों के राजा, आप अपने भक्तों के सभी विघ्नों को दूर करते हैं, आपको नमस्कार है। हे गणेश जी, जो अभक्तों के लिए विघ्न उत्पन्न करते हैं, आपको नमस्कार है।||१|| हे हेरम्ब, आप ढुंढि के राजा हैं, मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ। हे विनायक, देवताओं के स्वामी और ब्राह्मणों के नेता।||२|| हे सिद्धियों के स्वामी, आपका उदर लम्बा है और आप हाथी को धारण
।। उत्पातनाशन श्रीगणेश स्तोत्र ।।
।। उत्पातनाशन श्रीगणेश स्तोत्र ।। (हिन्दी अर्थ सहित) भगवान् गणेश समस्त विघ्नों का नाश करने वाले हैं तथा शुभ फल को साधकों को प्रदान करने वाले हैं। इनकी महिमा का वर्णन हमें अनेकों ग्रन्थों और पुराणों में प्राप्त होता है, उन्हीं में से एक समस्त उत्पातों के नाश के लिए श्रीगणेशपुराण में वर्णित उत्पातनाशनगणेशस्तोत्र है। इस स्तोत्र पाठ से समस्त उत्पातों का विनाश होता है। इस स्तोत्र के पाठ से उपासक को त्रिविध तापों से राहत प्राप्त होती है तथा भगवान् गणेश स्वयं इस स्तोत्र का पाठ करने वाले साधक की रक्षा करते हैं। नाथस्त्वमसि देवानां मनुष्योरगरक्षसाम्।।१।। यक्षगन्धर्वविप्राणां गजाश्वरथपक्षिणाम्। भूतभव्यभविष्यस्य बुद्धीन्द्रियगणस्यच।।२।। हर्षस्य शोकदुःखस्य सुखस्य ज्ञानमोहयोः। अर्थस्य कार्यजातस्य लाभहान्योस्तथैव च।।३।। स्वर्गपाताललोकानां पृथिव्या जलधेरपि। नक्षत्राणां ग्रहाणां च पिशाचानां च वीरुधाम्।।४।। वृक्षाणां सरितां पुंसां स्त्रीणां बालजनस्य च। उत्पत्तिस्थितिसंहारकारिणे ते नमो नमः।।५।। हे प्रभो ! आप देवता, मनुष्य, नाग, राक्षस, यक्ष, गन्धर्व, विप्र, गज, अश्व, रथ, पक्षी, भूत, वर्तमान, भविष्य, बुद्धि, इन्द्रियसमूह, हर्ष, शोक, दुःख, सुख, ज्ञान, मोह, अर्थ, समस्त कार्य, लाभ, हानि, स्वर्ग तथा पाताल आदि लोक, पृथ्वी, समुद्र, नक्षत्र, ग्रह, पिशाच, वनस्पति, वृक्ष, नदी, पुरुष, स्त्री एवं बालक-इन सभी के स्वामी हैं। सृष्टि, पालन तथा संहार करने वाले प्रभु आप [गणेश] को मेरा बारम्बार नमस्कार है। पशूनां पतये तुभ्यं तत्त्वज्ञानप्रदायिने। नमो विष्णुस्वरूपाय नमस्ते रुद्ररूपिणे।।६।। जीवरूपी पशुओं के पति तथा तत्त्वज्ञान प्रदान करनेवाले आपको नमस्कार है। विष्णुस्वरूप तथा रुद्रस्वरूप प्रभु आपको मेरा नमस्कार है। नमस्ते ब्रह्मरूपाय नमोऽनन्तस्वरूपिणे। मोक्षहेतो नमस्तुभ्यं नमो विघ्नहराय ते।।७।। ब्रह्मस्वरूप आपको नमस्कार है। अनन्तस्वरूप आपको नमस्कार है। हे मोक्षहेतो ! (मोक्ष को प्रदान करने वाले) आपको नमस्कार है। विघ्नों का नाश करने वाले आपको नमस्कार है। नमोऽभक्तविनाशाय नमो भक्तप्रियाय च। अधिदैवाधिभूतात्मंस्तापत्रयहराय ते।।८।। अभक्तों का नाश करने वाले आपको नमस्कार है तथा भक्तों के लिये प्रिय आपको नमस्कार है। सर्वोत्पातविघाताय नमो लीलास्वरूपिणे। सर्वान्तर्यामिणे तुभ्यं सर्वाध्यक्षाय ते नमः।।९।। हे प्रभु ! आप आधिदैविक, आधिभौतिक तथा आध्यात्मिक- इन तीनों प्रकार के तापों का हरण करने वाले आपको नमस्कार है। समस्त उपद्रवों का नाश करने वाले तथा लीलास्वरूप आपको नमस्कार है। आप सर्वान्तर्यामी को नमस्कार है। आप सर्वाध्यक्ष को नमस्कार है। अदित्या जठरोत्पन्न विनायक नमोऽस्तु ते। परब्रह्मस्वरूपाय नमः कश्यपसूनवे।।१०।। देवी अदिति के गर्भ से उत्पन्न हे विनायक ! आपको नमस्कार है। आप परब्रह्मस्वरूप कश्यपपुत्र को नमस्कार है। अमेयमायान्वितविक्रमाय मायाविने मायिकमोहनाय। अमेयमायाहरणाय माया- महाश्रयायास्तु नमो नमस्ते।।११।। अपरिमित माया से सम्पन्न पराक्रम वाले, मायास्वरूप, मायावियों को भी मोहित कर देने वाले, अपरिमेय माया का हरण कर लेने वाले तथा महामाया के आश्रयस्वरूप आपको बार-बार नमस्कार है। य इदं पठते स्तोत्रं त्रिसंध्योत्पातनाशनम्। न भवन्ति महोत्पाता विघ्ना भूतभयानि च।।१२।। जो मनुष्य तीनों सन्ध्याकालों में उपद्रवों का नाश करने वाले इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसे महान् उत्पात, विघ्न तथा भूत-प्रेत जनित भय नहीं होता। त्रिसंध्यं यः पठेत् स्तोत्रं सर्वान् कामानवाप्नुयात्। विनायकः सदा तस्य रक्षणं कुरुतेऽनघ।।१३।। जो तीनों सन्ध्याओं में इस स्तोत्र को पढ़ता है, वह समस्त वांछित फल प्राप्त करता है और हे अनघ ! विनायक गणेश सदा उसकी रक्षा करते हैं। ।। इति श्रीगणेशपुराणे उत्पातनाशनगणेशस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।।
श्री गणेशमहिम्न: स्तोत्र (श्रीपुष्पदन्तविरचितं)
भगवान श्री गणेश का अद्भुत स्तोत्र जिसके पठन के प्रभाव से होती है आपकी यात्रा सफल और होता है यात्रा का उद्देश्य सफल ! श्री गणेशमहिम्न: स्तोत्र (श्रीपुष्पदन्तविरचितं) भगवान् शिव एवं गणपति के अनन्य भक्त श्रीपुष्पदन्तजी द्वारा विरचित इस स्तोत्र में भगवान् गणेश की महिमा का विस्तृत वर्णन इकत्तीस (31) श्लोकों में किया गया है । स्तोत्र पाठ के लाभ :आत्मानन्द की प्राप्ति । यात्रा की निर्विघ्न पूर्ति तथा उद्देश्य की प्राप्ति । मोक्ष प्राप्ति । विद्या-ऐश्वर्य तथा धन की प्राप्ति । सुलक्षणा पत्नी एवं सुपुत्र की प्राप्ति । श्रीगणेशमहिम्न: स्तोत्र हिन्दी अर्थ सहित।। अनिर्वाच्यं रूपं स्तवननिकरो यत्र गणित स्तथा वक्ष्ये स्तोत्रं प्रथमपुरुषस्यात्र महतः। यतो जातं विश्वं स्थितमपि सदा यत्र विलयः स कीदृग्गीर्वाणः सुनिगमनुतः श्रीगणपतिः ॥१॥ श्रीगणेशजी का रूप अनिर्वचनीय है और जिनकी अनेक स्तुतियाँ की गयी हैं तथापि उन महत्तम परम पुरुष का स्तवन् करने को मैं उद्यत हूँ। जिनसे संसार की उत्पत्ति, स्थिति तथा संहारादि कार्य सदा होते रहते हैं, उन वेदवन्दित भगवान् श्रीगणपति की स्तुति वाणी से कैसे सम्भव है ? गणेशं गाणेशाः शिवमिति च शैवाश्च विबुधा, रविं सौरा विष्णुं प्रथमपुरुषं विष्णुभजकाः। वदन्त्येके शाक्ता जगदुदयमूलां परशिवां, न जाने किं तस्मै नम इति परं ब्रह्म सकलम् ॥२॥ जिन्हें भगवान् गणेश के भक्त गणेश कहते हैं, शिव के विद्वान् भक्त शिव कहते हैं, सूर्य के भक्त सूर्य कहते हैं, विष्णु के भक्त प्रथम पुरुष विष्णु कहते हैं, शक्ति की उपासना करने वाले जगत् की उत्पत्ति का मूल पराशक्ति शिवा कहते हैं, मुझे ज्ञात नहीं वे वस्तुतः क्या हैं ? उन सम्पूर्ण कलायुक्त परब्रह्म को मेरा नमस्कार है । तथेशं योगज्ञा गणपतिमिमं कर्म निखिलं, समीमांसा वेदान्तिन इति परं ब्रह्म सकलम् । अजां साङ्ख्यो ब्रूते सकलगुणरूपां च सततं प्रकर्तारं न्यायस्त्वथ जगति बौद्धा धियमिति ॥३॥ इन श्री गणपति को ही योग के तत्त्व को जानने वाले ईश्वर कहते हैं, पूर्वमीमांसक सम्पूर्ण कर्म कहते हैं, (उत्तर मीमांसक) वेदान्ती लोग पूर्ण परब्रह्म कहते हैं, सांख्यवादी सर्वगुणमयी अनादि प्रकृति कहते हैं, नैयायिक लोग संसार का कर्ता मानते हैं और बौद्ध लोग बुद्धि कहते हैं । कथं ज्ञेयो बुद्धेः परतर इयं बाह्यसरणिर्यथा धीर्यस्य स्यात्स च तदनुरूपो गणपतिः । महत्कृत्यं तस्य स्वयमपि महान् सूक्ष्ममणुवद् धृतिर्ज्योतिर्बिन्दुर्गगनसदृशः किञ्च सदसत् ॥४॥ उस परतर परमात्मा के वास्तविक रूप का ज्ञान बुद्धिगम्य नहीं है, क्योंकि यह बुद्धि के बाहर की बात है। जिसकी जैसी धारणा होती है, उसे गणपति उसी रूप में प्राप्त होते हैं। उनके कृत्य महान् हैं, वे स्वयं भी महत्तम तथा अणु से भी सूक्ष्मतम हैं। धृति, ज्योति, बिन्दु, आकाश आदि सब उन्हीं के रूप हैं। वे ही सत् तथा असत् रूप से सर्वत्र विद्यमान हैं । अनेकास्योऽपाराक्षिकरचरणोऽनन्तहृदय-स्तथा नानारूपो विविधवदनः श्रीगणपतिः । अनन्ताह्व: शक्त्या विविधगुणकर्मैकसमये त्वसङ्ख्यातानन्ताभिमतफलदोऽनेकविषये ॥५॥ श्री गणपति अनेक मुखों से युक्त हैं, अपार नेत्र, हाथ तथा चरणों वाले हैं, वे अनन्त हृदय वाले हैं, विविध रूपों वाले हैं, विविध प्रकार के मुखों वाले हैं, उनके न नामों का अन्त है और न शक्ति का अन्त है, क्योंकि नाना प्रकार के गुण एवं कर्मों का सम्पादन वे एक काल में करते हैं । अपने भक्तों को अनेक प्रकार के असंख्य, अनन्त मनोवांछित फल वे एक साथ प्रदान करते रहते हैं । न यस्यान्तो मध्यो न च भवति चादिः सुमहता- मलिप्तः कृत्वेत्थं सकलमपि खंवत् स च पृथक् । स्मृतः संस्मतॄणां सकलहृदयस्थः प्रियकरो नमस्तस्मै देवाय सकलसुरवन्द्याय महते ॥६॥ परमात्मास्वरूप श्रीगणेशजी का न आदि है, न अन्त है और न मध्य है। वे सब कुछ करते हुए भी आकाश की तरह अलिप्त रहते हैं । वे स्मरण करने वाले भक्तों द्वारा सदा वन्दित होकर उनके हृदयों में अन्तर्यामी रूप से विराजमान रहते हैं तथा उनका कल्याण करते रहते हैं। सभी देवताओं के वन्दनीय उन महान् देव को मेरा नमस्कार है । गणेशाद्यं बीजं दहनवनितापल्लवयुतं मनुश्चैकार्णोऽयं प्रणवसहितोऽभीष्टफलदः । सबिन्दुश्चाङ्गाद्यां गणकऋषिछन्दोऽस्य च निचृत्, स देवः प्राग्बीजं विपदपि च शक्तिर्जपकृताम् ॥७॥ हे गणेश ! आपका मूल बीजमन्त्र (गं) एकाक्षर है, जो बिन्दु, अंगादि और प्रणव के सहित अभीष्ट फल को प्रदान करता है। इस मन्त्र के ऋषि गणक, छन्द निचृत् एवं देवता गणपति हैं। विपत्तिकाल में बीजाक्षर सहित इस मन्त्र (ॐ गं गणपतये नमः) का जप करने से भक्तों को शक्ति प्राप्त होती है । गकारो हेरम्बः सगुण इति पुन्निर्गुणमयो, द्विधाऽप्येको जातः प्रकृतिपुरुषो ब्रह्म हि गणः । स चेशश्चोत्पत्तिस्थितिलयकरोऽयं प्रथमको, यतो भूतं भव्यं भवति पतिरीशो गणपतिः ॥८॥ गकार हेरम्ब (माता अम्बा के पुत्र) सगुण प्रकृति तत्त्व हैं और निर्गुण पुरुषतत्त्व भी हैं। एक होते हुए भी प्रकृति और पुरुष रूप में दो प्रकार से विभक्त हुआ वह ब्रह्म ही गण है। वे ही परमात्मा उत्पत्ति, स्थिति तथा प्रलय करने वाले हैं, वे गणपति ही आदिदेव हैं, जिनसे भूत, भविष्य तथा वर्तमान होते हैं, ये गणपति सबके पति तथा ईश हैं । गकारः कण्ठोर्ध्वं गजमुखसमो मर्त्यसदृशो णकारः कण्ठाधो जठरसदृशाकार इति च । अधोभागः कट्यां चरण इति हीशोऽस्य च तनु- र्विभातीत्थं नाम त्रिभुवनसमं भूर्भुवः सुवः ॥९॥ गजमुखाकार ‘ग’ कण्ठ के ऊर्ध्वभाग में स्थित मृत्युलोक सदृश है, ‘णकार’ जठराकार होकर कण्ठ के अधोभाग में स्थित है और शकार कटि के अधोभाग में चरण बनकर स्थित है। इस प्रकार श्रीगणपति का गणेश नाम भूर्भुवः तथा सुवरूप त्रिभुवन के समान सुशोभित हो रहा है । गणेशेति त्र्यर्णात्मकमपि वरं नाम सुखदं, सकृत्प्रोच्चैरुच्चारितमिति नृभिः पावनकरम् । गणेशस्यैकस्य प्रतिजपकरस्यास्य सुकृतं, न विज्ञातो नाम्नः सकलमहिमा कीदृशविधः ॥१०॥ तीन वर्णों का जो यह ‘गणेश’ ऐसा सुखद एवं सुन्दर नाम है, वह मनुष्यों के द्वारा एक बार भी उच्च स्वर से उच्चारण किये जाने पर उन्हें पवित्र कर देता है। एक बार भी ‘गणेश’ नाम का जप करने वाले का पुण्य फल नहीं जाना जा सकता है, तो उनके नाम की सम्पूर्ण महिमा कितनी है, इसे कौन जान सकता है । गणेशेत्याह्वां यः प्रवदति मुहुस्तस्य पुरतः, प्रपश्यंस्तद्वक्त्रं स्वयमपि गणस्तिष्ठति तदा । स्वरूपस्य ज्ञानं त्वमुक इति नाम्नास्य भवति, प्रबोधः सुप्तस्य त्वखिलमिह सामर्थ्यममुना ॥११॥ जिस भक्त की जिह्वा में ‘गणेश’ ऐसा नाम उच्चरित होता है, सम्पूर्ण गणरूपा सृष्टि उसके सामने उसके मुख की ओर बार-बार निहारती रहती है। इस नाम जप में स्वरूप ज्ञान कराने का ऐसा सामर्थ्य है – जैसे किसी सोये हुए व्यक्ति को उसका नाम लेकर पुकारने पर हो जाता है । गणेशो विश्वेऽस्मिन्स्थित इह च विश्वं गणपतौ गणेशो यत्रास्ते धृतिमतिरमैश्वर्यमखिलम् । समुक्तं नामैकं गणपतिपदं मङ्गलमयं तदेकास्यं दृष्टेः सकलविबुधास्येक्षणसमम् ॥१२॥ ब्रह्मरूप श्रीगणपति सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त हैं एवं सम्पूर्ण विश्व उन गणपति में व्याप्त है। जहाँ मूर्तिमान् श्रीगणेशजी अधिष्ठित होते हैं, वहाँ नैसर्गिक
मनोकामना पूर्ति स्तोत्र माॕंं त्रिवेणी स्तोत्र
।। त्रिशक्तिस्वरूपा श्रीत्रिवेणी स्तोत्र ।। (हिन्दी अर्थ सहित) तीर्थ राज प्रयाग में कल्पवास में अथवा कुंभ पर्व के अवसर पर वहां तीर्थ में स्नान व निवास करते हुए इस स्तोत्र का पाठ अवश्य करना चाहिए। इसके अतिरिक्त विश्व में कहीं भी रहते हुए भगवती त्रिवेणी लक्ष्मी और भगवान माधव नारायण का चिंतन ध्यान करते हुए इस स्तोत्र का पाठ त्रयतापो से मुक्त करता है।त्रिवेणी स्तोत्र-तीर्थराज प्रयाग में जहाँ गङ्गा यमुना सरस्वती मिलती हैं उसे त्रिवेणी कहते हैं । त्रिवेणी का वर्णन वेदों में भी आता है। स्त्रियों का सौभाग्य भी वेणी में ही होता है। चोटी को तीन लट पृथक करके गुथते हैं। पहिले तो वे तीनों पृथक-पृथक दीखती है, किन्त गुथने पर एक छिप जाती है दो ही दिखायी देती हैं। इसी प्रकार गङ्गा, यमुना सरस्वती तीनों मिलने पर सरस्वती गुप्त हो जाती है गङ्गा यमुना की दो धारा ही दिखायी देती हैं।यह पिण्ड तथा ब्रह्माण्ड त्रित्व पर ही अवलम्बित है। शरीर में भी इडा, पिङ्गला और सुषुम्ना जहाँ मिलती हैं, उसे त्रिवेणी कहते हैं। दोनों भौंहों के बीच में यह स्थान है। जहाँ ये मिलती हैं, उसे युक्त त्रिवेणी कहते हैं, जहाँ से फिर तीनों धारायें पृथक होती हैं उसे मुक्त त्रिवेणी कहते हैं। कलकत्ते के पास गङ्गा यमुना सरस्वती तीनों धारायें फिर पृथक होती है। वह स्थान भी त्रिवेणी के नाम से विख्यात है ‘त्रिवेणी’ नाम का वहाँ स्टेशन भी है। किन्तु प्राधान्य युक्तत्रिवेणी का ही है। जो पिण्ड में है वही ब्रह्माण्ड है। इसीलिये ब्रह्मा, विष्णु, महेश, सत्व, रज, तम इनसे ही सृष्टि होती है। त्रिवेणी में आधिभौतिक, आधिदैविक, और आध्यात्म ये तीनों ही भाव हैं। त्रिवेणीदेवी से ही सृष्टि होती है। त्रिवेणी ही सृष्टि की रक्षा करती हैं और अन्त में त्रिवेणी ही सबका संहार करती है। विश्व की सष्टि, स्थिति, लय त्रिवेणी पर ही अवलम्बित है। त्रिवेणी के रूप में त्रिगुणात्मिका आद्या महालक्ष्मी ही अवस्थित है। जो अपने उपासकों को पाप ताप शाप से मुक्त कर परमेश्वर सत्यनारायण ( वेणी माधव) से साक्षात्कार कराती है ।त्रिवेणी की एक उपासना ही त्रिशक्ति की उपासना है। यही बात इस स्तोत्र में बतायी गयी है। यह प्राचीन स्तोत्र बहुत ही दिव्य और महान है, इसकी रचना कब हुई और किसने की पता नहीं। किन्तु इसमें वर्णित भाव अतीव दिव्य है और त्रिवेणी के यथार्थ रूप को बतलाते हैं। हरि ॐ तत्सत्। श्री गणेशाय नमः। श्रीवेणीमाधवायनमः। श्रीत्रिवेणीदेव्यैनमः।। ॐ नमो नारायणाय वासुदेवाय। ॐ नमो भगवते त्रिवेणी माधवाय। ॐ श्रींं ह्री क्लीं ऐं सौ: त्रितापनाशिनी त्रिभुवन रूपिणी त्रिवेणी लक्ष्म्यै नमः। ॐ श्रीरुपायै च विद्महे, माधवप्रियायै धीमहि।तन्नो: त्रिवेणी: प्रचोदयात्।। ॐ महालक्ष्म्यै च विद्महे, मूलप्रकृत्यै धीमहि। तन्नो: भगवती: प्रचोदयात्।। ॐ आद्यायै च विद्महे, परमेश्वर्यै धीमहि। तन्नो: नारायणी: प्रचोदयात्।। ॐ काराब्ज निवासमत्त मधुपामुद्यान पीठस्थितांॐ कारागण काम कल्पलतिकामोजीस्वनी मौषधीम्। ॐ कारेश्वर केवल प्रिय सखी मोंकार नाद प्रियाम्ॐ कार प्रभवां विचित्र विभवां देवीं त्रिवेणी भजे।।१।। भावार्थ-जो ॐकार रूपी कमल वाटिका के पीठ पर मस्त भौरों की तरह निवास करती हैं, ॐकार के उपासकों की कामना सिद्ध करने के लिये कल्पवृक्ष के समान हैं, तेजोवर्धक औषधि के तुल्य हैं, ॐकारेश्वर (कृष्ण ) की एकमात्र प्रियसखी हैं, जिन्हें ॐ कार शब्द प्रिय है, ॐ कार से जिनकी उत्पत्ति हुई है और जो विचित्र ऐश्वर्यशालिनी हैं, ऐसे त्रिवेणी देवी की मैं वन्दना करता हूँ। अद्वैतांमभिवांक्षितार्थ फलदाम ब्याहता मव्ययाम्अष्टैश्वर्य करामनन्त जयदामब्जस्थितामक्षरीम्। आब्धि ग्रासनुतामशेष जननी मर्काग्नि कोटिप्रभाम्अज्ञानान्ध हरामपार करुणां देवीं त्रिवेणी भजे।।२।। भावार्थ-जो अद्वैत स्वरूपा, मनोवांछित फलदायिनी, अव्याहत गतिवाली, अविनाशिनी, आठों सिद्धियों को देनेवाली, सदा विजय प्राप्त करानेवाली, कमल पर स्थित अक्षर स्वरूपा हैं, जिनकी स्तुति अगस्तजी किया करते हैं, जो जगजननी हैं करोडों सूर्य एवं अग्नि के समान चमकनेवाली हैं, अज्ञान रूपी अन्धकार का नाश करनेवाली हैं, और जो अपार करुणामयी हैं, ऐसे त्रिवेणी देवी की मैं वन्दना करता हूँ। आम्नायागम सेविताघि युगलामापीनुत्तुङ्गस्तनीम्आपोज्योति रसाभिपूर्ण लहरी मानंद संधायिनीम्। आधारामरुणामनेक कुशलामाकार संशोभिताम्आदिक्षान्त समस्त वर्ण निलयां देवीं त्रिवेणींभजे।।३।। भावार्थ-जिनके दोनों चरणों की सेवा वेद और तन्त्रशास्त्र किया करते हैं, स्तन स्थूल एवं उत्तुङ्ग हैं, जिनका जल निर्मल स्वादिष्ट तथा तरङ्गों से युक्त है, जो आनन्द देनेवाली हैं, सबको धारण करनेवाली हैं, जिनका वर्ण लाल है, जो अनेक कार्यों में कुशल हैं, जिनकी आकृति सुन्दर है, और जो ‘अ’ से लेकर ‘क्ष’ तक के सभी अक्षरों के आधार है, ऐसे त्रिवेणीदेवी की मैं वन्दना करता हूँ। इष्टानिष्ट विवर्जिता मिह पर स्वामैक्य सौख्य प्रदांइच्छासिद्धि विलास वैभव परामिच्छा क्रिया संयुताम्। इच्छा शक्ति धनुश्शराभि दधतीं मिन्द्रार्चिता मिंदिराम्इष्टावाप्त वरिष्ठ वाक् प्रकरिणीं देवी त्रिवेणींभजे।।४।। भावार्थ-जो अच्छे और बुरे अपने और पराये के भेदभाव से दूर है। तथा सुख प्रदान करानेवाली एकमात्र स्वामिनी है, इच्छा शक्ति विलास-वैभव से सम्पन्न यथेच्छ आचरण करनेवाली हैं, इच्छाशक्ति रूपी धनुष और बाण को धारण करती है, इन्द्र जिनकी पूजा करते हैं, जो धन तथा मनोकामना पूर्ण करती है। जिनकी वाणी बड़ी ही ओजस्विनी है, ऐसे त्रिवेणीदेवी की में वन्दना करता हूँ ॥४॥ ईपत्स्मरे विराजमान वदना मीशान दैवार्चिताम्ईशित्वादि समस्त सिद्धि सहिता मींकार वर्णातिकाम्। ईशां काम कलां विशुद्धमनसां विश्वेश्वरीमीश्वरीम्ईषंत्री सकलार्थ दीपन करीं देवीं त्रिवेणी भजे।।५।। भावार्थ-जिनका मुख मन्द मन्द मुस्कान से सुशोभित है, शङ्कर जिनका पूजन करते हैं, जो ‘ईशित्व’ (सबको वश में रखना) आदि सम्पूर्ण सिद्धियों से युक्त हैं, जिनका स्वरूप इकार अक्षरमय है, जो सबकी स्वामिनी है, काम की कला हैं, पवित्र अन्तःकरण वाली हैं, विश्व की शासिका हैं, ईश्वरी हैं, तथा सकल पदार्थों को प्रकाशित करनेवाली, ऐसे त्रिवेणीदेवी की में वन्दना करता हूँ। उत्फुल्लारुण पद्मनेत्र युगला मुद्दण्ड दैत्यापहाम्उद्योतोज्ज्वल तीर्थराज रमणी मुल्लास तेजोवतीम्। उत्कर्षाभयदान पेशलकरा मुच्छास शक्तिप्रदाम्म उर्वस्यार्चित पादुकां पर कलां देवीं त्रिवेणींभजे।।६।। भावार्थ-प्रस्फुटित लाल कमल के समान जिनके नेत्र हैं, जो उद्दण्ड दैत्यों को नाश करनेवाली हैं, प्रभा से विलसित हैं, तीर्थराज प्रयाग की प्रिया है, उल्लास और तेज से युक्त हैं, उत्कर्ष एवं अभयदान देने में सिद्धहस्त हैं, जीवनशक्ति प्रदान करनेवाली हैं, जिनके खड़ाऊँ की पूजा उर्वशी करती है तथा जो उत्कृष्ट कला स्वरूपा हैं, ऐसे त्रिवेणीदेवी की मैं वन्दना करता हूँ। ऊर्ध्वश्रोत परा सरां त्रिनयना मूर्ध्वस्वरा मूर्ध्वगामऊर्ध्वाश्वास सुषुम्नमार्ग गमना मूर्ध्वेज्वल ज्वालिनीम्। ऊर्ध्वाधः परिपूर्णधाम लहरी मूर्ध्वप्रभां भास्वराम्ऊर्ध्वस्थान निवासिनीं शुभ करीं देवीं त्रिवेणींभजे।।७।। भावार्थ-जो ऊर्ध्वगामी प्रवाह से युक्त हैं, जिनके तीन नेत्र हैं, जिनका स्वर ऊर्ध्व है, जो ऊर्ध्वगामिनी है, ऊध्र्व-उच्छवास एवं सुषुम्ना नाड़ी के मार्ग से गमन करनेवाली हैं, ऊपर को उठने वाली भास्वर ज्वाला से दैदीप्यमान है, ऊपर और नीचे अत्यन्त तेज तरङ्गों से व्याप्त है, ऊध्र्व कान्तिवाली है, जाज्वल्यमान हैं, ऊर्ध्व स्थान में निवास करनेवाली है, तथा शुभ