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गोचर Planetary Transit, ब्लॉग Blogs

गुरु राशि परिवर्तन : कुंभ राशि Jupiter Transit Aquarius

गुरु गोचर – कुंभ Aquarius Jupiter Transit गुरु गोचर 2025 – Jupiter Transit 2025 कुंभ राशि फलकथनवैदिक ज्योतिष शास्त्र में बृहस्पति को सबसे शुभ ग्रह माना गया है। देवगुरु बृहस्पति साल 2025 में राशि परिवर्तन किए हैं। गुरु शनि के बाद सबसे मंद गति से चलने वाले ग्रह होते हैं। किसी एक राशि में गुरु लगभग 13 महीने रहते हैं फिर इसके बाद अगली राशि में प्रवेश करते हैं। गुरु को धनु और मीन राशियों का स्वामित्व प्राप्त है। गुरु को तीन द्दष्टियां पंचम, सप्तम और नवम प्राप्त हैं। देवगुरु इन द्दष्टियों से जिस किसी भी भाव को देखते हैं उससे शुभ फलों में वृद्धि करते हैं। साल 2025 में 14 मई को बुध के स्वामित्व वाली राशि मिथुन राशि में प्रवेश किए हैं। गुरु कर्क राशि में उच्च के और मकर राशि में नीच के होते हैं। कुंडली में गुरु की शुभ स्थिति से व्यक्ति के जीवन में धन, सुख, समृद्धि, संतान, शिक्षा और वैवाहिक जीवन का सुख प्रदान करते हैं। कुंडली में गुरु की स्थिति मजबूत होने पर जातक को समाज में अच्छा मान-सम्मान और यश की प्राप्ति होती है। गुरु करीब 13 महीनों के बाद 14 मई 2025 को मिथुन राशि में गोचर करेंगे। साल 2025 में गुरु अतिचारी होकर राशि परिवर्तन करेंगे। साल 2025 में पहले गुरु 14 मई को वृषभ राशि की अपनी यात्रा को विराम देते हुए मिथुन राशि में प्रवेश कर चुके है। फिर 19 अक्टूबर 2025 को दोपहर करीब 01 बजे मिथुन राशि से निकलकर चंद्रमा के स्वामित्व वाली राशि कर्क में प्रवेश करेंगे। गुरु कर्क राशि में प्रवेश करने पर यह अपनी उच्च अवस्था में रहेंगे। गुरु कर्क राशि में रहने के बाद 4 दिसंबर 2025 को मिथुन राशि में फिर से वापस आ जाएंगे। 09 जून 2025 को देवगुरु बृहस्पति अस्त हो जाएंगे। वर्ष 2025 में गुरु का गोचर कुंभ राशि वालों के लिए आर्थिक समृद्धि, कार्यों में सफलता, हर एक इच्छाओं की पूर्ति और आमदनी में अच्छे इजाफे के प्रबल योग दिखाई दे रहे हैं। कुंभ राशि वालों के लिए देवगुरु बृहस्पति दूसरे और ग्यारहवें भाव के स्वामी हैं। 14 मई 2025 को गुरु का गोचर आपकी राशि से पंचम भाव में होगा। कुंडली के पंचम भाव से विद्या और संनान के सुख के बारे में विचार किया जाता है। गुरु के राशि परिवर्तन का सकारात्मक प्रभाव नौकरीपेशा जातकों को देखने के मिलेगा। नौकरी पद, प्रतिष्ठा और वेतन में अच्छी बढ़ोतरी के योग हैं। आपकी राशि से पंचम भाव में गुरु के गोचर करने से यह आपके नवम, एकादश और लग्न भाव पर अपनी शुभ द्दष्टि डालेंगे। साल 2025 में कुंभ राशि वालों को शिक्षा में उत्तम सफलता मिलेगी। उच्च शिक्षा ग्रहण करने वाले जातकों अच्छी सफलता मिलेगी। संतान से जुड़ी शुभ सूचनाएं आपको प्राप्त होंगी। हालांकि जब देवगुरु आपके छठे भाव में आएंगे तो सेहत और धन संबंधी मामलों में समस्याओं का सामना करना पड़ेगा। उपाय :- पीली हल्दी का दान करें।

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गुरु गोचर : मकर राशि Jupiter Transit Capricorn

गुरु गोचर – मकर Capricorn Jupiter Transit गुरु गोचर 2025 – Jupiter Transit 2025 मकर राशि भविष्यवाणी वैदिक ज्योतिष शास्त्र में बृहस्पति को सबसे शुभ ग्रह माना गया है। देवगुरु बृहस्पति साल 2025 में राशि परिवर्तन किए हैं। गुरु शनि के बाद सबसे मंद गति से चलने वाले ग्रह होते हैं। किसी एक राशि में गुरु लगभग 13 महीने रहते हैं फिर इसके बाद अगली राशि में प्रवेश करते हैं। गुरु को धनु और मीन राशियों का स्वामित्व प्राप्त है। गुरु को तीन द्दष्टियां पंचम, सप्तम और नवम प्राप्त हैं। देवगुरु इन द्दष्टियों से जिस किसी भी भाव को देखते हैं उससे शुभ फलों में वृद्धि करते हैं। साल 2025 में 14 मई को बुध के स्वामित्व वाली राशि मिथुन राशि में प्रवेश किए है। गुरु कर्क राशि में उच्च के और मकर राशि में नीच के होते हैं। कुंडली में गुरु की शुभ स्थिति से व्यक्ति के जीवन में धन, सुख, समृद्धि, संतान, शिक्षा और वैवाहिक जीवन का सुख प्रदान करते हैं। कुंडली में गुरु की स्थिति मजबूत होने पर जातक को समाज में अच्छा मान-सम्मान और यश की प्राप्ति होती है। गुरु करीब 13 महीनों के बाद 14 मई 2025 को मिथुन राशि में गोचर कर चुके है। साल 2025 में गुरु अतिचारी होकर राशि परिवर्तन किए है। साल 2025 में पहले गुरु 14 मई को वृषभ राशि की अपनी यात्रा को विराम देते हुए मिथुन राशि में प्रवेश किए है। फिर 19 अक्टूबर 2025 को दोपहर करीब 01 बजे मिथुन राशि से निकलकर चंद्रमा के स्वामित्व वाली राशि कर्क में प्रवेश करेंगे। गुरु कर्क राशि में प्रवेश करने पर यह अपनी उच्च अवस्था में रहेंगे। गुरु कर्क राशि में रहने के बाद 4 दिसंबर 2025 को मिथुन राशि में फिर से वापस आ जाएंगे। 09 जून 2025 को देवगुरु बृहस्पति अस्त हो जाएंगे। साल 2025 में गुरु का राशि परिवर्तन मकर राशि वालों के लिए मिला-जुला साबित होगा। मकर राशि के जातकों के लिए देवगुरु बृहस्पति तीसरे और द्वादश भाव के स्वामी होकर साल 2025 में आपकी राशि से छठे भाव में गोचर करेंगे। छठे भाव में गोचर से आपकी सेहत में बुरा प्रभाव देखने को मिल सकता है। साल के कुछ महीनों में सेहत संबधित परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। वहीं दूसरी तरफ आपको नौकरी में कुछ अच्छे प्रस्ताव मिल सकते हैं। खर्चों में बढ़ोतरी भी हो सकती है। जीवनसाथी का अच्छा सहयोग प्राप्त होगा। अविवाहित जातकों को विवाह के योग भी बनेंगे। नौकरी में प्रमोशन के योग और व्यापार में अच्छा मुनाफा भी हासिल हो सकता है। गुरु छठे भाव में विराजमान होकर गुरु की द्दष्टि आपके दशम भाव, द्वादश भाव और द्वितीय भाव पर जा रही है। उपाय :- गुरुवार को बेसन के लड्डू का भोग लगाएं।

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गुरु गोचर: धनु राशि Jupiter Transit Sagitarious

गुरु गोचर – धनु Sagitarious Jupiter Transit गुरु गोचर 2025 – Jupiter Transit 2025 धनु राशि फलादेश वैदिक ज्योतिष शास्त्र में बृहस्पति को सबसे शुभ ग्रह माना गया है। देवगुरु बृहस्पति साल 2025 में राशि परिवर्तन करने वाले हैं। गुरु शनि के बाद सबसे मंद गति से चलने वाले ग्रह होते हैं। किसी एक राशि में गुरु लगभग 13 महीने रहते हैं फिर इसके बाद अगली राशि में प्रवेश करते हैं। गुरु को धनु और मीन राशियों का स्वामित्व प्राप्त है। गुरु को तीन द्दष्टियां पंचम, सप्तम और नवम प्राप्त हैं। देवगुरु इन द्दष्टियों से जिस किसी भी भाव को देखते हैं उससे शुभ फलों में वृद्धि करते हैं। साल 2025 में 14 मई को बुध के स्वामित्व वाली राशि मिथुन राशि में प्रवेश किए हैं। गुरु कर्क राशि में उच्च के और मकर राशि में नीच के होते हैं। कुंडली में गुरु की शुभ स्थिति से व्यक्ति के जीवन में धन, सुख, समृद्धि, संतान, शिक्षा और वैवाहिक जीवन का सुख प्रदान करते हैं। कुंडली में गुरु की स्थिति मजबूत होने पर जातक को समाज में अच्छा मान-सम्मान और यश की प्राप्ति होती है। गुरु करीब 13 महीनों के बाद 14 मई 2025 को मिथुन राशि में गोचर किए हैं। साल 2025 में गुरु अतिचारी होकर राशि परिवर्तन करेंगे। साल 2025 में पहले गुरु 14 मई को वृषभ राशि की अपनी यात्रा को विराम देते हुए मिथुन राशि में प्रवेश किए है। फिर 19 अक्टूबर 2025 को दोपहर करीब 01 बजे मिथुन राशि से निकलकर चंद्रमा के स्वामित्व वाली राशि कर्क में प्रवेश करेंगे। गुरु कर्क राशि में प्रवेश करने पर यह अपनी उच्च अवस्था में रहेंगे। गुरु कर्क राशि में रहने के बाद 4 दिसंबर 2025 को मिथुन राशि में फिर से वापस आ जाएंगे। 09 जून 2025 को देवगुरु बृहस्पति अस्त हो जाएंगे। धनु राशि के जातकों के लिए देवगुरु बृहस्पति पहले और चौथे भाव के स्वामी होते हैं। साल 2025 में गुरु का मिथुन राशि में गोचर धनु राशि के सप्तम भाव में प्रवेश हुआ है। गुरु साल 2025 में सप्तम भाव में विराजमान होकर आपके एकादश, पहले और तीसरे भाव पर अपनी शुभ द्दष्टि रखेंगे। गुरु का गोचर सप्तम भाव में होने से धनु राशि वालों के लिए शुभ संकेत हैं। कुंडली के सातवें भाव से साझेदारी और जीवनसाथी का विचार किया जाता है। ऐसे में जो लोग किसी के साथ मिलकर कोई काम-धंधा करते हैं तो उनके लिए साल 2025 में गुरु बहुत बड़ा लाभ दिला सकते हैं। वहीं जिन जातकों का विवाह नहीं हो रहा है उनका विवाह तय हो सकता है। साल 2025 में गुरु का गोचर इस राशि के जातकों के जीवन में मधुरता और संपन्नता लाएगा। आपकी आमदनी में वृद्धि के संकेत हैं। इस तरह से धनु राशि के जातकों के लिए देवगुरु बहुत ही शुभ साबित होंगे। उपाय:- पीले चावल मंदिर में दान करें।

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गुरु गोचर: वृश्चिक राशि Jupiter Transit Scorpio

गुरु गोचर – वृश्चिक Scorpio Jupiter Transit गुरु गोचर 2025 – Jupiter Transit 2025 वृश्चिक राशि फलकथनवैदिक ज्योतिष में गुरु ग्रह को सबसे शुभ और अच्छा फल प्रदान करने वाला ग्रह माना जाता है। ज्योतिष में गुरु ग्रह को शिक्षा, बुद्धि, ज्ञान, संतान, विवाह, सुख-समृद्धि, मान-सम्मान और धन का कारक ग्रह माना जाता है। गुरु किसी एक राशि में करीब 13 महीनों तक रहते हैं। गुरु धनु और मीन राशि के स्वामी होते हैं। यह कर्क राशि में उच्च के जबकि मकर राशि में नीच के होते हैं। गुरु साल 2025 में राशि परिवर्तन कर रहे है। जहां पर ये वृषभ राशि की अपनी यात्रा को विराम देते हुए बुध की राशि मिथुन में गोचर कर रहे है। सबसे खास बात इस बार यह है कि गुरु साल 2025 में तीन बार राशि परिवर्तन करेंगे। साल 2025 में सबसे पहले गुरु 14 मई को वृषभ राशि की अपनी यात्रा को विराम देते हुए मिथुन राशि में प्रवेश करेंगे, फिर अक्तूबर माह में कर्क राशि में और साल के अंत में एक बार फिर से मिथुन राशि में प्रवेश करेंगे। पंचांग गणना के मुताबिक 14 मई 2025 को सबसे पहले गुरु वृषभ राशि से निकलकर सुबह बुध की राशि मिथुन में प्रवेश किए हैं। फिर इसके बाद 18 अक्तूबर 2025 में रात को देवगुरु बृहस्पति मिथुन राशि से निकलकर कर्क राशि में प्रवेश करेंगे। इसके बाद वक्री अवस्था में रहते हुए 4 दिसंबर 2025 को मिथुन राशि में फिर से प्रवेश करेंगे। देवगुरु साल 2025 में मिथुन राशि में प्रवेश करने के साथ अतिचारी होंगे। वृश्चिक राशि के जातकों के लिए गुरु का गोचर अच्छा नहीं कहा जा सकता है। इस राशि के जातकों को कार्यक्षेत्र में कुछ अड़चनों का सामना करना पड़ सकता है। वृश्चिक राशि के जातकों के लिए गुरु दूसरे और पंचम भाव के स्वामी हैं और साल 2025 में मिथुन राशि में गोचर होने से यह वृश्चिक राशि के अष्टम भाव में रहेंगे। गुरु का गोचर आपके लिए अच्छा नहीं कहा जा सकता है। बनते हुए काम बिगड़ सकते हैं। धन के मामले में आपको थोड़ी परेशानियां उठानी पड़ सकती है। देवगुरु आपके अष्टम भाव में उपस्थित होकर यह आपके द्वादश, द्वितीय और चतुर्थ भाव पर पूर्ण द्दष्टि डालेंगे। ऐसे में आपके खर्चों में बढ़ोतरी हो सकती है, विदेश यात्रा पर जा सकते हैं। अचानक से धन लाभ के अवसर भी मिल सकते हैं। उपाय :- गाय को गुड़ और भिगोई हुई चने की दाल खिलाएं।

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गुरु गोचर: तूला राशि Jupiter Transit Libra

गुरु गोचर – तुला Libra Jupiter Transit गुरु गोचर 2025 – Jupiter Transit 2025 तुला राशि भविष्यवाणी वैदिक ज्योतिष में गुरु ग्रह को सबसे शुभ और अच्छा फल प्रदान करने वाला ग्रह माना जाता है। ज्योतिष में गुरु ग्रह को शिक्षा, बुद्धि, ज्ञान, संतान, विवाह, सुख-समृद्धि, मान-सम्मान और धन का कारक ग्रह माना जाता है। गुरु किसी एक राशि में करीब 13 महीनों तक रहते हैं। गुरु धनु और मीन राशि के स्वामी होते हैं। यह कर्क राशि में उच्च के जबकि मकर राशि में नीच के होते हैं। गुरु साल 2025 में राशि परिवर्तन कर रहे है। जहां पर ये वृषभ राशि की अपनी यात्रा को विराम देते हुए बुध की राशि मिथुन में गोचर कर रहे है। सबसे खास बात इस बार यह है कि गुरु साल 2025 में तीन बार राशि परिवर्तन करेंगे। साल 2025 में सबसे पहले गुरु 14 मई को वृषभ राशि की अपनी यात्रा को विराम देते हुए मिथुन राशि में प्रवेश करेंगे, फिर अक्तूबर माह में कर्क राशि में और साल के अंत में एक बार फिर से मिथुन राशि में प्रवेश करेंगे। पंचांग गणना के मुताबिक 14 मई 2025 को सबसे पहले गुरु वृषभ राशि से निकलकर सुबह बुध की राशि मिथुन में प्रवेश करेंगे। फिर इसके बाद 18 अक्तूबर 2025 में रात को देवगुरु बृहस्पति मिथुन राशि से निकलकर कर्क राशि में प्रवेश करेंगे। इसके बाद वक्री अवस्था में रहते हुए 4 दिसंबर 2025 को मिथुन राशि में फिर से प्रवेश करेंगे। देवगुरु साल 2025 में मिथुन राशि में प्रवेश करने के साथ अतिचारी होंगे। साल 2025 में गुरु के मिथुन राशि में गोचर होने से तुला राशि के नवम भाव यानी भाग्य भाव में प्रवेश करेंगे। वहीं तुला राशि के जातकों के जातकों के लिए गुरु आपके तीसरे और छठे भाव के स्वामी होते हैं। गुरु का गोचर आपके नवम भाव में होने से भाग्य में वृद्धि और धार्मिक कार्यों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेंगे। आपको अपने प्रयासों में अच्छी सफलता मिलेगी। उच्च शिक्षा में लगे छात्रों के लिए साल 2025 बहुत ही शुभ साबित होगा। जो लोग संतान की इच्छा रहते है उन्हे इस वर्ष संतान का सुख मिल सकता है। देवगुरु बृहस्पति तुला राशि के लिए नवम भाव में विराजमान होकर आपके पहले, तीसरे और पंचम भाव पर अपनी द्दष्टि रखेंगे। यहां से आपको देवगुरु की विशेष कृपा मिलेगी। उपाय :- गुरुवार को पीले वस्त्र पहनें और भगवान विष्णु की पूजा करें।

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कन्या राशि : गुरु गोचर फल Vergo Jupiter Transit

गुरु गोचर – कन्या राशि Jupiter Transit Vergo Zodiac गुरु गोचर 2025 – Jupiter Transit 2025 कन्या राशि फलादेश वैदिक ज्योतिष में गुरु ग्रह को सबसे शुभ और अच्छा फल प्रदान करने वाला ग्रह माना जाता है। ज्योतिष में गुरु ग्रह को शिक्षा, बुद्धि, ज्ञान, संतान, विवाह, सुख-समृद्धि, मान-सम्मान और धन का कारक ग्रह माना जाता है। गुरु किसी एक राशि में करीब 13 महीनों तक रहते हैं। गुरु धनु और मीन राशि के स्वामी होते हैं। यह कर्क राशि में उच्च के जबकि मकर राशि में नीच के होते हैं। गुरु साल 2025 में राशि परिवर्तन कर रहे है। जहां पर ये वृषभ राशि की अपनी यात्रा को विराम देते हुए बुध की राशि मिथुन में गोचर करेंगे। सबसे खास बात इस बार यह है कि गुरु साल 2025 में तीन बार राशि परिवर्तन करेंगे। साल 2025 में सबसे पहले गुरु 14 मई को वृषभ राशि की अपनी यात्रा को विराम देते हुए मिथुन राशि में प्रवेश कर रहे है, फिर अक्तूबर माह में कर्क राशि में और साल के अंत में एक बार फिर से मिथुन राशि में प्रवेश करेंगे। पंचांग गणना के अनुसार 14 मई 2025 को सबसे पहले गुरु का वृषभ राशि से निकलकर सुबह बुध की राशि मिथुन में प्रवेश हुआ है। फिर इसके बाद 18 अक्तूबर 2025 में रात को देवगुरु बृहस्पति मिथुन राशि से निकलकर कर्क राशि में प्रवेश करेंगे। इसके बाद वक्री अवस्था में रहते हुए 4 दिसंबर 2025 को मिथुन राशि में फिर से प्रवेश करेंगे। देवगुरु साल 2025 में मिथुन राशि में प्रवेश करने के साथ अतिचारी होंगे। कन्या राशि वालों के लिए साल 2025 कार्यक्षेत्र में चतुराई के साथ काम लेने का समय रहेगा। कन्या राशि के लोगों के लिए देवगुरु बृहस्पति चौथे और सप्तम भाव के स्वामी होते हैं और साल 2025 में मिथुन राशि में गोचर करने के दौरान देवगुरु बृहस्पति दशम भाव में प्रवेश करेंगे। दशम भाव कर्म का भाव माना जाता है। ऐसे में आपको अपने कार्यक्षेत्र में कुछ छोटी-मोटी परेशानियों से जूझना पड़ सकता है। कुछ काम बनते-बनते बिगड़ जाएंगे। दशम भाव में गुरु के विराजमान होने पर यह आपके दूसरे, चतुर्थ और छठे भाव को देखेंगे। इस तरह से साल 2025 में आपके द्वारा किए गए कर्म से संचित धन में इजाफा होगा। माता के साथ संबंध अच्छे रहेंगे। परिवार में प्यार और स्नेह बरकरार रहेगा। उपाय :- बृहस्पति मंत्र का जाप करें और चने की दाल का दान करें।

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बृहस्पति गोचर : सिंह राशि Leo Jupiter Transit

गुरु गोचर – सिंह राशि Jupiter Transit Leo Zodiac गुरु गोचर 2025 – Jupiter Transit 2025 सिंह राशि फल कथन वैदिक ज्योतिष में गुरु ग्रह को सबसे शुभ और अच्छा फल प्रदान करने वाला ग्रह माना जाता है। ज्योतिष में गुरु ग्रह को शिक्षा, बुद्धि, ज्ञान, संतान, विवाह, सुख-समृद्धि, मान-सम्मान और धन का कारक ग्रह माना जाता है। गुरु किसी एक राशि में करीब 13 महीनों तक रहते हैं। गुरु धनु और मीन राशि के स्वामी होते हैं। यह कर्क राशि में उच्च के जबकि मकर राशि में नीच के होते हैं। गुरु साल 2025 में राशि परिवर्तन कर रहे है। जहां पर ये वृषभ राशि की अपनी यात्रा को विराम देते हुए बुध की राशि मिथुन में गोचर कर रहे है। सबसे खास बात इस बार यह है कि गुरु साल 2025 में तीन बार राशि परिवर्तन करेंगे। साल 2025 में सबसे पहले गुरु 14 मई को वृषभ राशि की अपनी यात्रा को विराम देते हुए मिथुन राशि में प्रवेश करेंगे, फिर अक्तूबर माह में कर्क राशि में और साल के अंत में एक बार फिर से मिथुन राशि में प्रवेश करेंगे। पंचांग गणना के अनुसार 14 मई 2025 को सबसे पहले गुरु वृषभ राशि से निकलकर सुबह बुध की राशि मिथुन में प्रवेश करेंगे। फिर इसके बाद 18 अक्तूबर 2025 में रात को देवगुरु बृहस्पति मिथुन राशि से निकलकर कर्क राशि में प्रवेश करेंगे। इसके बाद वक्री अवस्था में रहते हुए 4 दिसंबर 2025 को मिथुन राशि में फिर से प्रवेश करेंगे। देवगुरु साल 2025 में मिथुन राशि में प्रवेश करने के साथ अतिचारी होंगे।सिंह राशि राशिचक्र की पांचवी राशि होती है। सिंह राशि के जातकों के लिए देवगुरु बृहस्पति पंचम और अष्टम भाव के स्वामी होते हैं। साल 2025 में गुरु का मिथुन राशि में गोचर सिंह राशि के जातकों के लिए एकादश भाव में होंगे। एकादश भाव इच्छापूर्ति और आमदनी का माना जाता है। गुरु के गोचर से आपको जीवन में अच्छी सफलता प्राप्त के योग बन रहे हैँ। आपके जीवन से आर्थिक चुनौतियां धीरे-धीरे खत्म होकर धन प्राप्ति की तरफ बढ़ेगा। एक से ज्यादा स्त्रोतों से धन लाभ के मौके बनेंगे। इसके अलावा आपको अचानक धन लाभ के तरह-तरह के योग बनेंगे। जो लोग अविवाहित हैं उनके विवाह तय हो सकते हैं। साल 2025 में गुरु एकादश भाव में रहते हुए गुरु की दृष्टी तृतीय, पंचम और सप्तम भाव पर रहेगी। शिक्षा और संतान के नजरिए से साल 2025 सुखद बदलाव की तरफ संकेत दे रहा है। उपाय :- गुरुवार को पीली वस्तुओं का दान करें।

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शनि,राहू के कारण करना पडता है दरिद्रता का सामना !

शनि और राहू यह दो ग्रह ऐसे हैं जो अपनी अशुभता पर आ जाए तो व्यक्ति को दुसरो पर निर्भर यानी मंगता बना देते हैं। क्युकी जब कोई भी ऐसा बोलता है कि उसको कोई नौकरी नहीं मिल रही, समाज में सम्मान नहीं मिल रहा और पैसे से खाली होने की वजह से परिवार के साथ भी झगड़े की स्थिति बनी रहती है। उस व्यक्ति पर कही ना कही शनि राहू दशा का प्रभाव या शनि साडेसाती या ढैय्या का प्रभाव होता है। इसी लिए आज आपको नौकरी कारोबार की समस्या और पारिवारिक कलह दूर करने के लिए शनि राहू अशुभता दूर करने के लिए उपाय बताये जा रहे हैं। ख़ास कर अगर जन्म कुंडली में सूर्य शनि युति, मंगल राहू युति या शनि राहू की स्थिति मेष, सिंह या वृश्चिक राशि में है और आपकी समस्या आर्थिक या पारिवारिक सुख से संबंधित है तो आपको शनि राहू के लिए उपाय जरुर करने चाहिए। १) शनि की अशुभता दूर करने के लिए घर की पश्चिम दिशा में सूर्य अस्त के बाद नीले आसन पर बैठें अपने सामने सरसों के तेल का दीपक 4 लॉन्ग डाल कर जलाएं। और शनि मंत्र “ऊँ शं शनैश्चराय नम:” 108 बार जप करें। सिर्फ इतना सा उपाय 4 शनिवार करने से ही आपको सकरात्मक प्रभाव देखने में मिलेगे। २) यदि आप राहू की अशुभता से परेशान हैं तो जूठे बर्तन राहू के कारक हैं और मंगल मिटटी है। इस लिए जूठे बर्तन धोने के लिए साबुन के साथ कुछ राख, मिटटी या रेत का इस्तेमाल करें। इस छोटे से उपाय से ही राहू की अशुभता दूर होगी और परिवार में शांति का माहोल बनेगा। यहाँ एक बात का और ध्यान रखें कि जूठे बर्तन सुबह धोने के लिए बिलकुल ना छोड़ें बल्कि रात को ही बर्तन धोकर सोना चाहिए।

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किस देवता या देवी को कौन सा प्रसाद चढ़ाना चाहिये ?? आप जिन देवता की भक्ति करते हो उन्हें चढ़ाए इस व्यंजन से बना हुआ प्रसाद भगवान होंगे प्रसन्न ! देंगे मनचाहा वरदान !

किस देवता या देवी को कौन सा प्रसाद चढ़ाना चाहिये ??? ‘पत्रं, पुष्पं, फलं, तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मन:।’ अर्थ:– जो कोई भक्त मेरे लिए प्रेम से पत्र, पुष्प, फल, जल आदि अर्पण करता है, उस शुद्ध बुद्धि निष्काम प्रेमी का प्रेमपूर्वक अर्पण किया हुआ वह पत्र-पुष्पादि मैं सगुण रूप में प्रकट होकर प्रीति सहित खाता हूं। -श्रीकृष्ण पूजा-पाठ या आरती के बाद तुलसीकृत जलामृत व पंचामृत के बाद बांटे जाने वाले पदार्थ को ‘प्रसाद’ कहते हैं। पूजा के समय जब कोई खाद्य सामग्री देवी-देवताओं के समक्ष प्रस्तुत की जाती है तो वह सामग्री प्रसाद के रूप में वितरण होती है। इसे ‘नैवेद्य’ भी कहते हैं। मनमाने प्रसाद हिन्दू धर्म में मंदिर में या किसी देवी या देवता की मूर्ति के समक्ष प्रसाद चढ़ाने की प्राचीनकाल से ही परंपरा रही है। यह बहुत महत्वपूर्ण सवाल है कि किस देवता को चढ़ता है कौन-सा प्रसाद। आजकल लोग कुछ भी लेकर आ जाते हैं और भगवान को चढ़ा देते हैं, जबकि यह अनुचित है। यह तर्क देना कि ‘देवी या देवता तो भाव के भूखे होते हैं, प्रसाद के नहीं’, ‍उचित नहीं है। आजकल मनमानी पूजा और मनमाने त्योहार भी बहुत प्रचलन में आ गए हैं। प्राचीन उत्सवों को फिल्मी लुक दे दिया गया है। गरबों में डिस्को डांडिया होने लगा है, जो कि धर्म-विरुद्ध कर्म है। ऐसे में यह जानना जरूरी है कि किस देवता को चढ़ता है किस चीज का प्रसाद जिससे कि वे प्रसन्न होंगे। प्रसाद चढ़ाने का प्रचलन कब शुरू हुआ? यज्ञ की आहुति भी देवता का प्रसाद है : प्रसाद चढ़ावे को नैवेद्य, आहुति और हव्य से जोड़कर देखा जाता रहा है, लेकिन प्रसाद को प्राचीनकाल से ही ‘नैवेद्य’ कहते हैं, जो कि शुद्ध और सात्विक अर्पण होता है। इसका संबंध किसी बलि आदि से नहीं होता। हवन की अग्नि को अर्पित किए गए भोजन को ‘हव्य’ कहते हैं। यज्ञ को अर्पित किए गए भोजन को ‘आहुति’ कहा जाता है। दोनों का अर्थ एक ही होता है। हवन किसी देवी-देवता के लिए और यज्ञ किसी खास मकसद के लिए। प्राचीनकाल से ही प्रत्येक हिन्दू भोजन करते वक्त उसका कुछ हिस्सा देवी-देवताओं को समर्पित करते आया है। यज्ञ के अलावा वह घर-परिवार में भोजन का एक हिस्सा अग्नि को समर्पित करता था। अग्नि उस हिस्से को देवताओं तक पहुंचा देती थी। चढा़ए जाने के उपरांत नैवेद्य द्रव्य ‘निर्माल्य’ कहलाता है। यज्ञ, हवन, पूजा और अन्न ग्रहण करने से पहले भगवान को नैवेद्य एवं भोग अर्पण की शुरुआत वैदिक काल से ही रही है। ‘शतपत ब्राह्मण’ ग्रंथ में यज्ञ को साक्षात भगवान का स्वरूप कहा गया है। यज्ञ में यजमान सर्वश्रेष्ठ वस्तुएं हविरूप से अर्पण कर देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त करना चाहता है। शास्त्रों में विधान है कि यज्ञ भोजन पहले दूसरों को खिलाकर यजमान ग्रहण करेंगे। वेदों के अनुसार यज्ञ में हृविष्यान्न और नैवेद्य समर्पित करने से व्यक्ति देवऋण से मुक्त होता है। प्राचीन समय में यह नैवेद्य (भोग) अग्नि में आहुति रूप में ही दिया जाता था, लेकिन अब इसका स्वरूप थोड़ा-सा बदल गया है। गुड़-चने के प्रसाद का प्रचलन ऐसे हुआ शुरू देवर्षि नारद भगवान विष्णु से आत्मा का ज्ञान प्राप्त करना चाहते थे लेकिन जब भी वे विष्णुजी के पास जाते तो विष्‍णुजी कहते कि पहले उन्हें इस ज्ञान के योग्य बनना होगा। तब नारदजी ने कठोर तप किया लेकिन फिर भी बात नहीं बनी तब वे चल पड़े धरती की ओर। धरती पर उन्होंने एक मंदिर में साक्षात विष्णु को बैठे हुए देखा कि एक बूढ़ी महिला उन्हें अपने हाथों से कुछ खिला रही है। नारदजी ने विष्णुजी के जाने के बाद उस बूढ़ी महिला से पूछा कि उन्होंने नारायण को क्या खिलाया? तब उन्हें पता चला कि गुड़-चने का प्रसाद उन्होंने ग्रहण किया था। कहते हैं कि नारद तब वहां रुककर तप और व्रत करने लगे और गुड़-चने का प्रसाद सभी को बांटने लगे। एक दिन नारायण स्वयं प्रकट हुए और उन्होंने नारद से कहा कि सच्ची भक्ति वाला ही ज्ञान का अधिकारी होता है। भगवान विष्णु ने उस बूढ़ी महिला को वैकुंठ धाम जाने का आशीर्वाद दिया और कहा कि जब भी कोई भक्त गुड़ और चना अर्पित करेगा उसकी मनोकामना निश्चित ही पूरी होगी। माना जाता है कि तभी से सभी ऋषि, मुनि और भक्त अपने इष्ट को गुड़ और चने का प्रसाद चढ़ाकर प्रसन्न करते आ रहे हैं। प्रचलित प्रसाद:– गुड़-चना, चना-मिश्री, नारियल-मिठाई, लड्डू, फल, दूध और सूखे मेवे। विष्णु भोग विष्णुजी को खीर या सूजी के हलवे का नैवेद्य बहुत पसंद है। खीर कई प्रकार से बनाई जाती है। खीर में किशमिश, बारीक कतरे हुए बादाम, बहुत थोड़ी-सी नारियल की कतरन, काजू, पिस्ता, चारौजी, थोड़े से पिसे हुए मखाने, सुगंध के लिए एक इलायची, कुछ केसर और अंत में तुलसी जरूर डालें। उसे उत्तम प्रकार से बनाएं और फिर विष्णुजी को भोग लगाने के बाद वितरित करें। भारतीय समाज में हलवे का बहुत महत्व है। कई तरह के हलवे बनते हैं लेकिन सूजी का हलवा विष्णुजी को बहुत प्रिय है। सूजी के हलवे में भी लगभग सभी तरह के सूखे मेवे मिलाकर उसे भी उत्तम प्रकार से बनाएं और भगवान को भोग लगाएं। प्रति रविवार और गुरुवार को विष्णु-लक्ष्मी मंदिर में जाकर विष्णुजी को उक्त उत्तम प्रकार का भोग लगाने से दोनों प्रसन्न होते हैं और उसके घर में किसी भी प्रकार से धन और समृद्धि की कमी नहीं होती है। शिव भोग शिव को भांग और पंचामृत का नैवेद्य पसंद है। भोले को दूध, दही, शहद, शकर, घी, जलधारा से स्नान कराकर भांग-धतूरा, गंध, चंदन, फूल, रोली, वस्त्र अर्पित किए जाते हैं। शिवजी को रेवड़ी, चिरौंजी और मिश्री भी अर्पित की जाती है। श्रावण मास में शिवजी का उपवास रखकर उनको गुड़, चना और चिरौंजी के अलावा दूध अर्पित करने से सभी तरह की मनोकामना पूर्ण होती है। श्री हनुमान भोग हनुमानजी को हलुआ, पंच मेवा, गुड़ से बने लड्डू या रोठ, डंठल वाला पान और केसर- भात बहुत पसंद हैं। इसके अलावा हनुमानजी को कुछ लोग इमरती भी अर्पित करते हैं।कोई व्यक्ति 5 मंगलवार कर हनुमानजी को चोला चढ़ाकर यह नैवेद्य लगाता है, तो उसके हर तरह के संकटों का अविलंब समाधान होता है। माँ लक्ष्मी भोग लक्ष्मीजी को धन की देवी माना

किस देवता या देवी को कौन सा प्रसाद चढ़ाना चाहिये ?? आप जिन देवता की भक्ति करते हो उन्हें चढ़ाए इस व्यंजन से बना हुआ प्रसाद भगवान होंगे प्रसन्न ! देंगे मनचाहा वरदान ! Read Post »

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कालसर्प दोष ( Kaalsarp yog )

काल सर्प दोष कुंडली में कब बनता है Kaalsarp dosh काल सर्प दोष, जानें लक्ष्ण और उपाय kalsarp dosh upay ज्योतिष में काल सर्प दोष को बहुत ही हानिकारक योग माना गया है। कहते हैं जिस व्यक्ति की कुंडली में यह काल सर्प दोष बनता हैं। उस व्यक्ति को जीवन में काफी संघर्ष करना पड़ता है। तो आइए जानते हैं काल सर्प दोष की पूजा विधि, फायदे और कालसर्प दोष के लक्षण।ज्योतिष शास्त्र में काल सर्प दोष को बहुत ही अशुभ माना गया है। कहा जाता है कि जिस व्यक्ति की कुंडली में काल सर्प दोष होता है तो व्यक्ति को जीवन में कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। कुंडली में काल सर्प दोष होने से व्यक्ति को मानसिक और शारीरिक रूप से प्रभावित होता है। इसलिए कालसर्प दोष की पूजा पूरे विधि विधान के साथ होना बेहद जरूरी है। आइए जानते हैं कालसर्प दोष क्या है, कालसर्प दोष की पूजा विधि और फायदे और कालसर्प दोष के लक्षण। कालसर्प दोष के लक्षण जिस व्यक्ति की कुंडली में काल सर्प दोष होते हैं इस व्यक्ति को अक्सर सपने में मृत लोग दिखाई देते हैं। इतना ही नहीं कुछ लोगों को तो यह भी दिखाई देता है कि कोई उनका गला दबा रहा हो। जिस व्यक्ति के जीवन में काल सर्प दोष होता है उसे जीवन में बहुत संघर्ष करना पड़ता है और जब उसको जरुरत होती है तब उसे अकेलापन महसूस होता है।कालसर्प से पीड़ित व्यक्ति के कारोबार पर काफी नकारात्मक असर पड़ता है। इसे व्यापार में बार बार हानी का सामना करना पड़ता है। इसके अलावा नींद में शरीर पर सांप को रेंगते देखना, सांप को खुद को डसते देखना। बात-बात पर जीवनसाथी से वाद विवाद होना। यदि रात में बार बार आपकी नींद खुलती है तो यह भी काल सर्प दोष का ही लक्षण है।इसके अलावा काल सर्प दोष से पीड़ित व्यक्ति को सपने में बार-बार लड़ाई झगड़ा दिखाई देता है। काल सर्प दोष के कारण व्यक्ति मानसिक और शारीरिक रूप से परेशान होता है। साथ ही सिर दर्द, त्वचारोग आदि भी कालसर्प दोष के लक्षण है। कुंडली में कब बनता है कालसर्प दोष ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, जब व्यक्ति की कुंडली में राहु और केतु के बीच जब सभी ग्रह आ जाते हैं तब काल सर्प दोष नामक योग का निर्माण होता है। कालसर्प दोष के उपाय कालसर्प दोष के कारण व्यक्ति को जीवन में काफी ज्यादा संघर्ष करना पड़ता है ऐसे में जल्द से जल्द इसका निवारण होना बेहद जरूरी है। आइए जानते हैं काल सर्प दोष के प्रभाव को कुछ कम करने के आसान उपाय। काल सर्प दोष से पीड़ित व्यक्ति को घर या मंदिर में जाकर रोजाना शिवलिंग पर अभिषेक करना चाहिए। प्रदोष तिथि के दिन शिव मंदिर में रुद्राभिषेक करना भी लाभकारी रहता है।इसके अलावा उस व्यक्ति को कुलदेवता की प्रतिदिन आराधना करनी चाहिए। प्रतिदिन महामृत्युंजय मंत्र का कम से कम 108 बार जप करना चाहिए।इसके अलावा हनुमान चालीसा का रोजाना 11 बार पाठ करना चाहिए। कालसर्प से पीड़ित व्यक्ति को अपने घर में मोरपंख रखने चाहिए।

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