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व्रत, पूजाविधि और विशेषताएं Method Of Worship

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व्रत, पूजाविधि और विशेषताएं Method Of Worship

Shardiya Navratri 2025:शारदीय नवरात्री घटस्थापना (कलश स्थापना) का शुभ मुहूर्त

नवरात्रि, जिसका शाब्दिक अर्थ ‘नौ रातें’ है, हिंदू धर्म के सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है। यह शक्ति की देवी, दुर्गा, को समर्पित है, जो ब्रह्मांड की सृजन, पालन और संहारक शक्ति का प्रतिनिधित्व करती हैं। यह पर्व मुख्य रूप से वर्ष में दो बार मनाया जाता है: चैत्र नवरात्रि, जो वसंत ऋतु में आती है, और शारदीय नवरात्रि, जो शरद ऋतु के आगमन का प्रतीक है। शारदीय नवरात्रि का विशेष महत्व है क्योंकि यह माँ दुर्गा की महिषासुर पर विजय की कथा से जुड़ा है, और इसका समापन दसवें दिन विजयादशमी के रूप में होता है, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। यह नौ दिन साधकों के लिए गहन आध्यात्मिक अभ्यास, व्रत और देवी के नौ रूपों की पूजा का समय होता है। ​शारदीय नवरात्रि शुभ मुहूर्त ​वर्ष 2025 में शारदीय नवरात्रि का पावन पर्व सोमवार, 22 सितंबर से शुरू हो रहा है । इस वर्ष यह पर्व नौ की बजाय दस दिनों का होगा । यह एक अत्यंत शुभ लक्षण है, क्योंकि एक तिथि का बढ़ना अत्यधिक फलदायी माना जाता है। इस बार चतुर्थी तिथि 25 और 26 सितंबर दोनों दिन रहेगी, जिससे पर्व की अवधि में वृद्धि होगी । पंचांग के अनुसार, घटस्थापना (कलश स्थापना) का मुहूर्त शारदीय नवरात्र की तिथि (Shardiya Navratri 2025 Tithi) प्रतिपदा तिथि 22 सितंबर को देर रात 1:26 बजे से शुरू होकर 23 सितंबर को रात 2:57 बजे तक रहेगी । उदयातिथि के अनुसार, शारदीय नवरात्रि इस बार 22 सितंबर को ही मनाई जाएगी. कलश स्थापना के लिए दो अत्यंत शुभ मुहूर्त हैं: प्रातः काल का मुहूर्त: सुबह 6:15 बजे से सुबह 7:46 बजे तक । ​अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 11:55 बजे से 12:43 बजे तक । ​ सूर्योदय – सुबह 06 बजकर 09 मिनट पर सूर्यास्त – शाम 06 बजकर 18 मिनट पर चन्द्रोदय- सुबह 06 बजकर 25 मिनट पर चंद्रास्त- शाम 06 बजकर 30 मिनट पर ब्रह्म मुहूर्त – सुबह 04 बजकर 35 मिनट से 05 बजकर 22 मिनट तक विजय मुहूर्त – दोपहर 02 बजकर 15 मिनट से 03 बजकर 03 मिनट तक गोधूलि मुहूर्त – शाम 06 बजकर 18 मिनट से 06 बजकर 41 मिनट तक निशिता मुहूर्त – रात्रि 11 बजकर 50 मिनट से 12 बजकर 38 मिनट तक पर्व का समापन 2 अक्टूबर को विजयादशमी के साथ होगा, जिस दिन रावण दहन की परंपरा होती है । ​देवी के वाहन का महत्व देवी का आगमन और प्रस्थान सप्ताह के उस दिन के अनुसार होता है, जिस दिन नवरात्रि का प्रारंभ होता है । चूँकि इस साल शारदीय नवरात्रि का प्रारंभ सोमवार, 22 सितंबर को हो रहा है, माँ दुर्गा का आगमन गज (हाथी) पर होगा । हाथी पर सवार होकर आना एक अत्यंत शुभ लक्षण माना जाता है । यह पूरे वर्ष सुख-समृद्धि और सौभाग्य का संचार करने का प्रतीक है । इसके विपरीत, प्रस्थान का वाहन मनुष्य है, जो एक अलग प्रतीकात्मक अर्थ रखता है । नवरात्रि की उत्पत्ति (Shardiya Navratri 2025 Significance) नवरात्रि का पौराणिक आधार महाशक्ति दुर्गा की महासुर महिषासुर पर विजय की कहानी से जुड़ा है । पौराणिक कथा के अनुसार, महिषासुर नामक एक अत्यंत शक्तिशाली दानव था, जिसका जन्म एक ऋषिवर और एक भैंस के मिलन से हुआ था । अपनी कठोर तपस्या से उसने ब्रह्मा से यह वरदान प्राप्त कर लिया था कि उसे कोई भी देवता या पुरुष नहीं मार पाएगा; उसकी मृत्यु केवल एक स्त्री के हाथों से ही संभव थी । इस वरदान के अहंकार में चूर होकर, महिषासुर ने तीनों लोकों पर अत्याचार करना शुरू कर दिया। उसने स्वर्ग पर आक्रमण कर देवताओं को पराजित कर दिया, जिसमें भगवान विष्णु और शिव भी शामिल थे । ​अपनी हार से हताश होकर, सभी देवता ब्रह्मा, विष्णु और महेश के पास सहायता के लिए पहुँचे। अपनी सामूहिक ऊर्जाओं को एक साथ मिलाकर, इन देवताओं ने एक नई, सर्वोच्च नारी शक्ति का निर्माण किया, जिसे दुर्गा कहा गया । इस प्रक्रिया में, प्रत्येक देवता ने अपने विशिष्ट हथियार देवी को प्रदान किए। शिव ने अपना त्रिशूल दिया, विष्णु ने अपना चक्र दिया, वरुण ने शंख दिया, और अन्य देवताओं ने भी अपने-अपने अस्त्र-शस्त्र दिए । हिमवान ने उन्हें सिंह का वाहन भेंट किया । यह प्रतीकात्मक रूप से दर्शाता है कि देवी दुर्गा कोई अलग शक्ति नहीं हैं, बल्कि वे सभी दिव्य शक्तियों का एक एकीकृत और अंतिम रूप हैं । ​इसके बाद, देवी दुर्गा ने अपनी भयंकर गर्जना से महिषासुर के असुरों को युद्ध के लिए चुनौती दी । नौ दिनों तक चले इस भयंकर युद्ध में, महिषासुर ने विभिन्न मायावी रूप धारण कर देवी को छलने का प्रयास किया। कभी वह एक क्रूर शेर बनता, तो कभी एक विशाल हाथी । अंत में, नौवें दिन, देवी ने अपने चक्र से महिषासुर का सिर काट दिया, जिससे धर्म की विजय हुई और ब्रह्मांडीय व्यवस्था पुनः स्थापित हुई । नवरात्रि में जिन नौ देवियों की पूजा होती है, वे कोई अलग-अलग देवता नहीं हैं, बल्कि वे एक ही महाशक्ति के नौ अलग-अलग स्वरूप हैं । ये नौ स्वरूप मानव चेतना के विभिन्न आध्यात्मिक चरणों और गुणों का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो हमें अज्ञानता से मुक्ति की ओर ले जाते हैं। ● शैलपुत्री (पहला दिन): हिमालय की पुत्री, ये देवी किसी भी अनुभव के शिखर पर स्थित दिव्यता का प्रतीक हैं। वे जीवन में स्थिरता और समृद्धि लाती हैं । ●​ब्रह्मचारिणी (दूसरा दिन): यह स्वरूप गहन तपस्या और शुद्ध, अछूती ऊर्जा का प्रतीक है। उनकी पूजा से साधक को स्वतः ही सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं । ●​चंद्रघंटा (तीसरा दिन): यह रूप मन को मोहित करने वाली सुंदरता का प्रतीक है। ये सभी प्राणियों में मौजूद सौंदर्य का स्रोत हैं । ●​कूष्माण्डा (चौथा दिन): इन्हें प्राण ऊर्जा का पुंज माना जाता है, जो सूक्ष्मतम जगत से लेकर विशालतम ब्रह्मांड तक फैली हुई है। ये निराकार होकर भी सभी रूपों को जन्म देती हैं । ●​स्कंदमाता (पांचवां दिन): ये संपूर्ण ब्रह्मांड की संरक्षिका और सभी ज्ञान प्रणालियों की जननी हैं । ●​कात्यायनी (छठा दिन): चेतना के द्रष्टा पहलू से निकलने वाली ऊर्जा का प्रतिनिधित्व करती हैं, जो सहज ज्ञान की शक्ति लाती हैं। इन्हें मन की शक्ति भी कहा गया है, और रुक्मिणी ने भगवान कृष्ण को पति

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अनन्त चतुर्दशी व्रत कथा एवं पूजा-विधि,अनन्त चतुर्दशी माहात्म्य एवं रहस्य, अनन्त नारायण स्तोत्रम् (हिंदी अर्थ सहित)

01. अनन्त चतुर्दशी व्रत कथा एवं पूजा-विधि 02. अनन्त चतुर्दशी माहात्म्य एवं रहस्य 03.अनन्त नारायण स्तोत्रम् (हिंदी अर्थ सहित) अनन्त चतुर्दशी व्रत भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी 06 सितंबर शनिवार 2025 १.ॐ श्रीं अनंताय नमः २ॐ ह्रीं नमो नारायणाय अनन्ताय श्रीं ॐ ३.ॐ अनन्तदेवाय च विदमहे विश्वरूपाय धीमहि तन्नो विष्णु प्रचोदयात् ४..अनन्तं ध्यायामहे विश्वरूपं प्रपद्यामहे।अनादिनित्यं विष्णुं तन्नो मोक्षाय प्रचोदयात् ॥ ५..ॐ नमो भगवते अनन्ताय विश्वरूपाय सर्वेश्वरायप्रलयकालानलसंहारकाय महापुरुषाय परब्रह्मणे नमः । ॐ अनन्तोऽसि अनन्तबाहो अनन्तशक्ते अनन्तगतेमाम् अमृतत्वाय पावय पावय नमः ॥ अनन्त चतुर्दशी व्रत कथा एवं पूजा-विधि अनन्त चतुर्दशी का महत्वअनन्त चतुर्दशी का पर्व भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी को मनाया जाता है। यह दिन भगवान विष्णु के “अनन्त” स्वरूप की उपासना के लिए अत्यंत पवित्र माना गया है।शास्त्रों में कहा गया है – इस दिन भगवान नारायण ने विराट विश्वरूप धारण कर समस्त ब्रह्माण्ड को अपने सूक्ष्म शरीर में धारण किया। अनंत चतुर्दशी व्रत रखने से या इस दिन भगवान अनंत के मंत्रों के जाप से बर्ष भर अनजाने में किए भक्ष्य अभक्ष्य के दोष से मुक्ति मिलती है। अनंत चतुर्दशी के व्रत से मनोकामना पूरी होने का योग बनता है। अनन्त चतुर्दशी पर व्रत रखने से धन, सुख, संतान, दीर्घायु तथा जीवन में स्थिरता प्राप्त होती है। इस दिन गणेश प्रतिमा विसर्जन भी होता है, अतः यह पर्व दोहरी महिमा से युक्त है।–2025 का शुभ समयभाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी 06 सितंबर शनिवार 2025तिथि आरंभ: 6 सितम्बर, प्रातः 03:12 बजेतिथि समाप्ति: 7 सितम्बर, प्रातः 01:41 बजेपूजा का श्रेष्ठ समय: 6 सितम्बर प्रातः 05:21 बजे से लेकर रात्रि 01:41 बजे तक व्रत पूर्व तैयारी 1. प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ पीले या सफेद वस्त्र धारण करें। 2. घर के पवित्र स्थान को गंगाजल से शुद्ध करें। 3. लकड़ी की चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर उस पर भगवान विष्णु और गणेश जी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें। 4. एक कलश स्थापित करें – उसमें पवित्र जल, आम की पत्तियाँ रखें और ऊपर नारियल रखें। 5. अनन्त सूत्र तैयार करें – यह पीले या लाल धागे का होता है जिसमें 14 गांठें होती हैं। अनन्त चतुर्दशी व्रत-विधि 1. दीपक व धूप जलाकर भगवान की स्तुति करें। 2. भगवान गणेश का पूजन करें और फिर विष्णुजी का ध्यान करें –“शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं, विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्ण शुभाङ्गम्।लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं, वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥” 3. चौकी पर 14 तिलक करें और हर तिलक पर 1 पूड़ी और 1 पुआ (या मिठाई) अर्पित करें। यह 14 लोकों का प्रतीक है। 4. पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, गुड़) से भगवान का अभिषेक करें और पूजा में प्रयोग करें। भगवान विष्णु कीकिसी भी पूजा में तुलसी दल अवश्य चढ़ाएं और उनके प्रसाद में तुलसी दल अवश्य मिलाकर अर्पित करें। 5. अनन्त सूत्र को पंचामृत में डुबोकर भगवान विष्णु के चरणों में अर्पित करें। 6. पूजा के बाद सूत्र को पुरुष दाहिनी बांह में और स्त्रियाँ बायीं बांह में बाँधती हैं।इस समय मंत्र जपें –“ॐ अनन्ताय नमः” 7. फल, पुष्प, तुलसीदल, नारियल और नैवेद्य अर्पित करें। 8. इसके बाद अनन्त चतुर्दशी की व्रत-कथा सुनें। और आरती करें।(श्रद्धालु चाहे तो इस दिन विष्णु सहस्रनाम एवं पुरुष सूक्त कापाठ भी कर सकते हैं।)इस प्रकार श्रद्धापूर्वक अनन्त चतुर्दशी व्रत-पूजन करने से भगवान विष्णु अपने भक्तों को अनन्त आशीर्वाद प्रदान करते हैं। व्रत का नियम इस दिन उपवास रखें और केवल फलाहार करें।पूजा के बाद प्रसाद ग्रहण करें।अनन्त सूत्र 14 दिन तक धारण करना चाहिए।व्रत का संकल्प 14 वर्षों तक करने की परंपरा है। चौदह बर्ष करने के बाद उद्यापन कर व्रत छोड़ सकते हैं | व्रत का फलपाप नाश होता है।रोग, शोक और क्लेश दूर होते हैं।धन-धान्य और सुख-समृद्धि प्राप्त होती है।संतान-सुख और वैवाहिक जीवन में स्थिरता आती है।अंततः मोक्ष की प्राप्ति होती है। अनंत चतुर्दशी व्रत कथा एक बार महाराज युधिष्ठिर ने राजसूय यज्ञ किया। उस समय यज्ञ मंडप का निर्माण सुंदर तो था ही, अद्भुत भी था वह यज्ञ मंडप इतना मनोरम था कि जल व थल की भिन्नता प्रतीत ही नहीं होती थी। जल में स्थल तथा स्थल में जल की भांति प्रतीत होती थी। बहुत सावधानी करने पर भी बहुत से व्यक्ति उस अद्भुत मंडप में धोखा खा चुके थे।एक बार कहीं से टहलते-टहलते दुर्योधन भी उस यज्ञ-मंडप में आ गया और एक तालाब को स्थल समझ उसमें गिर गया। द्रौपदी ने यह देखकर ‘अंधों की संतान अंधी’ कह कर उनका उपहास किया। इससे दुर्योधन चिढ़ गया। यह बात उसके हृदय में बाण समान लगी। उसके मन में द्वेष उत्पन्न हो गया और उसने पांडवों से बदला लेने की ठान ली। उसके मस्तिष्क में उस अपमान का बदला लेने के लिए विचार उपजने लगे। उसने बदला लेने के लिए पांडवों को द्यूत-क्रीड़ा में हरा कर उस अपमान का बदला लेने की सोची। उसने पांडवों को जुए में पराजित कर दिया। पराजित होने पर प्रतिज्ञानुसार पांडवों को बारह वर्ष के लिए वनवास भोगना पड़ा। वन में रहते हुए पांडव अनेक कष्ट सहते रहे। एक दिन भगवान कृष्ण जब मिलने आए, तब युधिष्ठिर ने उनसे अपना दुख कहा और दुख दूर करने का उपाय पूछा। तब श्रीकृष्ण ने कहा- ‘हे युधिष्ठिर! तुम विधिपूर्वक अनंत भगवान का व्रत करो, इससे तुम्हारा सारा संकट दूर हो जाएगा और तुम्हारा खोया राज्य पुन: प्राप्त हो जाएगा।’ इस संदर्भ में श्रीकृष्ण ने उन्हें एक कथा सुनाई – प्राचीन काल में सुमंत नाम का एक नेक तपस्वी ब्राह्मण था। उसकी पत्नी का नाम दीक्षा था। उसकी एक परम सुंदरी धर्मपरायण तथा ज्योतिर्मयी कन्या थी। जिसका नाम सुशीला था। सुशीला जब बड़ी हुई तो उसकी माता दीक्षा की मृत्यु हो गई। पत्नी के मरने के बाद सुमंत ने कर्कशा नामक स्त्री से दूसरा विवाह कर लिया। सुशीला का विवाह ब्राह्मण सुमंत ने कौंडिन्य ऋषि के साथ कर दिया। विदाई में कुछ देने की बात पर कर्कशा ने दामाद को कुछ ईंटें और पत्थरों के टुकड़े बांध कर दे दिए। कौंडिन्य ऋषि दुखी हो अपनी पत्नी को लेकर अपने आश्रम की ओर चल दिए। परंतु रास्ते में ही रात हो गई। वे नदी तट पर संध्या करने लगे।सुशीला ने देखा- वहां पर बहुत-सी स्त्रियां सुंदर वस्त्र धारण कर किसी देवता की पूजा पर रही थीं। सुशीला के पूछने पर उन्होंने विधिपूर्वक अनंत व्रत की महत्ता बताई। सुशीला ने वहीं उस व्रत का अनुष्ठान किया और चौदह गांठों वाला डोरा हाथ में

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परिवर्तिनी एकादशी

श्री पद्मा एकादशी महत्व विधि एवं कथा परिवर्तिनी (पद्मा) एकादशी का व्रत कल 03 सितंबर को रखा जाएगा। यह व्रत भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को रखा जाता है। इस दिन व्रत करने से आपके सभी कष्‍ट दूर होते हैं। परिवर्तिनी एकादशी भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को कहा जाता है। परिवर्तिनी एकादशी का व्रत कल 03 सितंबर बुधवार को रखा जाएगा। मान्‍यता है कि इस दिन भगवान विष्‍णु की विधि विधान से पूजा करने और व्रत करने से आपको सभी पापों से मुक्ति मिलने के साथ ही मोक्ष की भी प्राप्ति होती है। परिवर्तिनी एकादशी का महत्‍व इसलिए भी खास माना जाता है, क्‍योंकि मान्‍यता के अनुसार इस तिथि पर भगवान विष्‍णु पाताललोक में चातुर्मास की योग निद्रा के दौरान करवट बदलते हैं। इसलिए इसे परिवर्तिनी एकादशी कहते हैं। परिवर्तिनी एकादशी को जलझूलनी एकादशी और पद्मा एकादशी भी कहा जाता है। आइए आपको बताते हैं परिवर्तिनी एकादशी की तिथि कब से कब तक हैं और किस दिन व्रत रखना शास्‍त्र सम्‍मत होगा। परिवर्तिनी एकादशी की तिथि कब से कब तक परिवर्तिनी एकादशी तिथि का आरंभ 03 सितंबर बुधवार को देर रात 03 बजकर 53 मिनट से होगा और और यह 04 सितंबर गुरुवार को प्रातः 04 बजकर 21 मिनट पर समाप्‍त होगी। इसलिए उदया तिथि की मान्‍यता के अनुसार परिवर्तिनी एकादशी का व्रत 03 सितंबर को रखा जाएगा। पारण 04 सितंबर को सुर्योदय के उपरांत किया जाएगा। पद्मा एकादशी का महत्व पुराणों में मनीषी पुरुषों ने जल को ‘नारा’ कहा है। वह नारा ही भगवान का अयन-निवास स्थल है इसलिए वे नारायण कहलाते हैं। नारायण स्वरूप भगवान विष्णु सर्वत्र व्यापक रूप में विराजमान हैं। वे ही मेघ स्वरूप होकर वर्षा करते हैं। वर्षा से अन्न पैदा होता है और अन्न से प्रजा जीवन धारण करती है। श्रीविष्णु देवशयनी एकादशी से योग निद्रा में चले जाते हैं और भाद्रपद शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन वे अपनी करवट बदलते हैं। इस एकादशी को पद्मा, परिवर्तिनी, वामन एकादशी या डोल ग्यारस के नाम से जाना जाता है। मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु करवट बदलने के समय प्रसन्न मुद्रा में रहते हैं, इस अवधि में भक्तिभाव और विनयपूर्वक उनसे जो कुछ भी मांगा जाता है वे अवश्य प्रदान करते हैं। यह भी माना जाता है कि इस दिन माता यशोदा ने जलाशय पर जाकर श्रीकृष्ण के वस्त्र धोए थे,इसी कारण इसे जलझूलनी एकादशी भी कहा जाता है। मंदिरों में इस दिन भगवान श्रीविष्णु की प्रतिमा या शालिग्राम को पालकी में बिठाकर पूजा-अर्चना के बाद ढोल-नगाड़ों के साथ शोभा यात्रा निकाली जाती है। एकादशी पूजा विधि शास्त्रों के अनुसार पद्मा एकादशी के दिन प्रातः स्नान आदि से निवृत होकर भगवान विष्णु के वामन अवतार को ध्यान करते हुए उन्हें पचांमृत से स्नान करवाएं। इसके पश्चात गंगाजल से स्नान करवाकर कुमकुम-अक्षत, पीले पुष्प, चन्दन, तुलसी पत्र आदि से श्री हरि की पूजा करें। वामन भगवान की कथा का श्रवण या वाचन करने के बाद दीपक से आरती उतारें एवं प्रसाद सभी में वितरित करें। पुण्य फलों की प्राप्ति के लिए भगवान विष्णु के मंत्र ‘‘ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय’’का यथा संभव तुलसी की माला से जाप करें। शाम के समय भगवान विष्णु के मंदिर अथवा उनकी मूर्ति के समक्ष भजन-कीर्तन करना शुभ माना गया है। पद्मा एकादशी का महत्व इस एकादशी पर भगवान विष्णु सहित देवी लक्ष्मी की पूजा करने से जीवन में धन और सुख-समृद्धि की प्राप्ति तो होती ही है। परलोक में भी इस एकादशी के पुण्य से उत्तम स्थान मिलता है। पद्मा एकादशी के विषय में शास्त्र कहता है कि इस दिन छाता,जूते, चावल, दही,जल से भरा कलश एवं चांदी का दान करना उत्तम फलदायी होता है। जो लोग किसी कारणवश पद्मा एकादशी का व्रत नहीं कर पाते हैं उन्हें पद्मा एकादशी के दिन भगवान विष्णु के विभिन्न अवतारों की कथा का पाठ करना चाहिए। विष्णु सहस्रनाम एवं रामायण का पाठ करना भी इस दिन उत्तम फलदायी माना गया है। ये मिलता है फल धर्मग्रंथों के अनुसार, पद्मा एकादशी का व्रत करने से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है। जो मनुष्य इस एकादशी को भगवान विष्णु के वामन रूप की पूजा करता है उसके समस्त पापों का नाश होता है और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसके साथ ही, भगवान विष्णु की कृपा से जीवन में सुख, शांति और समृद्धि आती है। इस व्रत को करने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। व्रत कथा.. पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार युधिष्ठिर ने भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी की का नाम, देवता और पूजाविधि के बारे में पूछा। तब कृष्ण जी ने युधिष्ठिर को एक कथा सुनाई, जिसे ब्रह्माजी ने महात्मा नारद को कहा था। नारद ने ब्रह्माजी से पूछा – विष्णुजी की आराधना के लिए मैं आपसे जानना चाहता हूं कि भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी कौन-सी होती है? ब्रह्माजी ने कहा- आपने मुझे उत्तम प्रश्न किया है। भादो माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पद्मा के नाम से जाना जाता है। उस दिन भगवान ह्रषीकेश की पूजा की जाती है। सूर्यवंश में मान्धाता नामक एक चक्रवर्ती, सत्यप्रतिज्ञ और प्रतापी राजर्षि (जो राजा और ऋषि दोनों हों) हो गए हैं। उनके राज्य में अकाल नहीं पड़ता था। प्रजा को मानसिक चिंताएं नहीं सताती थीं और व्याधियों का प्रकोप भी नहीं होता था। उनकी प्रजा निर्भय और आर्थिक रूप से धन-समृद्ध थी। महाराज के कोष में केवल ईमानदारी से अर्जित धन का ही संग्रह था। उनके राज्य में समस्त वर्णों और आश्रमों के लोग अपने-अपने धर्म में लगे रहते थे। मान्धाता के राज्य की भूमि कामधेनु के समान फल देने वाली थी। उनके राज्यकाल में प्रजा का जीवन काफी सुखमय था।एक बार किसी कर्म के फलभोग के कारण राजा के राज्य में तीन वर्षों तक बारिश नहीं हुई। जिससे भूख से पीड़ित प्रजा नष्ट होने लगी। प्रजा महाराज के पास आकर कहने लगी कि आपको प्रजा की बात सुननी चाहिए। जल भगवान का निवास स्थान है। इसलिए वे नारायण कहलाते हैं। नारायणस्वरूप भगलावन विष्णु सर्वव्यापी है। वे ही मेघस्वरूप होकर वर्षा करते हैं और वर्षा से अन्न पैदा होता है और अन्न से प्रजा जीवित रहती है। महाराज, इस समय

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इस साल गणेश चतुर्थी पर बन रहा है दुर्लभ संयोग इस शुभ मुहूर्त में करे पूजा Ganesh Chaturthi

श्रीगणेश प्राकट्योत्सव (श्रीगणेश चतुर्थी) दिनांक- २७ अगस्त २०२५ को भगवान श्री गणेश अपने सभी भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करें-वैसे तो रोजाना ही भगवान गणेश की पूजा-अर्चना की जाती है, लेकिन भादों माह प्रभु की उपासना के लिए अत्यंत शुभ है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि पर गणेश चतुर्थी मनाई जाती है। इस दिन भगवान गणेश का जन्म हुआ था, जिसकी खुशी में देशभर में गणेश चतुर्थी मनाई जाती है। इस दौरान भक्तजन घरों, दफ्तरों, दुकानों और मंदिरों में गणपति जी की मूर्ति को स्थापित करते हैं और १० दिनों तक उनकी विधिनुसार उपासना करते हैं। इसके अलावा प्रभु की विशेष कृपा प्राप्ति के लिए मोदक, मोतीचूर लड्डू, खीर और मालपुआ जैस भोग लगाए जाते हैं, जिसे बेहद शुभ माना जाता है। इस वर्ष २७ अगस्त को गणेश चतुर्थी मनाई जा रही है। अतः प्रस्तुत है इस दिन गणपति जी की मूर्ति की स्थापना का शुभ मुहूर्त-इस बार भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि का प्रारंभ २६ अगस्त को दोपहर ०१ बजकर ५४ मिनट पर होगा। इसका समापन २७ अगस्त की दोपहर ०३ बजकर ४४ मिनट पर हो रहा है। उदया तिथि के अनुसार गणेश चतुर्थी का पर्व २७ अगस्त को मनाया जाएगा। स्थापना मुहूर्त- गणेश चतुर्थी पर भगवान गणेश की पार्थिव प्रतिमा पूजन एवं मूर्ति स्थापना के लिए २७ अगस्त को सुबह ११ बजकर ०५ मिनट से लेकर दोपहर ०१ बजकर ४० मिनट तक का शुभ मुहूर्त रहेगा। आप इस अवधि में गणपति जी की मूर्ति की स्थापना कर सकते हैं। गणेश चतुर्थी दुर्लभ संयोग-इस बार गणेश चतुर्थी पर प्रीति, सर्वार्थ सिद्धि, रवि के साथ इंद्र-ब्रह्म योग का संयोग बना रहेगा। वहीं कर्क में बुध और शुक्र के होने से लक्ष्मी नारायण योग का निर्माण होगा। इसके अलावा गणेश चतुर्थी पर बुधवार का महासंयोग तिथि की महत्ता को गई गुना बढ़ा रहा है। ।। जय गौरीनन्दन भगवान श्री गणेश ।।

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सावन (श्रावन) मास में सभी प्रकार के दोषों से मुक्ति पाने के लिए इसप्रकार करे भगवान भोलेनाथ को प्रसन्न !

सावन के सोमवार सावन के सोमवार का व्रत: महत्व, प्रभाव, लाभ और आधारों का विस्तृत विश्लेषण सावन (श्रावण) का महीना हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण माना जाता है। यह महीना भगवान शिव को समर्पित होता है, और सावन के सोमवार को विशेष रूप से शिव भक्त उपवास और पूजा-अर्चना करते हैं। इस व्रत का महत्व धार्मिक, आध्यात्मिक, और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से बहुत गहरा है। इसके विभिन्न पहलुओं—ज्योतिषीय, खगोलीय, वैज्ञानिक, और पौराणिक आधारों—का विस्तृत विश्लेषण इसप्रकार है :- 1. सावन के सोमवार के व्रत का महत्व और उद्देश्य सावन का महीना (जुलाई-अगस्त के बीच) भगवान शिव की भक्ति के लिए विशेष माना जाता है। इस महीने में पड़ने वाले प्रत्येक सोमवार को “श्रावण सोमवार” के रूप में मनाया जाता है। इस व्रत का मुख्य उद्देश्य है:आध्यात्मिक उन्नति: भगवान शिव की कृपा प्राप्त करना, मन की शांति, और आत्मिक शुद्धि।मनोकामना पूर्ति: यह माना जाता है कि यह व्रत अविवाहित लड़कियों के लिए अच्छा जीवनसाथी, विवाहित लोगों के लिए वैवाहिक सुख, और सभी के लिए स्वास्थ्य, समृद्धि, और सुख-शांति प्रदान करता है।पापों का नाश: शिव पुराण के अनुसार, सावन में शिव पूजा से पापों का नाश होता है और जीवन में सकारात्मकता आती है। 2. सावन के सोमवार के व्रत के प्रभाव और लाभ धार्मिक और आध्यात्मिक लाभ: शिव कृपा प्राप्ति: सावन में शिव की पूजा करने से भक्तों को भगवान शिव और माता पार्वती का आशीर्वाद प्राप्त होता है। यह व्रत भक्तों के मन को शुद्ध करता है और उन्हें सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है।वैवाहिक सुख: अविवाहित लड़कियां यह व्रत अच्छे वर की प्राप्ति के लिए करती हैं, जैसा कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए किया था।स्वास्थ्य और समृद्धि: यह माना जाता है कि यह व्रत शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर करता है और जीवन में समृद्धि लाता है।मन की शांति: उपवास और ध्यान से मन शांत होता है, जिससे तनाव और चिंता कम होती है। सामाजिक और सांस्कृतिक लाभ:सामुदायिक एकता: सावन में मंदिरों में भक्तों का जमावड़ा लगता है, जिससे सामाजिक और सांस्कृतिक एकता बढ़ती है। परंपराओं का संरक्षण: यह व्रत भारतीय संस्कृति और परंपराओं को जीवित रखने में मदद करता है। 3. सावन के सोमवार के व्रत का आधार: ज्योतिषीय, खगोलीय, वैज्ञानिक, और पौराणिक विश्लेषण (i) ज्योतिषीय आधारज्योतिष शास्त्र के अनुसार, सावन का महीना ग्रहों और नक्षत्रों की विशेष स्थिति के कारण महत्वपूर्ण होता है।चंद्रमा और सोमवार: सोमवार का स्वामी चंद्रमा है, और चंद्रमा का भगवान शिव से गहरा संबंध है। शिव पुराण के अनुसार, भगवान शिव ने चंद्रमा को अपने मस्तक पर धारण किया है, जिससे वे “चंद्रशेखर” कहलाते हैं। सावन में चंद्रमा की ऊर्जा विशेष रूप से प्रभावशाली होती है, जो मन और भावनाओं को संतुलित करती है।श्रावण नक्षत्र: सावन का महीना श्रावण नक्षत्र के प्रभाव में होता है। यह नक्षत्र भगवान विष्णु से संबंधित है, लेकिन शिव और विष्णु की एकता (हरिहर) के कारण इस महीने में शिव पूजा का विशेष महत्व है। ग्रहों का प्रभाव: ज्योतिष में सावन का महीना ग्रहों की स्थिति के कारण विशेष ऊर्जा से भरा होता है। इस दौरान उपवास और पूजा से नकारात्मक ग्रह प्रभावों को कम किया जा सकता है। (ii) खगोलीय आधारमौसमी और खगोलीय संयोग: सावन का महीना मानसून के मौसम में आता है, जो प्रकृति के पुनर्जनन का समय है। इस दौरान पृथ्वी की ऊर्जा और वातावरण में नमी बढ़ती है, जिसे आध्यात्मिक दृष्टिकोण से शुद्धिकरण का समय माना जाता है। खगोलीय दृष्टि से, इस समय सूर्य कर्क राशि में होता है, जो जल तत्व से संबंधित है। यह जल तत्व भगवान शिव से जुड़ा है, क्योंकि वे नीलकंठ के रूप में विषपान और जल के प्रतीक हैं।चंद्रमा की स्थिति: सावन में चंद्रमा की स्थिति और उसका प्रभाव मन और जल तत्व को प्रभावित करता है। सोमवार को चंद्रमा की ऊर्जा अधिक प्रभावी होती है, जिसे पूजा और उपवास के माध्यम से संतुलित किया जाता है। (iii) वैज्ञानिक आधारवैज्ञानिक दृष्टिकोण से सावन के सोमवार का व्रत कई तरह से लाभकारी हो सकता है:उपवास के लाभ: उपवास (Fasting) शरीर को डिटॉक्स करने में मदद करता है। यह पाचन तंत्र को आराम देता है, जिससे शरीर की ऊर्जा आत्म-शुद्धिकरण में लगती है। सावन में उपवास से मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार होता है। मानसिक स्वास्थ्य: सावन में मानसून के कारण वातावरण में नमी और ठंडक होती है, जो मन को शांत करती है। पूजा, ध्यान, और मंत्र जाप से मस्तिष्क में सेरोटोनिन और डोपामाइन जैसे न्यूरोट्रांसमीटर का स्तर बढ़ता है, जिससे तनाव कम होता है।प्रकृति से जुड़ाव: सावन में प्रकृति की हरियाली और जल की प्रचुरता मनुष्य को प्रकृति के करीब लाती है। शिवलिंग पर जल चढ़ाने की प्रक्रिया प्रतीकात्मक रूप से प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और संतुलन को दर्शाती है।सामाजिक मनोविज्ञान: सामूहिक पूजा और व्रत से सामाजिक एकता बढ़ती है, जो मानसिक स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है। (iv) पौराणिक आधारपौराणिक कथाओं में सावन के सोमवार के व्रत का विशेष महत्व है। कुछ प्रमुख कथाएं इस प्रकार हैं:समुद्र मंथन और नीलकंठ: शिव पुराण के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान निकले हलाहल विष को भगवान शिव ने अपने कंठ में धारण किया, जिससे उनका कंठ नीला हो गया। सावन का महीना इस घटना से जुड़ा माना जाता है, और इस दौरान शिव की पूजा से भक्तों को विषैले प्रभावों (पापों) से मुक्ति मिलती है।माता पार्वती की तपस्या: माता पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए कठिन तपस्या की थी। यह तपस्या सावन के महीने में विशेष रूप से की गई थी। इसलिए, अविवाहित लड़कियां इस व्रत को अच्छे वर की प्राप्ति के लिए करती हैं।शिव का जल से संबंध: भगवान शिव का जल से गहरा संबंध है। गंगा उनके जटाओं में वास करती हैं, और सावन में जल की प्रचुरता के कारण शिव पूजा का महत्व बढ़ जाता है। 4. सावन के सोमवार के व्रत की प्रक्रिया उपवास: भक्त सुबह जल्दी उठकर स्नान करते हैं और पूरे दिन उपवास रखते हैं। कुछ लोग निर्जला व्रत करते हैं, जबकि कुछ फलाहार या एक समय भोजन लेते हैं।शिव पूजा: शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र, धतूरा, और अन्य सामग्री चढ़ाई जाती है। “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जाप किया जाता है।रुद्राभिषेक: सावन में रुद्राभिषेक पूजा का

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व्रत, पूजाविधि और विशेषताएं Method Of Worship

चातुर्मास Chaturmas

चातुर्मास – साधना, संयम और शुद्धि का काल देवशयनी एकादशी से प्रारंभ होकर कार्तिक मास तक चलने वाला चातुर्मास सनातन संस्कृति में तप, व्रत, उपवास और आत्मशुद्धि का विशेष काल माना गया है.यह काल वर्षा ऋतु का होता है, जब संत-महात्मा एक स्थान पर रुककर साधना करते हैं और जनसामान्य को धर्मोपदेश देते हैं. चातुर्मास में आहार, आचरण और विचारों में संयम की परंपरा है, जो शरीर एवं मन दोनों की शुद्धि में सहायक होती है.वैज्ञानिक दृष्टि से यह काल पाचन तंत्र की शिथिलता का होता है, अतः व्रत-उपवास और सात्विकता स्वास्थ्य की रक्षा करते हैं. सनातन संस्कृति की यह परंपरा ऋतु, प्रकृति और अध्यात्म के संतुलन की गूढ़ समझ को दर्शाती है. चातुर्मास्य व्रत की महिमा 06 जुलाई 2025 रविवार से चातुर्मास प्रारंभ। 6/7/2025 Chaturmas आषाढ़ के शुक्ल पक्ष में एकादशी के दिन उपवास करके मनुष्य भक्तिपूर्वक चातुर्मास्य व्रत प्रारंभ करे। एक हजार अश्वमेघ यज्ञ करके मनुष्य जिस फल को पाता है, वही चातुर्मास्य व्रत के अनुष्ठान से प्राप्त कर लेता है।इन चार महीनों में ब्रह्मचर्य का पालन, त्याग, पत्तल पर भोजन, उपवास, मौन, जप, ध्यान, स्नान, दान, पुण्य आदि विशेष लाभप्रद होते हैं। व्रतों में सबसे उत्तम व्रत है – ब्रह्मचर्य का पालन। ब्रह्मचर्य तपस्या का सार है और महान फल देने वाला है। ब्रह्मचर्य से बढ़कर धर्म का उत्तम साधन दूसरा नहीं है। विशेषतः चतुर्मास में यह व्रत संसार में अधिक गुणकारक है।मनुष्य सदा प्रिय वस्तु की इच्छा करता है। जो चतुर्मास में अपने प्रिय भोगों का श्रद्धा एवं प्रयत्नपूर्वक त्याग करता है, उसकी त्यागी हुई वे वस्तुएँ उसे अक्षय रूप में प्राप्त होती हैं। चतुर्मास में गुड़ का त्याग करने से मनुष्य को मधुरता की प्राप्ति होती है। ताम्बूल का त्याग करने से मनुष्य भोग-सामग्री से सम्पन्न होता है और उसका कंठ सुरीला होता है। दही छोड़ने वाले मनुष्य को गोलोक मिलता है। नमक छोड़ने वाले के सभी पूर्तकर्म (परोपकार एवं धर्म सम्बन्धी कार्य) सफल होते हैं। जो मौनव्रत धारण करता है उसकी आज्ञा का कोई उल्लंघन नहीं करता। चतुर्मास में काले एवं नीले रंग के वस्त्र त्याग देने चाहिए। नीले वस्त्र को देखने से जो दोष लगता है उसकी शुद्धि भगवान सूर्यनारायण के दर्शन से होती है। कुसुम्भ (लाल) रंग व केसर का भी त्याग कर देना चाहिए। आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को श्रीहरि के योगनिद्रा में प्रवृत्त हो जाने पर मनुष्य चार मास अर्थात् कार्तिक की पूर्णिमा तक भूमि पर शयन करें । ऐसा करने वाला मनुष्य बहुत से धन से युक्त होता और विमान प्राप्त करता है, बिना माँगे स्वतः प्राप्त हुए अन्न का भोजन करने से बावड़ी और कुआँ बनवाने का फल प्राप्त होता है। जो भगवान जनार्दन के शयन करने पर शहद का सेवन करता है, उसे महान पाप लगता है। चतुर्मास में अनार, नींबू, नारियल तथा मिर्च, उड़द और चने का भी त्याग करें । जो प्राणियों की हिंसा त्याग कर द्रोह छोड़ देता है, वह भी पूर्वोक्त पुण्य का भागी होता है। चातुर्मास्य में परनिंदा का विशेष रूप से त्याग करें । परनिंदा को सुनने वाला भी पापी होता है। परनिंदा महापापं परनिंदा महाभयं। परनिंदा महद् दुःखं न तस्याः पातकं परम्।। ‘परनिंदा महान पाप है, परनिंदा महान भय है, परनिंदा महान दुःख है और पर निंदा से बढ़कर दूसरा कोई पातक नहीं है।’ चातुर्मास्य व्रत की महिमा चातुर्मास में ताँबे के पात्र में भोजन विशेष रूप से त्याज्य है। काँसे के बर्तनों का त्याग करके मनुष्य अन्य धातुओं के पात्रों का उपयोग करे। अगर कोई धातुपात्रों का भी त्याग करके पलाशपत्र, मदारपत्र या वटपत्र की पत्तल में भोजन करे तो इसका अनुपम फल बताया गया है। अन्य किसी प्रकार का पात्र न मिलने पर मिट्टी का पात्र ही उत्तम है अथवा स्वयं ही पलाश के पत्ते लाकर उनकी पत्तल बनाये और उससे भोजन-पात्र का कार्य ले। पलाश के पत्तों से बनी पत्तल में किया गया भोजन चन्द्रायण व्रत एवं एकादशी व्रत के समान पुण्य प्रदान करने वाला माना गया है।प्रतिदिन एक समय भोजन करने वाला पुरुष अग्निष्टोम यज्ञ के फल का भागी होता है। पंचगव्य सेवन करने वाले मनुष्य को चन्द्रायण व्रत का फल मिलता है। यदि धीर पुरुष चतुर्मास में नित्य परिमित अन्न का भोजन करता है तो उसके सब पातकों का नाश हो जाता है और वह वैकुण्ठ धाम को पाता है। चतुर्मास में केवल एक ही अन्न का भोजन करने वाला मनुष्य रोगी नहीं होता।जो मनुष्य चतुर्मास में केवल दूध पीकर अथवा फल खाकर रहता है, उसके सहस्रों पाप तत्काल विलीन हो जाते हैं।पंद्रह दिन में एक दिन संपूर्ण उपवास करने से शरीर के दोष जल जाते हैं और चौदह दिनों में तैयार हुए भोजन का रस ओज में बदल जाता है। इसलिए एकादशी के उपवास की महिमा है। वैसे तो गृहस्थ को महीने में केवल शुक्लपक्ष की एकादशी रखनी चाहिए, किंतु चतुर्मास की तो दोनों पक्षों की एकादशियाँ रखनी चाहिए।जो बात करते हुए भोजन करता है, उसके वार्तालाप से अन्न अशुद्ध हो जाता है। वह केवल पाप का भोजन करता है। जो मौन होकर भोजन करता है, वह कभी दुःख में नहीं पड़ता। मौन होकर भोजन करने वाले राक्षस भी स्वर्गलोक में चले गये हैं। यदि पके हुए अन्न में कीड़े-मकोड़े पड़ जायें तो वह अशुद्ध हो जाता है। यदि मानव उस अपवित्र अन्न को खा ले तो वह दोष का भागी होता है। जो नरश्रेष्ठ प्रतिदिन ‘ॐ प्राणाय स्वाहा, ॐ अपानाय स्वाहा, ॐ व्यानाय स्वाहा, ॐ उदानाय स्वाहा, ॐ समानाय स्वाहा’ – इस प्रकार प्राणवायु को पाँच आहुतियाँ देकर मौन हो भोजन करता है, उसके पाँच पातक निश्चय ही नष्ट हो जाते हैं।चतुर्मास में जैसे भगवान विष्णु आराधनीय हैं, वैसे ही ब्राह्मण भी। भाद्रपद मास आने पर उनकी महापूजा होती है। जो चतुर्मास में भगवान विष्णु के आगे खड़ा होकर ‘पुरुष सूक्त’ का पाठ करता है, उसकी बुद्धि बढ़ती है।चतुर्मास सब गुणों से युक्त समय है। इसमें धर्मयुक्त श्रद्धा से शुभ कर्मों का अनुष्ठान करना चाहिए। सत्संगे द्विजभक्तिश्च गुरुदेवाग्नितर्पणम्। गोप्रदानं वेदपाठः सत्क्रिया सत्यभाषणम्।। गोभक्तिर्दानभक्तिश्च सदा धर्मस्य साधनम्। सत्संग, भक्ति, गुरु, देवता और अग्नि का तर्पण, गोदान, वेदपाठ, सत्कर्म, सत्यभाषण, गोभक्ति और दान में प्रीति – ये सब सदा धर्म के साधन हैं। ’देवशयनी एकादशी से देवउठी एकादशी तक उक्त धर्मों का साधन एवं नियम महान फल देने वाला है। चतुर्मास

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गुरु पूर्णिमा के दिन कौन से पाठ को श्रद्धा पूर्वक पढ़ने से होती है अभीष्ट लक्ष्य की प्राप्ति !

गुरु पूर्णिमा हर साल आषाढ़ मास की पूर्णिमा को मनाई जाती है गुरु पूर्णिमा। 10 जुलै 2025, गुरुवार, Thursday, 10/7/2025 Guru Purnima गुरु पूर्णिमा अपने गुरु की पूजा करने का दिन है, चाहे वे आध्यात्मिक हों या शैक्षणिक गुरु। भक्त और छात्र इस दिन अपने गुरुओं को श्रध्दा पुर्वक पूजते हैं। गुरु जिसका अर्थ है जो अंधकार या अज्ञान को दूर करता है। गुरु एक ऐसा शब्द है जिसका उपयोग केवल सांसारिक ज्ञान के शिक्षक को संदर्भित करने के लिए नहीं किया जाता है, बल्कि वह व्यक्ति जो आत्म-परिवर्तन और अंततः आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जा सकता है। गुरु शब्द का प्रयोग श्रद्धा और सम्मान के साथ किया जाता है और इसे हमेशा पवित्रता और सर्वोच्च ज्ञान के साथ जोड़ा जाता है। इसे अक्सर गुरुदेव के रूप में प्रयोग किया जाता है, जो एक प्रबुद्ध गुरु को संदर्भित करता है। गुरु मानवता का मार्गदर्शन करते हैं और प्राचीन ज्ञान और शिक्षाओं के माध्यम से समकालीन दुनिया में जीवन को समझने में मानव जाति की मदद करते हैं। सदाशिव समारंभं शंकराचार्य मध्यमाम् । अस्मदाचार्य पर्यंतां वंदे गुरु परंपराम् ॥ भगवान सदाशिव से शुरू होने वाली, मध्य में आदि शंकराचार्य से लेकर मेरे तात्कालिक गुरु तक जारी रहने वाली परंपरा को नमन। ||श्री गुरु अष्टकम् || शरीरं सुरूपं तथा वा कलत्रंयशश्चारु चित्रं धनं मेरु तुल्यम् । मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मेततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ॥ 1 ॥ कलत्रं धनं पुत्र पौत्रादिसर्वंगृहो बांधवाः सर्वमेतद्धि जातम् । मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मेततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ॥ 2 ॥ षड्क्षंगादिवेदो मुखे शास्त्रविद्याकवित्वादि गद्यं सुपद्यं करोति । मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मेततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ॥ 3 ॥ विदेशेषु मान्यः स्वदेशेषु धन्यःसदाचारवृत्तेषु मत्तो न चान्यः । मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मेततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ॥ 4 ॥ क्षमामंडले भूपभूपलबृब्दैःसदा सेवितं यस्य पादारविंदम् । मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मेततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ॥ 5 ॥ यशो मे गतं दिक्षु दानप्रतापात्जगद्वस्तु सर्वं करे यत्प्रसादात् । मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मेततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ॥ 6 ॥ न भोगे न योगे न वा वाजिराजौन कंतामुखे नैव वित्तेषु चित्तम् । मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मेततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ॥ 7 ॥ अरण्ये न वा स्वस्य गेहे न कार्येन देहे मनो वर्तते मे त्वनर्ध्ये । मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मेततः किं ततः किं ततः किं ततः किम् ॥ 8 ॥ गुरोरष्टकं यः पठेत्पुरायदेहीयतिर्भूपतिर्ब्रह्मचारी च गेही । लमेद्वाच्छिताथं पदं ब्रह्मसंज्ञंगुरोरुक्तवाक्ये मनो यस्य लग्नम् ॥ 9 ॥ श्री गुर्वष्टकम् (गुरु अष्टकम्) हिन्दी अनुवाद 1.) यदि आपके पास शरीर सुन्दर हो, पत्नी सुन्दर हो, यश उत्तम और विविध हो, तथा धन मेरु पर्वत के समान हो; किन्तु यदि आपका मन गुरु के चरण कमलों में आसक्त न हो, तो फिर क्या अर्थ है, फिर क्या अर्थ है, फिर क्या अर्थ है, फिर क्या अर्थ है? 2.) आपके पास पत्नी, धन, पुत्र, पौत्र आदि ये सब; घर, सम्बन्धी – ये सब हो सकते हैं; किन्तु यदि मन गुरु के चरण कमलों में आसक्त न हो, तो फिर क्या अर्थ अर्थ, फिर क्या अर्थ है, फिर क्या अर्थ अर्थ, फिर क्या अर्थ है? 3.) वेद तथा उनके छह सहायक शास्त्रों का ज्ञान भी उसके होठों पर हो; काव्य-कौशल में निपुण हो; तथा वह अच्छा गद्य और काव्य रच सकता हो; किन्तु यदि उसका मन गुरु के चरण कमलों में आसक्त न हो, तो फिर क्या अर्थ है, फिर क्या अर्थ है, फिर क्या अर्थ है, फिर क्या अर्थ है? 4.) ‘अन्य देशों में मेरा सम्मान है; अपने देश में मैं सौभाग्यशाली हूँ; ‘सदाचरण में मुझसे बढ़कर कोई नहीं है’ – ऐसा कोई सोच सकता है, लेकिन यदि किसी का मन गुरु के चरणकमलों में आसक्त नहीं है, तो फिर क्या अर्थ है, फिर क्या अर्थ है, फिर क्या अर्थ है, फिर क्या अर्थ है? 5.) संसार के सम्राटों और राजाओं द्वारा निरंतर किसी के चरणों की पूजा की जा सकती है; लेकिन यदि किसी का मन गुरु के चरणकमलों में आसक्त नहीं है, तो फिर क्या अर्थ अर्थ, फिर क्या अर्थ है, फिर क्या अर्थ है, फिर क्या अर्थ है? 6.) दान और पराक्रम के कारण मेरी कीर्ति सब ओर फैल गई है; इन गुणों के पुरस्कार स्वरूप संसार की सभी वस्तुएँ मेरे हाथ में हैं; लेकिन यदि मेरा मन गुरु के चरणकमलों में आसक्त नहीं है, तो फिर क्या अर्थ है, फिर क्या अर्थ है, फिर क्या अर्थ है, फिर क्या अर्थ है? 7) न भोग में, न एकाग्रता में, न घोड़ों की भीड़ में; न प्रियतम के मुख में, न धन में मन टिकता है; परन्तु यदि वह मन गुरु के चरणकमलों में आसक्त न हो, तो फिर क्या अर्थ है, फिर क्या अर्थ अर्थ, फिर क्या अर्थ है, फिर क्या अर्थ है? 8.) न तो वन में, न अपने घर में, न ही जो कुछ प्राप्त होना है, न शरीर में, न ही जो अमूल्य है, उसमें मेरा मन लगता है; परन्तु यदि मेरा मन गुरु के चरणकमलों में आसक्त न हो, तो फिर क्या अर्थ है, फिर क्या अर्थ है, फिर क्या अर्थ है, फिर क्या अर्थ है? 9.) जो पुण्यात्मा व्यक्ति गुरु पूर्णिमा के पावनपर्व पर इस अष्टक का पाठ करता है, तथा जिसका मन गुरु के वचनों पर स्थिर रहता है – चाहे वह तपस्वी हो, राजा हो, विद्यार्थी हो, या गृहस्थ हो, वह अभीष्ट लक्ष्य को प्राप्त करता है, जिसे ब्रह्म कहा जाता है। श्री गुरुवष्टकम् (गुरु अष्टकम्)

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देवशयनी आषाढी एकादशी के पावन पर्व पर मात्र एक मंत्र जाप से होंगे पंढरीनाथ भगवान पांडुरंग प्रसन्न देंगे मनचाहा वरदान !

एकादशी को श्री विष्णु सहस्रनाम का पाठ करने से घर में सुख शांति बनी रहती है l राम रामेति रामेति । रमे रामे मनोरमे ।। सहस्त्र नाम त तुल्यं । राम नाम वरानने ।। आज एकादशी के दिन इस मंत्र के पाठ से विष्णु सहस्रनाम के जप के समान पुण्य प्राप्त होता है l एकादशी के दिन बाल नहीं कटवाने चाहिए। एकादशी को चावल व साबूदाना खाना वर्जित है | एकादशी को शिम्बी (सेम) ना खाएं अन्यथा पुत्र का नाश होता है। जो दोनों पक्षों की एकादशियों को आँवले के रस का प्रयोग कर स्नान करते हैं, उनके पाप नष्ट हो जाते हैं। देवशयनी आषाढी एकादशी 06 जुलाई 2025 रविवार को देवशयनी एकादशी है। देवशयनी एकादशी का व्रत महान पुण्यमय, स्वर्ग एवं मोक्ष प्रदान करनेवाले, सब पापों को हरनेवाला है । इस परम पावन पर्व पर पंढरीनाथ भगवान पांडुरंग का गायत्री मंत्र जाप तुलसी की माला पर किया जाए तो भगवान पांडुरंग प्रसन्न होकर मनचाहा वरदान देते हैं | पंढरीनाथ भगवान पांडुरंग गायत्री मंत्र “ॐ भक्तवरदाय विद्महे पांडुरंगाय धीमहि, तन्नो कृष्ण: प्रचोदयात्”. इसका अर्थ है, “हे भक्तवत्सल, मैं आपको जानता हूं, हे पांडुरंग, मैं आपका ध्यान करता हूं, वह कृष्ण हमें प्रेरित करें”.

देवशयनी आषाढी एकादशी के पावन पर्व पर मात्र एक मंत्र जाप से होंगे पंढरीनाथ भगवान पांडुरंग प्रसन्न देंगे मनचाहा वरदान ! Read Post »

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माँ शैलपुत्री Maa shailputri

नवरात्र पहला दिन माँ शैलपुत्री Navratri maa shailputri नवरात्र पहला दिन माँ शैलपुत्री  ब्रह्म पुराण में माँ शैलपुत्री के बारे में विस्तृत वर्णन मिलता है. माँ शैलपुत्री पर्वतराज हिमालय की बेटी है उन्हें माता पार्वती और हेमवती के नाम से भी जाना जाता है. इनका वाहन वृषभ है. नवरात्र के प्रथम दिन देवी शैलुपुत्री की पूजा करने का विधान है. मान्यता है की देवी पार्वती शिव के साथ विवाह के पश्चात प्रत्येक साल नौ दिनों के लिए अपने मायके आती थीं और पर्वतराज हिमालय नवरात्र के पहले दिन अपनी पुत्री का स्वागत उनकी पूजा कर किया करते थे तभी से नवरात्रो में पहले दिन माँ के शैलपुत्री रुप की पूजा की जाती है. माँ के दाहिने हाथ में त्रिशूल एवं बाएं हाथ में कमल का पुष्प शुशोभित है. करूणा और ममता का स्वरूप मानकर माँ के इस रूप की पूजा की  जाती है. माना जाता है कि माँ शैलपुत्री की आराधना करने मात्र से मूलाधार चक्र जागृत होता है नवरात्रो के पहले दिन माँ शैलपुत्री की पूजा करने से व्यक्ति को सुख, सुविधा, घर, संपत्ति,यश, वैभव प्राप्त होता है. नवरात्र पहला दिन माँ शैलपुत्री पूजा विधि Navratri puja vidhi नवरात्र पहला दिनपूजा विधिमाँ शैलपुत्रनवरात्रि के प्रथम दिन माँ शैलपुत्री की पूजा आराधना करने के लिए सबसे पहले पूजा स्थान को अच्छी तरह से साफ करके गंगाजल छिड़ककर शुद्ध कर ले. इसके बाद माँ दुर्गा की प्रतिमा को पूजा स्थल पर स्थापित करें। इसके बाद शुभ मुहूर्त में घटस्थापना यानि की कलश की स्थापना करे. कलश पर स्वस्तिक का चिन्ह बनाकर उसमें मौली बांध ले. अब कलश में गंगाजल मिलाकर शुद्ध जल से कलश को भर दे. कलश में सुपारी, या सिक्का डालकर कलश में आम के पत्ते रख दे. कलश के ऊपर नारियल रखकर मंदिर में स्थापित कर दे. इसके बाद माता को लाल चुनरी ओढ़ाकर तिलक कर पूजा करनी चाहिए. नवरात्र पहला दिन मंत्र/स्तुति Navratri Mantra Stuti नवरात्र पहला दिन माँ शैलपुत्री मंत्र ‘ॐ ऐं ह्रीं क्लीं शैलपुत्र्यै नम:।’ स्तुति :– शिखर वासिनी, त्रिशूल धारिणी वृषभ वाहिनी, शिव अर्धांगिनी सर्व प्रथम पूजा प्रतिस्ठायीनी शैलपुत्री यशस्विनम नमो नम:!! ध्यान वन्दे वाञ्छितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम्। वृषारुढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥ पूणेन्दु निभां गौरी मूलाधार स्थितां प्रथम दुर्गा त्रिनेत्राम्   पटाम्बर परिधानां रत्नाकिरीटा नामालंकार भूषिता॥ प्रफुल्ल वंदना पल्लवाधरां कातंकपोलां तुग कुचाम्। कमनीयां लावण्यां स्नेमुखी क्षीणमध्यां नितम्बनीम्॥ नवरात्र पहला दिन पहला भोग नवरात्र पहला दिन भोग विधि Navratri maa shailputri bhog मां शैलपुत्री को सफ़ेद चीजें अत्यधिक प्रिय है. इसीलिए नवरात्री के प्रथम दिन माँ शैलपुत्री को सफेद चीजों का भोग जैसे- गाय के घी में बना प्रसाद, घी का भोग बताया जाता है ऐसा करने से माँ अत्यधिक प्रसन्न होती है और व्यक्ति को आरोग्य का आशीर्वाद देती है. माँ शैलपुत्री आरती माँ शैलपुत्री आरती Aarti शैलपुत्री मां बैल असवार करें देवता जय जयकार ।।   शिव शंकर की प्रिय भवानी तेरी महिमा किसी ने ना जानी ।।   पार्वती तू उमा कहलावे जो तुझे सिमरे सो सुख पावे ।।   ऋद्धि-सिद्धि परवान करे तू दया करे धनवान करे तू ।।   सोमवार को शिव संग प्यारी आरती तेरी जिसने उतारी ।।   उसकी सगरी आस पुजा दो सगरे दुख तकलीफ मिला दो ।।   घी का सुंदर दीप जला के गोला गरी का भोग लगा के ।।   श्रद्धा भाव से मंत्र गाएं प्रेम सहित फिर शीश झुकाएं ।।   जय गिरिराज किशोरी अंबे शिव मुख चंद्र चकोरी अंबे ।।   मनोकामना पूर्ण कर दो भक्त सदा सुख संपत्ति भर दो ।। 

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होली 2026 Holi:- होली के दिन करे अचूक उपाय

• होलिका दहन ( Holika Dahan) • होली मनाने का कारण एवं महत्व ( holi manane ka mahatva ) • शास्त्रानुसार होली मनाने की पद्धति ( holi ) • पौराणिक कथाएं ( holi pouranik kathaye ) • होलिका दहन पुजा की विधी ( holi puja vidhi ) • होलिका दहन के नियम ( holika dahan ke niyam ) • होली के दिन करने वाले अचूक उपाय ( Holi ke achuk upay) • होली के दिन के वास्तु शास्त्र के सरल उपाय ( vastu upay) • होलाष्टक के समय में क्या करे और क्या ना करे(Holashtak) • होलिका दहन की विधी (vidhi) • होलिका दहन में क्या अर्पित करे( Holi ke din kya kare kya na kare) • होलिका दहन विशेष पुजन ( holi vishesh 2026) होलिका दहन 2026(Holika dahan 2026) त्यौहार, धार्मिक उत्सव एवं व्रत हिंदु धर्म का एक अविभाज्य अंग :-इनको मनाने के पीछे कुछ विशेष नैसर्गिक, सामाजिक, ऐतिहासिक एवं आध्यात्मिक कारण होते हैं तथा इन्हें उचित ढंग से मनाने से समाज के प्रत्येक व्यक्ति को अपने व्यक्तिगत एवं सामाजिक जीवन में अनेक लाभ होते हैं । इससे पूरे समाज की आध्यात्मिक उन्नति होती है । इसीलिए त्यौहार, धार्मिक उत्सव एवं व्रत मनाने का शास्त्राधार समझ लेना अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है । होली (Holi) होली भी संक्रांति के समान एक देवी हैं । षड्विकारों पर विजय प्राप्त करने की क्षमता होलिका देवी में है । विकारों पर विजय प्राप्त करने की क्षमता प्राप्त होने के लिए होलिका देवी से प्रार्थना की जाती है । इसलिए होली को उत्सव के रूप में मनाते हैं । होली के पर्व पर अग्निदेवता के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का कारण होली यह अग्निदेवता की उपासना का ही एक अंग है :-अग्निदेवता की उपासना से व्यक्ति में तेजतत्त्व की मात्रा बढने में सहायता मिलती है । होली के दिन अग्निदेवता का तत्त्व २ प्रतिशत कार्यरत रहता है । इस दिन अग्निदेवता की पूजा करने से व्यक्ति को तेजतत्त्व का लाभ होता है । इससे व्यक्ति में से रज-तम की मात्रा घटती है । होली के दिन किए जानेवाले यज्ञों के कारण प्रकृति मानव के लिए अनुकूल हो जाती है । इससे समय पर एवं अच्छी वर्षा होनेके कारण सृष्टिसंपन्न बनती है । इसीलिए होलीके दिन अग्निदेवता की पूजा कर उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है । घरों में पूजा की जाती है, जो कि सुबह के समय करते हैं । सार्वजनिक रूपसे मनाई जाने वाली होली रात में मनाई जाती है । होली मनाने का कारण (Holi manane ke karan ) :- पृथ्वी, जल, तेज, वायु एवं आकाश इन पांच तत्त्वों की सहायतासे देवता के तत्त्व को पृथ्वी पर प्रकट करने के लिए यज्ञ ही एक माध्यम है । जब पृथ्वी पर एक भी स्पंदन नहीं था, उस समय के प्रथम त्रेतायुग में पंचतत्त्वों में विष्णुतत्त्व प्रकट होने का समय आया । तब परमेश्वर द्वारा एक साथ सात ऋषि-मुनियों को स्वप्नदृष्टांत में यज्ञ के बारे में ज्ञान हुआ । उन्होंने यज्ञ की सिद्धताएं (तैयारियां) आरंभ कीं । नारदमुनि के मार्गदर्शनानुसार यज्ञ का आरंभ हुआ । मंत्रघोष के साथ सबने विष्णुतत्त्व का आवाहन किया । यज्ञकी ज्वालाओं के साथ यज्ञकुंड में विष्णुतत्त्व प्रकट होने लगा । इससे पृथ्वी पर विद्यमान अनिष्ट शक्तियों को कष्ट होने लगा । उनमें भगदड मच गई । उन्हें अपने कष्टका कारण समझ में नहीं आ रहा था । धीरे-धीरे श्रीविष्णु पूर्ण रूपसे प्रकट हुए । ऋषि-मुनियों के साथ वहां उपस्थित सभी भक्तों को श्री विष्णुजी के दर्शन हुए । उस दिन फाल्गुन पूर्णिमा थी । इस प्रकार त्रेतायुग के प्रथम यज्ञ के स्मरण में होली मनाई जाती है । होली के संदर्भ में शास्त्रों एवं पुराणों में अनेक कथाएं प्रचलित हैं–होली के पर्व से अनेक कहानियाँ जुड़ी हुई हैं। इनमें से सबसे प्रसिद्ध कहानी है प्रह्लाद की। माना जाता है कि प्राचीन काल में हिरण्यकशिपु नाम का एक अत्यंत बलशाली असुर था। अपने बल के दर्प में वह स्वयं को ही ईश्वर मानने लगा था। उसने अपने राज्य में ईश्वर का नाम लेने पर ही पाबंदी लगा दी थी। हिरण्यकशिपु का पुत्र प्रह्लाद ईश्वर भक्त था। प्रह्लाद की ईश्वर भक्ति से क्रुद्ध होकर हिरण्यकशिपु ने उसे अनेक कठोर दंड दिए, परंतु उसने ईश्वर की भक्ति का मार्ग न छोड़ा। हिरण्यकशिपु की बहन होलिका को वरदान प्राप्त था कि वह आग में भस्म नहीं हो सकती। हिरण्यकशिपु ने आदेश दिया कि होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठे। आग में बैठने पर होलिका तो जल गई, पर प्रह्लाद बच गया। ईश्वर भक्त प्रह्लाद की याद में इस दिन होली जलाई जाती है। प्रतीक रूप से यह भी माना जाता है कि प्रह्लाद का अर्थ आनन्द होता है। वैर और उत्पीड़न की प्रतीक होलिका (जलाने की लकड़ी) जलती है और प्रेम तथा उल्लास का प्रतीक प्रह्लाद (आनंद) अक्षुण्ण रहता है। प्रह्लाद की कथा के अतिरिक्त यह पर्व राक्षसी ढुंढी, राधा कृष्ण के रास और कामदेव के पुनर्जन्म से भी जुड़ा हुआ है। कुछ लोगों का मानना है कि होली में रंग लगाकर, नाच-गाकर लोग शिव के गणों का वेश धारण करते हैं तथा शिव की बारात का दृश्य बनाते हैं। कुछ लोगों का यह भी मानना है कि भगवान श्रीकृष्ण ने इस दिन पूतना नामक राक्षसी का वध किया था। इसी खु़शी में गोपियों और ग्वालों ने रासलीला की और रंग खेला था। भविष्यपुराण की कथा (Bhavishya puran ki katha) :- भविष्यपुराण में एक कथा है । प्राचीन काल में ढुंढा अथवा ढौंढा नामक राक्षसी एक गांव में घुसकर बालकों को कष्ट देती थी । वह रोग एवं व्याधि निर्माण करती थी । उसे गांव से निकालने हेतु लोगों ने बहुत प्रयत्न किए; परंतु वह जाती ही नहीं थी । अंत में लोगों ने अपशब्द बोलकर, श्राप देकर तथा सर्वत्र अग्नि जलाकर उसे डराकर भगा दिया । वह भयभीत होकर गांव से भाग गई । इस प्रकार अनेक कथाओं के अनुसार विभिन्न कारणों से इस उत्सव को देश-विदेश में विविध प्रकार से मनाया जाता है । प्रदेशानुसार फाल्गुनी पूर्णिमा से पंचमी तक पांच-छः दिनों में, कहीं तो दो दिन, तो कहीं पांचों दिन तक यह त्यौहार मनाया जाता है । होली का महत्त्व (Holi ka mahatva) : होली का संबंध मनुष्य के व्यक्तिगत तथा सामाजिक जीवन से है, साथ

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