।। त्रिशक्तिस्वरूपा श्रीत्रिवेणी स्तोत्र ।। (हिन्दी अर्थ सहित) तीर्थ राज प्रयाग में कल्पवास में अथवा कुंभ पर्व के अवसर पर वहां तीर्थ में स्नान व निवास करते हुए इस स्तोत्र का पाठ अवश्य करना चाहिए। इसके अतिरिक्त विश्व में कहीं भी रहते हुए भगवती त्रिवेणी लक्ष्मी और भगवान माधव नारायण का चिंतन ध्यान करते हुए इस स्तोत्र का पाठ त्रयतापो से मुक्त करता है।त्रिवेणी स्तोत्र-तीर्थराज प्रयाग में जहाँ गङ्गा यमुना सरस्वती मिलती हैं उसे त्रिवेणी कहते हैं । त्रिवेणी का वर्णन वेदों में भी आता है। स्त्रियों का सौभाग्य भी वेणी में ही होता है। चोटी को तीन लट पृथक करके गुथते हैं। पहिले तो वे तीनों पृथक-पृथक दीखती है, किन्त गुथने पर एक छिप जाती है दो ही दिखायी देती हैं। इसी प्रकार गङ्गा, यमुना सरस्वती तीनों मिलने पर सरस्वती गुप्त हो जाती है गङ्गा यमुना की दो धारा ही दिखायी देती हैं।यह पिण्ड तथा ब्रह्माण्ड त्रित्व पर ही अवलम्बित है। शरीर में भी इडा, पिङ्गला और सुषुम्ना जहाँ मिलती हैं, उसे त्रिवेणी कहते हैं। दोनों भौंहों के बीच में यह स्थान है। जहाँ ये मिलती हैं, उसे युक्त त्रिवेणी कहते हैं, जहाँ से फिर तीनों धारायें पृथक होती हैं उसे मुक्त त्रिवेणी कहते हैं। कलकत्ते के पास गङ्गा यमुना सरस्वती तीनों धारायें फिर पृथक होती है। वह स्थान भी त्रिवेणी के नाम से विख्यात है ‘त्रिवेणी’ नाम का वहाँ स्टेशन भी है। किन्तु प्राधान्य युक्तत्रिवेणी का ही है। जो पिण्ड में है वही ब्रह्माण्ड है। इसीलिये ब्रह्मा, विष्णु, महेश, सत्व, रज, तम इनसे ही सृष्टि होती है। त्रिवेणी में आधिभौतिक, आधिदैविक, और आध्यात्म ये तीनों ही भाव हैं। त्रिवेणीदेवी से ही सृष्टि होती है। त्रिवेणी ही सृष्टि की रक्षा करती हैं और अन्त में त्रिवेणी ही सबका संहार करती है। विश्व की सष्टि, स्थिति, लय त्रिवेणी पर ही अवलम्बित है। त्रिवेणी के रूप में त्रिगुणात्मिका आद्या महालक्ष्मी ही अवस्थित है। जो अपने उपासकों को पाप ताप शाप से मुक्त कर परमेश्वर सत्यनारायण ( वेणी माधव) से साक्षात्कार कराती है ।त्रिवेणी की एक उपासना ही त्रिशक्ति की उपासना है। यही बात इस स्तोत्र में बतायी गयी है। यह प्राचीन स्तोत्र बहुत ही दिव्य और महान है, इसकी रचना कब हुई और किसने की पता नहीं। किन्तु इसमें वर्णित भाव अतीव दिव्य है और त्रिवेणी के यथार्थ रूप को बतलाते हैं। हरि ॐ तत्सत्। श्री गणेशाय नमः। श्रीवेणीमाधवायनमः। श्रीत्रिवेणीदेव्यैनमः।। ॐ नमो नारायणाय वासुदेवाय। ॐ नमो भगवते त्रिवेणी माधवाय। ॐ श्रींं ह्री क्लीं ऐं सौ: त्रितापनाशिनी त्रिभुवन रूपिणी त्रिवेणी लक्ष्म्यै नमः। ॐ श्रीरुपायै च विद्महे, माधवप्रियायै धीमहि।तन्नो: त्रिवेणी: प्रचोदयात्।। ॐ महालक्ष्म्यै च विद्महे, मूलप्रकृत्यै धीमहि। तन्नो: भगवती: प्रचोदयात्।। ॐ आद्यायै च विद्महे, परमेश्वर्यै धीमहि। तन्नो: नारायणी: प्रचोदयात्।। ॐ काराब्ज निवासमत्त मधुपामुद्यान पीठस्थितांॐ कारागण काम कल्पलतिकामोजीस्वनी मौषधीम्। ॐ कारेश्वर केवल प्रिय सखी मोंकार नाद प्रियाम्ॐ कार प्रभवां विचित्र विभवां देवीं त्रिवेणी भजे।।१।। भावार्थ-जो ॐकार रूपी कमल वाटिका के पीठ पर मस्त भौरों की तरह निवास करती हैं, ॐकार के उपासकों की कामना सिद्ध करने के लिये कल्पवृक्ष के समान हैं, तेजोवर्धक औषधि के तुल्य हैं, ॐकारेश्वर (कृष्ण ) की एकमात्र प्रियसखी हैं, जिन्हें ॐ कार शब्द प्रिय है, ॐ कार से जिनकी उत्पत्ति हुई है और जो विचित्र ऐश्वर्यशालिनी हैं, ऐसे त्रिवेणी देवी की मैं वन्दना करता हूँ। अद्वैतांमभिवांक्षितार्थ फलदाम ब्याहता मव्ययाम्अष्टैश्वर्य करामनन्त जयदामब्जस्थितामक्षरीम्। आब्धि ग्रासनुतामशेष जननी मर्काग्नि कोटिप्रभाम्अज्ञानान्ध हरामपार करुणां देवीं त्रिवेणी भजे।।२।। भावार्थ-जो अद्वैत स्वरूपा, मनोवांछित फलदायिनी, अव्याहत गतिवाली, अविनाशिनी, आठों सिद्धियों को देनेवाली, सदा विजय प्राप्त करानेवाली, कमल पर स्थित अक्षर स्वरूपा हैं, जिनकी स्तुति अगस्तजी किया करते हैं, जो जगजननी हैं करोडों सूर्य एवं अग्नि के समान चमकनेवाली हैं, अज्ञान रूपी अन्धकार का नाश करनेवाली हैं, और जो अपार करुणामयी हैं, ऐसे त्रिवेणी देवी की मैं वन्दना करता हूँ। आम्नायागम सेविताघि युगलामापीनुत्तुङ्गस्तनीम्आपोज्योति रसाभिपूर्ण लहरी मानंद संधायिनीम्। आधारामरुणामनेक कुशलामाकार संशोभिताम्आदिक्षान्त समस्त वर्ण निलयां देवीं त्रिवेणींभजे।।३।। भावार्थ-जिनके दोनों चरणों की सेवा वेद और तन्त्रशास्त्र किया करते हैं, स्तन स्थूल एवं उत्तुङ्ग हैं, जिनका जल निर्मल स्वादिष्ट तथा तरङ्गों से युक्त है, जो आनन्द देनेवाली हैं, सबको धारण करनेवाली हैं, जिनका वर्ण लाल है, जो अनेक कार्यों में कुशल हैं, जिनकी आकृति सुन्दर है, और जो ‘अ’ से लेकर ‘क्ष’ तक के सभी अक्षरों के आधार है, ऐसे त्रिवेणीदेवी की मैं वन्दना करता हूँ। इष्टानिष्ट विवर्जिता मिह पर स्वामैक्य सौख्य प्रदांइच्छासिद्धि विलास वैभव परामिच्छा क्रिया संयुताम्। इच्छा शक्ति धनुश्शराभि दधतीं मिन्द्रार्चिता मिंदिराम्इष्टावाप्त वरिष्ठ वाक् प्रकरिणीं देवी त्रिवेणींभजे।।४।। भावार्थ-जो अच्छे और बुरे अपने और पराये के भेदभाव से दूर है। तथा सुख प्रदान करानेवाली एकमात्र स्वामिनी है, इच्छा शक्ति विलास-वैभव से सम्पन्न यथेच्छ आचरण करनेवाली हैं, इच्छाशक्ति रूपी धनुष और बाण को धारण करती है, इन्द्र जिनकी पूजा करते हैं, जो धन तथा मनोकामना पूर्ण करती है। जिनकी वाणी बड़ी ही ओजस्विनी है, ऐसे त्रिवेणीदेवी की में वन्दना करता हूँ ॥४॥ ईपत्स्मरे विराजमान वदना मीशान दैवार्चिताम्ईशित्वादि समस्त सिद्धि सहिता मींकार वर्णातिकाम्। ईशां काम कलां विशुद्धमनसां विश्वेश्वरीमीश्वरीम्ईषंत्री सकलार्थ दीपन करीं देवीं त्रिवेणी भजे।।५।। भावार्थ-जिनका मुख मन्द मन्द मुस्कान से सुशोभित है, शङ्कर जिनका पूजन करते हैं, जो ‘ईशित्व’ (सबको वश में रखना) आदि सम्पूर्ण सिद्धियों से युक्त हैं, जिनका स्वरूप इकार अक्षरमय है, जो सबकी स्वामिनी है, काम की कला हैं, पवित्र अन्तःकरण वाली हैं, विश्व की शासिका हैं, ईश्वरी हैं, तथा सकल पदार्थों को प्रकाशित करनेवाली, ऐसे त्रिवेणीदेवी की में वन्दना करता हूँ। उत्फुल्लारुण पद्मनेत्र युगला मुद्दण्ड दैत्यापहाम्उद्योतोज्ज्वल तीर्थराज रमणी मुल्लास तेजोवतीम्। उत्कर्षाभयदान पेशलकरा मुच्छास शक्तिप्रदाम्म उर्वस्यार्चित पादुकां पर कलां देवीं त्रिवेणींभजे।।६।। भावार्थ-प्रस्फुटित लाल कमल के समान जिनके नेत्र हैं, जो उद्दण्ड दैत्यों को नाश करनेवाली हैं, प्रभा से विलसित हैं, तीर्थराज प्रयाग की प्रिया है, उल्लास और तेज से युक्त हैं, उत्कर्ष एवं अभयदान देने में सिद्धहस्त हैं, जीवनशक्ति प्रदान करनेवाली हैं, जिनके खड़ाऊँ की पूजा उर्वशी करती है तथा जो उत्कृष्ट कला स्वरूपा हैं, ऐसे त्रिवेणीदेवी की मैं वन्दना करता हूँ। ऊर्ध्वश्रोत परा सरां त्रिनयना मूर्ध्वस्वरा मूर्ध्वगामऊर्ध्वाश्वास सुषुम्नमार्ग गमना मूर्ध्वेज्वल ज्वालिनीम्। ऊर्ध्वाधः परिपूर्णधाम लहरी मूर्ध्वप्रभां भास्वराम्ऊर्ध्वस्थान निवासिनीं शुभ करीं देवीं त्रिवेणींभजे।।७।। भावार्थ-जो ऊर्ध्वगामी प्रवाह से युक्त हैं, जिनके तीन नेत्र हैं, जिनका स्वर ऊर्ध्व है, जो ऊर्ध्वगामिनी है, ऊध्र्व-उच्छवास एवं सुषुम्ना नाड़ी के मार्ग से गमन करनेवाली हैं, ऊपर को उठने वाली भास्वर ज्वाला से दैदीप्यमान है, ऊपर और नीचे अत्यन्त तेज तरङ्गों से व्याप्त है, ऊध्र्व कान्तिवाली है, जाज्वल्यमान हैं, ऊर्ध्व स्थान में निवास करनेवाली है, तथा शुभ