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सकट चतुर्थी (संकष्टी चतुर्थी)

सकट चौथ (लम्बोदर संकष्टी) – 6 जनवरी 2026 के लिए विशेष मार्गदर्शन* 6 जनवरी 2026, मंगलवार को कृष्ण पक्ष चतुर्थी तिथि पर सकट चौथ / लम्बोदर संकष्टी मनाई जाएगी। यह तिथि विशेष रूप से संतानों के दीर्घायु, स्वास्थ्य और विघ्न नाश के लिए श्री गणेश जी की उपासना का दिन मानी जाती है। धनु राशि का सूर्य और कर्क से सिंह में गतिमान चन्द्र मन–दिमाग, घर–परिवार और मान–सम्मान पर विशेष प्रभाव देगा, इसलिए व्रत और साधना दोनों का फल तेज़ी से दिख सकता है। पूजन विधि (संक्षेप में) प्रातः स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र पहनकर व्रत का संकल्प लें – विशेषकर संतान, स्वास्थ्य और विघ्न नाश के लिए। घर के पूजा स्थान या उत्तर–पूर्व (ईशान) में श्री गणेश जी की मूर्ति/चित्र स्थापित करें; दीपक, धूप, अक्षत, दूर्वा, लाल पुष्प और मोदक/लड्डू अवश्य रखें। “ *ॐ गं गणपतये नमः* ” या “ *संकट नाशन गणेश स्तोत्र* ” का जप करें; कम से कम 11, 21 या 108 बार जप का संकल्प ले सकते हैं। चन्द्र उदय के बाद चन्द्रमा को शुद्ध जल, थोड़ी सी दुर्वा/अक्षत और दूध–शक्कर मिश्रित अर्घ्य दें, फिर व्रत खोलें। सकट चौथ की कथा सुनना/पढ़ना शास्त्रसम्मत माना गया है। आज क्या करें संतान, स्वास्थ्य और कर्ज से मुक्ति के लिए गणेश जी के समक्ष शांत मन से प्रार्थना करें। माता–पिता, बुजुर्गों और गुरुजन का आशीर्वाद अवश्य लें; कल का दिन परिवार–केन्द्रित संकल्पों के लिए अनुकूल है। जिनके ऊपर मानसिक दबाव, कोर्ट–कचहरी या जॉब में अड़चनें हैं, वे कल कम से कम 11 बार “ *ॐ वक्रतुंडाय हुं* ” का जप करें। शाम–रात्रि में अनावश्यक बहस से बचकर शान्त, संयमित व्यवहार रखें – इससे चन्द्र–मंगल के तनाव को काफी हद तक टाला जा सकता है। क्या न करें – विशेष चेतावनी* * *राहुकाल (15:14–16:35)* में बड़े आर्थिक निर्णय, यात्रा की शुरुआत या महत्वपूर्ण कागज़ पर हस्ताक्षर से यथासंभव बचें।* _व्रत रखते हुए भी अत्यधिक खाली पेट, शुगर/बीपी के मरीज कठोर निर्जल उपवास न करें; डॉक्टर की सलाह के अनुसार फलाहार/हल्का आहार रखें।_ * क्रोध, कटु वचन, पारिवारिक झगड़े और दिखावे के खर्च से विशेष रूप से बचें; *अश्लेषा–मघा प्रभाव से छोटी बात बड़ी बन सकती है।* * *आज गण्डमूल योग भी सक्रिय है* – यदि किसी शिशु का जन्म हो तो बाद में योग्य पंडित से गण्डमूल शांति करवाना शास्त्रीय रूप से उचित माना गया है; घबराने की आवश्यकता नहीं है, यह एक साधारण शांति–अनुष्ठान से संतुलित हो जाता है। अन्तिम संकेत* आजका दिन श्री गणेश की शरण लेकर पुराने “संकट” काटने और नये वर्ष के लिए स्पष्ट संकल्प लेने का है। यह सामान्य धार्मिक मार्गदर्शन है; व्यक्ति–विशेष उपाय और रत्न/दशा आधारित सलाह के लिए अपनी जन्मकुंडली अनुसार ही निर्णय लेना श्रेयस्कर है।

यम पंचक दीपदान

यम पंचक दीपदान दीपावली के पंच दिवसीय महापर्व पर पांचो दिन यमराज के निमित्त दीपदान करना चाहिए | 1. धनतेरस – संध्या उपरांत गेंहू के आटा से चौमुख दीपक बनाकर चार सफैद बात्ती व सरसों का तेल से युक्त करके उन दीपक को प्रज्ज्वलित करें।एक पलास के पत्ते पर दुध से बनी मिठाई के साथ दीपक को रखकर भगवान मृत्यु यम का स्मरण कर उसे घर से बाहर ले जाकर दक्षिण दिशा के ओर रख दें। अगर पलाश पता ना मिले तो गेंहू के ऊपर दीपक को रखें। धनतेरस के यम दीपदान से यम प्रसन्न होकर अकाल मृत्यु का हरण कर लेते हैं | 2. नरक चतुर्दशी के दिन इसी विधि से पुनः दीपदान होगा , इससे यम देव प्रसन्न हो हमारे पितरों को नरक से मुक्त करते हैं। पितृ दोष का शमन होता है | 3. दीपावली अमावस्या को यम दीपदान से भगवती श्री की कृपा प्राप्त होती है | 4. प्रतिपदा के यम दीपदान से शरीर के रोगों का शमन होता है। तंत्र अभिचार का नाश होता है | 5. यम द्वितीया के यम दीपदान से समस्त कामनाओं की पूर्ति होती है।अतः आप इन पांचों दिन यमराज के निमित्त दीपदान करें तो अति उत्तम। धनतेरस से लेकर द्वितीया तक प्रतिदिन प्रदोष काल में दीपक से घर को सजाना अवश्य चाहिए। मुख्य द्वार से लेकर हर कोने में। तुलसी जी के पास अवश्य।धनतेरस को गो घृत का 13 दीपक अवश्य प्रज्वलित करे | चतुर्दशी को सरसो तेल का 14 दीपक प्रज्वलित करे | अमावस्या को 27 गो घृत 27 सरसो तेल व 27 तिल तेल का दीपक प्रज्वलित कर पुजन स्थान पर देवताओं के निमित्त दीपदान अवश्य करें प्रतिपदा व द्वितीया को यथा सामर्थ्य दीपदान अवश्य करे |

धन, ऐश्वर्य और व्यापार में सफलता के लिए करें लक्ष्मी और कुबेर की संयुक्त आराधना (Lakshmi Kuber Puja Vidhi, Mantra, and Significance for Wealth & Prosperity)

देवी लक्ष्मी और भगवान कुबेर: धन, समृद्धि और ऐश्वर्य के अधिष्ठाता सनातन धर्म में धन, समृद्धि और ऐश्वर्य की बात होते ही सर्वप्रथम देवी लक्ष्मी और भगवान कुबेर का स्मरण होता है। ये दोनों ही दैवीय शक्तियाँ मानव जीवन में भौतिक और आध्यात्मिक उन्नति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। जहाँ देवी लक्ष्मी धन, वैभव, सौंदर्य और सौभाग्य की देवी हैं, वहीं भगवान कुबेर देवों के कोषाध्यक्ष और धन के संरक्षक के रूप में पूजे जाते हैं। इन दोनों की संयुक्त आराधना से जीवन में धन की प्राप्ति, उसका संरक्षण और निरंतर वृद्धि सुनिश्चित होती है। यह आलेख देवी लक्ष्मी और भगवान कुबेर के महत्व, उनकी पूजा विधि, उनसे जुड़ी कथाएँ और उनके संयुक्त पूजन के क्या है लाभ आइए जानते है देवी लक्ष्मी: धन, समृद्धि और सौभाग्य की देवीदेवी लक्ष्मी हिन्दू धर्म की सबसे पूजनीय देवियों में से एक हैं। उन्हें धन, समृद्धि (भौतिक और आध्यात्मिक), सौभाग्य, सौंदर्य और उर्वरता की देवी माना जाता है। वह भगवान विष्णु की पत्नी हैं और उनकी उपस्थिति के बिना कोई भी शुभ कार्य अधूरा माना जाता है। उत्पत्ति और स्वरूप: पौराणिक कथाओं के अनुसार, देवी लक्ष्मी की उत्पत्ति समुद्र मंथन के दौरान हुई थी। क्षीरसागर से प्रकट होने के बाद उन्होंने भगवान विष्णु को अपने पति के रूप में चुना। उनके स्वरूप को अत्यंत मनमोहक और शुभ माना जाता है। वे कमल पर विराजमान होती हैं, उनके हाथों में कमल पुष्प और स्वर्ण मुद्राएँ होती हैं, जो निरंतर झरती रहती हैं। उनके दोनों ओर गजराज (हाथी) उन्हें सूँड में जल भरकर स्नान कराते हुए दर्शाए जाते हैं, जो पवित्रता, शक्ति और वर्षा के माध्यम से समृद्धि का प्रतीक है। उनका वर्ण स्वर्ण या गुलाबी होता है और वे लाल वस्त्र धारण करती हैं, जो शक्ति और ऊर्जा का प्रतीक है। अष्टलक्ष्मी स्वरूप: देवी लक्ष्मी के आठ प्रमुख स्वरूप हैं, जिन्हें अष्टलक्ष्मी कहा जाता है। ये स्वरूप जीवन के विभिन्न पहलुओं में समृद्धि और कल्याण प्रदान करते हैं: 1. **आदि लक्ष्मी:** मूल देवी, जो सृष्टि के आरंभ से ही मौजूद हैं और मोक्ष प्रदान करती हैं। 2. **धन लक्ष्मी:** धन-संपदा और भौतिक समृद्धि की देवी। 3. **धान्य लक्ष्मी:** अन्न, धान्य और कृषि संबंधी समृद्धि की देवी। 4. **गज लक्ष्मी:** पशु धन, राजसी शक्ति और ऐश्वर्य की देवी। 5. **संतान लक्ष्मी:** संतान सुख और पारिवारिक वृद्धि की देवी। 6. **वीर लक्ष्मी (धैर्य लक्ष्मी):** साहस, धैर्य और शक्ति की देवी। 7. **विजय लक्ष्मी:** विजय, सफलता और बाधाओं पर काबू पाने की देवी। 8. **विद्या लक्ष्मी:** ज्ञान, शिक्षा और बुद्धि की देवी।ये अष्टलक्ष्मी स्वरूप दर्शाते हैं कि लक्ष्मी केवल भौतिक धन ही नहीं, बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में पूर्णता और समृद्धि प्रदान करती हैं। माता लक्ष्मी का महत्व: लक्ष्मी की कृपा के बिना जीवन में संतोष और सुख की कल्पना भी नहीं की जा सकती। वे केवल बैंक खातों में जमा धन ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, परिवार, ज्ञान, शांति और आध्यात्मिक उन्नति के रूप में भी समृद्धि प्रदान करती हैं। दीपावली, धनतेरस और शरद पूर्णिमा जैसे पर्व देवी लक्ष्मी की पूजा के लिए विशेष रूप से समर्पित हैं। उनकी पूजा से घर में सुख-शांति, धन-धान्य और सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है। माॕंं लक्ष्मी के प्रमुख मंत्र: महा लक्ष्मी मंत्र: “ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं सौं ॐ ह्रीं क ए ई ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं सकल ह्रीं सौं ऐं क्लीं श्रीं ह्रीं ॐ।” श्री लक्ष्मी बीज मंत्र: “ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः।” महालक्ष्मी अष्टकम: यह स्तोत्र देवी लक्ष्मी के विभिन्न स्वरूपों का गुणगान करता है और उनकी कृपा प्राप्त करने का एक शक्तिशाली माध्यम है। भगवान कुबेर: धन के संरक्षक और देवों के कोषाध्यक्षभगवान कुबेर हिन्दू धर्म में धन के देवता और देवताओं के कोषाध्यक्ष के रूप में पूजे जाते हैं। उन्हें यक्षों का राजा और उत्तर दिशा का दिक्पाल माना जाता है। वे केवल धन के दाता ही नहीं, बल्कि उसके कुशल प्रबंधक और संरक्षक भी हैं। उत्पत्ति और स्वरूप: भगवान कुबेर महर्षि विश्रवा और इडविडा के पुत्र हैं। वे लंकापति रावण के सौतेले भाई हैं। अपनी तपस्या से उन्होंने शिव जी को प्रसन्न कर धन का स्वामी और देवों का कोषाध्यक्ष होने का वरदान प्राप्त किया। उनका निवास स्थान कैलाश पर्वत के पास अलकापुरी में है। कुबेर देव का स्वरूप कुछ भिन्न है; वे अक्सर छोटे कद के, स्थूल शरीर वाले और धन के पात्र या थैली लिए हुए दर्शाए जाते हैं। उनके हाथ में एक गदा भी होती है। वे प्रायः एक नकुल (नेवला) के साथ भी चित्रित होते हैं, जो धन के रक्षक के रूप में जाना जाता है। भगवान कुबेर का महत्व: भगवान कुबेर की पूजा से व्यक्ति को धन की प्राप्ति के साथ-साथ उसकी सुरक्षा और वृद्धि का आशीर्वाद भी मिलता है। जहाँ देवी लक्ष्मी धन प्रदान करती हैं, वहीं भगवान कुबेर उस धन का सुचारु प्रबंधन और संरक्षण सुनिश्चित करते हैं। उनकी कृपा से व्यक्ति को आर्थिक स्थिरता, ऋण मुक्ति और अप्रत्याशित धन लाभ प्राप्त होता है। वे धन के सही उपयोग और निवेश में भी सहायता करते हैं। कुबेर देव को प्रसन्न करने से व्यक्ति के जीवन में कभी भी धन की कमी नहीं होती और वह समृद्धि के साथ जीवन व्यतीत करता है। भगवान कुबेर के प्रमुख मंत्र: कुबेर मूल मंत्र: “ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं वित्तेश्वराय नमः।” धन प्राप्ति कुबेर मंत्र: “ॐ यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धनधान्याधिपतये समृद्धिं मे देहि दापय स्वाहा।” कुबेर गायत्री मंत्र: “ॐ वैश्रवणाय विद्महे, नव निधये धीमहि, तन्नो कुबेरः प्रचोदयात्।” देवी लक्ष्मी और भगवान कुबेर की संयुक्त आराधना: धन की पूर्णतादेवी लक्ष्मी और भगवान कुबेर की संयुक्त आराधना का विशेष महत्व है। इन दोनों की पूजा एक-दूसरे की पूरक है और धन संबंधी सभी इच्छाओं की पूर्ति के लिए अत्यंत प्रभावी मानी जाती है। संयुक्त पूजा का महत्व: धन की प्राप्ति और संरक्षण: देवी लक्ष्मी धन प्रदान करती हैं, जबकि भगवान कुबेर उस धन का संरक्षण और सही प्रबंधन सुनिश्चित करते हैं। उनकी संयुक्त पूजा से व्यक्ति को धन की प्राप्ति होती है और वह धन उसके पास स्थायी रूप से रहता है, उसका अपव्यय नहीं होता। **व्यापार में वृद्धि:** व्यापारी वर्ग के लिए यह पूजा अत्यंत लाभकारी है। यह व्यापार में सफलता, लाभ और निरंतर वृद्धि प्रदान

दीपावली से पहले रमा एकादशी क्यों है खास? पूजा विधि, शुभ मुहूर्त और व्रत कथा

**रमा एकादशी: सौभाग्य, समृद्धि और मोक्ष का पावन पर्व** प्रत्येक वर्ष कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को रमा एकादशी का व्रत रखा जाता है। यह एकादशी दीपावली से ठीक चार दिन पहले आती है और इसे अत्यंत शुभ तथा फलदायी माना जाता है। भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी को समर्पित यह व्रत धन, धान्य, सुख-समृद्धि और आरोग्य प्रदान करने वाला है। ‘रमा’ देवी लक्ष्मी का ही एक नाम है, इसलिए इस एकादशी को रमा एकादशी कहा जाता है। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से व्रत रखने और पूजा करने से व्यक्ति के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। **रमा एकादशी का महत्व** हिंदू धर्म में एकादशी का व्रत भगवान विष्णु को समर्पित है और इसे सभी व्रतों में श्रेष्ठ माना जाता है। रमा एकादशी का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि यह देवी लक्ष्मी के नाम से जुड़ी है और दीपावली के आगमन का संकेत देती है। इस व्रत को करने से साधक को न केवल विष्णु जी का आशीर्वाद प्राप्त होता है, बल्कि देवी लक्ष्मी की कृपा से उसके घर में धन-धान्य की वृद्धि होती है। यह एकादशी व्यक्ति के जीवन में सकारात्मकता, शांति और समृद्धि लाती है।पद्म पुराण में रमा एकादशी के महत्व का विस्तृत वर्णन मिलता है। इस व्रत को करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं, दरिद्रता का नाश होता है और व्यक्ति को बैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है। यह व्रत शारीरिक और मानसिक शुद्धता के साथ-साथ आध्यात्मिक उन्नति का भी मार्ग प्रशस्त करता है। जो व्यक्ति निष्ठा और श्रद्धा के साथ इस व्रत का पालन करता है, उसे अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य प्राप्त होता है। **तिथि और शुभ मुहूर्त** रमा एकादशी कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को आती है। इसकी सटीक तिथि पंचांग के अनुसार बदल सकती है, लेकिन यह प्रायः अक्टूबर या नवंबर के महीने में पड़ती है। एकादशी तिथि का प्रारंभ और समापन समय महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि व्रत का संकल्प एकादशी तिथि के प्रारंभ में लिया जाता है और पारण द्वादशी तिथि में किया जाता है। व्रत के पारण का समय भी अत्यंत महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि द्वादशी तिथि के समाप्त होने से पहले और हरि वासर के बाद ही पारण करना चाहिए। **रमा एकादशी की व्रत कथा** रमा एकादशी की पावन कथा पद्म पुराण में वर्णित है, जो इस व्रत के महत्व को और भी बढ़ा देती है। प्राचीन काल में मुचुकुंद नाम के एक प्रतापी राजा थे, जो चंद्रभागा नगरी में राज्य करते थे। वे भगवान विष्णु के परम भक्त थे और न्यायप्रिय तथा धर्मात्मा शासक के रूप में विख्यात थे। राजा मुचुकुंद की एक अत्यंत सुंदर और गुणवान पुत्री थी, जिसका नाम चंद्रभागा था।राजा मुचुकुंद ने अपनी पुत्री चंद्रभागा का विवाह शोभन नामक एक राजकुमार से किया। शोभन एक धर्मात्मा और नेक हृदय का व्यक्ति था, लेकिन उसका स्वास्थ्य बहुत कमजोर था। वह शारीरिक रूप से दुर्बल था और बीमारियों से ग्रस्त रहता था। राजा मुचुकुंद के राज्य में सभी लोग, यहाँ तक कि उनके दामाद भी, एकादशी का व्रत नियमपूर्वक रखते थे।जब कार्तिक कृष्ण पक्ष की रमा एकादशी आई, तो चंद्रभागा और शोभन भी अपने पिता के घर पर थे। नगर में सभी लोग एकादशी व्रत की तैयारी कर रहे थे। चंद्रभागा ने अपने पति शोभन से कहा, “स्वामी! मेरे पिता के राज्य में एकादशी का व्रत बहुत कठोरता से रखा जाता है। इस दिन अन्न-जल ग्रहण नहीं किया जाता। यदि आप व्रत नहीं रखेंगे, तो आपको बहुत कष्ट होगा।”शोभन ने उत्तर दिया, “प्रिये! मैं तो अत्यंत दुर्बल हूँ। मुझसे निराहार व्रत कैसे हो पाएगा? यदि मैं जल भी नहीं पीऊँगा, तो संभव है कि मेरे प्राण ही निकल जाएँ।”चंद्रभागा बहुत चिंतित हुई। उसने सोचा कि यदि उसके पति ने व्रत नहीं रखा, तो उन्हें पाप लगेगा और यदि व्रत रखा, तो उनके प्राणों का संकट आ सकता है। वह अपने पिता राजा मुचुकुंद के पास गई और अपनी दुविधा बताई।राजा मुचुकुंद ने कहा, “बेटी, भगवान विष्णु की कृपा से सब संभव है। तुम अपने पति को हिम्मत दो। यदि वह शारीरिक रूप से अक्षम हैं, तो फलाहार या एक समय भोजन करके भी व्रत का पालन कर सकते हैं। किंतु व्रत का संकल्प और श्रद्धा महत्वपूर्ण है।” शोभन ने अपनी पत्नी चंद्रभागा की प्रेरणा और राजा मुचुकुंद के वचन सुनकर एकादशी का व्रत रखने का निश्चय किया। उसने संकल्प लिया कि वह यथाशक्ति व्रत का पालन करेगा। हालांकि, उसकी दुर्बलता के कारण वह व्रत के नियमों का पूरी तरह पालन नहीं कर पाया और व्रत के प्रभाव से उसकी मृत्यु हो गई।चंद्रभागा ने अपने पति की मृत्यु पर शोक व्यक्त किया, किंतु उसने अपने धर्म का पालन करते हुए स्वयं को सती नहीं किया, बल्कि अपने पिता के घर ही रहने का निर्णय लिया।रमा एकादशी के व्रत के प्रभाव से शोभन को अगले जन्म में मंदराचल पर्वत पर एक अत्यंत सुंदर और दिव्य नगरी प्राप्त हुई। यह नगरी धन-धान्य से परिपूर्ण थी और रत्नों से सुसज्जित थी। शोभन ने उस नगरी का राजा बनकर सुख-भोग किया। एक दिन, राजा मुचुकुंद के राज्य का एक ब्राह्मण, जो तीर्थ यात्रा पर निकला था, घूमते-घूमते मंदराचल पर्वत पर पहुँचा। उसने शोभन की दिव्य नगरी और उसके वैभव को देखा।उस ब्राह्मण ने शोभन को पहचान लिया और आश्चर्यचकित होकर पूछा, “राजकुमार शोभन! आप तो मृत हो चुके थे। यह सब कैसे संभव हुआ? इस अलौकिक नगरी का रहस्य क्या है?”शोभन ने ब्राह्मण को बताया, “यह सब मेरी पत्नी चंद्रभागा के पुण्य और रमा एकादशी के व्रत के प्रभाव से हुआ है। मैंने उस एकादशी का व्रत अत्यंत कठिनाई से रखा था, और उसी के पुण्य से मुझे यह दिव्य नगरी प्राप्त हुई है। किंतु, यह नगरी अस्थायी है, क्योंकि मैंने व्रत पूर्ण श्रद्धा से नहीं किया था। यदि चंद्रभागा यहाँ आकर मेरे साथ रहे, तो यह नगरी स्थायी हो सकती है।”ब्राह्मण ने वापस आकर चंद्रभागा को यह सारी बात बताई। चंद्रभागा अपने पति के जीवित होने और उनकी दिव्य नगरी के बारे में सुनकर अत्यंत प्रसन्न हुई। वह तुरंत उस ब्राह्मण के साथ मंदराचल पर्वत की ओर चल पड़ी। रास्ते में उन्हें देवगुरु बृहस्पति मिले, जिन्होंने चंद्रभागा को आशीर्वाद दिया और बताया कि उसके पति को

रमा एकादशी पर राशि अनुसार उपाय के लाभ !

रमा एकादशी 2025 : राशि अनुसार उपाय और उनका महत्व सनातन धर्म में एकादशी का व्रत भगवान विष्णु को समर्पित होता है, और आप जानते हैं क्या? सभी एकादशियों में रमा एकादशी का अपना एक खास महत्व है। ये कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को आती है – बिल्कुल दीपावली से पहले! इस दिन हम भगवान विष्णु के साथ-साथ देवी लक्ष्मी की भी पूजा करते हैं। और हाँ, ये व्रत सुख-समृद्धि और वैभव पाने के लिए बहुत ही फलदायी माना जाता है। शास्त्रों में लिखा है कि जो भी श्रद्धा से इस व्रत को करता है, उसके जीवन में धन, धान्य और अच्छी सेहत आती है। क्या आप जानते हैं रमा एकादशी का नाम कैसे पड़ा? दरअसल, देवी लक्ष्मी के एक स्वरूप को ‘रमा’ कहते हैं, और उन्हीं के नाम पर इसका नाम रखा गया है। लोगों का मानना है कि अगर आप इस दिन व्रत रखें और सही तरीके से पूजा करें, तो भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी दोनों का आशीर्वाद मिलता है। फिर क्या – घर में सुख-शांति और समृद्धि का माहौल बन जाता है! और हाँ, इस दिन जो भी दान-पुण्य या धार्मिक काम करते हैं, उसका फल कई गुना बढ़कर वापस मिलता है। इस दिन किए गए दान-पुण्य और धार्मिक अनुष्ठानों का फल कई गुना होकर वापस मिलता है। रमा एकादशी व्रत का महत्व: रमा एकादशी को ‘रंभा एकादशी’ भी कहा जाता है। यह व्रत चतुर्मास के अंतिम एकादशियों में से एक है, जब भगवान विष्णु क्षीरसागर में शयन कर रहे होते हैं। इस समय किए गए उपाय और पूजा-पाठ का विशेष फल मिलता है। इस दिन व्रत रखने से व्यक्ति के समस्त पापों का नाश होता है, उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है और जीवन में आने वाली सभी बाधाएं दूर होती हैं। यह व्रत विशेष रूप से धन-धान्य की वृद्धि, परिवार में सुख-शांति और दीर्घायु के लिए किया जाता है। सामान्य पूजा विधि: रमा एकादशी के दिन प्रातःकाल उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। व्रत का संकल्प लें और फिर धूप, दीप, चंदन, रोली, अक्षत, तुलसी दल, फल और मिष्ठान से भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी की पूजा करें। विष्णु सहस्त्रनाम या लक्ष्मी स्तोत्र का पाठ करना विशेष फलदायी होता है। दिन भर निराहार रहकर व्रत का पालन करें और शाम को भगवान की आरती करने के बाद फलाहार कर सकते हैं। अगले दिन द्वादशी को व्रत का पारण करें। राशि अनुसार उपाय का महत्व: ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, प्रत्येक व्यक्ति की अपनी एक विशेष राशि होती है, जिसका उसके जीवन, स्वभाव और भाग्य पर गहरा प्रभाव पड़ता है। ग्रहों की स्थिति और उनकी चाल के अनुसार हमारे जीवन में शुभ-अशुभ घटनाएं घटित होती हैं। जब हम अपनी राशि के अनुसार कोई विशेष उपाय या पूजा करते हैं, तो वह हमारी कुंडली में ग्रहों की स्थिति को अनुकूल बनाने में मदद करता है। रमा एकादशी के दिन राशि अनुसार उपाय करने से न केवल भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है, बल्कि संबंधित ग्रह भी मजबूत होते हैं, जिससे जीवन में अधिक सकारात्मकता और समृद्धि आती है। ये उपाय व्यक्ति की विशिष्ट समस्याओं को लक्षित करते हैं और उन्हें व्यक्तिगत रूप से अधिक लाभ पहुंचाते हैं।आइए जानते हैं रमा एकादशी पर अपनी राशि के अनुसार कौन से विशेष उपाय करने चाहिए:— मेष राशि (Aries): मेष राशि के जातकों के स्वामी मंगल देव हैं, जो ऊर्जा और पराक्रम के प्रतीक हैं। रमा एकादशी पर इन जातकों को भगवान विष्णु के नरसिंह स्वरूप और देवी लक्ष्मी के मंगलमयी स्वरूप की पूजा करनी चाहिए। उपाय: प्रातःकाल स्नान के बाद लाल वस्त्र धारण करें। भगवान विष्णु और लक्ष्मी जी को लाल चंदन, लाल फूल (जैसे गुड़हल) और लाल फल (जैसे अनार) अर्पित करें। विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें या “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का 108 बार जाप करें। दान:किसी गरीब व्यक्ति को लाल मसूर दाल या गुड़ का दान करें। लाभ:यह उपाय आपके क्रोध को शांत करेगा, शत्रु बाधा दूर करेगा और आत्मविश्वास में वृद्धि करेगा। धन संबंधी मामलों में भी लाभ होगा। वृषभ राशि (Taurus): वृषभ राशि के स्वामी शुक्र ग्रह हैं, जो धन, सौंदर्य और भौतिक सुखों के कारक हैं। इस राशि के जातकों को रमा एकादशी पर भगवान विष्णु के मोहिनी स्वरूप और देवी लक्ष्मी के धन लक्ष्मी स्वरूप की पूजा करनी चाहिए। उपाय: सफेद या गुलाबी वस्त्र धारण करें। भगवान विष्णु और लक्ष्मी जी को सफेद फूल (जैसे कमल या गुलाब), सफेद मिठाई और इत्र अर्पित करें। लक्ष्मी चालीसा या कनकधारा स्तोत्र का पाठ करें। दान: किसी सुहागिन स्त्री को सफेद वस्त्र, चावल या चीनी का दान करें। लाभ: यह उपाय आपके जीवन में सुख-समृद्धि लाएगा, आर्थिक स्थिति मजबूत करेगा और प्रेम संबंधों में मधुरता बढ़ाएगा। मिथुन राशि (Gemini): मिथुन राशि के स्वामी बुध ग्रह हैं, जो बुद्धि, वाणी और व्यापार के कारक हैं। इन जातकों को रमा एकादशी पर भगवान विष्णु के बुद्ध अवतार और देवी लक्ष्मी के विद्या लक्ष्मी स्वरूप की पूजा करनी चाहिए। उपाय: हरे वस्त्र धारण करें। भगवान को हरे रंग के फल (जैसे अमरूद), हरी इलायची और तुलसी दल अर्पित करें। “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” या “ॐ बुं बुधाय नमः” मंत्र का जाप करें। विष्णु पुराण का पाठ करना भी शुभ रहेगा। दान: किसी विद्यार्थी को पुस्तकें, कलम या हरी मूंग दाल का दान करें। लाभ: यह उपाय आपकी बुद्धि को तेज करेगा, वाणी में मधुरता लाएगा और व्यापार व करियर में सफलता दिलाएगा। कर्क राशि (Cancer): कर्क राशि के स्वामी चंद्रमा हैं, जो मन, माता और भावनाओं के कारक हैं। इन जातकों को रमा एकादशी पर भगवान विष्णु के कृष्ण स्वरूप और देवी लक्ष्मी के अन्नपूर्णा स्वरूप की पूजा करनी चाहिए। उपाय: सफेद वस्त्र धारण करें। भगवान को खीर, सफेद फूल (जैसे चमेली) और दूध से बनी मिठाई अर्पित करें। “ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चंद्रमसे नमः” मंत्र का जाप करें या चंद्र चालीसा का पाठ करें। दान: किसी जरूरतमंद को चावल, दूध या चांदी का दान करें। लाभ: यह उपाय आपके मन को शांत करेगा, मानसिक तनाव दूर करेगा और पारिवारिक सुख में वृद्धि करेगा। सिंह राशि (Leo): सिंह राशि के स्वामी सूर्य

धनतेरस: भगवान धन्वंतरि, लक्ष्मी-कुबेर पूजा और यमदीपदान कथा

Dhanteras 2025: Date, Shubh Muhurat & Why We Buy Gold **धनतेरस: धन, आरोग्य और सौभाग्य का महापर्व** भारत के सबसे बड़े और महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक, दीपावली, का शुभारंभ धनतेरस के पावन पर्व के साथ होता है। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को मनाया जाने वाला यह पर्व ‘धन’ और ‘तेरस’ के संयोजन से बना है, जहाँ ‘धन’ समृद्धि और ऐश्वर्य का प्रतीक है, वहीं ‘तेरस’ चंद्र पंचांग के अनुसार तेरहवीं तिथि को दर्शाता है। यह दिन न केवल भौतिक धन की प्राप्ति के लिए शुभ माना जाता है, बल्कि उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना के लिए भी विशेष महत्व रखता है। धनतेरस का पर्व हमें यह संदेश देता है कि सच्चा धन केवल सोना-चाँदी या मुद्रा नहीं, बल्कि निरोगी काया और मानसिक शांति भी है। यह दीपावली के पाँच दिवसीय उत्सव की शुरुआत का प्रतीक है, जो घरों में उत्साह, उमंग और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है।इस दिन भक्तजन विभिन्न प्रकार के अनुष्ठानों और परंपराओं का पालन करते हैं, जिनमें नए बर्तनों, सोने-चाँदी के आभूषणों की ख़रीददारी, भगवान धन्वंतरि, देवी लक्ष्मी और कुबेर की पूजा तथा यमराज के लिए दीपदान प्रमुख हैं। यह पर्व सदियों से भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग रहा है और इसकी जड़ें प्राचीन पौराणिक कथाओं और लोककथाओं में गहरी जमी हुई हैं, जो हमें जीवन के विभिन्न पहलुओं – स्वास्थ्य, धन और मृत्यु – के प्रति एक गहन दृष्टिकोण प्रदान करती हैं। धनतेरस का यह पावन अवसर हमें अपनी परंपराओं से जुड़ने, परिवार के साथ समय बिताने और आने वाली खुशियों का स्वागत करने का एक अद्भुत मौका देता है। **धनतेरस का शाब्दिक अर्थ और तिथि का महत्व** ‘धनतेरस’ शब्द दो संस्कृत शब्दों से मिलकर बना है: ‘धन’ और ‘तेरस’। ‘धन’ का अर्थ है संपत्ति, समृद्धि, ऐश्वर्य या कोई भी मूल्यवान वस्तु। यह केवल भौतिक संपत्ति जैसे सोना, चाँदी, नकदी तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसमें स्वास्थ्य, ज्ञान और परिवार का प्रेम भी शामिल है। भारतीय दर्शन में, ‘धन’ का अर्थ बहुत व्यापक है और यह जीवन की समग्र खुशहाली को दर्शाता है। वहीं, ‘तेरस’ का अर्थ है ‘तेरहवीं तिथि’। हिंदू पंचांग के अनुसार, प्रत्येक चंद्र मास को दो भागों में बांटा जाता है – कृष्ण पक्ष (घटते चंद्रमा का पखवाड़ा) और शुक्ल पक्ष (बढ़ते चंद्रमा का पखवाड़ा)। धनतेरस का पर्व कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की तेरहवीं तिथि को मनाया जाता है। इस तिथि को ‘त्रयोदशी’ भी कहते हैं।इस तिथि का चुनाव मात्र एक अंक नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरा ज्योतिषीय और पौराणिक महत्व है। तेरहवीं तिथि को कुछ विशेष नक्षत्रों और योगों के साथ जोड़ा जाता है, जो इस दिन को ख़रीददारी, पूजा-पाठ और नए कार्यों की शुरुआत के लिए अत्यधिक शुभ बनाते हैं। मान्यता है कि इस दिन किया गया कोई भी शुभ कार्य, विशेष रूप से धन से संबंधित, तेरह गुना अधिक फलदायी होता है। इसलिए लोग इस दिन धातु से बनी वस्तुएं, जैसे सोना, चाँदी, पीतल या तांबे के बर्तन ख़रीदते हैं, ताकि उनके घरों में धन और समृद्धि का तेरह गुना आगमन हो। यह तिथि दीपावली के मुख्य पर्व से ठीक दो दिन पहले आती है, जो इसे दीपावली की तैयारियों और उत्सव की शुरुआत के लिए एक आदर्श समय बनाती है। इस दिन का विशेष महत्व इसलिए भी है क्योंकि यह भगवान धन्वंतरि के प्रकट होने का दिन है, जो आयुर्वेद के जनक और देवताओं के वैद्य माने जाते हैं। उनका अवतरण भी समुद्र मंथन के दौरान तेरहवीं तिथि को ही हुआ था, जिससे इस दिन का आरोग्य संबंधी महत्व भी बढ़ जाता है। **पौराणिक कथाएँ और किंवदंतियाँ: धनतेरस से जुड़े गहरे रहस्य** धनतेरस के पर्व से कई पौराणिक कथाएँ और किंवदंतियाँ जुड़ी हुई हैं, जो इस दिन के महत्व और परंपराओं को समझने में मदद करती हैं। ये कथाएँ हमें न केवल इस पर्व की उत्पत्ति के बारे में बताती हैं, बल्कि जीवन, मृत्यु, स्वास्थ्य और धन के प्रति भारतीय दृष्टिकोण को भी दर्शाती हैं। **1. भगवान धन्वंतरि का प्राकट्य:** धनतेरस का सबसे महत्वपूर्ण और प्रचलित संबंध भगवान धन्वंतरि से है। यह माना जाता है कि समुद्र मंथन के दौरान, कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी के दिन ही भगवान धन्वंतरि अपने हाथों में अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे। समुद्र मंथन देवताओं और असुरों द्वारा अमरता प्राप्त करने के लिए किया गया एक विशाल प्रयास था, जिसमें से चौदह रत्नों की उत्पत्ति हुई थी। इन्हीं रत्नों में से एक भगवान धन्वंतरि थे, जिन्हें आयुर्वेद का जनक और देवताओं का वैद्य माना जाता है। उनके प्रकट होने के साथ ही, उन्होंने संसार को रोगों से मुक्ति दिलाने और दीर्घायु प्रदान करने का ज्ञान दिया। यही कारण है कि धनतेरस को ‘धन्वंतरि जयंती’ के रूप में भी मनाया जाता है और इस दिन अच्छे स्वास्थ्य की कामना के लिए भगवान धन्वंतरि की विशेष पूजा की जाती है। यह कथा हमें यह सिखाती है कि स्वास्थ्य ही सबसे बड़ा धन है और बिना अच्छे स्वास्थ्य के भौतिक धन का कोई महत्व नहीं है। **2. यमदीपदान की कथा (राजा हिम के पुत्र की कहानी):** धनतेरस की एक और महत्वपूर्ण कथा यमदीपदान से जुड़ी है, जो अकाल मृत्यु से बचाव का संदेश देती है। प्राचीन काल में, हिम नामक एक राजा थे, जिनके पुत्र की कुंडली में यह योग था कि विवाह के चौथे दिन सर्पदंश से उसकी मृत्यु हो जाएगी। जब राजकुमार का विवाह हुआ, तो उसकी नवविवाहिता पत्नी को इस भविष्यवाणी का पता चला। वह बहुत चतुर और बुद्धिमान थी। विवाह के चौथे दिन, उसने अपने पति को सोने-चाँदी के ढेर के बीच सोने नहीं दिया। उसने घर के मुख्य द्वार पर और पूरे महल में असंख्य दीपक जला दिए, ताकि हर कोना प्रकाशमान हो जाए। उसने अपने सभी आभूषण और सोने-चाँदी के सिक्के भी दरवाज़े के बाहर ढेर कर दिए।जब मृत्यु के देवता यमराज सर्प के रूप में राजकुमार के प्राण हरने आए, तो दीपों की चकाचौंध और आभूषणों की चमक से उनकी आँखें चौंधिया गईं। वे उस ढेर पर चढ़कर राजकुमार तक पहुँचने में असमर्थ रहे। पूरी रात यमराज उसी ढेर पर बैठे रहे और राजकुमार की पत्नी उन्हें कहानियाँ सुनाती रही और भजन गाती रही, ताकि राजकुमार सो न सके। भोर होने से पहले, यमराज को वापस लौटना पड़ा क्योंकि

स्कंधमाता की पूजाविधि – शक्ति की आराधना | भारतीय धर्म

माँ स्कंदमाता: नवदुर्गा का पंचम स्वरूपनवरात्रि के पावन पर्व पर, जब प्रकृति नवजीवन का संचार करती है और आध्यात्मिक ऊर्जा अपने चरम पर होती है, तब माँ दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की आराधना का विशेष महत्व होता है। इन नौ दिव्य रात्रियों में से पाँचवी रात्रि को जिस देवी की पूजा-अर्चना की जाती है, वे हैं माँ स्कंदमाता। यह स्वरूप ममता, वात्सल्य और परम शक्ति का अद्भुत संगम है। माँ स्कंदमाता, नवदुर्गा के पंचम स्वरूप के रूप में पूजी जाती हैं और उनकी आराधना से भक्तों को अलौकिक सुख, शांति और संतान सुख की प्राप्ति होती है। नाम का अर्थ और महत्व (नामकरण एवं व्युत्पत्ति) ‘स्कंदमाता’ नाम स्वयं उनके स्वरूप और महत्व को प्रकट करता है। यह दो शब्दों से मिलकर बना है: ‘स्कंद’ और ‘माता’। ‘स्कंद’ भगवान कार्तिकेय का एक नाम है, जिन्हें देवसेनापति और भगवान शिव-पार्वती के ज्येष्ठ पुत्र के रूप में जाना जाता है। ‘माता’ का अर्थ है जननी या माँ। इस प्रकार, स्कंदमाता का अर्थ हुआ ‘स्कंद की माता’ या ‘भगवान कार्तिकेय की जननी’। यह नाम ही उनकी सबसे बड़ी पहचान और महिमा का प्रतीक है।भगवान स्कंद, जिन्हें दक्षिण भारत में मुरुगन या सुब्रह्मण्यम के नाम से पूजा जाता है, देवों के सेनापति हैं जिन्होंने तारकासुर जैसे शक्तिशाली असुर का वध किया था। उनकी जननी होने के कारण, माँ स्कंदमाता को शक्ति और पराक्रम के साथ-साथ परम वात्सल्य और ममता का प्रतीक माना जाता है। वे अपने पुत्र स्कंद को अपनी गोद में लिए हुए हैं, जो उनकी ममतामयी छवि को दर्शाता है। इस स्वरूप में, वे न केवल एक देवी हैं, बल्कि एक आदर्श माँ भी हैं जो अपने पुत्र की रक्षा और पोषण करती हैं। दिव्य स्वरूप का वर्णन (दिव्य स्वरूप एवं iconography) माँ स्कंदमाता का स्वरूप अत्यंत भव्य, मनमोहक और शांत है, जो भक्तों के मन को शांति और सकारात्मकता से भर देता है। उनकी चार भुजाएँ हैं। वे अपने दो हाथों में कमल पुष्प धारण करती हैं, जो पवित्रता, सौंदर्य और आध्यात्मिक जागृति का प्रतीक है। कमल कीचड़ में खिलता है, फिर भी अपनी शुद्धता और सुंदरता बनाए रखता है, ठीक वैसे ही जैसे माँ अपने भक्तों को सांसारिक मोहमाया के बीच भी निर्मल और पवित्र रहने की प्रेरणा देती हैं।उनकी दाहिनी भुजा में, जो ऊपर की ओर उठी हुई है, वे अपने प्रिय पुत्र भगवान स्कंद (कार्तिकेय) को गोद में लिए हुए हैं। यह मुद्रा उनकी ममता और वात्सल्य को स्पष्ट रूप से दर्शाती है। भगवान स्कंद बाल रूप में माँ की गोद में विराजमान हैं, जो इस बात का प्रतीक है कि माँ अपने भक्तों को भी संतानवत प्रेम और सुरक्षा प्रदान करती हैं। उनका चौथा हाथ, जो नीचे की ओर झुका हुआ है, भक्तों को आशीर्वाद देने की मुद्रा (अभय मुद्रा) में होता है। यह मुद्रा भक्तों को भयमुक्त होने और सभी बाधाओं से मुक्ति पाने का आश्वासन देती है।माँ स्कंदमाता का वर्ण शुभ्र है, अर्थात वे श्वेत वर्ण की हैं, जो शांति, पवित्रता और ज्ञान का प्रतीक है। वे कमल के आसन पर विराजमान हैं, इसलिए उन्हें ‘पद्मासना’ देवी भी कहा जाता है। कमल पर आसीन होना यह दर्शाता है कि वे दिव्य लोकों में सर्वोच्च स्थान पर हैं और सांसारिक बंधनों से मुक्त हैं।उनका वाहन सिंह है, जो शक्ति, शौर्य और पराक्रम का प्रतीक है। एक ओर जहाँ वे अपने पुत्र को गोद में लेकर ममतामयी दिखती हैं, वहीं दूसरी ओर सिंह पर सवार होना उनकी अदम्य शक्ति और दुष्टों का नाश करने की क्षमता को दर्शाता है। यह स्वरूप बताता है कि माँ स्कंदमाता कोमल हृदय की होते हुए भी आवश्यकता पड़ने पर प्रचंड रूप धारण कर सकती हैं ताकि धर्म और न्याय की रक्षा की जा सके। यह duality उनके स्वरूप की अद्वितीय विशेषता है – वे एक ही समय में कोमल और शक्तिशाली हैं, शांत और प्रचंड हैं। पौराणिक कथा (पौराणिक पृष्ठभूमि एवं कथा) माँ स्कंदमाता के स्वरूप का गहरा संबंध भगवान कार्तिकेय की उत्पत्ति और तारकासुर वध की कथा से है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, तारकासुर नामक एक अत्यंत शक्तिशाली असुर था, जिसने अपनी कठोर तपस्या से ब्रह्मा जी से यह वरदान प्राप्त कर लिया था कि उसका वध केवल भगवान शिव के पुत्र ही कर सकते हैं। इस वरदान के कारण वह अत्यंत अहंकारी हो गया था और तीनों लोकों में हाहाकार मचा दिया था। देवतागण उसके अत्याचारों से त्रस्त थे और किसी भी तरह उससे मुक्ति पाना चाहते थे।समस्या यह थी कि भगवान शिव उस समय गहन तपस्या में लीन थे और माता सती के आत्मदाह के बाद उन्होंने विवाह न करने का प्रण ले लिया था। देवताओं ने कामदेव को भगवान शिव की तपस्या भंग करने के लिए भेजा, ताकि वे पार्वती से विवाह करें और उनके पुत्र तारकासुर का वध कर सकें। कामदेव ने अपने बाण चलाए, जिससे शिव की तपस्या भंग हुई, परंतु क्रोधित होकर शिव ने उन्हें भस्म कर दिया।बाद में, देवी पार्वती ने कठोर तपस्या की, जिससे प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उनसे विवाह किया। भगवान शिव और पार्वती के मिलन से ही भगवान स्कंद (कार्तिकेय) का जन्म हुआ। स्कंद को जन्म देने और उनका पोषण करने के कारण ही पार्वती का यह स्वरूप ‘स्कंदमाता’ कहलाया।भगवान स्कंद का जन्म एक विशेष उद्देश्य के लिए हुआ था – तारकासुर का वध। वे अत्यंत वीर, पराक्रमी और ज्ञानी थे। देवताओं ने उन्हें अपना सेनापति नियुक्त किया और उन्होंने अपनी अद्भुत शक्ति से तारकासुर का वध कर तीनों लोकों को उसके आतंक से मुक्ति दिलाई। इस प्रकार, माँ स्कंदमाता न केवल भगवान स्कंद की जननी हैं, बल्कि वे उस शक्ति का भी प्रतिनिधित्व करती हैं जो धर्म की रक्षा और दुष्टों के संहार के लिए एक दिव्य संतान को जन्म देती है और उसका पोषण करती है। उनकी गोद में विराजमान स्कंद यह दर्शाते हैं कि माँ अपने भक्तों को भी ज्ञान, शक्ति और विजय प्रदान करती हैं। पूजा का महत्व और शुभ फल (पूजा का महत्व एवं फल) नवरात्रि के पाँचवे दिन माँ स्कंदमाता की पूजा का विशेष महत्व है। उनकी आराधना से कई प्रकार के भौतिक और आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होते हैं: 1.संतान सुख की प्राप्ति: माँ स्कंदमाता को विशेष रूप से संतान प्राप्ति के लिए पूजा जाता है। जो दंपत्ति निःसंतान हैं या उत्तम संतान

माॕंं चंद्रघंटा की पूजा करने का सही तरीका – पूजा विधि और शुभ फल | भारतीय संस्कृति

इस बार पंचांग के अनुसार ऐसा अद्भुत संयोग बन रहा है जब माँ चंद्रघंटा की पूजा लगातार दो दिनों तक की जाएगी। आमतौर पर नवरात्रि का तीसरा दिन माँ चंद्रघंटा को समर्पित होता है, लेकिन इस बार तिथि और नक्षत्रों के विशेष संयोग के कारण भक्तों को 24 और 25 सितंबर दोनों दिन माँ चंद्रघंंटा की आराधना का अवसर मिलेगा। संयोग का कारण2025 में नवरात्रि का तीसरा दिन तृतीया तिथि और चतुर्थी तिथि के संयोग में आ रहा है। तिथि परिवर्तन की स्थिति के कारण श्रद्धालु 24 सितंबर को भी और 25 सितंबर को भी माँ चंद्रघंटा की पूजा कर सकेंगे।यह संयोग अत्यंत दुर्लभ माना गया है और इसे शुभ फलदायी भी बताया गया है। माँ चंद्रघंटा नवरात्रि के पावन पर्व का तीसरा दिन माँ दुर्गा के तृतीय स्वरूप, माँ चंद्रघंटा को समर्पित है। यह दिन भक्तों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि इस दिन माँ चंद्रघंटा की आराधना से असीम शांति, शक्ति और निर्भयता प्राप्त होती है। माँ चंद्रघंटा का नाम उनके मस्तक पर सुशोभित अर्धचंद्र से पड़ा है, जो घंटे के आकार का प्रतीत होता है। यह अर्धचंद्र उनकी सुंदरता और दिव्यता का प्रतीक है, साथ ही यह दर्शाता है कि वे अपने भक्तों के जीवन में शीतलता और शांति लाती हैं। स्वरूप और महिमा माँ चंद्रघंटा का स्वरूप अत्यंत भव्य और दिव्य है। उनका वर्ण स्वर्ण के समान चमकीला है, जो उनकी तेजोमय उपस्थिति को दर्शाता है। वे दस भुजाओं से सुशोभित हैं, जिनमें वे विभिन्न प्रकार के अस्त्र-शस्त्र धारण करती हैं। उनके एक हाथ में त्रिशूल, दूसरे में गदा, तीसरे में तलवार, चौथे में धनुष-बाण, पाँचवें में कमल का पुष्प, छठे में शंख, सातवें में अमृत कलश, आठवें में जप माला और नौवें में अभय मुद्रा तथा दसवें में वरद मुद्रा होती है। उनकी सवारी सिंह है, जो शक्ति और पराक्रम का प्रतीक है। सिंह पर सवार माँ चंद्रघंटा का यह स्वरूप भक्तों को यह संदेश देता है कि वे किसी भी चुनौती का सामना करने के लिए सदैव तत्पर रहती हैं।उनके मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र उनकी पहचान है। इस घंटे की ध्वनि इतनी तीव्र और भयंकर मानी जाती है कि यह समस्त नकारात्मक शक्तियों, दानवों और असुरों को भयभीत कर देती है। उनकी आँखों में करुणा और तेज का अद्भुत संगम है। उनका यह स्वरूप जितना उग्र और युद्ध के लिए तत्पर प्रतीत होता है, उतना ही शांत और सौम्य भी है। यह विरोधाभासी गुण उनके दिव्य स्वभाव को उजागर करते हैं, जहाँ वे दुष्टों का संहार करने वाली और भक्तों को शांति प्रदान करने वाली दोनों हैं। माँ चंद्रघंटा का यह स्वरूप भक्तों को भयमुक्त जीवन जीने की प्रेरणा देता है। वे अपने भक्तों को हर प्रकार के भय, बाधा और संकट से मुक्ति दिलाती हैं। उनकी उपासना से आत्मविश्वास में वृद्धि होती है और व्यक्ति किसी भी परिस्थिति में विचलित नहीं होता। पौराणिक कथाएँ और उत्पत्ति माँ चंद्रघंटा के प्राकट्य से जुड़ी कई पौराणिक कथाएँ प्रचलित हैं। एक कथा के अनुसार, जब पृथ्वी पर महिषासुर जैसे शक्तिशाली असुरों का अत्याचार बढ़ गया था और देवताओं को भी असुरो ने पराजित कर दिया था, तब ब्रह्मा, विष्णु और महेश सहित सभी देवताओं ने अपनी-अपनी शक्तियों का अंश प्रदान कर माँ दुर्गा को उत्पन्न किया। महिषासुर के आतंक को समाप्त करने के लिए माँ दुर्गा ने विभिन्न स्वरूप धारण किए, और उन्हीं में से एक स्वरूप माँ चंद्रघंटा का है।यह माना जाता है कि जब देवी ने चंद्रघंटा का रूप धारण किया, तब उनके घंटे की ध्वनि से तीनों लोक गूँज उठे। इस प्रचंड ध्वनि ने असुरों के हृदय में भय उत्पन्न कर दिया और उनकी सेना में भगदड़ मच गई। माँ चंद्रघंटा ने अपने दस हाथों में धारण किए गए अस्त्रों से उन दुष्टों का संहार किया और पृथ्वी पर शांति स्थापित की। उनका यह स्वरूप युद्ध के लिए पूरी तरह से तैयार, अत्यंत शक्तिशाली और क्रोधित प्रतीत होता है, लेकिन उनके भक्तों के लिए वे सदैव सौम्य और कल्याणकारी रहती हैं। एक अन्य कथा के अनुसार, भगवान शिव से विवाह करने के बाद, देवी पार्वती ने अपने मस्तक पर अर्धचंद्र धारण किया, जिसके कारण उन्हें चंद्रघंटा के नाम से जाना जाने लगा। यह स्वरूप उनके वैवाहिक जीवन की स्थिरता और शांति का प्रतीक भी माना जाता है। इस प्रकार, माँ चंद्रघंटा न केवल युद्ध की देवी हैं, बल्कि वे प्रेम, शांति और सद्भाव की प्रतीक भी हैं। प्रतीकात्मक महत्व और आध्यात्मिक अर्थ माँ चंद्रघंटा का प्रत्येक अंग और उनका समग्र स्वरूप गहन आध्यात्मिक महत्व रखता है: 1. स्वर्ण वर्ण: यह समृद्धि, शुद्धता और दिव्य प्रकाश का प्रतीक है। यह दर्शाता है कि माँ अपने भक्तों के जीवन को ज्ञान और धन से प्रकाशित करती हैं। 2. दस भुजाएँ: ये दसों दिशाओं पर देवी के नियंत्रण और उनकी सर्वव्यापकता को दर्शाती हैं। यह भी प्रतीक है कि वे अपने भक्तों को हर दिशा से आने वाले संकटों से बचाती हैं। 3. अस्त्र-शस्त्र: ये बुराई पर अच्छाई की विजय, आत्मरक्षा और धर्म की स्थापना के प्रतीक हैं। माँ अपने भक्तों को आंतरिक और बाहरी शत्रुओं से लड़ने की शक्ति प्रदान करती हैं। 4. सिंह की सवारी: सिंह साहस, शक्ति, दृढ़ संकल्प और निडरता का प्रतीक है। माँ सिंह पर सवार होकर यह संदेश देती हैं कि व्यक्ति को अपने जीवन के संघर्षों का सामना साहस और आत्मविश्वास के साथ करना चाहिए। 5. मस्तक पर अर्धचंद्र (घंटा): यह चंद्र शीतलता, शांति और संतुलन का प्रतीक है। घंटे की ध्वनि नकारात्मक ऊर्जा को दूर भगाती है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है। यह मन की चंचलता को शांत कर एकाग्रता प्रदान करने में भी सहायक है। 6. अभय और वरद मुद्राएँ: अभय मुद्रा भक्तों को भयमुक्त होने का आश्वासन देती है, जबकि वरद मुद्रा उन्हें आशीर्वाद और मनोवांछित फल प्रदान करने का प्रतीक है। 7. सौम्य और उग्र स्वरूप का संगम: यह दर्शाता है कि जीवन में संतुलन कितना महत्वपूर्ण है। माँ हमें सिखाती हैं कि आवश्यकता पड़ने पर हमें दृढ़ और शक्तिशाली होना चाहिए, लेकिन साथ ही हमें शांति और करुणा भी बनाए रखनी चाहिए। आध्यात्मिक रूप से, माँ चंद्रघंटा की उपासना से व्यक्ति के भीतर की नकारात्मकता, जैसे क्रोध, अहंकार, लोभ और मोह का नाश होता है। वे अपने

Shardiya Navratri 2025:शारदीय नवरात्री घटस्थापना (कलश स्थापना) का शुभ मुहूर्त

नवरात्रि, जिसका शाब्दिक अर्थ ‘नौ रातें’ है, हिंदू धर्म के सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है। यह शक्ति की देवी, दुर्गा, को समर्पित है, जो ब्रह्मांड की सृजन, पालन और संहारक शक्ति का प्रतिनिधित्व करती हैं। यह पर्व मुख्य रूप से वर्ष में दो बार मनाया जाता है: चैत्र नवरात्रि, जो वसंत ऋतु में आती है, और शारदीय नवरात्रि, जो शरद ऋतु के आगमन का प्रतीक है। शारदीय नवरात्रि का विशेष महत्व है क्योंकि यह माँ दुर्गा की महिषासुर पर विजय की कथा से जुड़ा है, और इसका समापन दसवें दिन विजयादशमी के रूप में होता है, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। यह नौ दिन साधकों के लिए गहन आध्यात्मिक अभ्यास, व्रत और देवी के नौ रूपों की पूजा का समय होता है। ​शारदीय नवरात्रि शुभ मुहूर्त ​वर्ष 2025 में शारदीय नवरात्रि का पावन पर्व सोमवार, 22 सितंबर से शुरू हो रहा है । इस वर्ष यह पर्व नौ की बजाय दस दिनों का होगा । यह एक अत्यंत शुभ लक्षण है, क्योंकि एक तिथि का बढ़ना अत्यधिक फलदायी माना जाता है। इस बार चतुर्थी तिथि 25 और 26 सितंबर दोनों दिन रहेगी, जिससे पर्व की अवधि में वृद्धि होगी । पंचांग के अनुसार, घटस्थापना (कलश स्थापना) का मुहूर्त शारदीय नवरात्र की तिथि (Shardiya Navratri 2025 Tithi) प्रतिपदा तिथि 22 सितंबर को देर रात 1:26 बजे से शुरू होकर 23 सितंबर को रात 2:57 बजे तक रहेगी । उदयातिथि के अनुसार, शारदीय नवरात्रि इस बार 22 सितंबर को ही मनाई जाएगी. कलश स्थापना के लिए दो अत्यंत शुभ मुहूर्त हैं: प्रातः काल का मुहूर्त: सुबह 6:15 बजे से सुबह 7:46 बजे तक । ​अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 11:55 बजे से 12:43 बजे तक । ​ सूर्योदय – सुबह 06 बजकर 09 मिनट पर सूर्यास्त – शाम 06 बजकर 18 मिनट पर चन्द्रोदय- सुबह 06 बजकर 25 मिनट पर चंद्रास्त- शाम 06 बजकर 30 मिनट पर ब्रह्म मुहूर्त – सुबह 04 बजकर 35 मिनट से 05 बजकर 22 मिनट तक विजय मुहूर्त – दोपहर 02 बजकर 15 मिनट से 03 बजकर 03 मिनट तक गोधूलि मुहूर्त – शाम 06 बजकर 18 मिनट से 06 बजकर 41 मिनट तक निशिता मुहूर्त – रात्रि 11 बजकर 50 मिनट से 12 बजकर 38 मिनट तक पर्व का समापन 2 अक्टूबर को विजयादशमी के साथ होगा, जिस दिन रावण दहन की परंपरा होती है । ​देवी के वाहन का महत्व देवी का आगमन और प्रस्थान सप्ताह के उस दिन के अनुसार होता है, जिस दिन नवरात्रि का प्रारंभ होता है । चूँकि इस साल शारदीय नवरात्रि का प्रारंभ सोमवार, 22 सितंबर को हो रहा है, माँ दुर्गा का आगमन गज (हाथी) पर होगा । हाथी पर सवार होकर आना एक अत्यंत शुभ लक्षण माना जाता है । यह पूरे वर्ष सुख-समृद्धि और सौभाग्य का संचार करने का प्रतीक है । इसके विपरीत, प्रस्थान का वाहन मनुष्य है, जो एक अलग प्रतीकात्मक अर्थ रखता है । नवरात्रि की उत्पत्ति (Shardiya Navratri 2025 Significance) नवरात्रि का पौराणिक आधार महाशक्ति दुर्गा की महासुर महिषासुर पर विजय की कहानी से जुड़ा है । पौराणिक कथा के अनुसार, महिषासुर नामक एक अत्यंत शक्तिशाली दानव था, जिसका जन्म एक ऋषिवर और एक भैंस के मिलन से हुआ था । अपनी कठोर तपस्या से उसने ब्रह्मा से यह वरदान प्राप्त कर लिया था कि उसे कोई भी देवता या पुरुष नहीं मार पाएगा; उसकी मृत्यु केवल एक स्त्री के हाथों से ही संभव थी । इस वरदान के अहंकार में चूर होकर, महिषासुर ने तीनों लोकों पर अत्याचार करना शुरू कर दिया। उसने स्वर्ग पर आक्रमण कर देवताओं को पराजित कर दिया, जिसमें भगवान विष्णु और शिव भी शामिल थे । ​अपनी हार से हताश होकर, सभी देवता ब्रह्मा, विष्णु और महेश के पास सहायता के लिए पहुँचे। अपनी सामूहिक ऊर्जाओं को एक साथ मिलाकर, इन देवताओं ने एक नई, सर्वोच्च नारी शक्ति का निर्माण किया, जिसे दुर्गा कहा गया । इस प्रक्रिया में, प्रत्येक देवता ने अपने विशिष्ट हथियार देवी को प्रदान किए। शिव ने अपना त्रिशूल दिया, विष्णु ने अपना चक्र दिया, वरुण ने शंख दिया, और अन्य देवताओं ने भी अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र दिए । हिमवान ने उन्हें सिंह का वाहन भेंट किया । यह प्रतीकात्मक रूप से दर्शाता है कि देवी दुर्गा कोई अलग शक्ति नहीं हैं, बल्कि वे सभी दिव्य शक्तियों का एक एकीकृत और अंतिम रूप हैं । ​इसके बाद, देवी दुर्गा ने अपनी भयंकर गर्जना से महिषासुर के असुरों को युद्ध के लिए चुनौती दी । नौ दिनों तक चले इस भयंकर युद्ध में, महिषासुर ने विभिन्न मायावी रूप धारण कर देवी को छलने का प्रयास किया। कभी वह एक क्रूर शेर बनता, तो कभी एक विशाल हाथी । अंत में, नौवें दिन, देवी ने अपने चक्र से महिषासुर का सिर काट दिया, जिससे धर्म की विजय हुई और ब्रह्मांडीय व्यवस्था पुनः स्थापित हुई । नवरात्रि में जिन नौ देवियों की पूजा होती है, वे कोई अलग-अलग देवता नहीं हैं, बल्कि वे एक ही महाशक्ति के नौ अलग-अलग स्वरूप हैं । ये नौ स्वरूप मानव चेतना के विभिन्न आध्यात्मिक चरणों और गुणों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो हमें अज्ञानता से मुक्ति की ओर ले जाते हैं। ● शैलपुत्री (पहला दिन): हिमालय की पुत्री, ये देवी किसी भी अनुभव के शिखर पर स्थित दिव्यता का प्रतीक हैं। वे जीवन में स्थिरता और समृद्धि लाती हैं । ●​ब्रह्मचारिणी (दूसरा दिन): यह स्वरूप गहन तपस्या और शुद्ध, अछूती ऊर्जा का प्रतीक है। उनकी पूजा से साधक को स्वतः ही सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं । ●​चंद्रघंटा (तीसरा दिन): यह रूप मन को मोहित करने वाली सुंदरता का प्रतीक है। ये सभी प्राणियों में मौजूद सौंदर्य का स्रोत हैं । ●​कूष्माण्डा (चौथा दिन): इन्हें प्राण ऊर्जा का पुंज माना जाता है, जो सूक्ष्मतम जगत से लेकर विशालतम ब्रह्मांड तक फैली हुई है। ये निराकार होकर भी सभी रूपों को जन्म देती हैं । ●​स्कंदमाता (पांचवां दिन): ये संपूर्ण ब्रह्मांड की संरक्षिका और सभी ज्ञान प्रणालियों की जननी हैं । ●​कात्यायनी (छठा दिन): चेतना के द्रष्टा पहलू से निकलने वाली ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करती हैं, जो सहज ज्ञान की शक्ति लाती हैं। इन्हें मन की शक्ति भी कहा गया है, और रुक्मिणी ने भगवान कृष्ण को पति

अनन्त चतुर्दशी व्रत कथा एवं पूजा-विधि,अनन्त चतुर्दशी माहात्म्य एवं रहस्य, अनन्त नारायण स्तोत्रम् (हिंदी अर्थ सहित)

01. अनन्त चतुर्दशी व्रत कथा एवं पूजा-विधि 02. अनन्त चतुर्दशी माहात्म्य एवं रहस्य 03.अनन्त नारायण स्तोत्रम् (हिंदी अर्थ सहित) अनन्त चतुर्दशी व्रत भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी 06 सितंबर शनिवार 2025 १.ॐ श्रीं अनंताय नमः २ॐ ह्रीं नमो नारायणाय अनन्ताय श्रीं ॐ ३.ॐ अनन्तदेवाय च विदमहे विश्वरूपाय धीमहि तन्नो विष्णु प्रचोदयात् ४..अनन्तं ध्यायामहे विश्वरूपं प्रपद्यामहे।अनादिनित्यं विष्णुं तन्नो मोक्षाय प्रचोदयात् ॥ ५..ॐ नमो भगवते अनन्ताय विश्वरूपाय सर्वेश्वरायप्रलयकालानलसंहारकाय महापुरुषाय परब्रह्मणे नमः । ॐ अनन्तोऽसि अनन्तबाहो अनन्तशक्ते अनन्तगतेमाम् अमृतत्वाय पावय पावय नमः ॥ अनन्त चतुर्दशी व्रत कथा एवं पूजा-विधि अनन्त चतुर्दशी का महत्वअनन्त चतुर्दशी का पर्व भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी को मनाया जाता है। यह दिन भगवान विष्णु के “अनन्त” स्वरूप की उपासना के लिए अत्यंत पवित्र माना गया है।शास्त्रों में कहा गया है – इस दिन भगवान नारायण ने विराट विश्वरूप धारण कर समस्त ब्रह्माण्ड को अपने सूक्ष्म शरीर में धारण किया। अनंत चतुर्दशी व्रत रखने से या इस दिन भगवान अनंत के मंत्रों के जाप से बर्ष भर अनजाने में किए भक्ष्य अभक्ष्य के दोष से मुक्ति मिलती है। अनंत चतुर्दशी के व्रत से मनोकामना पूरी होने का योग बनता है। अनन्त चतुर्दशी पर व्रत रखने से धन, सुख, संतान, दीर्घायु तथा जीवन में स्थिरता प्राप्त होती है। इस दिन गणेश प्रतिमा विसर्जन भी होता है, अतः यह पर्व दोहरी महिमा से युक्त है।–2025 का शुभ समयभाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी 06 सितंबर शनिवार 2025तिथि आरंभ: 6 सितम्बर, प्रातः 03:12 बजेतिथि समाप्ति: 7 सितम्बर, प्रातः 01:41 बजेपूजा का श्रेष्ठ समय: 6 सितम्बर प्रातः 05:21 बजे से लेकर रात्रि 01:41 बजे तक व्रत पूर्व तैयारी 1. प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ पीले या सफेद वस्त्र धारण करें। 2. घर के पवित्र स्थान को गंगाजल से शुद्ध करें। 3. लकड़ी की चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर उस पर भगवान विष्णु और गणेश जी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। 4. एक कलश स्थापित करें – उसमें पवित्र जल, आम की पत्तियाँ रखें और ऊपर नारियल रखें। 5. अनन्त सूत्र तैयार करें – यह पीले या लाल धागे का होता है जिसमें 14 गांठें होती हैं। अनन्त चतुर्दशी व्रत-विधि 1. दीपक व धूप जलाकर भगवान की स्तुति करें। 2. भगवान गणेश का पूजन करें और फिर विष्णुजी का ध्यान करें –“शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं, विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्ण शुभाङ्गम्।लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं, वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥” 3. चौकी पर 14 तिलक करें और हर तिलक पर 1 पूड़ी और 1 पुआ (या मिठाई) अर्पित करें। यह 14 लोकों का प्रतीक है। 4. पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, गुड़) से भगवान का अभिषेक करें और पूजा में प्रयोग करें। भगवान विष्णु कीकिसी भी पूजा में तुलसी दल अवश्य चढ़ाएं और उनके प्रसाद में तुलसी दल अवश्य मिलाकर अर्पित करें। 5. अनन्त सूत्र को पंचामृत में डुबोकर भगवान विष्णु के चरणों में अर्पित करें। 6. पूजा के बाद सूत्र को पुरुष दाहिनी बांह में और स्त्रियाँ बायीं बांह में बाँधती हैं।इस समय मंत्र जपें –“ॐ अनन्ताय नमः” 7. फल, पुष्प, तुलसीदल, नारियल और नैवेद्य अर्पित करें। 8. इसके बाद अनन्त चतुर्दशी की व्रत-कथा सुनें। और आरती करें।(श्रद्धालु चाहे तो इस दिन विष्णु सहस्रनाम एवं पुरुष सूक्त कापाठ भी कर सकते हैं।)इस प्रकार श्रद्धापूर्वक अनन्त चतुर्दशी व्रत-पूजन करने से भगवान विष्णु अपने भक्तों को अनन्त आशीर्वाद प्रदान करते हैं। व्रत का नियम इस दिन उपवास रखें और केवल फलाहार करें।पूजा के बाद प्रसाद ग्रहण करें।अनन्त सूत्र 14 दिन तक धारण करना चाहिए।व्रत का संकल्प 14 वर्षों तक करने की परंपरा है। चौदह बर्ष करने के बाद उद्यापन कर व्रत छोड़ सकते हैं | व्रत का फलपाप नाश होता है।रोग, शोक और क्लेश दूर होते हैं।धन-धान्य और सुख-समृद्धि प्राप्त होती है।संतान-सुख और वैवाहिक जीवन में स्थिरता आती है।अंततः मोक्ष की प्राप्ति होती है। अनंत चतुर्दशी व्रत कथा एक बार महाराज युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ किया। उस समय यज्ञ मंडप का निर्माण सुंदर तो था ही, अद्भुत भी था वह यज्ञ मंडप इतना मनोरम था कि जल व थल की भिन्नता प्रतीत ही नहीं होती थी। जल में स्थल तथा स्थल में जल की भांति प्रतीत होती थी। बहुत सावधानी करने पर भी बहुत से व्यक्ति उस अद्भुत मंडप में धोखा खा चुके थे।एक बार कहीं से टहलते-टहलते दुर्योधन भी उस यज्ञ-मंडप में आ गया और एक तालाब को स्थल समझ उसमें गिर गया। द्रौपदी ने यह देखकर ‘अंधों की संतान अंधी’ कह कर उनका उपहास किया। इससे दुर्योधन चिढ़ गया। यह बात उसके हृदय में बाण समान लगी। उसके मन में द्वेष उत्पन्न हो गया और उसने पांडवों से बदला लेने की ठान ली। उसके मस्तिष्क में उस अपमान का बदला लेने के लिए विचार उपजने लगे। उसने बदला लेने के लिए पांडवों को द्यूत-क्रीड़ा में हरा कर उस अपमान का बदला लेने की सोची। उसने पांडवों को जुए में पराजित कर दिया। पराजित होने पर प्रतिज्ञानुसार पांडवों को बारह वर्ष के लिए वनवास भोगना पड़ा। वन में रहते हुए पांडव अनेक कष्ट सहते रहे। एक दिन भगवान कृष्ण जब मिलने आए, तब युधिष्ठिर ने उनसे अपना दुख कहा और दुख दूर करने का उपाय पूछा। तब श्रीकृष्ण ने कहा- ‘हे युधिष्ठिर! तुम विधिपूर्वक अनंत भगवान का व्रत करो, इससे तुम्हारा सारा संकट दूर हो जाएगा और तुम्हारा खोया राज्य पुन: प्राप्त हो जाएगा।’ इस संदर्भ में श्रीकृष्ण ने उन्हें एक कथा सुनाई – प्राचीन काल में सुमंत नाम का एक नेक तपस्वी ब्राह्मण था। उसकी पत्नी का नाम दीक्षा था। उसकी एक परम सुंदरी धर्मपरायण तथा ज्योतिर्मयी कन्या थी। जिसका नाम सुशीला था। सुशीला जब बड़ी हुई तो उसकी माता दीक्षा की मृत्यु हो गई। पत्नी के मरने के बाद सुमंत ने कर्कशा नामक स्त्री से दूसरा विवाह कर लिया। सुशीला का विवाह ब्राह्मण सुमंत ने कौंडिन्य ऋषि के साथ कर दिया। विदाई में कुछ देने की बात पर कर्कशा ने दामाद को कुछ ईंटें और पत्थरों के टुकड़े बांध कर दे दिए। कौंडिन्य ऋषि दुखी हो अपनी पत्नी को लेकर अपने आश्रम की ओर चल दिए। परंतु रास्ते में ही रात हो गई। वे नदी तट पर संध्या करने लगे।सुशीला ने देखा- वहां पर बहुत-सी स्त्रियां सुंदर वस्त्र धारण कर किसी देवता की पूजा पर रही थीं। सुशीला के पूछने पर उन्होंने विधिपूर्वक अनंत व्रत की महत्ता बताई। सुशीला ने वहीं उस व्रत का अनुष्ठान किया और चौदह गांठों वाला डोरा हाथ में

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