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सनातन धर्म (Sanatan Dharm)

जिसका न आदि है न अंत, वही है सनातन । श्रीमद्भगवद्गीता के अनुसार, सनातन धर्म का मतलब है शाश्वत धर्म यानी जो सदा बना रहता है. यह धर्म, परमात्मा और आत्मा दोनों से जुड़ा है. सनातन धर्म, जीवन जीने का तरीका बताता है. यह एक आचार संहिता है जो नैतिकता पर आधारित है. गीता के अनुसार, सनातन धर्म से जुड़ी बातें: सनातन धर्म में परमात्मा और आत्मा दोनों को सनातन माना गया है. सनातन धर्म में सभी चीज़ें सनातन हैं और यह अनादिकाल से हैं. सनातन धर्म में धर्म की किसी भी सांप्रदायिक प्रक्रिया का समावेश नहीं होता. सनातन धर्म, परमेश्वर के साथ शाश्वत जीवों के शाश्वत संबंध को दर्शाता है. सनातन धर्म, जीवन की प्रेरणा है. सनातन धर्म, सही और गलत का विचार कर अपने कर्मों और कर्तव्यों का पालन करने का मार्गदर्शन करता है. सनातन धर्म, मानवता के लिए एक जाति, एक धर्म और एक ईश्वर का सिद्धांत है. सनातन धर्म, आध्यात्मिक समानता को अस्तित्वगत दायित्व के रूप में पुष्ट करता है. यहा इन पवित्र ग्रंथों को किसने लिखा बताया गया है 1-अष्टाध्यायी– पाणिनी 2-रामायण —वाल्मीकि 3-महाभारत —वेदव्यास 4-अर्थशास्त्र —चाणक्य 5-महाभाष्य —पतंजलि 6-सत्सहसारिका सूत्र —नागार्जुन 7-बुद्धचरित —अश्वघोष 8-सौंदरानन्द —अश्वघोष 9-महाविभाषाशास्त्र— वसुमित्र 10- स्वप्नवासवदत्ता —भास 11-कामसूत्र —वात्स्यायन 12-कुमारसंभवम् —-कालिदास 13-अभिज्ञानशकुंतलम् — कालिदास 14-विक्रमोउर्वशियां—- कालिदास 15-मेघदूत —- कालिदास 16-रघुवंशम्—- कालिदास 17-मालविकाग्निमित्रम्—- कालिदास 18-नाट्यशास्त्र —-भरतमुनि 19-देवीचंद्रगुप्तम—- विशाखदत्त 20-मृच्छकटिकम् —-शूद्रक 21-सूर्य सिद्धान्त —आर्यभट्ट 22-वृहतसिंता—- बरामिहिर 23-पंचतंत्र —-विष्णु शर्मा 24-कथासरित्सागर —-सोमदेव 25-अभिधम्मकोश— वसुबन्धु 26-मुद्राराक्षस— विशाखदत्त 27-रावणवध—- भटिट 28-किरातार्जुनीयम्—- भारवि 29-दशकुमारचरितम्—- दंडी 30-हर्षचरित —-वाणभट्ट 31-कादंबरी —–वाणभट्ट 32-वासवदत्ता —-सुबंधु 33-नागानंद —-हर्षवधन 34-रत्नावली —–हर्षवर्धन 35-प्रियदर्शिका —-हर्षवर्धन 36-मालतीमाधव —-भवभूति 37-पृथ्वीराज —-विजय जयानक 38-कर्पूरमंजरी—- राजशेखर 39-काव्यमीमांसा—- राजशेखर 40-नवसहसांक चरित —-पदम् गुप्त 41-शब्दानुशासन— राजभोज 42-वृहतकथामंजरी—- क्षेमेन्द्र 43-नैषधचरितम —-श्रीहर्ष 44-विक्रमांकदेवचरित—- बिल्हण 45-कुमारपालचरित—– हेमचन्द्र 46-गीतगोविन्द —–जयदेव 47-पृथ्वीराजरासो —–चंदरवरदाई 48-राजतरंगिणी—– कल्हण 49-रासमाला—– सोमेश्वर 50-शिशुपाल वध—- माघ 51-गौडवाहो—- वाकपति 52-रामचरित—- सन्धयाकरनंदी 53-द्वयाश्रय काव्य —- हेमचन्द्र वेद-ज्ञान:- प्र.1- वेद किसे कहते है ? उत्तर- ईश्वरीय ज्ञान की पुस्तक को वेद कहते है। प्र.2- वेद-ज्ञान किसने दिया ? उत्तर- ईश्वर ने दिया। प्र.3- ईश्वर ने वेद-ज्ञान कब दिया ? उत्तर- ईश्वर ने सृष्टि के आरंभ में वेद-ज्ञान दिया। प्र.4- ईश्वर ने वेद ज्ञान क्यों दिया ? उत्तर- मनुष्य-मात्र के कल्याण के लिए। प्र.5- वेद कितने है ? उत्तर- चार । 1-ऋग्वेद 2-यजुर्वेद 3-सामवेद4-अथर्ववेद प्र.6- वेदों के ब्राह्मण ? वेद ब्राह्मण 1 – ऋग्वेद – ऐतरेय 2 – यजुर्वेद – शतपथ. 3 – सामवेद – तांड्य. 4 – अथर्ववेद – गोपथ प्र.7- वेदों के उपवेद कितने है? उत्तर – चार। वेद उपवेद 1- ऋग्वेद – आयुर्वेद 2- यजुर्वेद – धनुर्वेद 3 -सामवेद – गंधर्ववेद 4- अथर्ववेद – अर्थवेद प्र 8- वेदों के अंग कितने हैं ? उत्तर – छः । 1 – शिक्षा 2 – कल्प 3 – निरूक्त 4 – व्याकरण 5 – छंद 6 – ज्योतिष | प्र.9- वेदों का ज्ञान ईश्वर ने किन -किन ऋषियो को दिया ?उत्तर- चार ऋषियों को। वेद ऋषि 1- ऋग्वेद – अग्नि 2 – यजुर्वेद – वायु 3 – सामवेद – आदित्य 4 – अथर्ववेद – अंगिरा प्र.10- वेदों का ज्ञान ईश्वर ने ऋषियों को कैसे दिया ? उत्तर- समाधि की अवस्था में। प्र.11- वेदों में कैसे ज्ञान है ? उत्तर- सब सत्य विद्याओं का ज्ञान-विज्ञान। प्र.12- वेदो के विषय कौन-कौन से हैं ? उत्तर- चार । ऋषि विषय. 1- ऋग्वेद – ज्ञान. 2- यजुर्वेद – कर्म. 3- सामवेद – उपासना 4- अथर्ववेद – विज्ञान | प्र.13- वेदों में। १) ऋग्वेद में मंडल – 102 अष्टक – 083 सूक्त – 10284 अनुवाक – 85 ऋचाएं – 10589 २) यजुर्वेद में अध्याय – 402 मंत्र – 1975 ३) सामवेद में आरचिक – 062 अध्याय – 063 ऋचाएं – 1875 ४) अथर्ववेद में कांड – 202 सूक्त – 7313 मंत्र – 5977 प्र.14- वेद पढ़ने का अधिकार किसको है ? उत्तर- मनुष्य-मात्र को वेद पढ़ने का अधिकार है। प्र.15- क्या वेदों में मूर्तिपूजा का विधान है ? उत्तर- बिलकुल भी नहीं। प्र.16- क्या वेदों में अवतारवाद का प्रमाण है ? उत्तर- नहीं। प्र.17- सबसे बड़ा वेद कौन-सा है ? उत्तर- ऋग्वेद। प्र.18- वेदों की उत्पत्ति कब हुई ? उत्तर- वेदो की उत्पत्ति सृष्टि के आदि से परमात्मा द्वारा हुई । अर्थात 1 अरब 96 करोड़ 8 लाख 43 हजार वर्ष पूर्व । प्र.19- वेद-ज्ञान के सहायक दर्शन-शास्त्र ( उपअंग ) कितने हैं और उनके लेखकों का क्या नाम है ? उत्तर- 1- न्याय दर्शन – गौतम मुनि। 2- वैशेषिक दर्शन – कणाद मुनि। 3- योगदर्शन – पतंजलि मुनि। 4- मीमांसा दर्शन – जैमिनी मुनि। 5- सांख्य दर्शन – कपिल मुनि। 6- वेदांत दर्शन – व्यास मुनि। प्र.20- शास्त्रों के विषय क्या है ? उत्तर- आत्मा, परमात्मा, प्रकृति, जगत की उत्पत्ति, मुक्ति अर्थात सब प्रकार का भौतिक व आध्यात्मिक ज्ञान-विज्ञान आदि। प्र.21- प्रामाणिक उपनिषदे कितनी है ? उत्तर- केवल ग्यारह। प्र.22- उपनिषदों के नाम बतावे ? उत्तर- 01-ईश ( ईशावास्य ) 02-केन 03-कठ 04-प्रश्न 05-मुंडक 06-मांडू 07-ऐतरेय 08-तैत्तिरीय 09-छांदोग्य 10-वृहदारण्यक 11-श्वेताश्वतर । प्र.23- उपनिषदों के विषय कहाँ से लिए गए है ? उत्तर- वेदों से। प्र.24- चार वर्ण। उत्तर- 1- ब्राह्मण. 2- क्षत्रिय. 3- वैश्य. 4- शूद्र प्र.25- चार युग। 1- सतयुग – 17,28000 वर्षों का नाम ( सतयुग ) रखा है।2- त्रेतायुग- 12,96000 वर्षों का नाम ( त्रेतायुग ) रखा है।3- द्वापरयुग- 8,64000 वर्षों का नाम है। 4- कलयुग- 4,32000 वर्षों का नाम है।कलयुग के 5122 वर्षों का भोग हो चुका है अभी तक।4,27024 वर्षों का भोग होना है। पंच महायज्ञ 1- ब्रह्मयज्ञ 2- देवयज्ञ 3- पितृयज्ञ 4- बलिवैश्वदेवयज्ञ 5- अतिथियज्ञ स्वर्ग – जहाँ सुख है। नरक – जहाँ दुःख है। भगवान शिव के”35″ रहस्य!! भगवान शिव अर्थात पार्वती के पति शंकर जिन्हें महादेव, भोलेनाथ, आदिनाथ आदि कहा जाता है | 1. आदिनाथ शिव : – सर्वप्रथम शिव ने ही धरती पर जीवन के प्रचार-प्रसार का प्रयास किया इसलिए उन्हें ‘आदिदेव’ भी कहा जाता है। ‘आदि’ का अर्थ प्रारंभ। आदिनाथ होने के कारण उनका एक नाम ‘आदिश’ भी है। 2. शिव के अस्त्र-शस्त्र : – शिव का धनुष पिनाक, चक्र भवरेंदु और सुदर्शन, अस्त्र पाशुपतास्त्र और शस्त्र त्रिशूल है। उक्त सभी का उन्होंने ही निर्माण किया था। 3. भगवान शिव का नाग : – शिव के गले में जो नाग लिपटा रहता है उसका नाम वासुकि है। वासुकि के बड़े भाई का नाम शेषनाग है। 4. शिव की अर्द्धांगिनी

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जन्म कुंडली में चतुर्थ भाव (4th house in birth chart)

ज्योतिष में चतुर्थ भाव मानसिक शांति, घर, वैभव, परिवार, वाहन, प्रारंभिक शिक्षा और माता का प्रतिनिधित्व करता है। यह भाव भावनाओं, आंतरिक सुरक्षा, भूमि और पैतृक विरासत का भी संकेत देता है। काल पुरुष कुंडली के अनुसार, कर्क राशि स्वाभाविक रूप से चतुर्थ भाव की स्वामी होती है, और चंद्रमा इसका अधिपति ग्रह है।चतुर्थ भाव में चंद्रमा की स्थिति अत्यंत शुभ मानी जाती है। यदि यह पीड़ित न हो, तो व्यक्ति को सकारात्मक सोच, मानसिक शक्ति, गहरी समझ और परिपक्वता का आशीर्वाद मिलता है।यहाँ चंद्रमा व्यक्ति को उसकी माँ के प्रति गहरा लगाव देता है। माँ दयालु हो सकती हैं, दूसरों की मदद करने वाली हो सकती हैं, या सामाजिक सेवा से जुड़ी हो सकती हैं। चतुर्थ भाव में शुभ स्थिति में स्थित चंद्रमा भावनात्मक संतुलन और आंतरिक सुरक्षा प्रदान करता है। हालाँकि, यदि चंद्रमा कमजोर हो या शनि, राहु या मंगल से पीड़ित हो, तो व्यक्ति चिंता, मूड स्विंग( Mood swing) या अवसाद का अनुभव कर सकता है। यदि केतु भी प्रभाव में हो, तो ऐसे ही समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं, लेकिन ध्यान के माध्यम से इन्हें नियंत्रित किया जा सकता है। यदि चतुर्थ भाव में चंद्रमा का संबंध बृहस्पति या शुक्र से हो, तो यह व्यक्ति की अंतर्ज्ञान, रचनात्मकता और संवेदनशीलता को बढ़ाता है। ऐसा व्यक्ति गहरी भावनात्मक बुद्धि रखता है और भौतिक संसार से परे चीजों को समझने की क्षमता रखता है।. चतुर्थ भाव में चंद्रमा मनोविज्ञान, सामाजिक सेवा, रियल एस्टेट और इंटीरियर डिजाइन से जुड़े करियर में सफलता दिला सकता है। व्यक्ति घर से काम कर सकता है या अपने मातृभूमि से जुड़ा कोई पेशा अपना सकता है। नाड़ी ज्योतिष में चतुर्थ भाव पिछले जन्म के कर्म और भावनात्मक ऋणों का प्रतिनिधित्व करता है। मजबूत चंद्रमा पारिवारिक रूप से सकारात्मक कर्म दर्शाता है, जबकि कमजोर या पीड़ित चंद्रमा अव्यवस्थित भावनात्मक बोझ का संकेत दे सकता है।यदि चंद्रमा द्विस्वभाव राशि (मिथुन, कन्या, धनु या मीन) में हो, तो व्यक्ति अक्सर स्थान परिवर्तन या यात्रा कर सकता है। नाड़ी ज्योतिष में, यह स्थिति ऐसे करियर का संकेत भी दे सकती है, जिसमें बार-बार यात्रा करनी पड़ती हो। Get your horoscope reading, Understand your birth chart, Astrology solutions for life problems , Astrological guidance for relationships, Learn about Vedic astrologyFree astrology predictions , Vedic astrology services , Astrology consultation online, Best astrologer in India, Astrology advice for career growthCareer astrology , Love astrology , Marriage astrology , Financial astrology , Health astrology , Vastu Shastra , NumerologyAstrology , Vedic astrology , Jyotish , Horoscope , Astrology predictions

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अपार धन समृद्धि प्राप्ति हेतु करें यह उपाय Dhan prapti ke liye upay

सुख समृधि प्राप्ति हेतु ज्योतिष उपाय और टोटके Sukh samruddhi prapti ke liye upay प्रत्येक घर में चित्र कैलेंडर लगाए जाते है ये सुंदर और प्रेरक होने चाहिए, जैसे अर्जुन को उपदेश देते श्री कृष्ण का चित्र ,पेड़-पौधों, महापुरुषों या आराध्य देव के चित्र लगाने से शुभत्व की वृद्धि होती है। युद्ध खुनखराबे, हिंसक पशु, बीमत्स चित्र कभी नहीं लगाने चाहिए। अपने घर में पवित्र नदियों का जल संग्रह करके रखना चाहिए। इसे घर के ईशान कोण में रखने से अधिक लाभ होता है। रात्रि में नाखून या बाल नहीं काटना चाहिए। अक्सर लोगों से सुनने में आता है कि घर मे कमाई तो बहुत है. पर पैसा नहीं टिकता तो यह प्रयोग करे जब गेहू को पिसवाने जाते है. तो उससे पहले 11 पत्ते तुलसी तथा 2 दाने केसर के डाल कर थोड़े से गेहूं को सारे गेहू में मिला कर पिसवा लें फिर घर में धन की कमी नहीं रहेगी तथा घर में बरकत रहेगी। यह क्रिया सोमवार और शनिवार को करनी है। रविवार के दिन पुष्य नक्षत्र हो तब गूलर के वृक्ष की जड़ प्राप्त करके घर लाए इसे धूप, दीप करके धन स्थान पर रख दें। यदि इसे धारण करना चाहे तो स्वर्ण के ताबीज में भर कर धारण कर लें जब तक यह ताबीज पास रहेगी, तब तक कोई कमी न आएगी घर में संतान सुख उत्तम रहेगा। यश की प्राप्ति होती रहेगी। धन-संपदा भरपूर होगे। सुख-शांति और संतुष्टि की प्राप्ति होगी। जिन व्यक्तियों को लाख प्रयत्न करने पर भी स्वयं का मकान न बन पा रहा हो वे इस टोटके को अपनाएं प्रत्येक शुक्रवार को नियम से किसी भूखे को भोजन कराएं और रविवार के दिन गाय को गुड खिलाएं। ऐसा नियमित करने से अपनी अचल संपत्ति बनेगी या कोई पैतृक संपत्ति प्राप्त होगी। अगर संभव हो तो प्रातः काल स्नान-ध्यान के पश्चात निम्न मंत्र का जाप करे मंत्र इस प्रकार है “ॐ ह्रीं श्रीं पद्मावती पद्मनेत्रे पद्मासने लक्ष्मी सौभाग्यदा नमः”. यह प्रयोग नव रात्रि के दिनों में अष्टमी तिथि को किया जाता है। प्रातः काल उठ कर पूजा स्थल में गंगा जल, कुआ जल, बोरिंग जल में से जो उपलब्ध हो, उसके छींटे लगाए एक पाटे के ऊपर दुर्गा जी के चित्र के सामने पूर्व में मुंह करते हुए उस पर कुछ सिक्के रखे सिक्कों पर रोली, लाल चंदन एवं एक गुलाब का साबुत पुष्प चढाएं माता से प्रार्थना करें इन सबको उठा कर पोटली बांध कर अपने गल्ले, संदूक अलमारी में रख दे यह टोटका हर 6 माह बाद पुनः करना चाहिए। एक गुलाब का फूल चढ़ाने से ही लक्ष्मी ( Lakshmi) की प्रसन्नता का अनुभव साधक को होने लग जाता है। निम्न मंत्र का नियमित जाप भी आर्थिक संपन्नता देने वाला है। “ॐ यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धन धान्याधिपतये धन-धान्य समृद्धिम मे देहि दापय स्वाहा”इस मंत्र का जाप करते हुए बेसन से लड्डू या केशर की बर्फी का भोग लगाना चाहिए तथा थोडा गंगा जल जाप करते हुए पास में रखें जाप पूरा होने के बाद (कम से कम 108 बार १ माला) गंगा जल व्यापार स्थल की दीवार पर छिड़क दें तथा मिठाई बच्चों में बांट दें यह व्यापारी लोगों को विशेष लाभ देने वाली साधना है। घर में समृद्धि लाने हेतु घर के उत्तर-पश्चिम के कोण में सुंदर से मिट्टी के बर्तन में कुछ सोने-चांदी के सिक्के लाल कपड़े में बांधकर रखे। फिर बर्तन को गेहूं या चावल से भर दें। ऐसा करने से घर में धन का अभाव नहीं रहेगा। व्यक्ति को ऋण मुक्त कराने में यह टोटका अवश्य सहायता करेगा मंगलवार को शिव मंदिर में जाकर शिवलिंग पर मसूर की दाल “ऋण मुक्तेश्वर महादेवाय नमः” मंत्र बोलते हुए चढ़ाए। घर में स्थायी सुख-समृद्धि हेतु पीपल के वृक्ष की छाया में खड़े रहकर लोहे के बर्तन में जल, चीनी, घी एवं दूध मिलाकर पीपल के वृक्ष की जड़ में डालने से घर में लंबे समय तक सुख-समृद्धि रहती है और लक्ष्मी ( Laxmi) का वास होता है।

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राशि अनुसार धारण करें यह रत्न होगा बड़ा लाभ! Rashi anusar dharan kare ratna hoga labh

रत्न सबके लिए नहीं होता। वे प्राकृतिक वस्तु न वस्तु प्राणवान ऊर्जा के स्रोत के रूप में कार्य करते हैं। लेकिन उनका चयन अपने लिए अपनी राशि के अनुसार करना चाहिए, अन्यथा रत्न किसी भी सीमा तक विपरीत प्रभाव डाल सकता है। रत्न बड़े प्रभावशाली होते हैं। यदि ज्योतिष व योगकारक रत्नों को उपयुक्त समय में रीति से जाग्रत कर धारण किया जाए तो मोटा लाभ प्राप्त किया जा सकता है। रत्न विशेष की अंगूठी में स्थापित धातु में धारक धारण करने से विशेष लाभ होता है। जानिए शुभ रत्न के अनुसार :- मेष :- इस लग्न वाले जातकों का अनुकूल रत्न मूंगा है एक शुक्ल पक्ष में किसी भी मंगलवार को मंगल की होरा में निम्न मंत्र से जाग्रत कर सोने में अनामिका मूल धारण करना चाहिए। मंत्र- ऊँ भयौ भौमाय नमः लाभ :- मूंगा धारण करने से रक्त साफ होता है और रक्त, साहस और बल में वृद्धि होती है, महिलाओं के शीघ्र विवाह में सहयोग मिलता है, प्रेत बाधा से मुक्ति मिलती है। बच्चों में नजर दोष दूर होता है। स्कॉर्पियो ( Scorpio) वाले भी इसे धारण कर सकते हैं। वृषभ :- इस कुंडली वाले जातकों के लिए उपयुक्त रत्न हीरा और राजयोग कारक रत्न तितली है। हीरा को शुक्ल पक्ष में किसी शुक्रवार को शुक्र की होरा में जाग्रत कर धारण करना चाहिए। मंत्र- ऊँ शुं शुक्राय नमः लाभ :- हीरा धारण करने से स्वास्थ्य एवं साहस प्रदान करता है। विचारशील कार्य है। शीघ्र विवाह कराता है। अग्नि भय और चोरी से पूछताछ है। महिलाओं में गर्भपात के रोग दूर होते हैं। पुरुषों में वीर्य दोष होता है। कहा जाता है कि जिन महिलाओं के बेटे की इच्छा होती है उन्हें हीरा धारण नहीं करना चाहिए, जिन महिलाओं को बेटे की चाहत है या जिनके बेटे को संतान की चाहत है उन्हें परीक्षण के लिए हीरा धारण करना चाहिए। इसे तुला( Vergo) राशि वाले जातक भी धारण कर सकते हैं। मिथुन राशि :- इस लग्न वाले जातकों के लिए उपयुक्त रत्न पन्ना है जिसे रविवार को बुध की होरा में निम्न मंत्र से जाग्रत कर लेना चाहिए। मंत्र- ऊँ बुं बुधाय नमः लाभ :- पारिश्रमिक दूर कर शांति प्रदान करता है। गाँव में सफलता की दुकान है। खांसी और अन्य गले की प्रयोगशाला को दूर किया जाता है। चंचल चित्तब्रित्तियों को शांत करता है। इसे धारण करने से एकाग्रता विकसित होती है। काम, क्रोध आदि मानसिक विकारों को दूर करके अत्यंत शांति बनी हुई है। कन्या राशि वाले जातक भी इसे धारण कर सकते हैं।* कर्क :- इस लग्न वाले जातकों के लिए उपयुक्त रत्न मोती है जिसे सोमवार के दिन प्रातः चंद्र की होरा में धारण करना चाहिए। सबसे पहले रत्न को इस मंत्र से जाग्रत कर लेना चाहिए। मंत्र- ऊँ सों सोमाय नमः लाभ :- मोती धारण करने से स्मरण शक्ति प्राप्त होती है। बल, विद्या और बुद्धि में वृद्धि होती है। क्रोध और मानसिक तनाव शांति होती है। इन्सोना, दांत और मूत्र रोग में लाभ होता है। यदि यह मूंगा भी धारण करता है तो अत्यंत लाभ देता है क्योंकि इस जातक का राजयोग कारक रत्न उत्पन्न होता है। सिंह :- इस लग्न वाले जातकों का अनुकूल रत्न माणिक्य है। इसे रविवार को प्रातः रवि की होरा में निम्न मंत्र से जाग्रत कर धारण करना चाहिए। मंत्र- ऊँ घृणि सूर्याय नमः लाभ :- माणिक्य धारण करने से साहस में वृद्धि होती है। भय, दुःख और अन्य व्याधियों का नाश होता है। नौकरी में उच्चपद व प्रतिष्ठा प्राप्त होती है। अस्थि विकार और सिर दर्द की समस्या से संबंधित संबंध है। कन्या :- इस लग्न वाले जातकों के लिए उपयुक्त रत्न पन्ना है जिसे रविवार को बुध की होरा में निम्न मंत्र से जाग्रत कर लेना चाहिए। मंत्र- ऊँ बुं बुधाय नमः। लाभ :- पारिश्रमिक दूर कर शांति प्रदान करता है। गाँव में सफलता की दुकान है। खांसी और अन्य गले की प्रयोगशाला को दूर किया जाता है। चंचल चित्तब्रित्तियों को शांत करता है। इसे धारण करने से एकाग्रता विकसित होती है। काम, क्रोध आदि मानसिक विकारों को दूर करके अत्यंत शांति बनी हुई है। कन्या राशि वाले जातक भी इसे धारण कर सकते हैं। इस राशिफल के लिए पन्ना, हीरा, नीलकंठ रत्न शुभ होते हैं। तुला :- इस लग्न वाले जातकों के लिए उपयुक्त रत्न हीरा और राजयोग कारक रत्न नीलम है। हीरा को शुक्ल पक्ष में किसी शुक्रवार को शुक्र की होरा में जाग्रत कर धारण करना चाहिए। मंत्र- ऊँ शुं शुक्राय नमः। लाभ :- हीरा धारण करने से स्वास्थ्य एवं साहस प्रदान करता है। विचारशील कार्य है। शीघ्र विवाह कराता है। अग्नि भय और चोरी से पूछताछ है। महिलाओं में गर्भपात के रोग दूर होते हैं। पुरुषों में वीर्य दोष होता है। कहा जाता है कि जिन महिलाओं के बेटे की इच्छा होती है उन्हें हीरा धारण नहीं करना चाहिए, जिन महिलाओं को बेटे की चाहत है या जिनके बेटे को संतान की चाहत है उन्हें परीक्षण के लिए हीरा धारण करना चाहिए। इस राशि वालो को लाभदायक हीरा, ओपल भी है। वृश्चिक :- इस लग्न वाले जातकों का अनुकूल रत्न मूंगा है एक शुक्ल पक्ष में किसी भी मंगलवार को मंगल की होरा में निम्न मंत्र से जाग्रत कर सोने में अनामिका मूल धारण करना चाहिए। मंत्र- ऊँ ऐं भौमाय नमः। लाभ :- मूंगा धारण करने से रक्त साफ होता है और रक्त, साहस और बल में वृद्धि होती है, महिलाओं के शीघ्र विवाह में सहयोग मिलता है, प्रेत बाधा से मुक्ति मिलती है। बच्चों में नजर दोष दूर होता है। धनु :- इस लग्न वाले जातकों का अनुकूल रत्न पुखराज है जिसे शुक्ल पक्ष के किसी भी गुरुवार को प्रातः गुरु की होरा में निम्न मंत्र से जाग्रत कर धारण करना चाहिए। मंत्र- ऊँ बृं बृहस्पतये नमः लाभ :- पुखराज धारण करने से बल, बुद्धि, ज्ञान, यज्ञ और मान- सम्मान में वृद्धि होती है। पुत्र संत देता है। पापकर्म करने से पहले। अजीर्ण रोग, कैंसर व चर्मरोग से मुक्ति लाइब्रेरी है। मकर :- इस लग्न वाले जातकों के लिए उपयुक्त रत्न नीलम है जिसे शनिवार के दिन प्रातः शनि की होरा में निम्न मंत्र से जाग्रत कर धारण करना चाहिए। मंत्र- ऊँ शं शनैश्चराये नमः लाभ :- नीलमणि

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मंगलदोष (Mars)

जन्म कुंडली में मंगल दोष और इसके परिहार Bhavanaji Blog – भावनाजीका ब्लॉग ज्योतिष शास्त्र अनुसार जन्म कुंडली के पहले, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम या द्वादश भाव में मंगल की स्थिति होने पर जातक या जातिका को मांगलिक कहा जाता है। यह मंगल दोष लग्न कुंडली के इलावा चंद्र और शुक्र कुंडली से भी देखा जाता है। और फिर उस हिसाब से मंगल दोष परिहार यानी विवाह हेतु उस तरह की कुंडली देखी जाती है जिसके माध्यम से मंगल दोष परिहार हो जाए। जैसे कि मांगलिक लड़के , लड़की का विवाह मांगलिक लड़के , लड़की से ही किया जाता है। इसी तरह ऐसा भी विचार है दोनों में से किसी एक की कुंडली में जिस भाव में मंगल हो उस भाव में दूसरे की कुंडली में अशुभ ग्रह आने से भी मंगल दोष का परिहार हो जाता है। जन्म कुंडली में शुभ और बलवान चंद्रमा या शुक्र केंद्र में होने से मंगल दोष परिहार होता है। जन्म कुंडली में मंगल अस्त हो तो भी मंगल दोष का परिहार होता है। जन्म कुंडली में मंगल अपनी या उच्च राशि में हो तो भी मंगल दोष का परिहार होता है। जन्म कुंडली में मंगल पर गुरु की दृष्टि होने से या फिर मंगल राहु युति होने पर भी मंगल दोष का परिहार होता है। जन्म कुंडली में पहले, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम या बाहरवें भाव में शनि होने से भी मंगल दोष का परिहार होता है।अगर आप मंगल दोष से निजात पाना चाहते हैं, तो मंगलवार के दिन लाल रंग की चीजें जैसे मसूर दाल, लाल मिर्च, लाल रंग की मिठाई, लाल रंग का वस्त्र आदि दान करें। हर मंगलवार के दिन स्नान-ध्यान के बाद हनुमान जी की पूजा करें। इस समय हनुमान चालीसा का पाठ करें। इसके बाद हनुमान जी के चरणों में सिंदूर अर्पित करें। मांगलिक जातक मंगलवार के दिन बाग या गार्डन में अशोक के पेड़ लगाएं। इस उपाय को करने से भी मंगल दोष दूर होता है। मंगल दोष कि शांति के लिए तंदूर में बनी मीठी रोटी मंगलवार के दिन किसी पक्षी या जानवर को खाने को दें।

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मंत्र जाप की शक्तियां

🔹ॐ कार मंत्र में शक्तियाँ हैं (Mantra Chanting) 🔸रक्षण शक्ति : ॐ सहित मंत्र का जप करते हैं तो वह हमारे जप तथा पुण्य की रक्षा करता है । किसी नामदान के लिए हुए साधक पर यदि कोई आपदा आनेवाली है, कोई दुर्घटना घटने वाली है तो मंत्र भगवान उस आपदा को शूली में से काँटा कर देते हैं । साधक का बचाव कर देते हैं। ऐसा बचाव तो एक नहीं, हजारों साधकों के जीवन में चमत्कारिक ढंग से महसूस होता है । 🔸गति शक्ति : जिस योग में, ज्ञान में, ध्यान में आप फिसल गये थे, उदासीन हो गये थे, किंकर्तव्यविमूढ़ हो गये थे उसमें मंत्रदीक्षा लेने के बाद गति आने लगती है । मंत्रदीक्षा के बाद आपके अंदर गति शक्ति कार्य में आपको मदद करने लगती है । 🔸कांति शक्ति : मंत्रजाप से जापक के कुकर्मों के संस्कार नष्ट होने लगते हैं और उसका चित्त उज्जवल होने लगता है । उसकी आभा उज्जवल होने लगती है, उसकी मति-गति उज्जवल होने लगती है और उसके व्यवहार में उज्जवलता आने लगती है । इसका मतलब ऐसा नहीं है कि आज मंत्र लिया और कल सब छूमंतर हो जायेगा… धीरे-धीरे होगा। एक दिन में कोई स्नातक नहीं होता,  एक दिन में कोई एम.ए. नहीं पढ़ लेता, ऐसे ही एक दिन में सब छूमंतर नहीं हो जाता। मंत्र लेकर ज्यों-ज्यों आप श्रद्धा से, एकाग्रता से और पवित्रता से जप करते जायेंगे त्यों-त्यों विशेष लाभ होता जायेगा । 🔸प्रीति शक्ति : ज्यों-ज्यों आप मंत्र जपते जायेंगे त्यों-त्यों मंत्र के देवता के प्रति, मंत्र के ऋषि, मंत्र के सामर्थ्य के प्रति आपकी प्रीति बढ़ती जायेगी । 🔸तृप्ति शक्ति : ज्यों-ज्यों आप मंत्र जपते जायेंगे त्यों-त्यों आपकी अंतरात्मा में तृप्ति बढ़ती जायेगी, संतोष बढ़ता जायेगा ।**जिनको गुरुमंत्र सिद्ध हो गया है उनकी वाणी में सामर्थ्य आ जाता है । नेता भाषण करता है त लोग इतने तृप्त नहीं होते, किंतु जिनका गुरुमंत्र सिद्ध हो गया है ऐसे महापुरुष बोलते हैं तो लोग बड़े तृप्त हो जाते हैं और महापुरुष के शिष्य बन जाते हैं । 🔸अवगम शक्ति : मंत्रजाप से दूसरों के मनोभावों को जानने की शक्ति विकसित हो जाती है । दूसरे के मनोभावों को आप अंतर्यामी बनकर जान सकते हो । 🔸प्रवेश अवति शक्ति : अर्थात् सबके अंतरतम की चेतना के साथ एकाकार होने की शक्ति । अंतःकरण के सर्व भावों को तथा पूर्वजीवन के भावों को और भविष्य की यात्रा के भावों को जानने की शक्ति कई योगियों में होती है । वे कभी-कभार मौज में आ जायें तो बता सकते हैं कि आपकी यह गति थी, आप यहाँ थे, फलाने जन्म में ऐसे थे, अभी ऐसे हैं । जैसे दीर्घतपा के पुत्र पावन को माता-पिता की मृत्यु पर उनके लिए शोक करते देखकर उसके बड़े भाई पुण्यक ने उसे उसके पूर्वजन्मों के बारे में बताया था । यह कथा योगवाशिष्ठ महारामायण में आती है । 🔸श्रवण शक्ति : मंत्रजाप के प्रभाव से जापक सूक्ष्मतम, गुप्ततम शब्दों का श्रोता बन जाता है । जैसे, शुकदेवजी महाराज ने जब परीक्षित के लिए सत्संग शुरु किया तो देवता आये । शुकदेवजी ने उन देवताओं से बात की । माँ आनंदमयी का भी देवलोक के साथ सीधा सम्बन्ध था । और भी कई संतो का होता है । दूर देश से भक्त पुकारता है कि गुरुजी ! मेरी रक्षा करो… तो गुरुदेव तक उसकी पुकार पहुँच जाती है !

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हवन-यज्ञ क्यो करे,कौनसा यज्ञ सर्वोपरि है (Yagya kyu kare)

दिनांक – 13 फरवरी 2025 दिन – गुरुवार विक्रम संवत् – 2081 अयन – उत्तरायण ऋतु – शिशिर मास – फाल्गुन पक्ष – कृष्ण तिथि – प्रतिपदा रात्रि 08:21 तक तत्पश्चात द्वितीया नक्षत्र – मघा रात्रि 09:07 तक, तत्पश्चात पूर्वाफाल्गुनी योग – शोभन प्रातः 07:31 तक, तत्पश्चात अतिगण्ड राहु काल – दोपहर 02:19 से दोपहर 03:44 तक सूर्योदय – 07:16 सूर्यास्त – 06:30 दिशा शूल – दक्षिण दिशा में अग्निवास: पाताल- अशुभ (रा.08:21)तक, पृथ्वी- शुभ चन्द्र वास: पूर्व शिववास: गौरीसन्निधौ- शुभ (रा.08:21)तक, सभायां- कष्टकारक ब्राह्ममुहूर्त – प्रातः 05:32 से 06:23 तक अभिजीत मुहूर्त – दोपहर 12:31 से दोपहर 01:17 तक निशिता मुहूर्त – रात्रि 12:28 फरवरी 14 से रात्रि 01:19 फरवरी 14 तक 🔻पद, चरण🔻 2 मी –मघा 08:16:26 3 मू –मघा 14:40:19 4 मे –मघा 21:06:08 1 मो —पूर्व फाल्गुनी 27:33:52 🔶चोघडिया, दिन🔶 शुभ –07:02 – 08:27 शुभ रोग –08:27 – 09:52 अशुभ उद्वेग –09:52 – 11:16 अशुभ चर –11:16 – 12:41 शुभ लाभ –12:41 – 14:06 शुभ अमृत –14:06 – 15:31 शुभ काल –15:31 – 16:56 अशुभ शुभ –16:56 – 18:21 शुभ 🔶चोघडिया, रात🔶 अमृत –18:21 – 19:56 शुभ चर –19:56 – 21:31 शुभ रोग –21:31 – 23:06 अशुभ काल –23:06 – 24:41 अशुभ लाभ –24:41 – 26:16 शुभ उद्वेग –26:16 – 27:51 अशुभ शुभ –27:51 – 29:26 शुभ अमृत– 29:26 – 31:01 शुभ विशेष – प्रतिपदा को कुष्माण्ड (कुम्हड़ा, पेठा) न खाएं क्योंकि यह धन का नाश करने वाला है। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-34) 🔹हवन-यज्ञ क्यों ?🔹 🔹प्रतिदिन यज्ञ का लाभ पाने की युक्ति🔹 🔸आज भी आपको देशी गाय के गोबर के कंडे व कोयले मिल सकते हैं। कभी-कभार उन्हें जलाकर जौ, तिल, घी, नारियल के टुकड़े एवं गूगल मिला के तैयार किया गया धूप कर दो तो बहुत सारे हानिकारक जीवाणु नष्ट हो जायेंगे। 🔸जब आपको ध्यान, जप आदि करना हो तो थोड़ी देर पहले यह धूप करके फिर उस धूप से शुद्ध बने हुए वातावरण में प्राणायाम, ध्यान, जप करने बैठें तो बहुत ही लाभ होगा। किंतु धूप में भी अति न करें, नहीं तो गले में कुछ तकलीफ हो सकती है, अतः माप से करें। *🔸गौ-गोबर के कंडे के धुएँ से हानिकारक जीवाणु नष्ट हो जाते हैं। इसी कारण जब कोई मर जाता है तो श्मशान-यात्रा में एक व्यक्ति मटकी में कंडों का धूआँ करते हुए चलता है ताकि मृतक के जीवाणु समाज में, वातावरण में न फैलें। 🔸आजकल परफ्यूम आदि से अगरबत्तियाँ बनती हैं। वे खुशबू तो देती हैं लेकिन उनमें प्रयुक्त रसायनों का हमारे स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। 🔸एक तो मोटर-गाड़ियों के धुएँ का कुप्रभाव, दूसरा अगरबत्तियों के रसायनों का भी कुप्रभाव शरीर पर पड़ता है। ऐसी अगरबत्तियों की अपेक्षा सात्त्विक अगरबत्ती या धूपबत्ती मिल जाय तो ठीक है, नहीं तो कम-से-कम घी का थोड़ा धूप कर लिया करो। 🔹सर्वोपरि यज्ञ कौन-सा ?🔹 🔸कीटाणुओं को मारना और शरीररूपी कीटाणुओं को अच्छा रखना उसीके पीछे वैज्ञानिकों की सारी भागदौड़ और उनका विज्ञान काम करता है। 🔸हमारे ऋषियों ने कीटाणु मारने के लिए यज्ञ की खोज नहीं की है अपितु वातावरण, भाव तथा जन्म-मरण के चक्कर में डालनेवाले मलिन अंतःकरण को ठीक करके परमात्मप्राप्ति में यज्ञ को निमित्त बनाया है। 🔸उन यज्ञों में भी श्रीकृष्ण कहते हैं कि जपयज्ञ सर्वोपरि है। अग्नि में जौ, तिल होमना अच्छा है परंतु इससे भी श्रेष्ठ है गुरुमंत्र लेकर माला पर जप करना। उसको भगवान श्रीकृष्ण ने ‘जपयज्ञ’ कहा है। 🔸भगवन्नाम जप में योग्य-अयोग्य का खयाल भी नहीं किया जाता। भगवन्नाम सारी अयोग्यताओं को हरकर प्राणियों के चित्त में छिपी हुई योग्यता जगा देता है। इसलिए जपयज्ञ सर्वोपरि यज्ञ माना गया। भगवान कहते हैं: यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि…’सब प्रकार के यज्ञों में जपयज्ञ मैं हूँ।’  (गीता : १०.२५) 🔸यज्ञ करने में तो यजमान धूआँ सहे, विधि- विधान का पालन करे तब लाभ होता है। और उस समय तो अग्नि के सामने तपना पड़ता है, कालांतर में उसे सुख मिलता है लेकिन भगवन्नाम लेने से तो वर्तमान में ही सुख मिलता है और कालांतर में परमात्मा मिलता है। 🔹ध्यान की महिमा आज्ञाचक्र में ओंकार या गुरु का ध्यान करने से बुद्धि विकसित होती है और नाभि में ओंकार या गुरु का ध्यान करने से आरोग्य एवं रोग प्रतिकारक शक्ति विकसित होती है। 🔹सुख-शांति व बरकत के उपाय🔹 तुलसी को रोज जल चढायें तथा गाय के घी का दीपक जलायें। सुबह बिल्वपत्र पर सफेद चंदन का तिलक लगाकर संकल्प करके शिवलिंग पर अर्पित करें तथा ह्र्द्यपुर्वक प्रार्थना करें।

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