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Author name: Divam Astro World

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मंत्र जाप की शक्तियां

🔹ॐ कार मंत्र में शक्तियाँ हैं (Mantra Chanting) 🔸रक्षण शक्ति : ॐ सहित मंत्र का जप करते हैं तो वह हमारे जप तथा पुण्य की रक्षा करता है । किसी नामदान के लिए हुए साधक पर यदि कोई आपदा आनेवाली है, कोई दुर्घटना घटने वाली है तो मंत्र भगवान उस आपदा को शूली में से काँटा कर देते हैं । साधक का बचाव कर देते हैं। ऐसा बचाव तो एक नहीं, हजारों साधकों के जीवन में चमत्कारिक ढंग से महसूस होता है । 🔸गति शक्ति : जिस योग में, ज्ञान में, ध्यान में आप फिसल गये थे, उदासीन हो गये थे, किंकर्तव्यविमूढ़ हो गये थे उसमें मंत्रदीक्षा लेने के बाद गति आने लगती है । मंत्रदीक्षा के बाद आपके अंदर गति शक्ति कार्य में आपको मदद करने लगती है । 🔸कांति शक्ति : मंत्रजाप से जापक के कुकर्मों के संस्कार नष्ट होने लगते हैं और उसका चित्त उज्जवल होने लगता है । उसकी आभा उज्जवल होने लगती है, उसकी मति-गति उज्जवल होने लगती है और उसके व्यवहार में उज्जवलता आने लगती है । इसका मतलब ऐसा नहीं है कि आज मंत्र लिया और कल सब छूमंतर हो जायेगा… धीरे-धीरे होगा। एक दिन में कोई स्नातक नहीं होता,  एक दिन में कोई एम.ए. नहीं पढ़ लेता, ऐसे ही एक दिन में सब छूमंतर नहीं हो जाता। मंत्र लेकर ज्यों-ज्यों आप श्रद्धा से, एकाग्रता से और पवित्रता से जप करते जायेंगे त्यों-त्यों विशेष लाभ होता जायेगा । 🔸प्रीति शक्ति : ज्यों-ज्यों आप मंत्र जपते जायेंगे त्यों-त्यों मंत्र के देवता के प्रति, मंत्र के ऋषि, मंत्र के सामर्थ्य के प्रति आपकी प्रीति बढ़ती जायेगी । 🔸तृप्ति शक्ति : ज्यों-ज्यों आप मंत्र जपते जायेंगे त्यों-त्यों आपकी अंतरात्मा में तृप्ति बढ़ती जायेगी, संतोष बढ़ता जायेगा ।**जिनको गुरुमंत्र सिद्ध हो गया है उनकी वाणी में सामर्थ्य आ जाता है । नेता भाषण करता है त लोग इतने तृप्त नहीं होते, किंतु जिनका गुरुमंत्र सिद्ध हो गया है ऐसे महापुरुष बोलते हैं तो लोग बड़े तृप्त हो जाते हैं और महापुरुष के शिष्य बन जाते हैं । 🔸अवगम शक्ति : मंत्रजाप से दूसरों के मनोभावों को जानने की शक्ति विकसित हो जाती है । दूसरे के मनोभावों को आप अंतर्यामी बनकर जान सकते हो । 🔸प्रवेश अवति शक्ति : अर्थात् सबके अंतरतम की चेतना के साथ एकाकार होने की शक्ति । अंतःकरण के सर्व भावों को तथा पूर्वजीवन के भावों को और भविष्य की यात्रा के भावों को जानने की शक्ति कई योगियों में होती है । वे कभी-कभार मौज में आ जायें तो बता सकते हैं कि आपकी यह गति थी, आप यहाँ थे, फलाने जन्म में ऐसे थे, अभी ऐसे हैं । जैसे दीर्घतपा के पुत्र पावन को माता-पिता की मृत्यु पर उनके लिए शोक करते देखकर उसके बड़े भाई पुण्यक ने उसे उसके पूर्वजन्मों के बारे में बताया था । यह कथा योगवाशिष्ठ महारामायण में आती है । 🔸श्रवण शक्ति : मंत्रजाप के प्रभाव से जापक सूक्ष्मतम, गुप्ततम शब्दों का श्रोता बन जाता है । जैसे, शुकदेवजी महाराज ने जब परीक्षित के लिए सत्संग शुरु किया तो देवता आये । शुकदेवजी ने उन देवताओं से बात की । माँ आनंदमयी का भी देवलोक के साथ सीधा सम्बन्ध था । और भी कई संतो का होता है । दूर देश से भक्त पुकारता है कि गुरुजी ! मेरी रक्षा करो… तो गुरुदेव तक उसकी पुकार पहुँच जाती है !

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आज का पंचांग (Panchang)

दिनांक – 17 फरवरी 2025 दिन – सोमवार विक्रम संवत् – 2081 अयन – उत्तरायण ऋतु – शिशिर मास – फाल्गुन पक्ष – कृष्ण तिथि – पञ्चमी प्रातः 04:53 फ़रवरी 18 तक तत्पश्चात षष्ठी नक्षत्र – चित्रा पूर्ण रात्रि तक योग – शूल प्रातः 08:55 तक, तत्पश्चात गण्ड राहु काल – सुबह 08:36 से सुबह 10:02 तक सूर्योदय – 07:14 सूर्यास्त – 06:32 दिशा शूल – पूर्व दिशा में ब्राह्ममुहूर्त – प्रातः 05:30 से 06:20 तक अभिजीत मुहूर्त – दोपहर 12:31 से दोपहर 01:17 तक निशिता मुहूर्त – रात्रि 12:28 फरवरी 18 से रात्रि 01:19 फरवरी 18 तक विशेष – पञ्चमी को बेल खाने से कलंक लगता है। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-34) 🔹बीमारी क्या खबर देती हैं ?🔹 🔹जो भी बिमारी आती है वह खबर देती है कि तुम खान-पान में संयम करो । पेट बाहर है तो हफ्ते में एकाध उपवास करो अथवा १५ दिन में एकादशी का व्रत रखो । कुछ नही खाओ, केवल नीबूं पानी अथवा गुनगुना पानी पियो । लड़्घनं परमौषधम ।…..अर्धरोगहरि निद्रा सर्वरोगहरि क्षुधा । उपवास और आराम बीमारियों को खा जायेगा । व्यक्ति दवाई से इतना जल्दी ठीक नहीं होता जितना उपवास से ठीक होता है । 🔹उपवास में कमजोरी लगे तो १५ से २५ ग्राम किशमिश धो के खा लो, बस हो गया । सारी बीमारी निकल जाती है | द्राक्ष, किशमिश लोग ऐसे ही खा लेते है । इन पर जंतुनाशक दवा डालते हैं, जो कि जहरी, हानिकारक होती है । इन्हें ३-४ बार अच्छी तरह धोकर ही खाना चाहिए । कभी गोमूत्र (या गोमूत्र अर्क) की कुछ बूँदे पानी में डाल के उससे भी धो सकते हैं । 🔹प्राणायाम करो, सूर्यनारायण को अर्ध्य दो और नाभि पर सूर्यनारायण का ध्यान करो । इससे आरोग्य प्राप्त होता है ।

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आज का पंचांग (Panchang today)

दिनांक – 14 फरवरी 2025 दिन – शुक्रवार विक्रम संवत् – 2081 अयन – उत्तरायण ऋतु – शिशिर मास – फाल्गुन पक्ष – कृष्ण तिथि – द्वितीया रात्रि 09:52 तक तत्पश्चात तृतीया नक्षत्र – पूर्वाफाल्गुनी रात्रि 11:09 तक, तत्पश्चात उत्तराफाल्गुनी योग – अतिगण्ड प्रातः 07:20 तक, तत्पश्चात सुकर्मा राहु काल – सुबह 11:29 से दोपहर 12:54 तक सूर्योदय – 07:16 सूर्यास्त – 06:31 दिशा शूल – पश्चिम दिशा में अग्निवास: पृथ्वी -शुभ (रा.08:50)तक, आकाश-अशुभ चन्द्र वास: पूर्व शिववास: सभायां- कष्टकारक, क्रीडायां-संततिकष्ट ब्राह्ममुहूर्त – प्रातः 05:32 से 06:22 तक अभिजीत मुहूर्त – दोपहर 12:31 से दोपहर 01:17 तक निशिता मुहूर्त – रात्रि 12:28 फरवरी 15 से रात्रि 01:19 फरवरी 15 तक व्रत पर्व विवरण – मातृ-पितृ पूजन दिवस 🔻पद, चरण🔻 2 टा पूर्व फाल्गुनी 10:03:30 3 टी पूर्व फाल्गुनी 16:35:00 4 टू पूर्व फाल्गुनी 23:08:19 1 टे उत्तर फाल्गुनी 29:43:24 🔶चोघडिया, दिन🔶 चर 06:48 – 08:12 शुभ लाभ 08:12 – 09:37 शुभ अमृत 09:37 – 11:01 शुभ काल 11:01 – 12:26 अशुभ शुभ 12:26 – 13:50 शुभ रोग 13:50 – 15:15 अशुभ उद्वेग 15:15 – 16:40 अशुभ चर. 16:40 – 18:04 शुभ 🔶चोघडिया, रात🔶 रोग 18:04 – 19:39 अशुभ काल 19:39 – 21:15 अशुभ लाभ 21:15 – 22:50 शुभ उद्वेग 22:50 – 24:26 अशुभ शुभ 24:26 – 26:01 शुभ अमृत 26:01 – 27:36 शुभ चर 27:36 – 29:12 शुभ रोग 29:12 – 30:47 अशुभ विशेष – द्वितीया को बृहती (छोटा बैंगन) खाना निषिद्ध है। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-34)

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हवन-यज्ञ क्यो करे,कौनसा यज्ञ सर्वोपरि है (Yagya kyu kare)

दिनांक – 13 फरवरी 2025 दिन – गुरुवार विक्रम संवत् – 2081 अयन – उत्तरायण ऋतु – शिशिर मास – फाल्गुन पक्ष – कृष्ण तिथि – प्रतिपदा रात्रि 08:21 तक तत्पश्चात द्वितीया नक्षत्र – मघा रात्रि 09:07 तक, तत्पश्चात पूर्वाफाल्गुनी योग – शोभन प्रातः 07:31 तक, तत्पश्चात अतिगण्ड राहु काल – दोपहर 02:19 से दोपहर 03:44 तक सूर्योदय – 07:16 सूर्यास्त – 06:30 दिशा शूल – दक्षिण दिशा में अग्निवास: पाताल- अशुभ (रा.08:21)तक, पृथ्वी- शुभ चन्द्र वास: पूर्व शिववास: गौरीसन्निधौ- शुभ (रा.08:21)तक, सभायां- कष्टकारक ब्राह्ममुहूर्त – प्रातः 05:32 से 06:23 तक अभिजीत मुहूर्त – दोपहर 12:31 से दोपहर 01:17 तक निशिता मुहूर्त – रात्रि 12:28 फरवरी 14 से रात्रि 01:19 फरवरी 14 तक 🔻पद, चरण🔻 2 मी –मघा 08:16:26 3 मू –मघा 14:40:19 4 मे –मघा 21:06:08 1 मो —पूर्व फाल्गुनी 27:33:52 🔶चोघडिया, दिन🔶 शुभ –07:02 – 08:27 शुभ रोग –08:27 – 09:52 अशुभ उद्वेग –09:52 – 11:16 अशुभ चर –11:16 – 12:41 शुभ लाभ –12:41 – 14:06 शुभ अमृत –14:06 – 15:31 शुभ काल –15:31 – 16:56 अशुभ शुभ –16:56 – 18:21 शुभ 🔶चोघडिया, रात🔶 अमृत –18:21 – 19:56 शुभ चर –19:56 – 21:31 शुभ रोग –21:31 – 23:06 अशुभ काल –23:06 – 24:41 अशुभ लाभ –24:41 – 26:16 शुभ उद्वेग –26:16 – 27:51 अशुभ शुभ –27:51 – 29:26 शुभ अमृत– 29:26 – 31:01 शुभ विशेष – प्रतिपदा को कुष्माण्ड (कुम्हड़ा, पेठा) न खाएं क्योंकि यह धन का नाश करने वाला है। (ब्रह्मवैवर्त पुराण, ब्रह्म खंडः 27.29-34) 🔹हवन-यज्ञ क्यों ?🔹 🔹प्रतिदिन यज्ञ का लाभ पाने की युक्ति🔹 🔸आज भी आपको देशी गाय के गोबर के कंडे व कोयले मिल सकते हैं। कभी-कभार उन्हें जलाकर जौ, तिल, घी, नारियल के टुकड़े एवं गूगल मिला के तैयार किया गया धूप कर दो तो बहुत सारे हानिकारक जीवाणु नष्ट हो जायेंगे। 🔸जब आपको ध्यान, जप आदि करना हो तो थोड़ी देर पहले यह धूप करके फिर उस धूप से शुद्ध बने हुए वातावरण में प्राणायाम, ध्यान, जप करने बैठें तो बहुत ही लाभ होगा। किंतु धूप में भी अति न करें, नहीं तो गले में कुछ तकलीफ हो सकती है, अतः माप से करें। *🔸गौ-गोबर के कंडे के धुएँ से हानिकारक जीवाणु नष्ट हो जाते हैं। इसी कारण जब कोई मर जाता है तो श्मशान-यात्रा में एक व्यक्ति मटकी में कंडों का धूआँ करते हुए चलता है ताकि मृतक के जीवाणु समाज में, वातावरण में न फैलें। 🔸आजकल परफ्यूम आदि से अगरबत्तियाँ बनती हैं। वे खुशबू तो देती हैं लेकिन उनमें प्रयुक्त रसायनों का हमारे स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। 🔸एक तो मोटर-गाड़ियों के धुएँ का कुप्रभाव, दूसरा अगरबत्तियों के रसायनों का भी कुप्रभाव शरीर पर पड़ता है। ऐसी अगरबत्तियों की अपेक्षा सात्त्विक अगरबत्ती या धूपबत्ती मिल जाय तो ठीक है, नहीं तो कम-से-कम घी का थोड़ा धूप कर लिया करो। 🔹सर्वोपरि यज्ञ कौन-सा ?🔹 🔸कीटाणुओं को मारना और शरीररूपी कीटाणुओं को अच्छा रखना उसीके पीछे वैज्ञानिकों की सारी भागदौड़ और उनका विज्ञान काम करता है। 🔸हमारे ऋषियों ने कीटाणु मारने के लिए यज्ञ की खोज नहीं की है अपितु वातावरण, भाव तथा जन्म-मरण के चक्कर में डालनेवाले मलिन अंतःकरण को ठीक करके परमात्मप्राप्ति में यज्ञ को निमित्त बनाया है। 🔸उन यज्ञों में भी श्रीकृष्ण कहते हैं कि जपयज्ञ सर्वोपरि है। अग्नि में जौ, तिल होमना अच्छा है परंतु इससे भी श्रेष्ठ है गुरुमंत्र लेकर माला पर जप करना। उसको भगवान श्रीकृष्ण ने ‘जपयज्ञ’ कहा है। 🔸भगवन्नाम जप में योग्य-अयोग्य का खयाल भी नहीं किया जाता। भगवन्नाम सारी अयोग्यताओं को हरकर प्राणियों के चित्त में छिपी हुई योग्यता जगा देता है। इसलिए जपयज्ञ सर्वोपरि यज्ञ माना गया। भगवान कहते हैं: यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि…’सब प्रकार के यज्ञों में जपयज्ञ मैं हूँ।’  (गीता : १०.२५) 🔸यज्ञ करने में तो यजमान धूआँ सहे, विधि- विधान का पालन करे तब लाभ होता है। और उस समय तो अग्नि के सामने तपना पड़ता है, कालांतर में उसे सुख मिलता है लेकिन भगवन्नाम लेने से तो वर्तमान में ही सुख मिलता है और कालांतर में परमात्मा मिलता है। 🔹ध्यान की महिमा आज्ञाचक्र में ओंकार या गुरु का ध्यान करने से बुद्धि विकसित होती है और नाभि में ओंकार या गुरु का ध्यान करने से आरोग्य एवं रोग प्रतिकारक शक्ति विकसित होती है। 🔹सुख-शांति व बरकत के उपाय🔹 तुलसी को रोज जल चढायें तथा गाय के घी का दीपक जलायें। सुबह बिल्वपत्र पर सफेद चंदन का तिलक लगाकर संकल्प करके शिवलिंग पर अर्पित करें तथा ह्र्द्यपुर्वक प्रार्थना करें।

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स्तोत्र Stotra

मनोकामना पूर्ति स्तोत्र माॕंं त्रिवेणी स्तोत्र

।। त्रिशक्तिस्वरूपा श्रीत्रिवेणी स्तोत्र ।। (हिन्दी अर्थ सहित) तीर्थ राज प्रयाग में कल्पवास में अथवा कुंभ पर्व के अवसर पर वहां तीर्थ में स्नान व निवास करते हुए इस स्तोत्र का पाठ अवश्य करना चाहिए। इसके अतिरिक्त विश्व में कहीं भी रहते हुए भगवती त्रिवेणी लक्ष्मी और भगवान माधव नारायण का चिंतन ध्यान करते हुए इस स्तोत्र का पाठ त्रयतापो से मुक्त करता है।त्रिवेणी स्तोत्र-तीर्थराज प्रयाग में जहाँ गङ्गा यमुना सरस्वती मिलती हैं उसे त्रिवेणी कहते हैं । त्रिवेणी का वर्णन वेदों में भी आता है। स्त्रियों का सौभाग्य भी वेणी में ही होता है। चोटी को तीन लट पृथक करके गुथते हैं। पहिले तो वे तीनों पृथक-पृथक दीखती है, किन्त गुथने पर एक छिप जाती है दो ही दिखायी देती हैं। इसी प्रकार गङ्गा, यमुना सरस्वती तीनों मिलने पर सरस्वती गुप्त हो जाती है गङ्गा यमुना की दो धारा ही दिखायी देती हैं।यह पिण्ड तथा ब्रह्माण्ड त्रित्व पर ही अवलम्बित है। शरीर में भी इडा, पिङ्गला और सुषुम्ना जहाँ मिलती हैं, उसे त्रिवेणी कहते हैं। दोनों भौंहों के बीच में यह स्थान है। जहाँ ये मिलती हैं, उसे युक्त त्रिवेणी कहते हैं, जहाँ से फिर तीनों धारायें पृथक होती हैं उसे मुक्त त्रिवेणी कहते हैं। कलकत्ते के पास गङ्गा यमुना सरस्वती तीनों धारायें फिर पृथक होती है। वह स्थान भी त्रिवेणी के नाम से विख्यात है ‘त्रिवेणी’ नाम का वहाँ स्टेशन भी है। किन्तु प्राधान्य युक्तत्रिवेणी का ही है। जो पिण्ड में है वही ब्रह्माण्ड है। इसीलिये ब्रह्मा, विष्णु, महेश, सत्व, रज, तम इनसे ही सृष्टि होती है। त्रिवेणी में आधिभौतिक, आधिदैविक, और आध्यात्म ये तीनों ही भाव हैं। त्रिवेणीदेवी से ही सृष्टि होती है। त्रिवेणी ही सृष्टि की रक्षा करती हैं और अन्त में त्रिवेणी ही सबका संहार करती है। विश्व की सष्टि, स्थिति, लय त्रिवेणी पर ही अवलम्बित है। त्रिवेणी के रूप में त्रिगुणात्मिका आद्या महालक्ष्मी ही अवस्थित है। जो अपने उपासकों को पाप ताप शाप से मुक्त कर परमेश्वर सत्यनारायण ( वेणी माधव) से साक्षात्कार कराती है ।त्रिवेणी की एक उपासना ही त्रिशक्ति की उपासना है। यही बात इस स्तोत्र में बतायी गयी है। यह प्राचीन स्तोत्र बहुत ही दिव्य और महान है, इसकी रचना कब हुई और किसने की पता नहीं। किन्तु इसमें वर्णित भाव अतीव दिव्य है और त्रिवेणी के यथार्थ रूप को बतलाते हैं। हरि ॐ तत्सत्। श्री गणेशाय नमः। श्रीवेणीमाधवायनमः। श्रीत्रिवेणीदेव्यैनमः।। ॐ नमो नारायणाय वासुदेवाय। ॐ नमो भगवते त्रिवेणी माधवाय। ॐ श्रींं ह्री क्लीं ऐं सौ: त्रितापनाशिनी त्रिभुवन रूपिणी त्रिवेणी लक्ष्म्यै नमः। ॐ श्रीरुपायै च विद्महे, माधवप्रियायै धीमहि।तन्नो: त्रिवेणी: प्रचोदयात्।। ॐ महालक्ष्म्यै च विद्महे, मूलप्रकृत्यै धीमहि। तन्नो: भगवती: प्रचोदयात्।। ॐ आद्यायै च विद्महे, परमेश्वर्यै धीमहि। तन्नो: नारायणी: प्रचोदयात्।। ॐ काराब्ज निवासमत्त मधुपामुद्यान पीठस्थितांॐ कारागण काम कल्पलतिकामोजीस्वनी मौषधीम्। ॐ कारेश्वर केवल प्रिय सखी मोंकार नाद प्रियाम्ॐ कार प्रभवां विचित्र विभवां देवीं त्रिवेणी भजे।।१।। भावार्थ-जो ॐकार रूपी कमल वाटिका के पीठ पर मस्त भौरों की तरह निवास करती हैं, ॐकार के उपासकों की कामना सिद्ध करने के लिये कल्पवृक्ष के समान हैं, तेजोवर्धक औषधि के तुल्य हैं, ॐकारेश्वर (कृष्ण ) की एकमात्र प्रियसखी हैं, जिन्हें ॐ कार शब्द प्रिय है, ॐ कार से जिनकी उत्पत्ति हुई है और जो विचित्र ऐश्वर्यशालिनी हैं, ऐसे त्रिवेणी देवी की मैं वन्दना करता हूँ। अद्वैतांमभिवांक्षितार्थ फलदाम ब्याहता मव्ययाम्अष्टैश्वर्य करामनन्त जयदामब्जस्थितामक्षरीम्। आब्धि ग्रासनुतामशेष जननी मर्काग्नि कोटिप्रभाम्अज्ञानान्ध हरामपार करुणां देवीं त्रिवेणी भजे।।२।। भावार्थ-जो अद्वैत स्वरूपा, मनोवांछित फलदायिनी, अव्याहत गतिवाली, अविनाशिनी, आठों सिद्धियों को देनेवाली, सदा विजय प्राप्त करानेवाली, कमल पर स्थित अक्षर स्वरूपा हैं, जिनकी स्तुति अगस्तजी किया करते हैं, जो जगजननी हैं करोडों सूर्य एवं अग्नि के समान चमकनेवाली हैं, अज्ञान रूपी अन्धकार का नाश करनेवाली हैं, और जो अपार करुणामयी हैं, ऐसे त्रिवेणी देवी की मैं वन्दना करता हूँ। आम्नायागम सेविताघि युगलामापीनुत्तुङ्गस्तनीम्आपोज्योति रसाभिपूर्ण लहरी मानंद संधायिनीम्। आधारामरुणामनेक कुशलामाकार संशोभिताम्आदिक्षान्त समस्त वर्ण निलयां देवीं त्रिवेणींभजे।।३।। भावार्थ-जिनके दोनों चरणों की सेवा वेद और तन्त्रशास्त्र किया करते हैं, स्तन स्थूल एवं उत्तुङ्ग हैं, जिनका जल निर्मल स्वादिष्ट तथा तरङ्गों से युक्त है, जो आनन्द देनेवाली हैं, सबको धारण करनेवाली हैं, जिनका वर्ण लाल है, जो अनेक कार्यों में कुशल हैं, जिनकी आकृति सुन्दर है, और जो ‘अ’ से लेकर ‘क्ष’ तक के सभी अक्षरों के आधार है, ऐसे त्रिवेणीदेवी की मैं वन्दना करता हूँ। इष्टानिष्ट विवर्जिता मिह पर स्वामैक्य सौख्य प्रदांइच्छासिद्धि विलास वैभव परामिच्छा क्रिया संयुताम्। इच्छा शक्ति धनुश्शराभि दधतीं मिन्द्रार्चिता मिंदिराम्इष्टावाप्त वरिष्ठ वाक् प्रकरिणीं देवी त्रिवेणींभजे।।४।। भावार्थ-जो अच्छे और बुरे अपने और पराये के भेदभाव से दूर है। तथा सुख प्रदान करानेवाली एकमात्र स्वामिनी है, इच्छा शक्ति विलास-वैभव से सम्पन्न यथेच्छ आचरण करनेवाली हैं, इच्छाशक्ति रूपी धनुष और बाण को धारण करती है, इन्द्र जिनकी पूजा करते हैं, जो धन तथा मनोकामना पूर्ण करती है। जिनकी वाणी बड़ी ही ओजस्विनी है, ऐसे त्रिवेणीदेवी की में वन्दना करता हूँ ॥४॥ ईपत्स्मरे विराजमान वदना मीशान दैवार्चिताम्ईशित्वादि समस्त सिद्धि सहिता मींकार वर्णातिकाम्। ईशां काम कलां विशुद्धमनसां विश्वेश्वरीमीश्वरीम्ईषंत्री सकलार्थ दीपन करीं देवीं त्रिवेणी भजे।।५।। भावार्थ-जिनका मुख मन्द मन्द मुस्कान से सुशोभित है, शङ्कर जिनका पूजन करते हैं, जो ‘ईशित्व’ (सबको वश में रखना) आदि सम्पूर्ण सिद्धियों से युक्त हैं, जिनका स्वरूप इकार अक्षरमय है, जो सबकी स्वामिनी है, काम की कला हैं, पवित्र अन्तःकरण वाली हैं, विश्व की शासिका हैं, ईश्वरी हैं, तथा सकल पदार्थों को प्रकाशित करनेवाली, ऐसे त्रिवेणीदेवी की में वन्दना करता हूँ। उत्फुल्लारुण पद्मनेत्र युगला मुद्दण्ड दैत्यापहाम्उद्योतोज्ज्वल तीर्थराज रमणी मुल्लास तेजोवतीम्। उत्कर्षाभयदान पेशलकरा मुच्छास शक्तिप्रदाम्म उर्वस्यार्चित पादुकां पर कलां देवीं त्रिवेणींभजे।।६।। भावार्थ-प्रस्फुटित लाल कमल के समान जिनके नेत्र हैं, जो उद्दण्ड दैत्यों को नाश करनेवाली हैं, प्रभा से विलसित हैं, तीर्थराज प्रयाग की प्रिया है, उल्लास और तेज से युक्त हैं, उत्कर्ष एवं अभयदान देने में सिद्धहस्त हैं, जीवनशक्ति प्रदान करनेवाली हैं, जिनके खड़ाऊँ की पूजा उर्वशी करती है तथा जो उत्कृष्ट कला स्वरूपा हैं, ऐसे त्रिवेणीदेवी की मैं वन्दना करता हूँ। ऊर्ध्वश्रोत परा सरां त्रिनयना मूर्ध्वस्वरा मूर्ध्वगामऊर्ध्वाश्वास सुषुम्नमार्ग गमना मूर्ध्वेज्वल ज्वालिनीम्। ऊर्ध्वाधः परिपूर्णधाम लहरी मूर्ध्वप्रभां भास्वराम्ऊर्ध्वस्थान निवासिनीं शुभ करीं देवीं त्रिवेणींभजे।।७।। भावार्थ-जो ऊर्ध्वगामी प्रवाह से युक्त हैं, जिनके तीन नेत्र हैं, जिनका स्वर ऊर्ध्व है, जो ऊर्ध्वगामिनी है, ऊध्र्व-उच्छवास एवं सुषुम्ना नाड़ी के मार्ग से गमन करनेवाली हैं, ऊपर को उठने वाली भास्वर ज्वाला से दैदीप्यमान है, ऊपर और नीचे अत्यन्त तेज तरङ्गों से व्याप्त है, ऊध्र्व कान्तिवाली है, जाज्वल्यमान हैं, ऊर्ध्व स्थान में निवास करनेवाली है, तथा शुभ

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