भगवान श्री कृष्ण अर्जुन से क्या कहते है ?
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।। घर के पितर रुष्ट होने के लक्षण और उपाय ।। बहुत जिज्ञासा होती है आखिर ये पितृदोष है क्या? पितृ-दोष शांति के सरल उपाय पितृ या पितृ गण कौन हैं ? आपकी जिज्ञासा को शांत करती विस्तृत प्रस्तुति। पितृ गण हमारे पूर्वज हैं जिनका ऋण हमारे ऊपर है, क्योंकि उन्होंने कोई ना कोई उपकार हमारे जीवन के लिए किया है मनुष्य लोक से ऊपर पितृ लोक है,पितृ लोक के ऊपर सूर्य लोक है एवं इस से भी ऊपर स्वर्ग लोक है।आत्मा जब अपने शरीर को त्याग कर सबसे पहले ऊपर उठती है तो वह पितृ लोक में जाती है, वहाँ हमारे पूर्वज मिलते हैं अगर उस आत्मा के अच्छे पुण्य हैं तो ये हमारे पूर्वज भी उसको प्रणाम कर अपने को धन्य मानते हैं की इस अमुक आत्मा ने हमारे कुल में जन्म लेकर हमें धन्य किया इसके आगे आत्मा अपने पुण्य के आधार पर सूर्य लोक की तरफ बढती है।वहाँ से आगे, यदि और अधिक पुण्य हैं, तो आत्मा सूर्य लोक को भेज कर स्वर्ग लोक की तरफ चली जाती है, लेकिन करोड़ों में एक आध आत्मा ही ऐसी होती है, जो परमात्मा में समाहित होती है जिसे दोबारा जन्म नहीं लेना पड़ता मनुष्य लोक एवं पितृ लोक में बहुत सारी आत्माएं पुनः अपनी इच्छा वश, मोह वश अपने कुल में जन्म लेती हैं। पितृ दोष- हमारे ये ही पूर्वज सूक्ष्म व्यापक शरीर से अपने परिवार को जब देखते हैं, और महसूस करते हैं कि हमारे परिवार के लोग ना तो हमारे प्रति श्रद्धा रखते हैं और न ही इन्हें कोई प्यार या स्नेह है और ना ही किसी भी अवसर पर ये हमको याद करते हैं,ना ही अपने ऋण चुकाने का प्रयास ही करते हैं तो ये आत्माएं दुखी होकर अपने वंशजों को श्राप दे देती हैं,जिसे “पितृ- दोष” कहा जाता है।पितृ दोष एक अदृश्य बाधा है। ये बाधा पितरों द्वारा रुष्ट होने के कारण होती है पितरों के रुष्ट होने के बहुत से कारण हो सकते हैं, आपके आचरण से, किसी परिजन द्वारा की गयी गलती से, श्राद्ध आदि कर्म ना करने से, अंत्येष्टि कर्म आदि में हुई किसी त्रुटि के कारण भी हो सकता है।इसके अलावा मानसिक अवसाद,व्यापार में नुक्सान, परिश्रम के अनुसार फल न मिलना, विवाह या वैवाहिक जीवन में समस्याएं, कैरिअर में समस्याएं या संक्षिप्त में कहें तो जीवन के हर क्षेत्र में व्यक्ति और उसके परिवार को बाधाओं का सामना करना पड़ता है। पितृ दोष होने पर अनुकूल ग्रहों की स्थिति, गोचर, दशाएं होने पर भी शुभ फल नहीं मिल पाते, कितना भी पूजा पाठ, देवी देवताओं की अर्चना की जाए उसका शुभ फल नहीं मिल पाता। पितृ दोष दो प्रकार से प्रभावित करता है- १.अधोगति वाले पितरों के कारण, २.उर्ध्वगति वाले पितरों के कारण। अधोगति वाले पितरों के दोषों का मुख्य कारण परिजनों द्वारा किया गया गलत आचरण, अतृप्त इच्छाएं, जायदाद के प्रति मोह और उसका गलत लोगों द्वारा उपभोग होने पर, विवाहादि में परिजनों द्वारा गलत निर्णय। परिवार के किसी प्रियजन को अकारण कष्ट देने पर पितर क्रुद्ध हो जाते हैं, परिवार जनों को श्राप दे देते हैं और अपनी शक्ति से नकारात्मक फल प्रदान करते हैं। उर्ध्व गति वाले पितर सामान्यतः पितृदोष उत्पन्न नहीं करते, परन्तु उनका किसी भी रूप में अपमान होने पर अथवा परिवार के पारंपरिक रीति-रिवाजों का निर्वहन नहीं करने पर वह पितृदोष उत्पन्न करते हैं।इनके द्वारा उत्पन्न पितृदोष से व्यक्ति की भौतिक एवं आध्यात्मिक उन्नति बिलकुल बाधित हो जाती है, फिर चाहे कितने भी प्रयास क्यों ना किये जाएँ, कितने भी पूजा पाठ क्यों ना किये जाएँ, उनका कोई भी कार्य ये पितृदोष सफल नहीं होने देता। पितृ दोष निवारण के लिए सबसे पहले ये जानना ज़रूरी होता है कि किस गृह के कारण और किस प्रकार का पितृ दोष उत्पन्न हो रहा है ?जन्म पत्रिका और पितृ दोष जन्म पत्रिका में लग्न, पंचम, अष्टम और द्वादश भाव से पितृदोष का विचार किया जाता है। पितृ दोष में ग्रहों में मुख्य रूप से सूर्य, चन्द्रमा, गुरु, शनि और राहू-केतु की स्थितियों से पितृ दोष का विचार किया जाता है।इनमें से भी गुरु, शनि और राहु की भूमिका प्रत्येक पितृ दोष में महत्वपूर्ण होती है इनमें सूर्य से पिता या पितामह, चन्द्रमा से माता या मातामह, मंगल से भ्राता या भगिनी और शुक्र से पत्नी का विचार किया जाता है।अधिकाँश लोगों की जन्म पत्रिका में मुख्य रूप से क्योंकि गुरु, शनि और राहु से पीड़ित होने पर ही पितृ दोष उत्पन्न होता है, इसलिए विभिन्न उपायों को करने के साथ साथ व्यक्ति यदि पंचमुखी, सातमुखी और आठ मुखी रुद्राक्ष भी धारण कर ले , तो पितृ दोष का निवारण शीघ्र हो जाता है। पितृ दोष निवारण के लिए इन रुद्राक्षों को धारण करने के अतिरिक्त इन ग्रहों के अन्य उपाय जैसे मंत्र जप और स्तोत्रों का पाठ करना भी श्रेष्ठ होता है। विभिन्न ऋण और पितृ दोष- हमारे ऊपर मुख्य रूप से ०५ ऋण होते हैं जिनका कर्म न करने (ऋण न चुकाने पर) हमें निश्चित रूप से श्राप मिलता है, ये ऋण हैं- मातृ ऋण, पितृ ऋण, मनुष्य ऋण, देव ऋण और ऋषि ऋण। मातृ ऋण- माता एवं माता पक्ष के सभी लोग जिनमें मा, मामी, नाना, नानी, मौसा, मौसी और इनके तीन पीढ़ी के पूर्वज होते हैं, क्योंकि माँ का स्थान परमात्मा से भी ऊंचा माना गया है अतः यदि माता के प्रति कोई गलत शब्द बोलता है, अथवा माता के पक्ष को कोई कष्ट देता रहता है, तो इसके फलस्वरूप उसको नाना प्रकार के कष्ट भोगने पड़ते हैं। इतना ही नहीं, इसके बाद भी कलह और कष्टों का दौर भी परिवार में पीढ़ी दर पीढ़ी चलता ही रहता है। पितृ ऋण- पिता पक्ष के लोगों जैसे बाबा, ताऊ, चाचा, दादा-दादी और इसके पूर्व की तीन पीढ़ी का श्राप हमारे जीवन को प्रभावित करता है पिता हमें आकाश की तरह छत्रछाया देता है, हमारा जिंदगी भर पालन -पोषण करता है, और अंतिम समय तक हमारे सारे दुखों को खुद झेलता रहता है।पर आज के के इस भौतिक युग में पिता का सम्मान क्या नयी पीढ़ी कर रही है ? पितृ-भक्ति करना मनुष्य का धर्म है, इस धर्म का पालन न करने पर उनका श्राप नयी पीढ़ी को झेलना ही पड़ता है, इसमें घर
चन्द्र ग्रहण का प्रभाव 07 सितम्बर 2025 के चन्द्र ग्रहण का बारह राशियों पर प्रभाव मेष चन्द्रग्रहण के प्रभाव से विवादों से छुटकारा मिल सकता है। आपकी राशि से एकादश भाव में पड़ने वाला यह ग्रहण आपकी आर्थिक स्थिति को भी सुदृढ़ रखेगा। व्यापार में उन्नति होगी। दोस्तों से कुछ नाराजगी हो सकती है। उच्चाधिकारियों के सामने आपकी छवि सुधरेगी। किसी बीमार परिजन की सेहत में सुधार होगा। समाधान: महामृत्युञ्जय मन्त्र का जप आपको परेशानियों से मुक्त रखेगा। वृषभ कार्यक्षेत्र में आपके विरुद्ध लोग सक्रिय हो सकते हैं। बड़े कार्य आपके हाथ से निकल सकते हैं। उच्च अधिकारी आपके ऊपर हावी होने का प्रयास करेंगे। पिता की सेहत का ध्यान रखना होगा। राजनीति से जुड़े लोगों को अच्छी सफलता मिल सकती है। समाधान: ग्रहण काल के दौन अपने गुरु मन्त्र का जप करें। मिथुन आपकी आर्थिक स्थिति अच्छी होगी। धैर्यवान होकर कार्य करें। सरकारी कार्यों में अवरोध उत्पन्न होने की आशंका रहेगी। तकनीक शिक्षा में सफलता मिलने के योग प्रबल हैं। स्थायी सम्पत्ति सम्बन्धित मामले सुलझ सकते हैं। धर्म-कर्म में विशेष रुचि लेंगे। समाधान: “ॐ सों सोमाय नमः।” का जप करें। कर्क आपकी राशि से अष्टम भाव में चन्द्रग्रहण प्रभाव डालेंगे। स्वास्थ्य सम्बन्धी कष्ट बढ़ सकते हैं। कोई शोक समाचार मिल सकता है। शोध कार्यों से जुड़े लोगों को नयी उपलब्धि मिल सकती है। लम्बी दूरी की यात्राओं से बचना चाहिये। मन तनाव और आशंकाओं से घिरा हो सकता है। समाधान: ग्रहण के अगले दिन सुबह उड़द की दाल और चावल का दान करें। सिंह चन्द्रग्रहण का प्रभाव सामान्य रहेगा। प्रतियोगी परीक्षा में उत्तम परिणाम मिल सकते हैं। व्यापार में कुछ नये बदलाव कर सकते हैं। किन्तु मिथ्या अहंकार से बचने का प्रयास करें। जीवनसाथी को सेहत सम्बन्धी परेशानी हो सकती है। विवादों का निपटारा करने में सफलता मिलेगी। समाधान: ग्रहण से 9 घण्टे पूर्व भोजन और जल में तुलसीदल डाल दें। कन्या चन्द्रग्रहण का प्रभाव आपकी राशि से षष्ठम् भाव पर पड़ने वाला है। यह ग्रहण आपको करियर में शानदार मौके उपलब्ध करायेगा। कानूनी मामलों में विजय मिलने के योग बन रहे हैं। आप अपने शत्रुओं पर भारी पड़ेंगे। भविष्य को लेकर महत्त्वपूर्ण निर्णय ले सकते हैं। समाधान: भगवान विष्णु के मन्त्रों का जप करें। तुला शेयर बाजार और वित्तीय मामलों में व्यापक उतार-चढ़ाव देखने को मिलेगा। गर्भवती महिलाओं को ग्रहण काल में चाकू, सुई और धारदार वस्तुओं से दूरी बनाकर रखनी चाहिये। पाचन विकार बढ़ सकते हैं। प्रेम सम्बन्धों में संवादहीनता उत्पन्न होने की आशंका है। पुराने मामले दोबारा उलझ सकते हैं। सन्तान को लेकर चिन्ता हो सकती है। समाधान: ग्रहण के दिन कौओं को मीठे चावल खिलायें। वृश्चिक नयी सम्पत्ति और वाहन में निवेश कर सकते हैं। हृदय रोगियों को अगले तीन-महीने विशेष रूप से सतर्क रहना चाहिये। उच्च पद की इच्छा और आकांक्षा रहेगी। माता का स्वास्थ्य परेशानी का कारण बन सकता है। अनावश्यक बातों को तूल न दें। सोचे हुए कार्य तय समय पर पूरे नहीं होंगे। समाधान: प्रतिदिन भगवान शिव का जलाभिषेक करने से कुछ राहत मिलेगी। धनु नये व्यापारिक समझौते हो सकते हैं। रुके हुये कार्य इस ग्रहण के प्रभाव में दोबारा शुरू हो सकते हैं। कार्यक्षेत्र में पदोन्नति मिल सकती है। मेहनत का सकारात्मक परिणाम प्राप्त होगा। महत्वपूर्ण कार्यों की योजना बना सकते हैं। अगले तीन महीने का समय नये अवसरों को पहचानने का है। समाधान: चींटियों को आटे और शक्कर खिलायें। मकर व्यर्थ के खर्चों से आपकी आर्थिक स्थिति बिगड़ सकती है। दाँतों और आँखों में कुछ समस्या आ सकती है। परिजनों के व्यवहार से असन्तुष्ट होंगे। गलत माध्यमों से धन कमाने की प्रवृत्ति नुकसानदेह होगी। धन के उधार लेन-देन से बचना चाहिये। किसी परिजन को स्वास्थ्य समस्या हो सकती है। जोखिम भरे निवेश लाभकारी सिद्ध होंगे। समाधान: ग्रहण के बाद किसी ब्राह्मण को धन और अन्न का दान करें। कुम्भ चन्द्रग्रहण आपकी ही राशि में घट रहा है। इसके कारण मानसिक तनाव बढ़ सकता है। तन्त्र और अध्यात्म में रुचि ले सकते हैं। भावनात्मक फैसले लेने से बचें। करियर को लेकर महत्वपूर्ण निर्णय ले सकते हैं। अनुसन्धानात्मक कार्यों के प्रति झुकाव बढ़ेगा। अपने से बड़ों की बातों का निरादर न करें। आत्मविश्वास में कमी हो सकती है। समाधान: ग्रहण के बाद श्वेत वस्त्र और चावल का दान करें। मीन दिखावटी जीवनशैली से बचें। एकाग्रचित्त होने में सफलता मिलेगी। दाम्पत्य जीवन में सम्बन्ध प्रगाढ़ होंगे। कार्यक्षेत्र में आपकी जिम्मेदारियाँ बढ़ने वाली हैं। किसी को धन उधार न दें। रात्रि में बुरे स्वप्न आ सकते हैं। मन में बहुत सारे विचारों का प्रवाह रहेगा। किसी योग्य गुरु से दीक्षा लेने का संकल्प मन में उदित होगा। सन्तान की सेहत का ध्यान रखें। समाधान: “नमः शिवाय।” मन्त्र का ग्रहण काल के दौरान जप करें।
चन्द्र ग्रहण विशेष (2) Read Post »
वैदिक ज्योतिष शोध संस्थान ७–८ सितम्बर २०२५ का पूर्ण चन्द्र ग्रहण: वैज्ञानिक तथ्य, आचार–विचार, मंत्र–दान और बारह राशियों पर विस्तृत प्रभावतिथि, प्रकार, दृश्यता और समय (IST)यह पूर्ण चन्द्र ग्रहण (Total Lunar Eclipse / Blood Moon) आज रविवार, 7 सितम्बर 2025 की रात भारत में स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। भारत में स्थानीय समयानुसार प्रमुख पड़ाव: पेनुमbral प्रारम्भ: 8:58 PM, 7 सितम्बरपूर्णता (Totality): 11:00 PM – 12:22 AM (8 सितम्बर)अधिकतम (मैक्सिमम): लगभग 11:41 PMपेनुमbral समाप्ति: 2:25 AM, 8 सितम्बर। Time and Dateयह ग्रहण एशिया, अफ्रीका, यूरोप और ऑस्ट्रेलिया से व्यापक रूप से दृश्य है; वैश्विक विवरण के अनुसार यह हाल के वर्षों में सबसे व्यापक रूप से दिखने वाले चन्द्र ग्रहणों में है। Time and DateNASA/Science पृष्ठ भी 7 सितम्बर 2025 को होने वाले इस टोटल लूनर एक्लिप्स की पुष्टि करता है। NASA Scienceनोट (परम्परा): भारत में अनेक लोग चन्द्र ग्रहण से लगभग ९ घंटे पूर्व सूतक मानते हैं (परम्परागत धार्मिक मान्यता)। समय–तिथियाँ स्थानानुसार/पंचांगानुसार भिन्न बताई जा सकती हैं; सूतक की यह परम्परा आज भी कई प्रकाशनों में उल्लिखित है। Indiatimesवैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य (संक्षेप)जब पृथ्वी सूर्य और चन्द्रमा के बीच आकर चन्द्रमा पर अपनी उम्ब्रा छाया डालती है, तब पूर्ण चन्द्र ग्रहण होता है। पृथ्वी का वायुमण्डल नीली तरंगदैर्घ्य अधिक बिखेर देता है और लाल प्रकाश चन्द्रमा तक पहुँचता है—इसी से Blood Moon का लालिमा–वर्ण दिखता है। (अवलोकन हेतु सुरक्षित; सौर ग्रहण की तरह किसी विशेष चश्मे की आवश्यकता नहीं।) Time and Dateग्रहण–काल में अनुशंसित आचरण (धार्मिक दृष्टि)यथाशक्ति मंत्र–जप, ध्यान, स्तोत्र–पाठ करें; ग्रहण–काल का जप अनेक परम्पराओं में अत्यंत फलदायी माना गया है। गर्भवती महिलाओं, वृद्धों व रोगियों के लिए अनावश्यक परिश्रम/तनाव से बचने की सलाह दी जाती है (यह सांस्कृतिक–धार्मिक अनुशंसा है, चिकित्सकीय सलाह नहीं)।सूतक/ग्रहण–काल में नव–भोजन, मांगलिक कर्म, अग्नि–आहुति आदि से परहेज़ की परम्परा भी प्रचलित है। Indiatimesग्रहण–काल में प्रचलित मंत्र (सर्व–राशि हेतु)महामृत्युंजय मंत्र: ॐ त्र्यंबकं यजामहे… (आरोग्य–शांति के लिए)ॐ नमः शिवाय (मन–शुद्धि व चित्त–स्थिरता)चन्द्र गायत्री: ॐ क्षीरोदन्वत् समभूताय नमः / ॐ चन्द्राय विद्महे सोमराजाय धीमहि तन्नो चन्द्रः प्रचोदयात्ग्रहणोत्तर शुद्धि एवं दानग्रहण के बाद स्नान/आचमन, घर–आसन की शुद्धि (गंगाजल/स्वच्छ जल) और दीप–धूप।दान: अन्न, तिल, वस्त्र, फल, गौ–सेवा/अन्न–सेवा, रोगियों/ज़रूरतमंदों की सहायता—परम्परानुसार ग्रहणोत्तर दान को अत्यन्त पुण्यकारी माना गया है। Indiatimesराशिवार विस्तृत प्रभाव, उपाय–मंत्र और दानज्योतिषीय विचार में इस ग्रहण का मुख्य प्रभाव कुम्भ राशि–क्षेत्र पर पड़ता है; नीचे दिए संकेत चन्द्र ग्रहण के सामूहिक/सामान्य फल हैं। व्यक्तिगत जन्म–कुण्डली, गोचर–दशा और देश–काल–पत्नीकरक आदि के अनुसार फल परिवर्तित हो सकते हैं। 1) मेष प्रभाव (लाभ भाव): नये सम्पर्क–अवसर, परन्तु पुराने मित्र/नेटवर्क में मतभेद सम्भव; मानसिक चंचलता। उपाय–मंत्र: ॐ चन्द्राय नमः, ॐ नमः शिवाय। दान: लाल वस्त्र, गुड़, मसूर, ताँबे का दान। 2) वृष प्रभाव (दशम भाव): कार्यस्थल पर उतार–चढ़ाव, वरिष्ठों से संवाद–सामंजस्य की परीक्षा; निर्णय धैर्य से लें। उपाय–मंत्र: ॐ नमः शिवाय, ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः। दान: चावल, दही, सफेद तिल/वस्त्र। 3) मिथुन प्रभाव (भाग्य भाव): यात्राएँ/धार्मिक योजनाएँ स्थगित; गुरु–पितृ विषय में सावधानी; भाग्य–फल मिश्रित। उपाय–मंत्र: ॐ नमो भगवते वासुदेवाय। दान: हल्दी, पीली दाल, पीला वस्त्र व गुड़। 4) कर्क प्रभाव (अष्टम भाव): आकस्मिक व्यय/उतार–चढ़ाव; स्वास्थ्य–सावधानी; वाहन/उपकरण में सतर्कता। उपाय–मंत्र: महामृत्युंजय जप, ॐ रुद्राय नमः। दान: काले तिल, तेल, अन्न। 5) सिंह प्रभाव (सप्तम भाव): दाम्पत्य/साझेदारी में संवेदनशीलता; संवाद–मर्यादा रखें, समझौतावादी रवैया हितकर। उपाय–मंत्र: ॐ नमः शिवाय, ॐ सूर्याय नमः। दान: गेहूँ, गुड़, लाल वस्त्र। 6) कन्या प्रभाव (षष्ठ भाव): ऋण–शत्रु–रोग विषय में सजग रहें; रूटीन/डायट सुधारें, विवाद टालें। उपाय–मंत्र: ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। दान: मूँग, हरी सब्ज़ियाँ, दही। 7) तुला प्रभाव (पंचम भाव): शिक्षा/एकाग्रता में विघ्न; प्रेम–सम्बन्ध/संतान विषय में धैर्य; सृजनात्मकता को संरचना दें। उपाय–मंत्र: ॐ क्लीं कृष्णाय नमः या ॐ नमो भगवते वासुदेवाय। दान: दूध, मिश्री, श्वेत पुष्प, चावल। 8) वृश्चिक प्रभाव (चतुर्थ भाव): गृह–शांति/माता–स्वास्थ्य पर ध्यान; जायदाद/वाहन–निर्णयों में विलम्ब हितकर। उपाय–मंत्र: ॐ चन्द्राय नमः, ॐ नमः शिवाय। दान: श्वेत तिल, चावल, दूध/रजत–दान (सामर्थ्यानुसार)। 9) धनु प्रभाव (तृतीय भाव): यात्राओं/कम्यूनीकेशन–कार्य में व्यवधान; सहोदर/टीम–मेलजोल में संयम। उपाय–मंत्र: ॐ बृहस्पतये नमः, ॐ नमः शिवाय। दान: पीला वस्त्र, हल्दी, पीली दाल। 10) मकर प्रभाव (द्वितीय भाव): वाणी–संयम आवश्यक; अनियोजित व्यय/निवेश से बचें; परिवार–संवाद को प्राथमिकता दें। उपाय–मंत्र: ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः, ॐ शनैश्चराय नमः। दान: काला तिल, तिल–तेल, अन्न/अन्नक्षेत्र–सेवा। 11) कुम्भ प्रभाव (लग्न भाव): स्वास्थ्य–ऊर्जा/निर्णय–क्षमता पर सीधा प्रभाव; अति–प्रतिक्रिया से बचें, दिनचर्या साधें। उपाय–मंत्र: महामृत्युंजय जप, ॐ चन्द्राय नमः। दान: श्वेत वस्त्र, चावल, दही, श्वेत पुष्प। 12) मीन प्रभाव (व्यय/द्वादश भाव): अनावश्यक खर्च/अनिद्रा; विदेश–संबंधी कार्यों में विलम्ब; ध्यान/जप से मन–स्थिरता। उपाय–मंत्र: ॐ नमो भगवते वासुदेवाय। दान: काला वस्त्र/तिल, अन्न; रोगी–सेवा/निराश्रित सहायता शुभ। संक्षिप्त अनुशंसाएँ (सभी के लिए)आज 11:00 PM–12:22 AM (पूर्णता–वेला) में जप/ध्यान का विशेष संकल्प लें; अधिकतम के आसपास (लगभग 11:41 PM) मन को एकाग्र करें। Time and Dateग्रहणोत्तर स्नान–शुद्धि, दीप–धूप, इष्ट–स्मरण तथा अन्न–वस्त्र–तिल–फल का दान करें। (परम्परागत मान्यता)
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आर्थिक स्थिति कब तक सही होगी? अच्छा रुपये पैसा कमा रहे है लेकिन अचानक आर्थिक रूप से स्थिति कमजोर होने लगे या अचानक कुछ समय से आर्थिक स्थिति कमजोर होने लगी है तब यही चिंता सताने लगती हैं कब तक कैसे आर्थिक स्थिति अच्छी होगी और क्या उपाय कर ले जिससे आर्थिक स्थिति अच्छी हो जाये आदि तो आज इसी बारे में बात करते है। कुंडली का दूसरा और ग्यारहवाँ भाव और इन भावो के स्वामी आर्थिक स्थिति के बारे में पूरी तरह जानकारी देते है दूसरा भाव पैसा जुड़ने का है तो ग्यारहवाँ भाव कमाई का है।अब दूसरे भाव स्वामी कुंडली मे पीड़ित हैं या पाप ग्रहों से या कुंडली के अशुभ योगों से सम्बन्ध में है तब जब दूसरे भाव स्वामी की दशा अन्तर्दशा शुरू होती हैं तब आर्थिक रूप से धन की हानि, जुड़ा हुआ रुपये पैसा भी निकल जाता है।अब ग्यारहवाँ भाव और ग्यारहवे भाव स्वामी होते है कमाई के, धन आगमन के, अब ग्यारहवें भाव स्वामी और ग्यारहवाँ भाव कुंडली मे अच्छी स्थिति में है लेकिन किसी तरह के अशुभ योगों में ग्यारहवें भाव स्वामी हैं तब ऐसी स्थिति में अचानक जब ग्यारहवे भाव स्वामी ग्रहो की दशाएँ शुरू होते ही कमाई में गिरावट, धन स्थिति कमजोर होने लगती है और जब तक ग्रहदशाये खराब चलती हैं , कमाई और धन की कमजोर बनी रहती है। ऐसी स्थिति में ग्यारहवे भाव स्वामी या ग्यारहवे भाव से सम्बन्ध बना रहे अनुकूल ग्रहो की दशाएँ शुरू होंगी तब धीरे धीरे आर्थिक स्थिति अनुकूल और अच्छी होनी चालू होगी, इसके अलावा उपाय कर लेने के बाद स्थिति धन की अनुकूल होनी चालू होगी। अब कुछ उदाहरणों से समझते है उदाहरण वृष लग्न में ग्यारहवे भाव स्वामी गुरु तो दूसरे भाव स्वामी बुध है अब गुरु और बुध दोनों अगर कुंडली में अच्छी स्थिति में है और दूसरे/ग्यारहवे भाव भी अच्छी स्थिति में है तब यहाँ ग्यारहवे और दूसरे भाव स्वामी की अनुकूल दशा अन्तर्दशाये शुरू होंगी तब आर्थिक स्थिति ठीक होनी चालू होंगी, इसके अलावा उपाय करने से भी आर्थिक स्थिति को अनुकूल किया जा सकता है। उदाहरण सिंह लग्न में दूसरे और ग्यारहवे भाव स्वामी बुध कुंडली मे बलवान स्थिति में अगर है और दूसरा/ग्यारहवाँ भाव भी अच्छी स्थिति में हैं तब आर्थिक स्थिति तो अच्छी रहेगी पर किसी कारण से अशुभ ग्रहदशाये कुंडली मे शुरू हो गई है तब अशुभ ग्रहदशाओ के कारण दिक्कते आर्थिक रूप से आएगी जब तक समय खराब ग्रहो का रहेगा तब तक, फिर जब दूसरे और ग्यारहवे भाव सम्बन्धी अनुकूल ग्रहो की दशाएँ शुरू होंगी तब आर्थिक स्थिति खुद सही होने लगेगी इसके अलावा उपाय आर्थिक ग्रहो संबंधी करने से स्थिति में सुधार होने लगेगा। उदाहरण कुम्भ लग्न में दूसरे और ग्यारहवे भाव स्वामी गुरु कुंडली मे मजबूत है और दूसरा और ग्यारहवे भाव भी मजबूत है तब आर्थिक स्थिति इस हिसाब से कुंडली मे ठीक है पर यहाँ ग्रहो का गोचर दूसरे और ग्यारहवे भाव पर अशुभ आ गया हैं और ग्रहदशा भी अशुभ फल देने वाले ग्रहो की इस समय आ गई हैं तब आर्थिक स्थिति में बाधा और धन कमाई होने में दिक्कते बनने लगेगी आदि, अब दूसरा भाव ग्यारहवाँ भाव और गुरु बलवान है कुंडली मे अब जब दूसरे ,ग्यारहवे भाव स्वामी या इन भावों से सम्बंधित ग्रहो की जब अनुकूल/शुभ फल देने वाले ग्रहो की दशाएँ शुरू होंगी तब आर्थिक स्थिति सही होनी और आर्थिक रूप से सुधार होना शुरू होगा। अगर लंबे समय तक ग्रहदशाओ के खराब रहने के कारण आर्थिक स्थिति खराब या कमजोर होती जा रही है तब उपाय आर्थिक ग्रहो संबंधी करने से आर्थिक रूप से स्थिति अच्छी होने लगेगी।
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क्या आप अपने गोत्र की असली शक्ति को जानते हैं? यह कोई परंपरा नहीं है। कोई अंधविश्वास नहीं है। यह आपका प्राचीन कोड है। मानो आपका अतीत इसी पर टिका हो। 1. गोत्र आपका उपनाम नहीं है। यह आपकी आध्यात्मिक डीएनए है।पता है सबसे अजीब क्या है?अधिकतर लोग जानते ही नहीं कि वे किस गोत्र से हैं।हमें लगता है कि यह बस एक लाइन है जो पंडितजी पूजा में कहते हैं। लेकिन यह सिर्फ इतना नहीं है।आपका गोत्र दर्शाता है — आप किस ऋषि की मानसिक ऊर्जा से जुड़े हुए हैं।खून से नहीं, बल्कि विचार, ऊर्जा, तरंग और ज्ञान से।हर हिंदू आध्यात्मिक रूप से एक ऋषि से जुड़ा होता है।वो ऋषि आपके बौद्धिक पूर्वज हैं।उनकी सोच, ऊर्जा, और चेतना आज भी आपमें बह रही है। 2. गोत्र का अर्थ जाति नहीं होता।आज लोग इसे गड़बड़ा देते हैं।गोत्र ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र नहीं दर्शाता।यह जातियों से पहले, उपनामों से पहले, राजाओं से भी पहले अस्तित्व में था।यह सबसे प्राचीन पहचान का तरीका था — ज्ञान पर आधारित, शक्ति पर नहीं।हर किसी का गोत्र होता था।ऋषि अपने शिष्यों को गोत्र देते थे जब वे उनकी शिक्षाओं को ईमानदारी से अपनाते थे।इसलिए, गोत्र कोई लेबल नहीं — यह आध्यात्मिक विरासत की मुहर है। 3. हर गोत्र एक ऋषि से जुड़ा होता है — एक “सुपरमाइंड” (Supermind) से मान लीजिए आप वशिष्ठ गोत्र से हैं — तो आप वशिष्ठ ऋषि से जुड़े हैं, वही जिन्होंने श्रीराम और दशरथ को मार्गदर्शन दिया था।भृगु गोत्र?आप उस ऋषि से जुड़े हैं जिन्होंने वेदों का हिस्सा लिखा और योद्धाओं को प्रशिक्षण दिया।कुल 49 मुख्य गोत्र हैं — हर एक ऋषियों से जुड़ा जो ज्योतिषी, वैद्य, योद्धा, मंत्रद्रष्टा या प्रकृति वैज्ञानिक थे। 4. क्यों बुज़ुर्ग एक ही गोत्र में विवाह मना करते थे? यह बात स्कूल में नहीं सिखाई जाती।प्राचीन भारत में गोत्र एक जेनेटिक ट्रैकर था।यह पितृवंश से चलता है — यानी पुत्र ऋषि की लाइन आगे बढ़ाते हैं।इसलिए अगर एक ही गोत्र के दो लोग विवाह करें, तो वे आनुवंशिक रूप से भाई-बहन जैसे होंगे।इससे संतान में मानसिक और शारीरिक विकार आ सकते हैं। गोत्र व्यवस्था = प्राचीन भारतीय डीएनए विज्ञानऔर यह हम हजारों साल पहले जानते थे — जब पश्चिमी विज्ञान को जेनेटिक्स का भी अंदाजा नहीं था। 5. गोत्र = आपका मानसिक प्रोग्रामिंगचलो इसे व्यक्तिगत बनाते हैं।कुछ लोग गहरे विचारक होते हैं।कुछ में गहरी आध्यात्मिक भूख होती है।कुछ को प्रकृति में शांति मिलती है।कुछ नेता या सत्य के खोजी होते हैं।क्यों?क्योंकि आपके गोत्र के ऋषि का मन आज भी आपके अंदर गूंजता है।अगर आपका गोत्र किसी योद्धा ऋषि का है — आपको साहस महसूस होगा।अगर वह किसी वैद्य ऋषि से है — तो आयुर्वेद या चिकित्सा में रुचि हो सकती है।यह संयोग नहीं — यह गहराई से जुड़ा प्रोग्राम है। 6. पहले गोत्र के आधार पर शिक्षा दी जाती थीप्राचीन गुरुकुलों में सबको एक जैसा नहीं सिखाया जाता था।गुरु का पहला प्रश्न होता था:“बेटा, तुम्हारा गोत्र क्या है?”क्यों?क्योंकि इससे गुरु समझ जाते थे कि छात्र कैसे सीखता है, कौन सी विद्या उसके लिए उपयुक्त है।अत्रि गोत्र वाला छात्र — ध्यान और मंत्रों में प्रशिक्षित होता।कश्यप गोत्र वाला — आयुर्वेद में गहराई से जाता।गोत्र सिर्फ पहचान नहीं, जीवनपथ था। 7. ब्रिटिशों ने इसका मज़ाक उड़ाया, बॉलीवुड ने हंसी बनाई, और हमने इसे भुला दियाजब ब्रिटिश भारत आए, उन्होंने इसे अंधविश्वास कहा।फिर फिल्मों में मज़ाक बना —“पंडितजी फिर से गोत्र पूछ रहे हैं!” — जैसे यह कोई बेमतलब रस्म हो।धीरे-धीरे हमने अपने बुज़ुर्गों से पूछना छोड़ दिया।अपने बच्चों को बताना छोड़ दिया।100 साल में 10,000 साल पुरानी व्यवस्था लुप्त हो रही है।उसे किसी ने खत्म नहीं किया। हमने ही उसे मरने दिया। 8. अगर आप अपना गोत्र नहीं जानते — तो आपने एक नक्शा खो दिया हैकल्पना कीजिए कि आप किसी प्राचीन राजघराने से हों — पर अपना उपनाम तक नहीं जानते।आपका गोत्र = आपकी आत्मा का GPS है।सही मंत्रसही साधनासही विवाहसही मार्गदर्शनइसके बिना हम अपने ही धर्म में अंधे होकर चल रहे हैं। 9. गोत्र की पुकार सिर्फ रस्म नहीं होतीजब पंडित पूजा में आपका गोत्र बोलते हैं, तो वे सिर्फ औपचारिकता नहीं निभा रहे।वे आपको आपकी ऋषि ऊर्जा से दोबारा जोड़ रहे होते हैं।यह एक पवित्र संवाद होता है:“मैं, भारद्वाज ऋषि की संतान, अपने आत्मिक वंशजों की उपस्थिति में यह संकल्प करता हूँ।”यह सुंदर है। पवित्र है। सच्चा है। 10. इसे फिर से जीवित करो — इसके लुप्त होने से पहलेअपने माता-पिता से पूछो।दादी-दादा से पूछो।शोध करो, पर इसे जाने मत दो।इसे लिखो, अपनी संतानों को बताओ। गर्व से कहो:आप सिर्फ 1990 या 2000 में जन्मे इंसान नहीं हैं —आप एक ऐसी ज्योति के वाहक हैं जो हजारों साल पहले किसी ऋषि ने जलाई थी। 11. आपका गोत्र = आत्मा का पासवर्ड आज हम वाई-फाई पासवर्ड, नेटफ्लिक्स लॉगिन याद रखते हैं…पर अपने गोत्र को भूल जाते हैं।वो एक शब्द — आपके भीतर की चेतना आदतें पूर्व कर्मआध्यात्मिक शक्तियां…सब खोल सकता है।यह लेबल नहीं — यह चाबी है। 12. महिलाएं विवाह के बाद गोत्र “खोती” नहीं हैं लोग सोचते हैं कि विवाह के बाद स्त्री का गोत्र बदल जाता है। पर सनातन धर्म सूक्ष्म है।श्राद्ध आदि में स्त्री का गोत्र पिता से लिया जाता है।क्योंकि गोत्र पुरुष रेखा से चलता है (Y-क्रोमोज़ोम से)।स्त्री ऊर्जा को वहन करती है, लेकिन आनुवंशिक रूप से उसे आगे नहीं बढ़ाती।इसलिए स्त्री का गोत्र समाप्त नहीं होता — वह उसमें मौन रूप से जीवित रहता है। 13. स्वयं ईश्वर ने धरती पर अवतार लेकर गोत्र का पालन किया रामायण में श्रीराम और सीता जी के विवाह में भी गोत्र जांचा गया श्रीराम: इक्ष्वाकु वंश, वशिष्ठ गोत्र सीता माता: जनक की पुत्री, कश्यप गोत्र जय सिया राम
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सभी देशवासियों को गुरुपूर्णिमा महर्षि वेदव्यास जयंती की असीम एवं हार्दिक शुभकामनाएं………..! हिंदू धर्म में गुरु पूर्णिमा का खास महत्व है। ज्योतिष पंचांग के अनुसार हर साल गुरु पूर्णिमा का पर्व आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि के दिन मनाये जाने का विधान है। इस तिथि को आषाढ़ पूर्णिमा, व्यास पूर्णिमा और वेद व्यास जयंती के नाम से भी जाना जाता है। साथ ही इस दिन महान गुरु महर्षि वेदव्यास जिन्होंने ब्रह्मसूत्र, महाभारत, श्रीमद्भागवत और अट्ठारह पुराण जैसे अद्भुत साहित्यों की रचना की उनका जन्म हुआ था। साथ ही इस दिन गुरु पूजन करने का खास महत्व है। साथ ही इस शुभ अवसर पर पवित्र नदी में स्नान और दान करने का विशेष महत्व है।जहां इस दिन को वेद व्यास जी की जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। वहीं लोग गुरु पूजन करते हैं। साथ ही गुरु को उपहार में फल, वस्त्र और मिष्ठान देते हैं। वहीं इस दिन सत्यनारायण भगवान की कथा घर पर कराना शुभ रहता है। गुरु पूर्णिमा की तिथि, शुभ मुहूर्त और धार्मिक महत्व- गुरु पूर्णिमा २०२५ तिथि-ज्योतिष पंचांग के मुताबिक आषाढ़ माह की पूर्णिमा तिथि की शुरुआत १० जुलाई को रात ०१ बजकर ३७ मिनट पर होगी और अगले दिन यानी ११ जुलाई रात को ०२ बजकर ०७ मिनट पर तिथि खत्म होगी। इस प्रकार से १० जुलाई को गुरु पूर्णिमा का पर्व मनाया जाएगा। गुरु पूर्णिमा २०२५ शुभ मुहूर्त -ब्रह्म मुहूर्त- सुबह ४:१०-४:५० बजे तक। अभिजीत मुहूर्त- सुबह ११:५९- १२:५४ बजे तक। विजय मुहूर्त- दोपहर १२:४५- ०३:४० बजे तक। गोधूलि मुहूर्त- शाम ०७:२१- ०७:४१ बजे तक। गुरु पूर्णिमा का महत्व-गुरु पूर्णिमा के दिन सभी गुरुओं को नमन किया जाता है। गुरु पूर्णिमा के अगले दिन से सावन मास प्रारंभ हो जाता है, जिसका उत्तर भारत में बहुत महत्व है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, आषाढ़ माह की पूर्णिमा तिथि पर भगवान वेद व्यास का जन्म हुआ था। इसलिए इस तिथि पर गुरु पूर्णिमा के पर्व को मनाया जाता है। महर्षि वेद व्यास ने कई वेदों और पुराणों की रचना की । इस खास अवसर पर भगवान विष्णु, मां लक्ष्मी और वेद व्यास जी की पूजा-अर्चना करने का खास महत्व है। वहीं गुरु की हमारे जीवन में महत्व को समझाने के लिए गुरु पूर्णिमा का पर्व मनाया जाता है। गुरु पूर्णिमा पर लोग अपने गुरुओं को उपहार देते हैं और उनका आर्शीवाद लेते हैं। ।। श्री गुरुवे नमः ।।
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जन्मकुंडली मे स्थित ग्रह अशुभ कारक देते है तब उनका निदान करना जरुरी होता है | आप अपनी राशि अनुसार, राशि स्वामी ग्रह को जाने और अपनी राशि के स्वामी ग्रह का उपाय करके या आपकी जन्म कुंडली में स्थित पीडित ग्रहों के उपाय करके दुष्प्रभावो से बच सकते है | सूर्य ग्रह दोष: इस ग्रह के दोष से पेट, आँख, हृदय का रोग हो सकता है | यह सरकारी और मानहानि हानि देने वाला करक है | उपाय :प्रतिदिन सुबह स्नान के बाद सूर्य नमस्कार करे,सुर्याष्टकम् का पाठ करे, सूर्य गायत्री मंत्र का जाप करे | जरुरतमंद को गेहूँ और गूड का दान करे | चन्द्र ग्रह दोष : चन्द्र दोष के कारण मन मे अशांति रहती है, माता के साथ मतभेद होते है,कभी-कभी मानसिक स्थिति खराब हो जाती है | उपाय :चन्द्र दोष से बचने के लिए सोमवार को शिव पूजा करे | शिव मंत्र जैसे ॐ नमः शिवाय और महामृत्युञ्जय मंत्र का जप करे | सोमवार को सफेद चीजो जैसे दूध दही चावल आदि का दान करे | ॐ सोम सोमाय नमः का 108 बार असली रुद्राक्ष की माला से जप करे | मंगल ग्रह दोष : जिसे मंगल दोष होता है उसे गुस्सा अधिक आना , चिढचिड़ापन स्वभाव हो जाता है | मंगल रक्त सम्बन्धी बीमारी , उच्च रक्तचाप देने वाला है | उपाय :लाल रंग की माला से ॐ अं अंगारकाय नमः का सही विधि से मंत्र जप करे | हनुमान जी के मंत्र और हनुमान चालिसा का पाठ भी शुभ माना जाता है | बुध ग्रह दोष : बुध ग्रह के दोष के कारण वाणी कठोर रहती है,पढ़ाई मे समस्या रहती है,बहन,बुआ के साथ मतभेद हो जाते है,व्यवसाय मे नुकसान का सामना करना पड सकता है | उपाय : ॐ बुं बुधाय नमः मंत्र जप करे | भगवान गणेश की स्तुति करे और बुधवार को गणेश को दुर्वा चढ़ए | गौ माँ को सुबह हरी घास खिलाये | गुरु ग्रह दोष: गुरु ग्रह के दोष के कारण मोटापे का शिकार हो सकते है,शिक्षा प्राप्ति में बाधा उत्पन्न हो सकती है,मान-सम्मान मे कमी हो सकती है | उपाय : अपने सिर पर केसर का तिलक लगाये | हल्दी की गाँठ जेब में रखे | केले , पीली दाल , पीले वस्त्रो का गुरूवार को दान करे | गुरु बृहस्पति के मंत्र का जाप करे | शुक्र ग्रह दोष: शुक्र ग्रह के दोष के कारण वैवाहिक जीवन में कलह उत्पन्न हो सकता है,दरिद्रता का सामना करना पड सकता है,संतान प्राप्ति में बाधा | उपाय : शुक्र देव के मन्त्र का जप करे | माँ लक्ष्मी की पूजा अर्चना करे | उन्हें कमल के पुष्प अर्पित करे | गरीब बच्चो को खाना खिलाये | शनि ग्रह दोष : इस ग्रह के कारण काम बहुत ही धीरे धीरे होते है | घर और वाहन क्षतिग्रस्त हो सकता है | अकस्मात दुर्घटना हो सकती है | उपाय : पीपल के पेड के नीचे शनिवार की शाम को सरसो के तेल का दिपक प्रज्वलित करे, नौकर,मजदूरों को यथाशक्ति दान करे, मामा-चाचा से लडाई-झगडा ना करे,कभी झुठी गवाही ना दे, शनिवार के दिन पीपल के पेड की परिक्रमा करके शनि मंत्र का रुद्राक्ष की माला पर जाप करे | राहु ग्रह दोष: यह शत्रु बढ़ाने वाला है | अचानक दुर्घटना कराने वाला ग्रह है | यह दिमाग के संतुलन को बिगाड़ देता है | उपाय :ॐ रं राहवे नमः मंत्र का जप करे | बहते पाने में दूध और कोयले को बहाए | हनुमान जी के 12 नाम पढ़े और सुन्दरकाण्ड का पाठ करे | केतु ग्रह दोष : यह चर्म रोग, मानसिक तनाव, वाणी में कठोरता लाने वाला कारक है | यह शत्रुता बढ़ाने वाला ग्रह दोष है | उपाय :काले तिल का दान करे | हनुमान जी को चोला चढ़ाये | मंदिर में झंडा दान करे |
इसप्रकार प्राप्त करे ग्रहों के शुभ फल Graho ke shubh fal Read Post »
पिता पुत्र में टकराव के ज्योतिष कारण और उपाय पिता-पुत्र के संबंधों में टकराव का कारण केवल मानसिकता या परिस्थितियाँ ही नहीं, बल्कि जन्म कुंडली में छिपी ग्रहों की द्वंद्वात्मक स्थिति और पूर्व जन्म के कर्मफल भी होते हैं। भृगु नाड़ी ज्योतिष में विश्लेषण ग्रहों के संबंध और वेद से होता है, विशेषकर:सूर्य = पिता, चंद्र = माता, मंगल = संतान/पुत्र, शनि = पीढ़ी टकराव सूर्य के बाद मंगल या शनि हों, तो पिता और पुत्र के बीच अहम टकराव, अलग दृष्टिकोण और संघर्ष मंगल, सूर्य को वेध दे तो पुत्र का व्यवहार आक्रामक या असहमति पूर्ण हो सकता है शनि सूर्य को वेध दे = पीढ़ी संघर्ष, नई और पुरानी पीढ़ी दरमियान सोच की टकराहट इस स्थिति में पिता को लगता है पुत्र सम्मान नहीं देता, और पुत्र को लगता है पिता दबाव डालते हैं जैमिनी पद्धति से – पिता-पुत्र संबंध पिता का कारक = सूर्य पुत्र का कारक = मंगल पुत्र के लिए जातक का पंचम भाव, और पिता के लिए नवम भाव सूर्य पर राहु या शनि की दृष्टि हो → पिता से दूरी या अहंकार टकराव ( आत्मकारक ) और पंचमेश / मंगल में संबंध न हो → पुत्र की बात को आत्मा स्वीकार नहीं करती, नवम पर पाप दृष्टि हो या निर्बल हो → पिता का अपमान या अशांत संबंध पिता-पुत्र टकराव के मुख्य ज्योतिषीय संकेत सूर्य – शनि युति या दृष्टि | सम्मान बनाम अहंकार की लड़ाई मंगल – सूर्य द्वंद्व , क्रोध, गुस्सा, टकराव पंचम भाव पीड़ित | संतान के साथ मतभेद आत्म कारक और पितृ कारक में द्वेष | आत्मिक दूरी, पूर्व जन्म कर्म फल ( अरुढ नवम ) पर पाप दृष्टि | परिवार और संबंध में अशांति ज्योतिषीय उपाय – पिता-पुत्र संबंध सुधार के लिए सूर्य शांति उपाय (पिता के लिए):– प्रतिदिन सूर्योदय में जल चढ़ाएं– ॐ घृणि सूर्याय नमः का 108 बार जप– रविवार को गेहूं, लाल वस्त्र, गुड़ का दान | मंगल शांति उपाय (पुत्र के लिए):– मंगलवार को हनुमान जी का दर्शन और ॐ अंगारकाय नमः का जप– रक्तदान करें (यदि स्वास्थ्य अनुकूल हो)– भाई, पिता या पुरुषों के साथ विनम्रता रखें | शनि का सामंजस्य हेतु उपाय (यदि टकराव लम्बा चल रहा है):– ॐ शं शनैश्चराय नमः – शनिवार को– पीपल वृक्ष के नीचे दीपक जलाना– पुराने वस्त्र या जूते दान करें | मानसिक और आध्यात्मिक अभ्यास:शिव-पार्वती का पारिवारिक पूजन पारिवारिक एकता में अत्यंत सहायक है आदित्य ह्रदय स्तोत्र का पाठ दोनों में सूर्य तत्व को सुदृढ़ करता है |
जन्म कुंडली में स्थित किस दोष के कारण होते हैं पिता और पुत्र में मतभेद Read Post »
विवाह होने में देरी या शादीशुदा जीवन में तनाव काफी सारे लोगों के साथ यह समस्या होती है कि प्रेम संबंध को विवाह में बदलने में बाधा आती है, या फिर कुछ मामलो में शादी के योग्य होने के बाद भी रिश्ता नहीं आता जबकि कुछ लोगों को उनके शादीशुदा जीवन में समस्या के अनुभव होते हैं जिनका कारण सास बहु के बीच तनाव या फिर पति पत्नी के बीच आपसी तनाव भी कारण हो सकता है | जब भी जन्म कुंडली में चंद्रमा पर उसके शत्रु ग्रह का प्रभाव होता है तो व्यक्ति को प्रेम संबंध या शादीशुदा जीवन में इस तरह की समस्या के अनुभव होते हैं और अगर चंद्रमा की शुभता के उपाय ना किये जाए तो उस रिश्ते में अलगाव या तलाक की स्थिति भी बन जाती है | चंद्रमा के अशुभ पहलु की बात करें तो जब जन्म कुंडली में चंद्रमा पर बुध या शुक्र का प्रभाव होता है तो अशुभता के लक्ष्ण इस प्रकार हैं:- व्यक्ति को शिक्षा प्राप्ति में कठिनाई के अनुभव होते हैं | घर में अशांति के वातावरण से मनमुटाव और झगड़े बढ़ते हैं | व्यक्ति की माता को निंदा, रोक टोक की आदत हो सकती है | व्यक्ति के प्रेम संबंध और वैवाहिक जीवन प्रभावित होता है | दुकान कारोबार में आर्थिक नुक्सान होता है | उपाय: बुध शांति के लिए अष्टमी तिथि के दिन कन्या पूजन करना चाहिए | बुध शांति के लिए कागज़ की नाव बना कर चलते पानी में बहा देनी चाहिए | शुक्र शांति के लिए सात तरह का अनाज दान करना चाहिए | शुक्र शांति के लिए गोशाला में जाकर दान पुन्य करना चाहिए | चंद्रमा की मजबूती के लिए चांदी का चोकोर सिक्का अपने साथ रखना चाहिए | चंद्रमा की शुभता के लिए अमावस्या के दिन पवित्र नदी में स्नान करना चाहिए | चंद्रमा के अशुभ पहलु की बात करें तो जब जन्म कुंडली में चंद्रमा पर शनि या केतु का प्रभाव होता है तो अशुभता के लक्ष्ण इस प्रकार हैं :- व्यक्ति की 24 वर्ष आयु के बाद माता का स्वास्थ्य खराब होता है | व्यक्ति की माता को समाज में सम्मान की कमी के अनुभव होते हैं | विवाह योग्य होने के बाद भी शादी के लिए रिश्ते नहीं आते | प्रेम संबंध को शादी में बदलने में बाधा आती है | व्यक्ति को गलत फैसलों से आर्थिक नुक्सान होते हैं | उपाय: शनि की शांति के लिए सरसों के तेल में चेहरा देख कर दान करना चाहिए | शनि की शांति के लिए सरसों के तेल में 2 लॉन्ग डाल कर दीपक जलाना चाहिए | केतु की शांति के लिए सात तरह का अनाज दान करना चाहिए | केतु की शांति के लिए चलने फिरने में असमर्थ लोगों को दान पुन्य करना चाहिए | चंद्रमा की मजबूती के लिए चांदी का चोकोर सिक्का अपने साथ रखना चाहिए | चंद्रमा की शुभता के लिए अमावस्या के दिन पवित्र नदी में स्नान करना चाहिए |
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