भगवान श्री गणेश का अद्भुत स्तोत्र जिसके पठन के प्रभाव से होती है आपकी यात्रा सफल और होता है यात्रा का उद्देश्य सफल ! श्री गणेशमहिम्न: स्तोत्र (श्रीपुष्पदन्तविरचितं) भगवान् शिव एवं गणपति के अनन्य भक्त श्रीपुष्पदन्तजी द्वारा विरचित इस स्तोत्र में भगवान् गणेश की महिमा का विस्तृत वर्णन इकत्तीस (31) श्लोकों में किया गया है । स्तोत्र पाठ के लाभ :आत्मानन्द की प्राप्ति । यात्रा की निर्विघ्न पूर्ति तथा उद्देश्य की प्राप्ति । मोक्ष प्राप्ति । विद्या-ऐश्वर्य तथा धन की प्राप्ति । सुलक्षणा पत्नी एवं सुपुत्र की प्राप्ति । श्रीगणेशमहिम्न: स्तोत्र हिन्दी अर्थ सहित।। अनिर्वाच्यं रूपं स्तवननिकरो यत्र गणित स्तथा वक्ष्ये स्तोत्रं प्रथमपुरुषस्यात्र महतः। यतो जातं विश्वं स्थितमपि सदा यत्र विलयः स कीदृग्गीर्वाणः सुनिगमनुतः श्रीगणपतिः ॥१॥ श्रीगणेशजी का रूप अनिर्वचनीय है और जिनकी अनेक स्तुतियाँ की गयी हैं तथापि उन महत्तम परम पुरुष का स्तवन् करने को मैं उद्यत हूँ। जिनसे संसार की उत्पत्ति, स्थिति तथा संहारादि कार्य सदा होते रहते हैं, उन वेदवन्दित भगवान् श्रीगणपति की स्तुति वाणी से कैसे सम्भव है ? गणेशं गाणेशाः शिवमिति च शैवाश्च विबुधा, रविं सौरा विष्णुं प्रथमपुरुषं विष्णुभजकाः। वदन्त्येके शाक्ता जगदुदयमूलां परशिवां, न जाने किं तस्मै नम इति परं ब्रह्म सकलम् ॥२॥ जिन्हें भगवान् गणेश के भक्त गणेश कहते हैं, शिव के विद्वान् भक्त शिव कहते हैं, सूर्य के भक्त सूर्य कहते हैं, विष्णु के भक्त प्रथम पुरुष विष्णु कहते हैं, शक्ति की उपासना करने वाले जगत् की उत्पत्ति का मूल पराशक्ति शिवा कहते हैं, मुझे ज्ञात नहीं वे वस्तुतः क्या हैं ? उन सम्पूर्ण कलायुक्त परब्रह्म को मेरा नमस्कार है । तथेशं योगज्ञा गणपतिमिमं कर्म निखिलं, समीमांसा वेदान्तिन इति परं ब्रह्म सकलम् । अजां साङ्ख्यो ब्रूते सकलगुणरूपां च सततं प्रकर्तारं न्यायस्त्वथ जगति बौद्धा धियमिति ॥३॥ इन श्री गणपति को ही योग के तत्त्व को जानने वाले ईश्वर कहते हैं, पूर्वमीमांसक सम्पूर्ण कर्म कहते हैं, (उत्तर मीमांसक) वेदान्ती लोग पूर्ण परब्रह्म कहते हैं, सांख्यवादी सर्वगुणमयी अनादि प्रकृति कहते हैं, नैयायिक लोग संसार का कर्ता मानते हैं और बौद्ध लोग बुद्धि कहते हैं । कथं ज्ञेयो बुद्धेः परतर इयं बाह्यसरणिर्यथा धीर्यस्य स्यात्स च तदनुरूपो गणपतिः । महत्कृत्यं तस्य स्वयमपि महान् सूक्ष्ममणुवद् धृतिर्ज्योतिर्बिन्दुर्गगनसदृशः किञ्च सदसत् ॥४॥ उस परतर परमात्मा के वास्तविक रूप का ज्ञान बुद्धिगम्य नहीं है, क्योंकि यह बुद्धि के बाहर की बात है। जिसकी जैसी धारणा होती है, उसे गणपति उसी रूप में प्राप्त होते हैं। उनके कृत्य महान् हैं, वे स्वयं भी महत्तम तथा अणु से भी सूक्ष्मतम हैं। धृति, ज्योति, बिन्दु, आकाश आदि सब उन्हीं के रूप हैं। वे ही सत् तथा असत् रूप से सर्वत्र विद्यमान हैं । अनेकास्योऽपाराक्षिकरचरणोऽनन्तहृदय-स्तथा नानारूपो विविधवदनः श्रीगणपतिः । अनन्ताह्व: शक्त्या विविधगुणकर्मैकसमये त्वसङ्ख्यातानन्ताभिमतफलदोऽनेकविषये ॥५॥ श्री गणपति अनेक मुखों से युक्त हैं, अपार नेत्र, हाथ तथा चरणों वाले हैं, वे अनन्त हृदय वाले हैं, विविध रूपों वाले हैं, विविध प्रकार के मुखों वाले हैं, उनके न नामों का अन्त है और न शक्ति का अन्त है, क्योंकि नाना प्रकार के गुण एवं कर्मों का सम्पादन वे एक काल में करते हैं । अपने भक्तों को अनेक प्रकार के असंख्य, अनन्त मनोवांछित फल वे एक साथ प्रदान करते रहते हैं । न यस्यान्तो मध्यो न च भवति चादिः सुमहता- मलिप्तः कृत्वेत्थं सकलमपि खंवत् स च पृथक् । स्मृतः संस्मतॄणां सकलहृदयस्थः प्रियकरो नमस्तस्मै देवाय सकलसुरवन्द्याय महते ॥६॥ परमात्मास्वरूप श्रीगणेशजी का न आदि है, न अन्त है और न मध्य है। वे सब कुछ करते हुए भी आकाश की तरह अलिप्त रहते हैं । वे स्मरण करने वाले भक्तों द्वारा सदा वन्दित होकर उनके हृदयों में अन्तर्यामी रूप से विराजमान रहते हैं तथा उनका कल्याण करते रहते हैं। सभी देवताओं के वन्दनीय उन महान् देव को मेरा नमस्कार है । गणेशाद्यं बीजं दहनवनितापल्लवयुतं मनुश्चैकार्णोऽयं प्रणवसहितोऽभीष्टफलदः । सबिन्दुश्चाङ्गाद्यां गणकऋषिछन्दोऽस्य च निचृत्, स देवः प्राग्बीजं विपदपि च शक्तिर्जपकृताम् ॥७॥ हे गणेश ! आपका मूल बीजमन्त्र (गं) एकाक्षर है, जो बिन्दु, अंगादि और प्रणव के सहित अभीष्ट फल को प्रदान करता है। इस मन्त्र के ऋषि गणक, छन्द निचृत् एवं देवता गणपति हैं। विपत्तिकाल में बीजाक्षर सहित इस मन्त्र (ॐ गं गणपतये नमः) का जप करने से भक्तों को शक्ति प्राप्त होती है । गकारो हेरम्बः सगुण इति पुन्निर्गुणमयो, द्विधाऽप्येको जातः प्रकृतिपुरुषो ब्रह्म हि गणः । स चेशश्चोत्पत्तिस्थितिलयकरोऽयं प्रथमको, यतो भूतं भव्यं भवति पतिरीशो गणपतिः ॥८॥ गकार हेरम्ब (माता अम्बा के पुत्र) सगुण प्रकृति तत्त्व हैं और निर्गुण पुरुषतत्त्व भी हैं। एक होते हुए भी प्रकृति और पुरुष रूप में दो प्रकार से विभक्त हुआ वह ब्रह्म ही गण है। वे ही परमात्मा उत्पत्ति, स्थिति तथा प्रलय करने वाले हैं, वे गणपति ही आदिदेव हैं, जिनसे भूत, भविष्य तथा वर्तमान होते हैं, ये गणपति सबके पति तथा ईश हैं । गकारः कण्ठोर्ध्वं गजमुखसमो मर्त्यसदृशो णकारः कण्ठाधो जठरसदृशाकार इति च । अधोभागः कट्यां चरण इति हीशोऽस्य च तनु- र्विभातीत्थं नाम त्रिभुवनसमं भूर्भुवः सुवः ॥९॥ गजमुखाकार ‘ग’ कण्ठ के ऊर्ध्वभाग में स्थित मृत्युलोक सदृश है, ‘णकार’ जठराकार होकर कण्ठ के अधोभाग में स्थित है और शकार कटि के अधोभाग में चरण बनकर स्थित है। इस प्रकार श्रीगणपति का गणेश नाम भूर्भुवः तथा सुवरूप त्रिभुवन के समान सुशोभित हो रहा है । गणेशेति त्र्यर्णात्मकमपि वरं नाम सुखदं, सकृत्प्रोच्चैरुच्चारितमिति नृभिः पावनकरम् । गणेशस्यैकस्य प्रतिजपकरस्यास्य सुकृतं, न विज्ञातो नाम्नः सकलमहिमा कीदृशविधः ॥१०॥ तीन वर्णों का जो यह ‘गणेश’ ऐसा सुखद एवं सुन्दर नाम है, वह मनुष्यों के द्वारा एक बार भी उच्च स्वर से उच्चारण किये जाने पर उन्हें पवित्र कर देता है। एक बार भी ‘गणेश’ नाम का जप करने वाले का पुण्य फल नहीं जाना जा सकता है, तो उनके नाम की सम्पूर्ण महिमा कितनी है, इसे कौन जान सकता है । गणेशेत्याह्वां यः प्रवदति मुहुस्तस्य पुरतः, प्रपश्यंस्तद्वक्त्रं स्वयमपि गणस्तिष्ठति तदा । स्वरूपस्य ज्ञानं त्वमुक इति नाम्नास्य भवति, प्रबोधः सुप्तस्य त्वखिलमिह सामर्थ्यममुना ॥११॥ जिस भक्त की जिह्वा में ‘गणेश’ ऐसा नाम उच्चरित होता है, सम्पूर्ण गणरूपा सृष्टि उसके सामने उसके मुख की ओर बार-बार निहारती रहती है। इस नाम जप में स्वरूप ज्ञान कराने का ऐसा सामर्थ्य है – जैसे किसी सोये हुए व्यक्ति को उसका नाम लेकर पुकारने पर हो जाता है । गणेशो विश्वेऽस्मिन्स्थित इह च विश्वं गणपतौ गणेशो यत्रास्ते धृतिमतिरमैश्वर्यमखिलम् । समुक्तं नामैकं गणपतिपदं मङ्गलमयं तदेकास्यं दृष्टेः सकलविबुधास्येक्षणसमम् ॥१२॥ ब्रह्मरूप श्रीगणपति सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त हैं एवं सम्पूर्ण विश्व उन गणपति में व्याप्त है। जहाँ मूर्तिमान् श्रीगणेशजी अधिष्ठित होते हैं, वहाँ नैसर्गिक